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   Dr. Balram Shukla Awarded by Pratap Narayan Young Literary Award

हलचल

डॉ. बलराम शुक्ल प्रताप नारायण युवा साहित्यकार सम्मान से सम्मानित

  • काव्य डेस्क, नई दिल्ली (अमर उजाला)
साहित्यकार डॉ. बलराम शुक्ल को प्रतिष्ठित भाऊराव देवरस सेवा न्यास ने वर्ष 2017 के पंडित प्रताप नारायण युवा साहित्यकार सम्मान से नवाजा है। संस्कृत भाषा और साहित्य में मौलिक रचनात्मकता के लिए यह सम्मान विधानसभाध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित ने उत्तर-प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ में सोमवार को आयोजित कार्यक्रम में प्रदान किया।

राप्तीनगर के रहने वाले डॉ. शुक्ल मूल रूप से महराजगंज के भिटौली बाजार कस्बे के समीप सोहरौना राजा गांव के रहने वाले हैं। इनकी प्राथमिक शिक्षा यहीं से हुई है। पिता रामचंद्र शुक्ल जूनियर हाई स्कूल महराजगंज के अवकाश प्राप्त शिक्षक हैं। सम्मानित होने की खबर को सुनकर उनके आवास पर गुरुजनों, शुभचिंतकों के बधाई देने का तांता लगा रहा।

बचपन से ही मेधावी डॉ. शुक्ल ने गोरखपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से संस्कृत और फारसी साहित्य में परास्नातक किया। दोनों विषयों में यूनिवर्सिटी टॉप करने पर डॉ. सीडी देशमुख पुरस्कार प्राप्त किया। डॉ. शुक्ल संस्कृत तथा फारसी दोनों भाषाओं के कवि हैं। इन्होंने ईरान के विश्व कविता समारोह में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। विविध सांस्कृतिक प्रसंगों में वे आठ बार ईरान की आमंत्रित किए गए हैं।

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The paper, which swallowed all my summer vacation days, is out. “Rumi’s Philosophical Rendering of Ethical Stories of Panchatantra”(रूमी की कीमियागरी :पंचतन्त्र की नैतिक कहानियों का आध्यात्मिक संस्करण) published in the recent number of prestigious Hindi Journal of CSDS ( Centre for the studies of developing societies)प्रतिमान. The प्रतिमान aims at decolonizing the knowledge construction. The PDF file of the paper can be downloaded from the following link –

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शब्द, प्रतीक, कहानियाँ एवम् विचार समय के प्रवाह में सर्वत्र भ्रमण करते हुए मानवीय संस्कृति एवं सभ्यता को समृद्ध करते हैं। निरन्तर भ्रमण के कारण उनके स्वरूप में देश तथा काल के अनुरूप स्वभावतः परिवर्तन हो जाते हैं । कभी कभी ये परिवर्तन इतने अधिक होते हैं कि कथाओं के मूल स्वरूप की पहचान ही कठिन हो जाती है। ये परिवर्तन वस्तुतः भिन्न समाज तथा संस्कृति में गृहीत कथाओं या प्रतीकों को अधिक स्वीकृत बनाने के लिये किये जाते हैं। इनका उद्देश्य मूल कथा को हानि पहुँचाना नहीं होता है। इसीलिये इन परिवर्तनों के बावजूद  कथाओं का मूल सन्देश प्रायः समान रहता है ।

ईसा पूर्व तृतीय शताब्दी के लगभग संकलित पञ्चतन्त्र ग्रन्थ कथा साहित्य के चतुर्दिक् प्रव्रजन का अपूर्व उदाहरण है। यह सर्वाधिक साहित्यिक अनुवादों वाला भारतीय ग्रन्थ है जिसके ५० भाषाओं में लगभग २०० संस्करण उपलब्ध हैं । इनमें से तीन चौथाई संस्करण भारतीयेतर भाषाओं में प्राप्य हैं। केवल भारत में ही इस ग्रन्थ के २५ विभिन्न संस्करण मिलते हैं जिनमें तन्त्राख्यायिका से लेकर हितोपदेश तक सम्मिलित हैं । विद्वानों ने प्राचीन भारत में प्रसारित पञ्चतन्त्र की विभिन्न शाखाओं को चार प्रमुख समूहों में वर्गीकृत किया है। पञ्चतन्त्र का सबसे प्राचीन स्वरूप सम्भवतः तन्त्राख्यायिका है (Dasgupta 1947: 90)। यह वही पाठ है जिससे पहलवी (फ़ारसी भाषा का मध्यकालीन रूप) भाषा में अनुवाद किया गया होगा। सोमदेव के कथासरित्सागर तथा क्षेमेन्द्र की बृहत्कथामञ्जरी में जिस पञ्चतन्त्र की कथाओं का उपयोग किया गया था वह उसका उत्तर–पश्चिम पाठ रहा होगा जो अब उपलब्ध नहीं होता। जैनों के कथा साहित्य में पञ्चतन्त्र की कहानियाँ मुख्यतः दो रूपों में उपस्थित दिखायी देती हैं। उन्होंने संस्कृत भाषा में पञ्चतन्त्र के पूरे संस्करण प्रस्तुत किये जिसमें सबसे प्रसिद्ध है ११९९ ई॰ में विद्यमान जैनाचार्य पूर्णभद्र का पञ्चाख्यान नामक परिवर्धित संस्करण। एस॰ एन॰ दासगुप्त के अनुसार यह पञ्चतन्त्र के दाक्षिणात्य संस्करण पर आधारित रहा होगा। पञ्चतन्त्र की कथायें जैन धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों की व्याख्याओं में भी बिखरी पड़ी हैं। ये कथायें प्राकृत भाषा में लिखी गयी हैं और इनका सम्भावित समय ६ठीं शताब्दी इस्वी है[1]। प्राकृत की ये कथायें जैन ग्रन्थों में प्रयुक्त होने के बावजूद अपने मूल स्वरूप को सुरक्षित रखती हैं। । पञ्चतन्त्र का सबसे नवीन तथा परिवर्तित–परिवर्धित संस्करण नारायण पण्डित का हितोपदेश है। नारायण पण्डित बंगाल के राजा धवलचन्द्र के आश्रित थे। धवलचन्द्र का समय १३७३ ई॰ है।

पञ्चतन्त्र की विश्वयात्रा उसके प्राचीन फ़ारसी अनुवाद के साथ शुरू होती है। फ़ारसी तथा अरबी जगत् में पञ्चतन्त्र कलीलः व दिम्नः(کلیله و دمنه)[2] के नाम से रूपान्तरित एवं प्रख्यात है । ५७० ईस्वी में सासानी सम्राट् अनूशीरवान् (انوشیروان)  के मन्त्री बुज़ुर्गमेह्र (بزرگمهر) ने बरज़वै तबीब के माध्यम से इस ग्रन्थ का अनुवाद पहलवी (मध्यकालीन फ़ारसी) भाषा में कराया। पहलवी में इसका नाम कलीलग व दिम्नग था। यही अनुवाद पञ्चतन्त्र के सीरियन तथा अन्य विश्वभाषाओं में हुए अनुवादों का आधार बना । ७५० ईस्वी वर्ष में फ़ारसी भाषा के विद्वान् अब्दुल्लाह इब्ने मुक़फ्फ़ा ने इसका अनुवाद अरबी भाषा में किया । १२ वीं सदी में ग़ज़नवी वंश के शासक बहराम शाह के यहाँ मुंशी पद पर कार्यरत नसरुल्लाह मुंशी ने इसका अनुवाद अर्वाचीन फ़ारसी में किया। इस अनुवाद का नाम भी कलीलः व दिम्नः ही है। यह अनुवाद मूल की अपेक्षा बहुत परिवर्धित है। फ़ारसी का यही अनुवाद अनवारे सुहैली आदि अनेक दूसरे फ़ारसी रूपान्तरणों का आधार बना[3]। अनवारे सुहैली ग्रन्थ १५वीं सदी में हिरात के तैमूरी सुल्तान हुसैन बैक़रा के दरबारी विद्वान् वाइज़ काशिफ़ी के द्वारा लिखा गया था। इसका प्रमुख आधार नसरुल्लाह मुंशी का फ़ारसी भाषा में लिखित कलीलः व दिम्नः ग्रन्थ था। इन फ़ारसी रूपान्तरणों के अतिरिक्त पञ्चतन्त्र की कथायें समस्त विश्व में रूपान्तरित तथा स्वीकृत हुईं, जो एक स्वतन्त्र अध्ययन का विषय है[4]

सम्पूर्ण विश्व में भ्रमण करने उपरान्त भी पञ्चतन्त्र की कथाओं के मूल सन्देश में बहुत अधिक अन्तर नहीं देखा गया है। पञ्चतन्त्र की कथाओं का मूल उद्देश्य है–रुचिकर पशुकथाओं का उपयोग करके बालकों को नीतिशास्त्र की शिक्षा देना। स्वयं पञ्चतन्त्र के प्रारम्भ में इन कथाओं के संग्रह का उद्देश्य अमरशक्ति राजा के मन्दबुद्धि पुत्रों को नीतिशिक्षण रूपी आख्यान द्वारा बताया गया है। विष्णुशर्मा की प्रतिज्ञा उन राजकुमारों को नीतिशास्त्र में निष्णात बनाना ही था[5]। हितोपदेश में भी इन कथाओं का स्पष्ट उद्देश्य यही बताया गया है। इसके प्रस्तावनात्मक श्लोकों में कहा गया है[6]

कथाच्छलेन बालानां नीतिस्तदिह कथ्यते॥

(इस पुस्तक में कहानी के बहाने बच्चों को नीति शिक्षा दी जा रही है।)

यही कारण है कि पञ्चतन्त्र के आरम्भ में देवताओं को प्रणाम करने के बाद ग्रन्थकार ने प्राचीन काल के प्रमुख नीतिशास्त्र प्रणेताओं (नयशास्त्रकर्ता ) को नमस्कार समर्पित किये हैं–

मनवे वाचस्पतये शुक्राय पराशराय ससुताय।

चाणक्याय च विदुषे नमोऽस्तु नयशास्त्रकर्तृभ्यः॥ (कथामुख २)

पञ्चतन्त्र में व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों प्रकार की नैतिक शिक्षाएँ कथाओं में सुन्दर रीति से गूँथ दी गयी हैं। इनका उद्देश्य यह है कि इसका अध्ययन करने वाले बालकों के हृदय में ये नैतिक शिक्षायें इस प्रकार घर कर जायें कि वे जीवन के किसी भी क्षेत्र में अव्यावहारिक आचरण न करें तथा कहीं भी असफलता प्राप्त न करें । पञ्चतन्त्र की फलश्रुति में भी इसका उद्देश्य यही बताया गया है–

अधीते य इदं नित्यं नीतिशास्त्रं शृणोति च।

न पराभवमाप्नोति शक्रादपि कदाचन॥ (पञ्चतन्त्र कथामुख १०)

(जो इस नीतिशास्त्र का नित्य अध्ययन करता है तथा इसे सुनता है वह इन्द्र से भी कभी पराजित नहीं हो सकता। )

इस पत्र का केन्द्रीय विषय मौलाना जलालुद्दीन रूमी (आगे रूमी अथवा मौलाना के नाम से अभिहित) द्वारा अपनी विश्वप्रसिद्ध  आध्यात्मिक कविता– मसनवी ए मानवी (आगे मसनवी की संज्ञा से कथित) में  इन कथाओं का किया गया उपयोग है। मसनवी में हमें पञ्चतन्त्र की कथाओं के स्वरूप एवं सन्देश दोनों में आश्चर्यजनक  परिवर्तन मिलता है। प्रस्तुत पत्र में यह देखने का प्रयत्न किया गया है कि किस प्रकार रूमी ने पञ्चतन्त्र की नैतिक कथाओं को आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान करके उनका उपयोग अपने कथ्य को पुष्ट करने में किया है।

[1] The Pañcatantra stories among Jains : versions, peculiarities and usages – Nalini BALBIR (Abstract of the paper)

[2] आधुनिक फ़ारसी में इसका उच्चारण – कलीले व दिम्ने , अरबी तथा उर्दू में कलीला व दिम्ना किया जाता है।

[3]….the Hebrew version 1100 A.D., the Latin about 1270 A.D., the German 1480 A.D., the Italian 1552A.D., the French 1678 A.D. The Greek in 1080 A.D. the Persian in 12th century A.D. (Vardachari 1960 : 124)

[4] विशेष चर्चा “पञ्चतन्त्र की विश्वयात्रा के मुख्य पड़ाव” नामक प्रकाश्यमान शोधपत्र में।

[5] “…पुनरेतांस्तव पुत्रान् मासषट्केन यदि नीतिशास्त्रज्ञान् न करोमि ततः स्वनामत्यागं करोमि।” पञ्चतन्त्र कथामुख पृ॰ ४

[6] हितोपदेश प्रस्तावना श्लोक सं॰ ८

इस शोधपत्र का शेष भाग अधोलिखित लिंक पर प्राप्त किया जा सकता है–

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अथवा इस लिंक से–

https://www.academia.edu/34301747/_Rumis_Philosophical_Rendering_of_Ethical_Stories_of_Panchatantra_रूमी_की_कीमियागरी_पंचतन_त_र_की_नैतिक_कहानियों_का_आध_यात_मिक_संस_करण_

प्रतिमान के इस अंक की सूची इस प्रकार है–

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नवीन अलंकारों की निरन्तर ऊहा के साथ-साथ भारतीय काव्यशास्त्रियों ने उन पर सूक्ष्म तथा लम्बी बहसें भी की हैं। साथ ही उनकी स्पष्टता के लिये अनेक तरह से विभाजनों के भी प्रयत्न किये जाते रहे हैं। वर्गीकरण के द्वारा हम किसी विषय को सूक्ष्मता से समझ पाते हैं। इस कारण से भारतीय काव्य शास्त्र में किये गये अलंकारों के वर्गीकरणों का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है। इस पाठ में अलंकारों के विभिन्न प्रकार के वर्गीकरणों पर विचार किया गया है–

https://www.youtube.com/watch?v=OOBVyI__G9M

इस पाठ की लिखित सामग्री निम्नोक्त लिंक से प्राप्त की जा सकती है-
http://epgp.inflibnet.ac.in/ahl.php?csrno=18
P-08#M-20

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भारत में अलंकारों की चर्चा २००० वर्षों से भी अधिक प्राचीन है। epg पाठशाला के इस पाठ में भारतीय साहित्य शास्त्र के विकास के विभिन्न सोपानों में अलंकारों की संख्या तथा महत्त्व के प्रति बदलते दृष्टिकोणों पर संक्षिप्त चर्चा प्रस्तुत की गयी है।अलंकार सिद्धान्त काव्यशास्त्र के प्राचीनतम सिद्धान्तों में से एक है। अलंकार शब्द विद्वानों के अनुसार दो अर्थों में प्रयुक्त होता रहा है। काव्य में जो कुछ भी अच्छा लग रहा है उन सबके कारक तत्त्वों को अलंकार कहते हैं, यह अलंकार का पहला अर्थ है। इस अर्थ में ध्वनि, रस, रीति आदि सभी उपकरणों को अलंकार कहा जा सकता है। इसी कारण से साहित्यशास्त्र को अलंकारशास्त्र के नाम से भी जाना जाता है। परन्तु दूसरा अर्थ सीमित है। शब्द तथा अर्थ के सौन्दर्योत्पादक अनित्य काव्यगत धर्मों को अलंकार कहा जाता है। अलंकारों के स्वरूप तथा महत्त्व को भारतीय काव्यशास्त्र की सहस्राब्दियों में अनेकशः विभिन्न प्रकार से समझा जाता रहा है। कुछ काव्यशास्त्रियों ने इसे काव्य का ऐसे ही अनिवार्य धर्म माना जैसे कि आग का धर्म गर्मी होता है, जबकि कुछ ने इसे अनित्य मान कर इसके अभाव में भी काव्य की क्षति की सम्भावना नहीं की। अलंकारों के महत्त्व, वर्गीकरण तथा संख्या, तीनों में ही वृद्धि तथा ह्रास की एक लम्बी परम्परा रही है। प्रस्तुत पाठ में सहस्राब्दियों में विकसित अलंकारों के स्वरूप का विहंगावलोकन प्रस्तुत किया जा रहा है। इसे निम्नलिखित लिंक पर सुना जा सकता है –
https://www.youtube.com/watch?v=LXTeI4GeUWw

पाठ का लिखित रूप निम्नलिखित लिंक पर जाकर P-08 # M-19 के अन्तर्गत प्राप्त किया जा सकता है-

http://epgp.inflibnet.ac.in/ahl.php?csrno=18

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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अपने ई पी जी पाठशाला उपक्रम के अन्तर्गत उच्चशिक्षा के पाठ्यक्रमों के पाठों को तैयार करके उनके लिखित रूप तथा उनकी रिकार्डिंग उपलब्ध करायी है। भाषाओं में संस्कृत तथा हिन्दी के पाठ भी उपलब्ध हो रहे हैं। हिन्दी परास्नातक के कुछ भारतीय काव्यशास्त्र के अन्तर्गत कुछ पाठों को मुझसे भी तैयार कराया गया था। इनकी लिखित तथा रिकार्डेड सामग्री उपलब्ध हो रही है। इन्हें epg की साइट के अतिरिक्त youtube पर भी डाला गया है। प्रस्तुत है इस शृङ्खला की पहली कड़ी।
 
 
इस पाठ की लिखित सामग्री को- http://epgp.inflibnet.ac.in/ahl.php?csrno=18 इस लिंक पर जाकर P-08, M-18 के अन्तर्गत देखा जा सकता है।
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संस्कृतश्रीः–पत्रिकायां शंकरनायण Sankara Narayanan Gवर्यस्य सौजन्येन प्रकाशमायाता कविता.. “समुज्ज्वलः कृष्णरसः”. English translation of 3 verses was kindly done by Shankar Rajaraman Ji. शंकरेण पुरस्कृता–शंकरेण शंकरमठाच्च प्रकाशिता –आहत्य कथनीयम्––”दासोऽहं दाक्षिणात्यानां शंकराणां विशेषतः”।

 
यथा विहीनो नयनद्वयेन स्पृशेदनीशो नितरां दिशोऽग्रे।
हृदोऽवकाशेष्वपि केशवाहं पश्यामि तद्वत् तव सन्निधानम्॥
Just as a blind man may try to make sense of his world by stretching his hands out and touching what is in front of him, so do I search for your presence in the inner recess of my heart.
 
मूको न वक्तुं वचसा प्रयत्नादिष्टाननालोकनतृप्तिमीष्टे।
यथा, तथा मेऽपि तवानुभूतिं वदन्ति नेत्राण्यतिविह्वलानि॥
 
तवानुभूत्याऽविरलात्मना मां प्रगाढितो विष्वगिवास्ति वातः।
भूयो यतः स्तम्भितवायुवृत्तिर्विष्णो निरुद्धश्वसनोऽनुभामि॥
 
अधोक्षजातीतसमस्तवृत्ते वृत्तेष्वमेयं भवदीयवृत्तम्।
संवर्णयन्तं स्खलतीति दृष्ट्वा मां घोषयेयुः कुकविं कवीन्द्राः॥
O Adhokshaja! Your playful exploits cannot be contained within the traditional metrical structure of poetry. And therefore I am likely to falter here and there. Let master poets proclaim me a bad poet (It is the fault of your exploits that poetry cannot completely capture them)
कुर्वन्तु कुत्सां बलवत्कवीन्द्रास्तवानुरक्तस्य न मेऽस्ति हानिः।
पत्या मता श्वश्रुकुलावमानं प्रीत्या तृणं नो मनुते नवोढा॥
Or let master poets call me names. It does not matter to me any bit because I am devoted to you. If the wife is loved by her husband, doesn’t she put up with the abuses that the in-law’s family may heap on her?
 
छन्दांसि भग्नानि भवन्त्वमूनि च्छन्दो न भज्येत तवानुगामी।
भवन्तु वर्णा हृतवर्णशोभास्त्वद्वर्णलोभो न तु किन्तु यातु॥
 
भवन्तु कृष्णेऽस्खलितास्पदस्य पदानि काव्येषु विसंष्ठुलानि।
समुज्ज्वलः कृष्णरसो मदीयो जगद्विचित्रेऽत्र कवित्वमार्गे॥

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                                      जयउ सरस्सइ बुहअणवन्दिअअरपाअसे ̆ट्ठकंदोट्ठा।

                                     पाउअ विअ महुरमुही सक्कअ विअ रूढमाहप्पा[1]

                                                     (जयतु सरस्वती बुधजनवन्दिततरश्रेष्ठपादपङ्कजा।

                                                      प्राकृतमिव मधुरमुखी संस्कृतमिव रूढमाहात्म्या॥)

सम्बोधि के नवीन अंक में प्राकृत साहित्य के चारुत्व के भाषिक कारकों की समीक्षा परक यह लेख प्रकाशित हुआ है–

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जिस साहित्यिक प्राकृत की चर्चा इस पत्र का विषय है, भाषाविदों ने उसके वाग्व्यवहार का समय पहली शताब्दी ईस्वी से लेकर पाँचवीं शताब्दी तक माना है। यह काल संस्कृत कविता शैली के पूर्णतः विकसित हो जाने के बाद का है[2]। संस्कृत में काव्योचित संवेदना तथा भाषा का विकास वैदिक काल से ही प्रारम्भ हो गया था। महाकाव्य काल से होते हुए शताब्दियों तक इसे पूर्णता प्राप्त होती रही। संस्कृत के समान्तर, प्राकृत भाषा क्षेत्रीय भाषाओं के रूप में प्रारम्भ से प्रचलित तो थी लेकिन इसका साहित्यिक प्रयोग बहुत बाद में देखा गया। प्राकृत का साहित्यिक स्वरूप, चूँकि संस्कृत कविता के बाद आया इस कारण प्राकृत काव्य में वे सारी विशिष्टतायें प्रायः आ गयीं जिन्हें युगों के विकास के परिणामस्वरूप संस्कृत कविता ने प्राप्त किया था। प्राकृत कविता को संस्कृत काव्य परम्परा से काव्योचित अभिव्यक्तियाँ, मुहावरे, उपमान–विधान, काव्य रूढियाँ, छन्दोवैचित्र्य तथा अन्यान्य आलंकारिक उपादान रिक्थ के रूप में प्राप्त हुए। महाकाव्य, गीतिकाव्य, गद्यकाव्य, नाटक, कथासाहित्य आदि विधागत विशिष्टतायें भी संस्कृत की ही भाँति प्राकृत में भी प्रचलित हुईं। बाद में प्राकृत ने भी अनेक स्तरों पर संस्कृत की परम्परा को समृद्ध किया।

प्राकृत कविता संस्कृत की प्रायः सभी काव्यात्मक विशेषताओं से संवलित है, लेकिन इसके साथ ही प्राकृत कविता की अनेक मौलिक विशेषतायें भी हैं जिन्हें हम संस्कृत में नहीं पाते। प्राकृत कविता में अनेकानेक ऐसे चमत्कार भी प्राप्त होते हैं जो संस्कृत कविता की अपेक्षा विशिष्ट हैं। प्राकृत के कवितागत सामर्थ्य को रसिक समाज ने पहचान लिया था जिसका संकेत हमें यत्र तत्र मिलता भी है। संस्कृत की अपेक्षा प्राकृत की कविता को रमणीयतर मानते हुए प्राकृत का कवि कहता है– सन्ते पाउअकव्वे को सक्कइ सक्कअं पढिउं[3]? प्राकृत में काव्यगत सम्भावनाओं के इस नयेपन की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए वाक्पतिराज ने अपने गउडवहो में कहा है–                   णवमत्थदंसणं संनिवेससिसिराओ बन्धरिद्धीओ।

अविरलमिणमो आभुवणबन्धमिह णवर पअअम्मि[4]

( प्राकृत में नवीनकाव्यार्थ दिखायी पड़ते हैं। इसके काव्यबन्धों की समृद्धि सन्निवेश के वैशिष्ट्य के कारण आह्लादक है। मानों, इसमें सम्पूर्ण भुवन ही समाहित हो रहा है। ये विशेषताएँ केवल प्राकृत काव्य की ही हैं।)

संस्कृत की अपेक्षा प्राकृत कविता में काव्यार्थ की यह नवीन सम्भावना उसकी अपनी भाषागत विशिष्टताओं के कारण प्रकट हो पायी है। प्राकृत में सामान्य रूप से संस्कृत कविता में प्रयुक्त काव्य विच्छित्तियों तथा कवि समयों का ही प्रयोग मिलता है। दोनों भाषाएँ संरचना तथा काव्यार्थ की दृष्टि से इतनी निकट हैं कि सामान्यतः विद्वद्वर्ग में प्राकृत कविता का अध्ययन संस्कृत की छाया से हुआ करता है तथा अधिकतर प्राकृत कविताओं को संस्कृतानुवाद-सहिष्णु माना जाता है। अर्थात् ऐसा माना जाता है कि काव्यार्थ को गँवाये बिना उन्हें संस्कृत में परिवर्तित करके समझा जा सकता है । इन भाषाओं में परस्पर अनुवाद की आवश्यकता भी नहीं होती। इसी कारण इनके मध्य हुए भाषान्तरण को अनुवाद न कह कर छाया कहते हैं। इन सारी निकटताओं के बावजूद, प्राकृत कविताओं की सभी काव्य विच्छित्तियों को संस्कृत की छाया मात्र से मूल्यांकित किया जा सकता हो, ऐसा नहीं है। प्राकृत साहित्य के अध्ययन के क्रम में हमें ऐसी अनेक स्थितियाँ प्रायः दिखायी पड़ जाती हैं जहाँ संस्कृत अनुवाद, प्राकृत काव्य के अर्थ के प्रकाशन में पूरी तरह से समर्थ नहीं होता। ये स्थितियाँ वे होती हैं जहाँ प्राकृत कविता की क्षमता, उसकी भाषिक विशेषताओं के कारण संस्कृत के भाषिक ढाँचे को अतिक्रान्त कर जाती है। प्रस्तुत चर्चा में इन्हीं काव्यात्मक स्थितियों का दिङ्मात्र निदर्शन किया जा रहा है।

उपर्युक्त स्थितियाँ सामान्यतया दो प्रकार की हो सकती हैं। पहली स्थिति वह है जब प्राकृत कविता में संस्कृत से आगत तद्भव शब्दों का प्रयोग न करके देशज शब्दों का प्रयोग किया गया हो[i]। ध्यातव्य है कि देशज शब्द संस्कृतमूलक नहीं होते अतः उनकी छाया नहीं की जा सकती। उनका अनुवाद संस्कृत के समानार्थी शब्दों को खोज कर करना होता है। उदाहरण के लिये गाथासप्तशती की यह प्रसिद्ध गाथा–एत्थ णिमज्जइ अत्ता[5] इत्यादि के संस्कृत अनुवाद में अत्ता के स्थान पर श्वश्रू का प्रयोग किया गया है।

दूसरी स्थिति काव्य की दृष्टि से पहली स्थिति की अपेक्षा और महत्त्वपूर्ण है। संस्कृत तथा प्राकृत यद्यपि समान्तर भाषाएँ हैं तथापि दोनों की भाषिक मर्यादा में कुछ भेद अवश्य हैं। उन भेदों के कारण प्राकृत कविता को अनेकशः नये काव्यात्मक चमत्कारों का लाभ मिल जाता है। प्राकृत की अलंकृत कविता शैली का काल संस्कृत की कविता के बाद का है। ऐसा देखा जाता है कि ऐतिहासिक दृष्टि से ध्वनि तथा अर्थ के स्तरों पर परिवर्तित होने के अनन्तर बाद की साहित्यिक भाषाओं में अनेक बार चमत्कार की सम्भावना कई गुना बढ़ जाती है। पुराने पड़ते शब्द, लोक से लुप्त होने के बावजूद काव्य की स्मृति में अक्षुण्ण रहते हैं। काव्य की स्मृति लोक की स्मृति की अपेक्षा बलवती होती है। पुराने शब्द तथा उनके अर्थ, नये शब्दों तथा उनके अर्थों के साथ रखे जा सकने के कारण अनेक बार काव्य को अभूतपूर्व अर्थ प्रदान कर देते हैं। पूर्ववर्ती भाषाओं में यह चमत्कार उत्पन्न नहीं किया जा सकता है। ब्रजभाषा के कवि बिहारी के एक दोहे से हम इस बात को और स्पष्ट कर सकते हैं– नाक बास बेसरि लह्यो बसि मुकुतनु के संग। इस दोहे में नाक शब्द अपने पुराने–स्वर्ग अर्थ में भी है तथा नये–नासिका अर्थ में भी। यह सही है कि बिहारी के काल (१५९५–१६६४ ई॰) में नाक शब्द लोकव्यवहार स्वर्ग के अर्थ में बिलकुल प्रयुक्त नहीं होता रहा होगा, लेकिन कविता में उन्हें इस शब्द के पुराने अर्थ के प्रयोग की स्वीकृति मिल गयी है। स्पष्ट है कि पुरातन तथा नवीन अर्थ का यही संयोग इस कविता में विद्यमान श्लेष के चमत्कार का कारण है।

साहित्य की यह ऐतिहासिक परिघटना सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक है। भारतीय साहित्य में हम इसे और स्पष्ट रूप में देख सकते हैं क्योंकि यहाँ भाषिक तथा साहित्यिक विकास के विभिन्न कालखण्ड सौभाग्यवश सुरक्षित हैं। भारतीय भाषा परम्परा की अविच्छिन्नता तथा परिपूर्णता इसके साहित्य की समृद्धि का एक बड़ा कारण है। एक और उदाहरण तुलसीदास के रामचरितमानस से है। ग्रन्थारम्भ में ही, खल वन्दना के प्रसंग में वे कहते हैं–

बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेहीं। संतत सुरानीक हित जेही।।

कवि दुर्जनों को शक्र(=इन्द्र) के समान इस कारण से कह पाता है कि सुरानीक दोनों के लिए हितकर होता है। यहाँ सुरानीक शब्द में सखण्ड श्लेष है। एक बार तो इसका विभाग हम सुर+अनीक (देवसेना) करेंगे जो कि इन्द्र के पक्ष में संगत होगा। दूसरी बार दुर्जन के पक्ष में सुरा+नीक (अच्छी शराब) यह अर्थ लेना होगा। तुलसीदासजी ने जो चमत्कार उत्पन्न किया है वह संस्कृत में सम्भव नहीं है क्योंकि वह केवल संस्कृत पर आधारित नहीं है। वह तो संस्कृत का सारा रिक्थ लेकर समृद्ध हुई बाद की भाषा (अवधी) में ही सम्भव है[6]। प्राकृत भाषा के जो अपने अभिलक्षण हैं, वे भी इसी प्रकार संस्कृत की परम्परा से जुड़कर कविता को अपूर्व सौन्दर्य प्रदान करते हैं। यही कारण है कि भारतीय भाषा परम्परा में बाद बाद की भाषाओं को कविता के लिए अधिकाधिक समर्थ तथा सम्भावनापूर्ण माना गया है। इस कथ्य के समर्थन में अनेक प्रमाण दिये जा सकते हैं। प्राकृत कवि स्वयंभू का कहना है– देसी भासा उभय तडुज्जलु अर्थात् अपभ्रंश भाषा संस्कृत और प्राकृत से भी उज्ज्वल है। शाकुन्तलम् की टीका करते हुए शंकर ने लिखा है– संस्कृतात् प्राकृतं श्रेष्ठं ततोऽपभ्रंशभाषणम्[7] अर्थात् संस्कृत से श्रेष्ठ प्राकृत है तथा उससे भी उत्तम अपभ्रंश भाषा है। विद्यापति का कथन–देसिल बयना सब सञ मिट्ठा। ते तैसनो जम्पओं अवहट्ठा, प्रसिद्ध ही है॥ १२वीं सदी में वर्तमान संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध मुक्तककार गोवर्धन की उक्ति है वाणी प्राकृतसमुचितरसा बलेनैव संस्कृतं नीता[8](मुक्तक का समुचित रस तो प्राकृत में विद्यमान है, मैं उसे बलपूर्वक संस्कृत में ले आ रहा हूँ।)

व्याकरणिक कोटियों तथा ध्वनि सम्बन्धी वितरण के आधार पर संस्कृत की अपेक्षा प्राकृत में सरलता तथा सुकुमारता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है[9]। कवियों ने प्राकृत कविता के सौन्दर्य परिवर्धन के लिए इसी प्रकार की भाषिक विशिष्टताओं का विनियोग किया है।

संस्कृत से प्राकृत भाषाओं में ध्वनि आदि स्तरों पर घटित परिवर्तनों के कारण शब्दराशि में जो रूपान्तरण हुए उनके कारण प्राकृत के शब्दों में काव्यगत चारुत्व की सम्भावना बहुत अधिक बढ़ गयी। यह चमत्कार शब्द के स्तर पर, अर्थालंकार के स्तर पर तथा ध्वनि आदि अनेक स्तरों पर दृष्टिगोचर होता है। ध्वनि परिवर्तनों के बाद अनेक शब्दों के रूप प्राकृत में एक समान हो गये जिसके कारण वे शब्द श्लिष्ट हो गये हैं, तथा उनके अर्थ प्रदान करने का सामर्थ्य भी बढ़ गया है। प्राकृत के गय का अर्थ केवल गत ही नहीं है गज भी है। सत्थर का अर्थ केवल स्रस्तर ही नहीं है, शास्त्र भी है। मिअ का अर्थ मृत ही नहीं मृग भी हो सकता है। शाकुन्तलम् में अनसूया के कथन में आया हुआ वसन्तोदार शब्द संस्कृत में वसन्तावतार तथा वसन्तोदार दोनों तरह से देखा जा सकता है[10]। भाषिक परिवर्तनों से प्राप्त काव्य सौन्दर्य की इस गुणात्मक अभिवृद्धि पर प्राकृत का विशेषाधिकार है। ऐसे प्रसंगों में संस्कृत की छाया अथवा अनुवादों को देखने से यह बात स्पष्ट होती है कि संस्कृत में ये प्रसंग यथावस्थ रूपान्तरित नहीं किये जा सकते। इस तथ्य को निम्नोक्त उदाहरण से सिद्ध किया जा सकता है–

परिहूएण वि दिअहं घरघरभमिरेण अण्णकज्जम्मि

चिरजीविएण इमिणा खविअम्हो दड्ढकायेण[11]

उपर्युक्त गाथा में प्रयुक्त अण्णकज्जम्मि तथा दड्ढकायेण ये दोनों शब्द प्राकृत की भाषिक विशिष्टता के कारण दो–दो अर्थ दे सकते हैं– अन्यकार्ये तथा अन्नकार्ये, और दग्धकायेन तथा दग्धकाकेन। जबकि संस्कृत छाया से हम किसी एक ही अर्थ को पा सकते हैं। उपर्युक्त गाथा की संस्कृत छाया निम्नोक्त प्रकार से की जा सकती है–

परिभूतेनापि दिवसं गृहगृहभ्रमणशीलेनान्यकार्ये।

चिरजीवितेनानेन क्षपिताः स्मो दग्धकायेन॥[12]

इस गाथा के संस्कृत अनुवाद में कविसम्मत अर्थ नहीं आ पाया है और उसे स्पष्ट करने के लिये अनुवादक भट्ट मथुरानाथ शास्त्री को अन्य अभीष्ट शब्दों को कोष्ठक में रखना पड़ा है–

परिभूतेनापि दिनं गृहं गृहं भ्रामिणान्यकार्येण (–अन्नकार्येण)।

चिरजीवितेन सपदि क्षपिताः स्मोऽनेन दग्धकायेन (–काकेन)॥[13]

प्रस्तुत गाथा किसी अनुताप ग्रस्त वृद्ध का कथन है। कथन के वैशिष्ट्य के कारण उपर्युक्त शब्दों के अर्थ अन्यकार्य तथा दग्धकाय मात्र में नियन्त्रित हो जायेंगे लेकिन पुनः अनेकार्थक शब्द काय के प्रयोग के कारण काक सम्बन्धी अर्थ भी व्यंजित होगा। इसके बाद वाच्यभूत वाक्यार्थ तथा व्यंग्यभूत वाक्यार्थ में उपमानोपमेय भाव होकर उपमा अलंकार ध्वनि व्यंजित होगी। इस क्रम से प्राप्त संलक्ष्यक्रम ध्वनि शब्दशक्ति से उत्पन्न मानी जायेगी। स्पष्ट है कि शब्दों के प्रयोग की यह विशिष्टता केवल प्राकृत काव्य में ही है। संस्कृत छाया अथवा अनुवाद में तो दोनों अर्थों का कण्ठतः कथन करना होगा। इस कारण दोनों के दोनों अर्थ वाच्य हो जायेंगे फलतः उनसे अभिहित होने वाली उपमा वाच्य ही होगी व्यंग्य नहीं। इस प्रकार उत्तम ध्वनिकाव्य का उदाहरण प्राकृतगाथा ही बन पायेगी संस्कृतानुवाद नहीं। एक अन्य उदाहरण पर ध्यान देते हैं–

रयणुज्जल–पयसोहं तं कव्वं जं तवेइ पडिवक्खं

पुरिसायंतविलासिणिरसणादामं विअ रसंतं॥ (वज्जालग्गं ३.२)

इस गाथा में चार पदों में श्लेष है। रयणुज्जल का अर्थ–रचनोज्ज्वल तथा रत्नोज्ज्वल दोनों है। पडिवक्खं से प्रतिपक्षः तथा पतिवक्षः दोनों अर्थ लिए जा सकते हैं। रसंतं का अर्थ रसान्तम् तथा रसत् (शब्द करते हुए) दोनों है। इनमें से तीन श्लेष केवल प्राकृत भाषा में ही सम्भव हैं। केवल पद शब्द अनेकार्थक होने से संस्कृत तथा प्राकृत दोनों में समान रूप से श्लेष का लाभ दे सकता है।

आगे हम संस्कृत भाषा की अपेक्षा प्राकृत भाषाओं में दृष्टिगत प्रमुख ध्वनि परिवर्तनों के काव्यात्मक उपयोगों पर चर्चा करेंगे। इन ध्वनि परिवर्तनों से प्राप्त, शब्दालंकार तथा अर्थालंकार दोनों स्तरों पर चारुत्व का आधान करने वाली, भाषिक विशेषताओं का, महत्त्व की दृष्टि से क्रमशः वर्णन किया जा रहा है–

  • मध्यवर्ती अल्पप्राण व्यंजनों का लोप

प्राकृतों में (विशेषतः महाराष्ट्री प्राकृत में, जो कि पद्य के लिये उपयुक्ततम तथा प्रयुक्ततम भाषा मानी गयी है[14]) असंयुक्त अवस्था में विद्यमान तथा शब्द के आदि में न आने वाले[15] अल्पप्राण व्यञ्जनों– क,ग,च,ज,त,द,प तथा यकार–वकार का प्रायः लोप हो जाता है[16]। इन लुप्त ध्वनियों के पहले और बाद में भी यदि अकार हो तो वहाँ यश्रुति अर्थात् य जैसी ध्वनि का आगम हो जाता है[17]। कुछ विद्वानों का मत है कि महाराष्ट्री को काव्य की दृष्टि से मधुर बनाने के लिये उसे प्रयास पूर्वक मध्यगत अल्पप्राण वर्णों से रहित बनाया गया था[18]। परन्तु यह कथन अतिशयोक्तिपूर्ण है क्योंकि अगर काव्य में प्रयोग करने मात्र के लिये इन शब्दों की ध्वनियों का लोप किया गया होता तो उसी दिशा में परिवर्तित अन्य शब्दों के रूप, जो अब भी हमारी भाषाओं में मिलते हैं, वे नहीं मिलते[19]। वे काव्य तक ही सीमित होकर रह गये होते। यह बात अवश्य सत्य है कि इन व्यञ्जनों के लोप के कारण प्राकृत अत्यन्त मधुर हो गयी है तथा उसके बन्ध सुकुमार हो गये हैं। वस्तुतः उपर्युक्त प्रकार के परिवर्तन भारतीय आर्यभाषाओं के स्वाभाविक रूपान्तर के फलस्वरूप सामने आये हैं जो मुखसुख तथा अन्य ध्वनि परिवर्तन के कारणों द्वारा प्रेरित हैं[20]। इस प्रवृत्ति के कारण काव्यविच्छित्तियों के निम्नोक्त प्रकार प्राकृत कविता में दिखाई पड़ते हैं–

  1. अनुप्रास– प्राकृत शब्दों में प्रयुक्त उपर्युक्त अल्पप्राण व्यंजन अधिकतर विजातीय होते हैं। इन वैरूप्य सम्पादक व्यञ्जनों का लोप हो जाने के बाद तथा कई बार उन लुप्त स्वरों के स्थान पर य–श्रुति या व–श्रुति हो जाने पर व्यंजनों की समानता दिखायी पड़ने लगती है जिससे अनुप्रास अलंकार बरबस उपस्थित हो जाता है। यथा,

अमअमअ गअणसेहर रअणीमुहतिलअ चंद दे छिवसु (गा॰स॰ १.१६)

–अथवा–

अमयमयगयणसेहर रयणीमुहतिलय चंद दे छिवसु

  1. श्लेष – उपर्युक्त ध्वनि परिवर्तनों के कारण विभिन्न ध्वनियों से घटित शब्दों का स्वरूप एक जैसा हो जाता है। इसके कारण वे समान स्वरूप वाले होकर अनेक अर्थ दे पाते हैं। इस परिस्थिति के परिणाम स्वरूप श्लेष तथा श्लेष से उत्थापित उपमा आदि अलंकारों का सुन्दर प्रयोग प्राकृत कविता में हो पाता है। श्लेषोत्थापित समुच्चय अलंकार का एक उदाहरण देखें–

अहिणअपओअरसिएसु पहिअ–सामाइएसु दिअहेसु।

सोहइ पसरिअगीआण णच्चिअं मोरवुंदाणं ॥ (गा॰स॰ ६.५९)

इस गाथा में पओअ से पयोद और प्रयोग, रसिएसु से…..सामाइएसु से श्यामायितेषु और सामाजिकेषु तथा गीआण से ग्रीवाणां और गीतानां दोनों अर्थ लिए जा सकते हैं।

श्लेषोत्थापित उपमा का एक उदाहरण देखें–

सच्छन्दिया सरूवा सालंकारा य सरस–उल्लावा।

वरकामिणि व्व गाहा गाहिज्जन्ती रसं देइ॥ (व॰ल॰ २.४)[21]

इस पद्य में गाथा की तुलना श्रेष्ठ कामिनी के साथ की गयी है। दोनों स्वच्छन्द, सुरूप, सालंकार तथा सूक्तियों वाली हैं। यहाँ तक तो संस्कृत तथा प्राकृत दोनों साथ साथ चलती हैं लेकिन श्लिष्ट शब्द गाहिज्जन्ती प्राकृत की अपनी विशेषता है। गाथा गीयमाना (=गायी जाती) होकर उसी प्रकार रस प्रदान करती है जैसे कामिनी गाह्यमाना (= भोग किये जाने पर)।

श्लेष कई बार रूपक अलंकार को भी सम्भव बनाता है–

न सहइ अब्भत्थणियं असइ गयाणं पि पिट्ठिमंसाइं।

दट्ठूण भासुरमुहं खलसीहं को न बीहेइ॥ (व॰ल॰ ५.१२)

प्रस्तुत गाथा में खल तथा सिंह का अभेद आरोपित किया गया है। यह तभी सम्भव हो पाता है जब गयाणं गतानां और गजानां इन दोनों अर्थों को दे सके। सिंह जिस प्रकार हाथियों की पीठ के मांस को खाता है उसी प्रकार दुष्ट पुरुष परोक्ष में लोगों की निन्दा करता रहता है।

श्वेताम्बर जैन साधु जयवल्लभ का वज्जालग्ग नामक सूक्तिकोश श्लेष के इस प्रकार के काव्यात्मक प्रयोगों के लिए बहुत प्रसिद्ध है[22]

  1. श्लेषोत्थापित अर्थान्तरन्यास–

जह जह वड्ढेइ ससी तह तह ओ पेच्छ घेप्पइ मएण

वयणिज्जवज्जिआओ कस्स वि जइ हुंति रिद्धीओ ॥ (व॰ल॰ २६५, २९.२)

(जैसे जैसे चन्द्रमा बढ़ता है वैसे वैसे, देखो, वह मृग (मद) से युक्त हो जाता है। काश, किसी की भी सम्पत्ति निन्दा से रहित होती!) इस उदाहरण में चन्द्रमा का निन्दित होना तभी उपपन्न होगा जब उसे मद युक्त बताया जायेगा। लेकिन चन्द्रमा तो मद से युक्त नहीं होता, वह तो मृग से युक्त होता है। इसे सम्भव बनाने लिए प्राकृत कवि ने मअ शब्द का उपयोग किया है जो मृग के साथ साथ मद का भी वाचक है। इसी प्रयोग विशेष के कारण अर्थान्तरन्यास अलंकार यहाँ सम्भव हो पाया है।

  1. यमक– मध्यवर्ती व्यञ्जनों के लोप से कई बार भिन्न शब्दों का स्वरूप एक जैसा हो जाता है जिससे यमक अलंकार की सृष्टि होती है। यमक स्वयं तो एक शब्दालंकार है[23] लेकिन यह काव्य में असंगति, विरोध आदि अन्यान्य अर्थालंकारों का भी आधार बन जाता है। गाथासप्तशती की अधोलिखित प्रसिद्ध गाथा का उदाहरण इसके लिए दिया जा सकता है–

मुहमारुएण तं कण्ह गोरअं राहिआए ̆अवणेंतो।

एताणँ वल्लवीणं अण्णाणँ वि गोरअं हरसि ॥ (गा॰स॰ १.८९)

(हे कृष्ण, तुम अपने मुँह की फूँक से राधिका के गोरज को हटाते हुए दूसरी गोपियों के गौरव का भी हरण कर

रहे हो।)

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उपर्युक्त पद्य में पहले गोरअं का अर्थ गोरजः (=गायों के चलने से उठी धूल) है जबकि दूसरे गोरअं का अर्थ है गौरव। प्राकृत भाषा के विशिष्ट ध्वनि परिवर्तनों के फलस्वरूप इन दोनों शब्दों का स्वरूप समान हो गया है, फलतः यहाँ यमक की परिस्थिति उत्पन्न हो गयी है। यमक के बल से यहाँ असंगति अलंकार की भी सृष्टि हो गयी है। कार्य तथा कारण अगर अलग अलग स्थानों पर वर्णित किये जायें तो वहाँ असंगति अलंकार होता है[24]

विंझो ण होइ अगओ गएहिं बहुएहिँ वि गएहिं॥ (व॰ल॰ १८८, १९.३)

(विन्ध्य पर्वत भी बहुत सारे हाथियों के चले जाने से हाथी रहित नहीं होता।) इस उदाहरण में पहले गएहिं का अर्थ है गजैः तथा दूसर गएहिं का अर्थ है गतैः। ज तथा त दोनों के लुप्त हो जाने के कारण[25] दोनों शब्दों का स्वरूप समान हो गया है तथा यमक की परिस्थिति उत्पन्न हो गयी है।

सुकइवयणऽण्णवाओ विचित्तरयणाणि सुत्तिरयणाणि। (गाथारत्नकोश २)

(सुकवियों के वचन के समुद्र से विचित्र बनावट वाले सूक्ति रत्नों को–) इस उदाहरण में पहला रयण शब्द रचना का वाचक है जबकि दूसरा रत्न का वाचक है। च तथा त के लुप्त होने तथा त् के बाद स्वरभक्ति हो जाने से दोनों का रूप समान हो गया है।

जमस्स दण्डस्स सगब्भिआ मे गआ गआ जस्स सिरं कराला[26] (उसाणिरुद्धं १.६९)

(यम दण्ड की तरह मेरी कराल गदा जिस के सिर पर चली) इस उदाहरण में पहले गआ का अर्थ गदा है तथा दूसरे गआ का अर्थ गता है। दोनों में क्रमशः त तथा द के लोप के कारण यह परिस्थिति उत्पन्न हुई है।

  1. सौकुमार्य तथा माधुर्य– उच्चारण में दुष्कर अल्पप्राण वर्णों के लोप हो जाने के कारण प्राकृत कविता से श्रुतिकटुत्व दोष जाता रहता है। प्राकृत कविता के लालित्य के कारकों में से यह अन्यतम है। इसी कारण प्राकृत काव्य के बन्ध सुकुमार हो जाते हैं। इस आधार पर पाश्चात्त्य विद्वान प्राकृत को कविता हेतु बनायी गयी कृत्त्रिम भाषा के रूप में शङ्का करते हैं। प्राकृत कवियों ने प्राकृत की अपेक्षा संस्कृत के श्रुतिकटुत्व की अनेकशः आलोचना की है[27]। उपर्युक्त गुणों के उदाहरण स्वरूप सरस्वती कण्ठाभरण में उदाहृत राजशेखर की कर्पूरमञ्जरी नाटिका से एक प्राकृत शिखरिणी प्रस्तुत है–

परं जोण्हा उण्हा गरलसरिसो चंदणरसो खदक्खारो हारो मलअपवणादेहतवणा।

मुणाली बाणाली जलइ अ जलद्दा तणुलदा वरिट्ठा जं दिट्ठा कमलवअणा सा सुणअणा॥(क॰म॰२.११)

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  1. शब्दशक्तिमूलक वस्तुध्वनि–जब कविता में अनेकार्थक शब्दों का प्रयोग हो लेकिन उनके दूसरे अर्थ प्रसंगवश नियन्त्रित हो जायें तथा अभिधा से एक ही अर्थ आये, ऐसा होने पर भी अगर दूसरे अर्थ की प्रतीति होने लगे तो उस अन्य अर्थ की प्राप्ति में व्यंजना व्यापार को ही कारण माना जाता है। व्यंजना अपना यह काम शब्दविशेष के प्रयोग के कारण ही कर पाती है। काव्य में ऐसा व्यंग्यार्थ यदि प्रमुखता से चमत्कार पैदा कर रहा हो तो उस काव्य को शब्दशक्तिमूलक संलक्ष्यक्रमव्यंग्य काव्य कहते हैं। यह व्यंग्य अर्थ वस्तुरूप और अलंकाररूप दोनों प्रकार का हो सकता है। वस्तुध्वनि का उदाहरण आगे प्रस्तुत है–

जइ सो न एइ गेहं ता दूइ अहोमुही तुमं कीस ।

सो होही मज्झ पिओ तो तुज्झ न खंडए वयणं[28] ॥ (व॰ल॰ ४१७, ४३.५)

(यह खण्डिता नायिका की नायक को सन्देश देने गयी किन्तु उससे रमण करके लौटी दूती के प्रति उक्ति है– अगर वह=नायक घर नहीं आता तो, हे दूति, तुम अधोमुख क्यों हो? यदि वह मेरा प्रिय होता तो तुम्हारे वचन का उल्लंघन नहीं करता।) इस उदाहरण में वयणम् शब्द के अन्य अर्थ वदनम् को खण्डयेत् के साथ मिलाकर देखने से चौर्य रत वाली वस्तु व्यञ्जित होती है। यह शब्दशक्त्युत्थ ध्वनि वयण शब्द विशेष के कारण ही सम्भव हो पायी है।

  • संयुक्त विषम व्यञ्जनों का समीकरण–

प्राकृत भाषा की सबसे बड़ी विशेषता, जो उसे संस्कृत की ध्वनि व्यवस्था से भिन्न करती है, वह है उसमें विषम व्यञ्जनों का समीकरण । संस्कृत में ऐसे दो व्यंजन भी साथ आ सकते हैं जो भिन्न भिन्न वर्गों से सम्बन्धित हों (जैसे प्राप्त, युक्त आदि), अथवा उनमें से एक वर्गीय हो और दूसरा अन्तःस्थ या महाप्राण हो (जैसे योग्य, स्वस्ति आदि)। परन्तु प्राकृत में भिन्न प्रकृति के व्यञ्जनों का संयोग नहीं होता। समीकरण की प्रक्रिया द्वारा ये ध्वनियाँ समान हो जाती हैं। प्राकृत वैयाकरणों के अनुसार विजातीय व्यञ्जनों में से जो निर्बल होता है उसका लोप हो जाता है तथा बचे हुए सबल वर्ण का द्वित्व हो जाता है[29]। व्यञ्जनों के बलाबल का निर्णय करने वाला रेखाचित्र अधोनिर्दिष्ट है–

यदि दो समान बल वाले वर्ण एक साथ आ जायें तो उनमें से पहले वाले वर्ण का लोप तथा बाद वाले वर्ण का द्वित्व हो जाता है[30]। इसके अतिरिक्त कुछ संयुक्त वर्णों का विशेष ध्वनि परिवर्तन भी होता है, जैसे ज्ञ का ण्ण, त्य का च्च इत्यादि[31]

इस वैशिष्ट्य के कारण उत्थापित काव्य सौन्दर्य के कुछ प्रकार अधोवर्णित हैं–

  1. अनुप्रास– संयुक्त वर्णों के समीकरण प्राकृत काव्य में अनुप्रास की मात्रा को संस्कृत की अपेक्षा बढ़ा देते हैं, क्योंकि अनुप्रास समान (अथवा समीकृत) व्यञ्जनों के प्रयोग से ही उत्थापित होता है। प्राकृत में अनेक संयुक्त व्यञ्जन कई बार एक विशेष संयुक्त व्यंजन समूह में ही परिणत होते हैं, जैसे ज्ञ, र्ण तथा न्न तीनों ही प्राकृत में ण्ण ध्वनि में परिणत होंगे। ऐसी परिस्थितियों में अनुप्रास का प्रकट होना अनिवार्य सा हो जाता है, जैसे–

संते पाउअकव्वे को सक्कइ सक्कअं पढिउं। (व॰ल॰ ३.११)

उपर्युक्त उदाहरण में शक्नोति संस्कृतं प्राकृतगत समीकरण सिद्धान्त के फलस्वरूप क्रमशः सक्कइ तथा सक्कअं हो गये हैं जिस कारण अनुप्रास की स्थिति बन पायी है।

  1. श्लेष– कई बार विजातीय संयुक्त वर्णों के समीकरण के कारण दो अलग अलग शब्दों का स्वरूप एक जैसा हो जाता है। इसके कारण श्लेष अलंकार की स्थिति बनती है, जैसे–

किसिओ सि कीस केसव किं न कओ धन्नसंगहो मूढ। (व॰ल॰ ६००, ६२.११)

   (कृश क्यों हो रहे हो केशव, हे मूढ, क्या तुमने धान्य/ सुन्दर रमणी का संग्रह/परिग्रह नहीं किया?)। उपर्युक्त उदाहरण में धन्न शब्द धान्य तथा धन्या दोनों का वाचक है। क्योंकि दोनों शब्दों में समीकरण के अनन्तर धन्न रूप ही बनता है।

  1. शब्दशक्त्युत्थ ध्वनि– शब्दशक्ति से उत्पन्न ध्वनि के प्रसंगों में प्रायः ऐसे शब्द प्रयुक्त होते हैं जिनमें श्लिष्टार्थ प्रदान करने की क्षमता होती है। उपर्युक्त प्रकार से हुए समीकरणों के कारण प्राकृत में ऐसे शब्द उद्भूत हो गये हैं जिनका प्रयोग इस प्रकार की ध्वनि को प्राप्त करने के लिए किया जाता रहा है–

पन्थिअ ण एत्थ सत्थरमत्थि मणं पत्थरत्थले गामे[32]। (व॰ल॰ ४९४)

(हे पथिक, इस पत्थरों से भरे गाँव में बिछौना/शास्त्र बिलकुल दुर्लभ है)। उपर्युक्त उदाहरण में सत्थर शब्द ध्वनि का प्रयोजक है क्योंकि संस्कृत के शास्त्र तथा स्रस्तर दोनों ही शब्द प्राकृत के विशिष्ट ध्वनि परिवर्तनों के कारण सत्थर के रूप में प्राप्त होते हैं।

  1. अन्त्यानुप्रास– हिन्दी में जिसे तुक मिलाना कहते हैं संस्कृत में उसके लिए शब्द है अन्त्यानुप्रास। प्राकृत में दुर्बल वर्णों के स्थान पर सहवर्ती वर्णों के द्वित्व होने से अनेक बार काव्य में तुकों की निष्पत्ति हो जाया करती है जिससे कविता की संगीतात्मकता में पर्याप्त अभिवृद्धि होती है। यह अन्त्यानुप्रास उसी कविता की संस्कृत छाया वाले रूपों में दिखायी नहीं पड़ती। उदाहरण के लिए–

कौलो धम्मो कस्स णो होइ रम्मो[33]

इस उदाहरण में धर्म का रम्य के साथ तुक मिलाया जा सका है तथा काव्य सौन्दर्य में अभिवृद्धि हो

सकी है क्योंकि प्राकृत मे इनके रूप किंचित् भिन्न होकर समान श्रुति वाले हो गये हैं।

णट्ठो चन्दुज्जोओ वासारत्तो हला पत्तो। (शृङ्गारप्रकाश[34])

वर्षारात्रः की जगह वासारत्तो तथा प्राप्तः की जगह पत्तो, इन परिवर्तनों द्वारा उपर्युक्त गाथा में

अन्त्यानुप्रास की संगीतात्मक सृष्टि हो पायी है।

  1. माधुर्य– काव्यशास्त्रियों के प्रेक्षण के अनुसार विषमवर्गीय व्यञ्जनों के समीकृत होकर सवर्गीय संयोग के रूप में प्राप्त हो जाने के कारण काव्य में माधुर्य गुण निष्पन्न हो जाता है। प्राकृत के एक परवर्ती कवि रामपाणिवाद के कंसवहो का एक माधुर्य गुण युक्त उदाहरण प्रस्तुत है–

फुरंतदंतुज्जलकंतिचंदिमासमग्गसुन्देरमुहेन्दुमंडलं।

विसुद्धमो ̆त्तागुणको ̆त्थुहप्पहापलित्तवच्छं फुडवच्छलंछणं॥ (कंसवहो १.४२)

  • मध्यवर्ती वर्गीय महाप्राण व्यञ्जनों का हकारादेश

प्राकृत भाषाओं में ख, घ, थ, ध तथा भ इन चतुर्थ महाप्राण वर्गीय वर्णों के स्थान पर ह का आदेश हो जाता है[35]। वस्तुतः होता यह है कि महाप्राण वर्ण अगर असंयुक्त अवस्था में हों तथा शब्द के आदि में न आयें तो उनके स्पर्श अंश का लोप हो जाता है। स्पर्श अंश का लोप होने पर हकार शेष रहता है। प्राकृत भाषा की इस विशिष्टता के आधार पर प्राकृतकवियों द्वारा निम्नांकित प्रकार के काव्य चारुत्व का लाभ लिया गया है–

  1. यमक–इस प्रकार के स्थलों में यमक की निष्पत्ति प्रायः हकारघटित शब्दों के साथ होती है। उदाहरण के लिए–

                     वेवन्तथोरथणहरहरकअकण्ठग्गहं गोरिं। (वक्रोक्तिजीवितम् पृ॰ ७९)

(काँपते हुए अल्प भार वाले वक्षस्थलों के साथ शिव के द्वारा गले लगायी गयी गौरी को–) यहाँ भर शब्द परिवर्तित होकर हर हो गया तथा अगले हर के साथ मिलकर इसने यमक की स्थिति उत्पन्न की।

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  1. सामान्य श्लेषालंकार– रीदीओ विलिहन्तु कव्वकुसला जोण्हं चओरा विअ। (कर्पूरमंजरी १.१)

(कविता में कुशल कविगण रीतियों की रचना ऐसे ही करें जैसे चकोर ज्योत्स्ना का लेहन करते हैं।) उपर्युक्त पद्य का यह अर्थ तभी समर्थित हो पायेगा जब हम विलिहिन्तु पद का श्लेष से दो अर्थों का ग्रहण करें– विलिखन्तु तथा विलिहन्तु। स्पष्ट है कि ऐसा प्राकृत में ही सम्भव है।

  1. श्लेषोत्थापित उपमा–

निद्धम्मो गुणरहिओ ठाणविमुक्को य लोहसंभूओ।

विंधइ जणस्स हिययं पिसुणो बाणो व्व लग्गंतो॥ (व॰ल॰ ५३, ५.५)

प्रकृत उदाहरण में पिशुन व्यक्ति की तुलना बाण के साथ की गयी है। यह उपमा तभी समर्थित हो पाती है जब अन्यान्य विशेषणों की तरह लोहसंभूओ शब्द भी उपमान तथा उपमेय दोनों के साथ संगत हो सके। प्राकृत की विशेषता के कारण इसके दो अर्थ – लोहसंभूत तथा लोभसंभूत सम्भव हो पाते हैं।

  1. श्लेषोत्थापित अर्थापत्ति– श्लेष के कुछ उदाहरण अधोलिखित हैं–

एक्कोँ च्चिअ दुव्विसहो विरहो मारेइ गयवई भीमो।

किं पुण गहिअसिलीमुहसमाहवो फग्गुणो पत्तो॥ (व॰ल॰ ६३८, ६६.९)

उपर्युक्त श्लोक में विरहो शब्द विरहः तथा विरथः दोनों का वाचक है। इसके कारण भीम (भयंकर) विरह तथा विरथ (रथरहित) भीम (मध्यम पाण्डव) दोनों अर्थ सम्भव हो पाये हैं। ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण कविता में अर्थापत्ति अलंकार की सृष्टि भी हो रही है। अर्थापत्ति अलंकार तब सम्भव होता है जब किसी पर्याप्त प्रसंग की अपर्याप्त वस्तु में व्याप्ति दिखायी जाती है[36]। यह कैमुतिक न्याय द्वारा सिद्ध हो पाता है।

  1. श्लेषोत्थापित विशेषोक्ति–

महु महु इत्ति भणंतहो वच्चदि कालो जणस्सु।

तो वि ण देउ जणद्दउ गोअरिभोदि मणस्सु ॥ (ध्वन्यालोक पृ॰ ५४४)

(मैं मैं/ विष्णु कहते हुए लोगों का समय बीत जाता है। फिर भी देव जनार्दन मनोगोचर नहीं होते।)

इस अपभ्रंश के पद्य में महु महु शब्द मधुमथु (विष्णु) तथा मैं मैं, दोनों का वाचक है। इस प्रकृत श्लेष के कारण विष्णु के पक्ष वाले अर्थ में विशेषोक्ति अलंकार की उद्भावना हो गयी है। कारण के रहने पर भी कार्य का न होना विशेषोक्ति कहलाती है[37]

  1. श्लेषोत्थापित व्याघात[38]

सव्वो छुहिओ सोहइ मढदेउलमन्दिरं च चच्चरअं।

नरणाह मह कुडुंबं छुहछुहिअं दुब्बलं होइ ॥ (व॰ल॰ १६१, १६.११)

(सुधालिप्त होने के बाद मठ, मन्दिर तथा चौराहे सारे सुन्दर लगते हैं, हे राजन्, लेकिन मेरा परिवार क्षुधा से क्षुधित होने पर दुर्बल हो गया है।) इस पद्य में व्याघात अलंकार तभी सृष्ट हो पाता है जब हम छुहिअ पद के द्वारा दो विरुद्ध कार्यों की निष्पत्ति दिखा पायें। ध्यातव्य है कि सुधित तथा क्षुधित दोनों शब्द प्राकृत में छुहिअ के रूप में प्राप्त होते हैं।

  • संयोगपूर्व तथा सानुस्वार दीर्घ स्वर का ह्रस्वीकरण

प्राकृत में दीर्घ वर्ण के बाद यदि संयोग रहे तो उसका ह्रस्व हो जाता है[39]। यह भाषिक परिघटना वस्तुतः लाघव के अनुरोध से होती है। संयोग के बाद यदि ह्रस्व स्वर हो तो वह अपने आप गुरु हो जाता है[40]। अतितरां गुरु की ऐसी प्रवृत्ति संस्कृत में तो है लेकिन प्राकृत में इसका अभाव है। यही स्थिति तब भी होती है जब दीर्घ वर्ण के बाद अनुस्वार होता है। इस प्रवृत्ति से उद्भूत कुछ काव्यात्मक उदाहरण निम्नवत् हैं–

  1. यमक

होसइ किल साहारो साहारे अंगणम्मि वड्ढन्ते।

पत्ते वसन्तमासे वसंतमासाइँ सोसेइ ॥ (व॰ल॰ ६३९, ६६.१०)

(विरहिणी कहती है–मैंने सोचा था कि वसन्त के आने पर आँगन में बढ़ता हुआ यह आम का पेड़ मुझे सहारा देगा। लेकिन यह तो मेरे वसा–आँत तथा माँसों को सुखा रहा है।) इस प्रकार का अद्भुत चमत्कारी प्रयोग इस कारण सम्भव हो पाया है कि प्राकृत में वसान्त्र शब्द का रूप वसंत हो जाता है।

  1. अर्थापत्ति[41]

मासच्छेए जो धाइ सम्मुहो सूरमंडलग्गस्स।

जइ एरिसो ससंको नीसंको केरिसो होइ ॥ (गाथारत्नकोश ५६९)

(मास के समाप्त होने पर जो सूर्यमण्डल की ओर गति करता है–अथवा– माँस के कट जाने पर भी जो शूर की तलवार के सम्मुख दौड़ पड़ता है; अगर शशांक/सशंक ऐसा है तो निःशंक कैसा होगा।) इस प्रसंग में अर्थापत्ति अलंकार तभी संगत हो पायेगा जब हम ससंक को शशांक तथा सशंक दोनों अर्थों में गृहीत करें। प्राकृत में सानुस्वार दीर्घ स्वर के ह्रस्व हो जाने के कारण हम यह लाभ ले पाते हैं।

  • प्राकृत में अनेक वर्णों का अभाव–

प्राकृत में संस्कृत की तरह स्वरों तथा व्यंजनों की बहुलता नहीं है। इसमें अनेक वर्ण अनुपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए ऐ, औ, ऋ, अः, श, ष आदि[42]। ये वर्ण प्राकृत भाषाओं में व्यवहृत नहीं होते। प्राकृत कविओं ने इस अभिलक्षण का प्रयोग अनेकत्र अपनी कविता के सौन्दर्य को बढ़ाने में किया है–

 

  1. अनुप्रास–

सामा सामण्णपआवइणो रेह च्चिअ ण होइ। (वक्रोक्तिजीवित पृ॰ ५७[43])

प्रकृत उदाहरण में स्पष्ट है कि श्यामा शब्द का शकार सकार में परिवर्तित हो गया है जिसके कारण आगे आने वाले सामण्ण शब्द के सकार के साथ मिलकर अनुप्रास की सृष्टि हो रही है।

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  • प्राकृत कविता में प्रयुक्त देशज शब्द

ऊपर चर्चा आ चुकी है कि प्राकृत में तद्भव तथा तत्सम शब्दों के अतिरिक्त देशज शब्द भी प्रयुक्त होते हैं। देशज शब्दों का मूल हमें संस्कृत में नहीं मिलता। प्राकृत कविता में अनेक बार तत्सम–तद्भव शब्दों के साथ देशज शब्दों के प्रयोग से एक विशेष प्रकार की ध्वन्यात्मक चारुता आ जाती है। उदाहरण के लिए–

  1. अन्त्यानुप्रास (तुक)–

पोढ–सुणओ विअण्णो अत्ता मत्ता पई वि अण्णत्थो। (गा॰ स॰ ६.४९)

अत्ता सास के लिए प्रयुक्त देशज शब्द है जो मत्ता के साथ मिलकर अन्त्यानुप्रास को प्रयोजित कर रहा है।

  1. अनुप्राससामान्य–

सो च्चिअ दीसइ गोसे सवत्तिणअणेसु संकंतं। (गा॰ स॰ २.६)

गोसे शब्द प्रभात के लिए प्रयुक्त देशी शब्द है।

जयउ सरसउसइ बुहजणवंदिअअरपाअसेट्ठकंदोट्ठा

उपर्युक्त उदाहरण में कन्दोट्ठ शब्द कमल के लिए प्रयोग में आने वाला देशी शब्द है जो श्रेष्ठ से परिवर्तित तद्भव शब्द सेट्ठ के साथ मिलकर अनुप्रास के सौन्दर्य को प्रकट कर रहा है।

  • प्राकृत में अन्तिम व्यञ्जन का लोप –

प्राकृत भाषा में अन्तिम स्वररहित व्यञ्जन का अभाव होता है[44]। उदाहरण के लिए प्राकृत में सरित् के स्थान पर प्राकृत में सरि, हरित् के स्थान पर हरि, जगत् के स्थान पर जग तथा छन्दस् के स्थान पर छन्द आदि रूप प्राप्त होते हैं। ऐसी स्थितियों में ये परिवर्तित शब्द व्यञ्जन सहित तथा व्यञ्जन रहित दोनों प्रकार के शब्दों के अर्थ देने लगते हैं। इससे श्लेष की स्थिति बनती है तथा श्लेष और अन्य श्लेषोत्थापित अलंकारों का प्रयोग सम्भव हो पाता है। छन्द शब्द का एक उदाहरण प्रस्तुत है–

छन्दं अयाणमाणेहिँ जा किया सा ण होइ रमणिज्जा।

किं गाहा अह सेवा अहवा गाहा वि सेवा वि ॥ (व॰ल॰ २.१०)

(इच्छा/छन्द के बिना जो कुछ किया जाय वह रमणीय नहीं होता है। चाहे गाथा हो अथवा सेवा हो अथवा गाथा और सेवा दोनों हो।) संस्कृत के छन्द (इच्छा) तथा छन्दस् (वृत्त या जाति) दोनों शब्द प्राकृत में छन्द के रूप में मिलते हैं। इसी उपर्युक्त श्लेष के कारण इस पद्य में गाथा तथा सेवा दोनों में उपमानोपमेय भाव व्यंजित हो पाया है।

  • प्राकृतगत सुबन्तरूप वैशिष्ट्य–

प्राकृत में अनेक बार शब्दों के सुबन्त रूप संस्कृत सुबन्तों की अपेक्षा भिन्न होते हैं। ऐसा सामान्यतः इसलिए होता है क्योंकि प्राकृत में सुप् प्रत्ययों के आदेश संस्कृत की अपेक्षा अलग होते हैं। ऐसे शब्द अपने बाद में आने वाले पदों के साथ मिलकर अनेक प्रकार के शब्दालंकारों की सृष्टि कर पाते हैं, जो प्राकृत काव्य की अपनी विशेषताएँ कही जा सकती हैं। एक उदाहरण वाक्पतिराज के गउडवहो (पद्यसंख्या ६) से प्रस्तुत है–

हरिणो हरिणच्छाअं विलास–परिसंठिअं जअइ॥

यहाँ हरेः शब्द के लिए प्राकृत भाषा में प्रयुक्त हरिणो शब्द की ही विशेषता है जिसके कारण वह आगे के हरिण (=हिरन) के साथ मिलकर यमक की छटा बिखेर रहा है।

  • प्राकृत में अनेक व्याकरणिक कोटियों का अभाव–

प्राकृत भाषा में संस्कृत की अनेक व्याकरणिक कोटियाँ लुप्त हो गयी हैं। संस्कृत भाषा में अनेक युगों की भाषिक प्रवृत्तियों का संग्रह दिखायी पड़ता है जिसके कारण संस्कृत बहुस्तरीय और बहुसंरचनात्मक रूप में हमारे सामने प्रकट होती है। भाषाएँ सामान्यतः क्लिष्टता से सरलता की ओर गति करती हैं। इसी कारण प्राकृत में संस्कृत के द्विवचन, आत्मनेपद, चतुर्थी विभक्ति आदि अनेक व्याकरणिक कोटियाँ लुप्त हो गयी हैं अथवा अल्पप्रयुक्त हैं[45]। प्राकृत कवियों ने भाषा की इस विशेषता का अनेकशः उपयोग काव्य सौन्दर्य के परिवर्धन में भी किया है। उदाहरणार्थ–

सा सल्लइ सल्लइ गयवरस्स विंझं मुयन्तस्स॥ (व॰ल॰ १८७, १९.२)

(वह सल्लकी का वृक्ष विन्ध्य पर्वत छोड़ते हुए गजेन्द्र को सालता है।) उपर्युक्त पद्य में शल्यायते (शल्य की तरह लगता है) शब्द आत्मनेपद का त्याग करके प्राकृतगत समीकरण के नियमों के अनुसार सल्लइ रूप को धारण करता है। यह सल्लइ रूप सल्लकी के परिवर्तित सल्लइ रूप के साथ मिलकर यमक अलंकार का उदाहरण बनता है।

  • वर्णों के वर्णान्तरादेश

संस्कृत की बहुत सी ध्वनियाँ प्राकृत भाषा की अपनी ध्वनि प्रणाली की विशेषताओं के अनुसार अन्यान्य ध्वनियों में परिवर्तित हो जाती हैं। इसके कारण भी प्राकृत काव्य में विच्छित्ति वैचित्र्य देखा जाता है। कुछ उदाहरण अधोलिखित हैं–

  1. श्लेष–

अव्वोच्छिण्णपसरिओ अहिअं उद्धाइ फुरिअसूरच्छाओ।

उच्छाहो सुभडाणं विसमक्खलिओ महाणईण व सोओ॥ (सेतुबन्ध ३.१७)

उपर्युक्त स्कन्धक में वीरों के उत्साह की तुलना महानदियों के प्रवाह के साथ की गयी है। दोनों फुरिअसूरच्छाअ हैं। प्राकृत भाषा की विशेषता है कि वह उन्हें एक साधारण धर्म से जोड़ते हुए भी उनके लिए अलग अलग अर्थ समर्पित करती है– स्फुरितशूरच्छाय तथा स्फुरितसूर्यच्छाय।

  1. यमक–

तुइ सण्णिहिदम्मि पेक्खए विविहं णच्चइ णच्चई व सा। (उसाणिरुद्धं २.६६)

नृत्यति नर्तकीव की अपेक्षा णच्चइ णच्चईव में यमक का अतिरिक्त लाभ प्रत्यक्ष है।

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कज्जलकज्जं पि कअं उअरि भमंतेहिँ भमरेहिं। (शृ॰प्र॰ पृ॰ ४५२[46])

कज्जलकार्यं का कज्जलकज्जं हो जाना भी यमक का ही आधान करता है।

उपर्युक्त प्रसंगों का एक अन्य महत्त्वपूर्ण उपयोग यह भी हो सकता है कि इनकी सहायता से हम प्राकृत कविता में मौलिकता की जाँच भी कर सकते हैं। इसके वे चमत्कार जो अनुवादसहिष्णु हैं उन्हें प्राकृत कविता ने परम्परा से प्राप्त किये हैं जबकि अनुवाद–असहिष्णु चमत्कारों को हमें प्राकृत परम्परा की अपनी सृष्टि माननी होगी। अन्यथा मुद्राराक्षस की अधोलिखित गाथा–

छग्गुणसंजोअदिढा उवाअपरिवाडिघडिअपासमुही।

चाणक्कणीइरज्जू रिउसंजमणुज्जआ जयइ[47]

को यदि संस्कृत में कर दिया जाये तो भी उसके अर्थ में किसी भी प्रकार की हानि नहीं होगी[48]। केवल नाटक में नीच पात्र के द्वारा इसकी अनिवार्यप्रयुक्तता व्याहत हो जायेगी। ऐसी कवितायें यद्यपि प्राकृत भाषा में तथा प्राकृतोचित गाथा छन्द में लिखी गयी है फिर भी हमें मानना होगा कि ये संस्कृत से अतितरां प्रभावित हैं तथा उतनी स्वाभाविक नहीं हैं जितनी कि उपर्युक्त कविताएँ।

इस प्रकार उपर्युक्त वर्णनों से स्पष्ट है कि प्राकृत कविता की अपनी भाषिक विशेषताओं के कारण उसमें मौलिक काव्य सौन्दर्य की सृष्टि के अनुकूल सामर्थ्य विकसित हुआ है जो संस्कृतानुवाद के द्वारा गम्य नहीं है।

शब्दों की अनेकार्थकता तथा उससे प्रयुक्त काव्यचारुत्व के कारण प्राकृत कविता प्राचीनकाल से ही प्रसिद्ध रही है। लालित्य, मधुराक्षरत्व, शृंगारिकता के अलावा प्राकृत काव्य अपनी छेकभणितियों के कारण रसिकों में स्वीकृत प्राकृत काव्य संस्कृत के साथ प्रतिद्वन्द्विता करता हुआ दिखायी पड़ता है। यही कारण है कि संस्कृत के काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में उत्तम काव्य के उदाहरणों में प्राकृत की कविताएँ उपन्यस्त होती रही हैं। प्राकृत काव्य के इस प्रकार के चारुत्व में उसकी विशिष्ट ध्वनि प्रणाली तथा अन्य उपरिवर्णित भाषिक विशेषताओं का बड़ा योगदान है।

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After reading this paper an excellent poet of Sanskrit Dr. Shankar Rajaraman writes a Prakrita verse with similar characteristics-

अत्थि ण सो कव्वगुणो पाउअभासेक्कसुलहसंजोओ ।
जो णत्थि बंभवणिआवणिआमहुकेसरम्मि वलरामे ॥

         (अस्ति न स काव्यगुणः प्राकृतभाषैकसुलभसंयोगः।
यो नास्ति ब्रह्मवनितावनिकामधुकेसरे बलरामे ॥ )

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संक्षिप्त सन्दर्भ सूची

प्राकृत साहित्य के ग्रन्थ–

  1. संस्कृतगाथासप्तशती व्यंग्यसर्वंकषोपेता (१९८३) भट्टमथुरानाथशास्त्री (पुनः॰) मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली
  2. वज्जालग्गं (१९८४) अनु॰ डा̆॰ विश्वनाथ पाठक. पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संस्थान, वाराणसी
  3. गाथासप्तशती (१९९५) अनु॰ डा̆॰ विश्वनाथ पाठक. पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी–५
  4. गाहारयणकोस (१९७५) जिनेश्वरसूरिकृत. सं॰ अमृतलाल भोजक, नगीन जे॰ शाह. एल॰ डी॰ इंस्टिट्यूट आ̆फ़ इंडोलोजी, अहमदाबाद–९
  5. शृङ्गारमंजरी सट्टकम् (१९७८) विश्वेश्वरविरचितम्, सं॰ अनु॰ बाबूलालशुक्ल शास्त्री. विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी
  6. पाइअलच्छीनाममाला (१९६०) महाकवि धनपाल. सं॰ बेचरदास जीवराज दोशी.शादीलाल जैन, बम्बई–३
  7. विमलसूरिविरइयं पउमचरियं (१९६२) सं॰ हर्मन जैकोबी. प्राकृतग्रन्थ परिषद्, वाराणसी
  8. कंसवहो (सं॰ २००२) रामपाणिवादकृत. सं॰ ए॰ एन॰ उपाध्ये. मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली.
  9. गउडवहो (१९९४) अनु॰ मिथिलेश कुमारी मिश्र. चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी
  10. उसाणिरुद्धं (१९९६) रामपाणिवादविरइयं. सं॰ वी॰ एम॰ कुलकर्णी. शारदाबेन चिमनभाई एजुकेशनल रिसर्च सेण्टर, अहमदाबाद
  11. सेतुबन्धमहाकाव्यम् (२००६) अनु॰ डा̆॰ हरिशंकर पाण्डेय. शारदा संस्कृत संस्थान, वाराणसी
  12. जैन, प्रेम सुमन (१९८२) प्राकृतकाव्यमंजरी. राजस्थान प्राकृत भारती संस्थान, जयपुर
  13. बाहरी, हरदेव () प्राकृत और उसका साहित्य . राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
  14. जैन, जगदीशचन्द्र(१९६१) प्राकृत साहित्य का इतिहास. चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी
  15. सूरिदेव, श्रीरञ्जन (१९८४) प्राकृत–संस्कृत का समान्तर अध्ययन. भाषा साहित्य संस्थान, इलाहाबाद
  16. () Kulkarni,V.M. (1988), Prakrit Verses in Sanskrit Works on Poetics. Bhogilal Leherchand Institute of Indology, Delhi.

प्राकृत व्याकरण के ग्रन्थ–

  1. प्राकृतानन्द (१९६२) सं॰ मुनि जिनविजय. संचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर
  2. शेषकृष्णविरचिता प्राकृतचन्द्रिका (१९६९) संशोधक–सुभद्र झा, सम्पादक–प्रभाकर झा. भारतीय विद्या प्रकाशन, वाराणसी
  3. प्राकृतचिन्तामणि (१९८७) श्रीघासीलालजी महाराज. आचार्य श्रीघासीलाल जी महाराज साहित्य प्रकाशन समिति, इन्दौर
  4. प्राकृतकौमुदी(१९८८) श्रीघासीलालजी महाराज. आचार्य श्रीघासीलाल जी महाराज साहित्य प्रकाशन समिति, इन्दौर
  5. प्राकृतशब्दप्रदीपिका नृसिंहशास्त्रिकृता (१९९२) सं॰ डा̆॰ एम॰ गोपाल रेड्डी, वी॰ श्रीनिवास शर्मा. संस्कृतपरिषद्, उस्मानिया विश्वविद्यालय–हैदराबाद
  6. प्राकृतप्रकाशः संजीवनी–सुबोधिनी–मनोरमा–प्राकृतमञ्जरीतिटीकाचतुष्टयेन हिन्द्यनुवादेन च समन्वितः (१९९६) सं॰ आचार्य बलदेव उपाध्याय
  7. हैमप्राकृतव्याकरणम् (१९९६) सं॰ आप्टे, के॰ वी॰. चौखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी।
  8. पिशल्, आर॰, (अनु॰) जोशी,हेमचन्द्र (१९५८).प्राकृत भाषाओं का व्याकरण बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना
  9. जैन, उदयचन्द्र (१९८८) शौरसेनी प्राकृतव्याकरण. प्राकृत अध्ययन प्रसार केन्द्र, उदयपुर
  10. Ananthanarayana, H.S. (1973) A Prakrit Reader. Central Institute of Indian languages. Mysore

 

[1] जयतु सरस्वती बुधजनवन्दिततरश्रेष्ठपादपङ्कजा।

प्राकृतमिव मधुरमुखी संस्कृतमिव रूढमाहात्म्या॥

[2] यद्यपि एस॰वी॰ सोहनी आदि कई विद्वान् हाल की गाहासत्तसई को कालिदास से भी प्राचीन मानते हैं। वे हित्वा हालां इत्यादि मेघदूतस्थ श्लोक (पूर्वमेघ) के हाला पद से हाल की सप्तशती का संकेत मानते हैं। Sohoni, S.V. Kalidasa, Hala Satavahana and Chandrapgupta II. JBRS. Vol. XLI.Pt. 2, p. 229. अन्यत्र भी– सूरिदेव (१९८४) पृ॰ ५५.

[3] प्राकृतकाव्य के रहते कोई संस्कृत कैसे पढ़ सकता है? (वज्जालग्गं ३.११)

[4] गउडवहो ९२

[5] ७.६७

[6] नीक शब्द फ़ारसी भाषा का प्रतीत होता है, जिसका अर्थ अच्छा या नेक होता है। हिन्दी में प्रचलित नेक शब्द इसी का उच्चारणान्तर है। फ़ारसी में इस शब्द के मुक्तपरिवर्त (Free Variants) हैं– नीकू या निकू।

[7] पिशेल(१९५८) पृ॰२ पर हेमचन्द्र जोशी की टिप्पणी।

[8] आर्यासप्तशती १.५२

[9] परुसा सक्कअबंधा पाउअबंधो वि होइ सुउमारो। पुरिसमहिलाणँ जेत्तिअमिहंतरं तेत्तिअमिमाणं॥ अर्थात् संस्कृत के रचनाबन्धकठोर तथा प्राकृत के बन्ध सुकुमार होते हैं। इन दोनों में इतना ही अन्तर है जितना स्त्री और पुरुष (के अवयव बन्ध) में। राजशेखर–कर्पूरमंजरी १–८

[10] शाकुन्तलम् प्रथम अंक, पृ॰ १५, पंक्ति ६१ (सं॰) गौरीनाथ शास्त्री, साहित्य अकादमी।

[11] गाहासत्तसई २.३४

[12] तत्रैव

[13] तत्रैव

[14] महाराष्ट्राश्रयां भाषां प्रकृष्टां प्राकृतं विदुः। (काव्यादर्श १.३४)

[15] स्वरादसंयुक्तस्यानादेः १.१७६

[16] कगचजतदपयवां प्रायो लुक्। हैम॰ १.१७७

[17] अवर्णे यश्रुतिः। हैम॰ १.१८०

[18] देखिये–पिशेल (१९५८) पृ॰८, पृ॰ १८ आदि।

[19] उदाहरण के लिये शीतकाल के लिये प्राचीन राजस्थानी में सीयाळ तथा उष्णकाल के ऊन्हाळ का प्रयोग। भगिनिपति का बहनोई। रसवती का रसोई। गृहकृत्य का भोजपुरी में घरकच। पाद का पाव या पाँव। चतुष्पाद का भोजपुरी में चौआ। आम्रराजि का अमराई, राजिका का राई। ये परिवर्तन इस बात में स्पष्ट प्रमाण हैं कि उपर्युक्त ध्वनि परिवर्तन कृत्रिम नहीं अपितु स्वाभाविक दिशा से निर्देशित हैं।

[20] यद्यपि भाषा में सादृश्य भी ध्वनि परिवर्तन का प्रेरक कारण होता है, लेकिन यह भी एक स्वाभाविक प्रक्रिया है तथा सादृश्य भाषिक परिवर्तन का एक अकेला कारण नहीं है।

[21] एक अन्य उदाहरण–

सालंकाराहिं सलक्खणाहिं अन्नन्नरायरसियाहिं।

गाहाहिँ पणयिणीहिँ व खिज्जइ चित्तं अइंतीहिं॥ (व॰ल॰ २.२)

(रायरसिय शब्द रागरसिक तथा रागरसित दोनों अर्थों को दे रहा है, जिसके कारण गाथा तथा प्रयसी में उपमा सम्भव हो पा रही है।)

[22] वज्जालग्गं (१९८४), भूमिका–xiii–xxvii

[23] अर्थे सत्यर्थभिन्नानां वर्णानां सा पुनः श्रुतिः। यमकम्–॥ (काव्यप्रकाश ९.८३)

[24] विरुद्धं भिन्नदेशत्वं कार्यहेत्वोरसंगतिः। (कुवलयानन्दः ८५)

[25] तथा प्राकृत में अकारान्त शब्दों में ऐस् के स्थान पर भिस् प्रत्यय का भी प्रयोग होने के कारण (हैम॰ ३.७ भिसो हि हिँ हिं)

[26] एक अन्य उदाहरण– अणण्णणाहा अविहा विहाअ णे। (कंसवहो १.३६)

[27] १.डज्झउ सक्कयकव्वं सक्कयकव्वं च णिम्मियं जेण।

बंसहरम्मि पलित्ते तडयडतट्टतणं कुणइ॥

२. पाइयकव्वुल्लावे पडिवयणं सक्कएण जो देइ।

सो कुसुमसत्थरं पत्थरेण दलिउं विणासेइ ॥ (व॰ ल॰ परिशिष्ट ३१* ३–४)

[28] अन्य उदाहरण–

तं नमह भारइं जीए चरणनहदप्पणेसु संकंता।

   बहुवयणा होंति फुडं पणमंता तक्खणे कइणो॥ (गाथारत्नकोश १८)

[29] अनादौ शेषादेशयोर्द्वित्वम् २.८९

[30] देखिए– हैम॰ २.७७ से २.९०

[31] विशेष विस्तार के लिये देखें हेमचन्द्रकृत प्राकृतव्याकरण–द्वितीय पाद सूत्र ।

[32] अत्र यद्युपभोगक्षमोऽसि तदा आस्स्वेति (वस्तुमात्रं) व्यज्यते। काव्यप्रकाश ४.५३

[33] कर्पूरमंजरी १.२३

[34] कुलकर्णी पृ॰ ६९

[35] खघथधभाम् । हैम॰१.१८७

[36] कैमुत्येनार्थसंसिद्धिः काव्यार्थापत्तिरिष्यते।

स जितस्त्वन्मुखेनेन्दुः का वार्ता सरसीरुहाम्॥ (कुवलयानन्द १२०)

[37] कार्याजनिर्विशेषोक्तिः सति पुष्कलकारणे।

हृदि स्नेहक्षयो नाभूत् स्मरदीपे ज्वलत्यपि॥ (कुवलयानन्द ८३)

[38] यद्यथा साधितं केनाप्यपरेण तदन्यथा।

तथैव यद्विधीयेत स व्याघात इति स्मृतः॥ (काव्यप्रकाश १०.१३७–१३८)

[39] ह्रस्वः संयोगे। हैम॰ १.८४

[40] संयोगे गुरु। (अष्टाध्यायी १.४.११)

[41] लक्षण ऊपर निर्दिष्ट है।

[42] ऐ–औ–̆क– ̆प––ऋ–ॠ–लृ–लॢ–प्लुत–श–षाः सर्गः चतुर्थी भ्यसि

प्रान्ते हल् ङञनाः पृथग्द्विवचनं नाष्टादश प्राकृते। (प्राकृतचन्द्रिका १.१३)

[43] कुलकर्णी पृ॰ १८ पर उद्धृत

[44] प्रान्ते हल् ङञनाः पृथग्द्विवचनं नाष्टादश प्राकृते। (प्राकृतचन्द्रिका १.१३)

[45] सुप्तिङ्लिङ्गनराज्झलादिबहुलं षष्ठी चतुर्थ्याः सदा

तादर्थ्योदितङेस्तु वा बहुवचो द्वित्वे प्रयोज्यं सदा॥ (प्राकृतचन्द्रिका १.१४)

[46] कुलकर्णी पृ॰ ८१

[47] मुद्राराक्षस ६–४

[48] ऐसा प्रतीत होता है कि कवि ने मूलतः यह पद्य संस्कृत में ही बनाया होगा। इसकी संस्कृतच्छाया में कहीं भी छन्दोभङ्ग दृष्टिगोचर नहीं होता– षड्गुणसंयोगदृढा उपायपरिपाटिघटितपाशमुखी। चाणक्यनीतिरज्जू रिपुसंयमनोद्यता जयति॥तदेव॥

[i] प्राकृत वैयाकरणों ने व्याकृति की सुविधा तथा लाघव के लिए संस्कृत को प्राकृत का मूल मान लिया है। उन्होंने संस्कृत की अपेक्षा प्राकृत के शब्दों को ३ प्रकारों का बताया है– १. वे शब्द जिनमें प्रकृति तथा प्रत्यय दोनों में विकृति हो वे हैं तद्भव, २. जिनमें केवल प्रत्ययांश में विकृति हो प्रकृत्यंश में नहीं वे हैं तत्सम (तत्सम को संस्कृतसम भी कहते हैं, दे॰ हैम॰ सर्वत्र लबरामवन्द्रे सूत्र की वृत्ति) तथा ३. जिन शब्दों का प्रयोग क्षेत्र विशेष तक सीमित होने के कारण अप्रसिद्ध हों वे हैं देशी। देखिए– प्राकृतचन्द्रिका १. ४–७

प्रकृतिः संस्कृतं तत्र भवत्वात् प्राकृतं स्मृतम्।

तद्भवं तत्समं देशीत्येवमेव त्रिधा मतम्॥

प्रकृतिप्रत्ययांशाभ्यां विकृतं तद्भवं यथा।

गोरीआ देउ सोहग्गं सामिद्धिं पाअडं स्मृतम्॥

यत्केवलं प्रत्ययांशे विकृतं तत्समं यथा–।

हरिणो चरणे चारु नुमो कमलकोमले॥

देशी देशविशेषेण प्रयुक्तमपरिस्फुटम्।

यथा– हल्लो हलं हालः कंदोट्टं सम उप्पवम्॥

अन्यत्र भी–प्राकृतशब्दप्रदीपिका–उपोद्घातश्लोक।

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