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                                      जयउ सरस्सइ बुहअणवन्दिअअरपाअसे ̆ट्ठकंदोट्ठा।

                                     पाउअ विअ महुरमुही सक्कअ विअ रूढमाहप्पा[1]

                                                     (जयतु सरस्वती बुधजनवन्दिततरश्रेष्ठपादपङ्कजा।

                                                      प्राकृतमिव मधुरमुखी संस्कृतमिव रूढमाहात्म्या॥)

सम्बोधि के नवीन अंक में प्राकृत साहित्य के चारुत्व के भाषिक कारकों की समीक्षा परक यह लेख प्रकाशित हुआ है–

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जिस साहित्यिक प्राकृत की चर्चा इस पत्र का विषय है, भाषाविदों ने उसके वाग्व्यवहार का समय पहली शताब्दी ईस्वी से लेकर पाँचवीं शताब्दी तक माना है। यह काल संस्कृत कविता शैली के पूर्णतः विकसित हो जाने के बाद का है[2]। संस्कृत में काव्योचित संवेदना तथा भाषा का विकास वैदिक काल से ही प्रारम्भ हो गया था। महाकाव्य काल से होते हुए शताब्दियों तक इसे पूर्णता प्राप्त होती रही। संस्कृत के समान्तर, प्राकृत भाषा क्षेत्रीय भाषाओं के रूप में प्रारम्भ से प्रचलित तो थी लेकिन इसका साहित्यिक प्रयोग बहुत बाद में देखा गया। प्राकृत का साहित्यिक स्वरूप, चूँकि संस्कृत कविता के बाद आया इस कारण प्राकृत काव्य में वे सारी विशिष्टतायें प्रायः आ गयीं जिन्हें युगों के विकास के परिणामस्वरूप संस्कृत कविता ने प्राप्त किया था। प्राकृत कविता को संस्कृत काव्य परम्परा से काव्योचित अभिव्यक्तियाँ, मुहावरे, उपमान–विधान, काव्य रूढियाँ, छन्दोवैचित्र्य तथा अन्यान्य आलंकारिक उपादान रिक्थ के रूप में प्राप्त हुए। महाकाव्य, गीतिकाव्य, गद्यकाव्य, नाटक, कथासाहित्य आदि विधागत विशिष्टतायें भी संस्कृत की ही भाँति प्राकृत में भी प्रचलित हुईं। बाद में प्राकृत ने भी अनेक स्तरों पर संस्कृत की परम्परा को समृद्ध किया।

प्राकृत कविता संस्कृत की प्रायः सभी काव्यात्मक विशेषताओं से संवलित है, लेकिन इसके साथ ही प्राकृत कविता की अनेक मौलिक विशेषतायें भी हैं जिन्हें हम संस्कृत में नहीं पाते। प्राकृत कविता में अनेकानेक ऐसे चमत्कार भी प्राप्त होते हैं जो संस्कृत कविता की अपेक्षा विशिष्ट हैं। प्राकृत के कवितागत सामर्थ्य को रसिक समाज ने पहचान लिया था जिसका संकेत हमें यत्र तत्र मिलता भी है। संस्कृत की अपेक्षा प्राकृत की कविता को रमणीयतर मानते हुए प्राकृत का कवि कहता है– सन्ते पाउअकव्वे को सक्कइ सक्कअं पढिउं[3]? प्राकृत में काव्यगत सम्भावनाओं के इस नयेपन की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए वाक्पतिराज ने अपने गउडवहो में कहा है–                   णवमत्थदंसणं संनिवेससिसिराओ बन्धरिद्धीओ।

अविरलमिणमो आभुवणबन्धमिह णवर पअअम्मि[4]

( प्राकृत में नवीनकाव्यार्थ दिखायी पड़ते हैं। इसके काव्यबन्धों की समृद्धि सन्निवेश के वैशिष्ट्य के कारण आह्लादक है। मानों, इसमें सम्पूर्ण भुवन ही समाहित हो रहा है। ये विशेषताएँ केवल प्राकृत काव्य की ही हैं।)

संस्कृत की अपेक्षा प्राकृत कविता में काव्यार्थ की यह नवीन सम्भावना उसकी अपनी भाषागत विशिष्टताओं के कारण प्रकट हो पायी है। प्राकृत में सामान्य रूप से संस्कृत कविता में प्रयुक्त काव्य विच्छित्तियों तथा कवि समयों का ही प्रयोग मिलता है। दोनों भाषाएँ संरचना तथा काव्यार्थ की दृष्टि से इतनी निकट हैं कि सामान्यतः विद्वद्वर्ग में प्राकृत कविता का अध्ययन संस्कृत की छाया से हुआ करता है तथा अधिकतर प्राकृत कविताओं को संस्कृतानुवाद-सहिष्णु माना जाता है। अर्थात् ऐसा माना जाता है कि काव्यार्थ को गँवाये बिना उन्हें संस्कृत में परिवर्तित करके समझा जा सकता है । इन भाषाओं में परस्पर अनुवाद की आवश्यकता भी नहीं होती। इसी कारण इनके मध्य हुए भाषान्तरण को अनुवाद न कह कर छाया कहते हैं। इन सारी निकटताओं के बावजूद, प्राकृत कविताओं की सभी काव्य विच्छित्तियों को संस्कृत की छाया मात्र से मूल्यांकित किया जा सकता हो, ऐसा नहीं है। प्राकृत साहित्य के अध्ययन के क्रम में हमें ऐसी अनेक स्थितियाँ प्रायः दिखायी पड़ जाती हैं जहाँ संस्कृत अनुवाद, प्राकृत काव्य के अर्थ के प्रकाशन में पूरी तरह से समर्थ नहीं होता। ये स्थितियाँ वे होती हैं जहाँ प्राकृत कविता की क्षमता, उसकी भाषिक विशेषताओं के कारण संस्कृत के भाषिक ढाँचे को अतिक्रान्त कर जाती है। प्रस्तुत चर्चा में इन्हीं काव्यात्मक स्थितियों का दिङ्मात्र निदर्शन किया जा रहा है।

उपर्युक्त स्थितियाँ सामान्यतया दो प्रकार की हो सकती हैं। पहली स्थिति वह है जब प्राकृत कविता में संस्कृत से आगत तद्भव शब्दों का प्रयोग न करके देशज शब्दों का प्रयोग किया गया हो[i]। ध्यातव्य है कि देशज शब्द संस्कृतमूलक नहीं होते अतः उनकी छाया नहीं की जा सकती। उनका अनुवाद संस्कृत के समानार्थी शब्दों को खोज कर करना होता है। उदाहरण के लिये गाथासप्तशती की यह प्रसिद्ध गाथा–एत्थ णिमज्जइ अत्ता[5] इत्यादि के संस्कृत अनुवाद में अत्ता के स्थान पर श्वश्रू का प्रयोग किया गया है।

दूसरी स्थिति काव्य की दृष्टि से पहली स्थिति की अपेक्षा और महत्त्वपूर्ण है। संस्कृत तथा प्राकृत यद्यपि समान्तर भाषाएँ हैं तथापि दोनों की भाषिक मर्यादा में कुछ भेद अवश्य हैं। उन भेदों के कारण प्राकृत कविता को अनेकशः नये काव्यात्मक चमत्कारों का लाभ मिल जाता है। प्राकृत की अलंकृत कविता शैली का काल संस्कृत की कविता के बाद का है। ऐसा देखा जाता है कि ऐतिहासिक दृष्टि से ध्वनि तथा अर्थ के स्तरों पर परिवर्तित होने के अनन्तर बाद की साहित्यिक भाषाओं में अनेक बार चमत्कार की सम्भावना कई गुना बढ़ जाती है। पुराने पड़ते शब्द, लोक से लुप्त होने के बावजूद काव्य की स्मृति में अक्षुण्ण रहते हैं। काव्य की स्मृति लोक की स्मृति की अपेक्षा बलवती होती है। पुराने शब्द तथा उनके अर्थ, नये शब्दों तथा उनके अर्थों के साथ रखे जा सकने के कारण अनेक बार काव्य को अभूतपूर्व अर्थ प्रदान कर देते हैं। पूर्ववर्ती भाषाओं में यह चमत्कार उत्पन्न नहीं किया जा सकता है। ब्रजभाषा के कवि बिहारी के एक दोहे से हम इस बात को और स्पष्ट कर सकते हैं– नाक बास बेसरि लह्यो बसि मुकुतनु के संग। इस दोहे में नाक शब्द अपने पुराने–स्वर्ग अर्थ में भी है तथा नये–नासिका अर्थ में भी। यह सही है कि बिहारी के काल (१५९५–१६६४ ई॰) में नाक शब्द लोकव्यवहार स्वर्ग के अर्थ में बिलकुल प्रयुक्त नहीं होता रहा होगा, लेकिन कविता में उन्हें इस शब्द के पुराने अर्थ के प्रयोग की स्वीकृति मिल गयी है। स्पष्ट है कि पुरातन तथा नवीन अर्थ का यही संयोग इस कविता में विद्यमान श्लेष के चमत्कार का कारण है।

साहित्य की यह ऐतिहासिक परिघटना सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक है। भारतीय साहित्य में हम इसे और स्पष्ट रूप में देख सकते हैं क्योंकि यहाँ भाषिक तथा साहित्यिक विकास के विभिन्न कालखण्ड सौभाग्यवश सुरक्षित हैं। भारतीय भाषा परम्परा की अविच्छिन्नता तथा परिपूर्णता इसके साहित्य की समृद्धि का एक बड़ा कारण है। एक और उदाहरण तुलसीदास के रामचरितमानस से है। ग्रन्थारम्भ में ही, खल वन्दना के प्रसंग में वे कहते हैं–

बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेहीं। संतत सुरानीक हित जेही।।

कवि दुर्जनों को शक्र(=इन्द्र) के समान इस कारण से कह पाता है कि सुरानीक दोनों के लिए हितकर होता है। यहाँ सुरानीक शब्द में सखण्ड श्लेष है। एक बार तो इसका विभाग हम सुर+अनीक (देवसेना) करेंगे जो कि इन्द्र के पक्ष में संगत होगा। दूसरी बार दुर्जन के पक्ष में सुरा+नीक (अच्छी शराब) यह अर्थ लेना होगा। तुलसीदासजी ने जो चमत्कार उत्पन्न किया है वह संस्कृत में सम्भव नहीं है क्योंकि वह केवल संस्कृत पर आधारित नहीं है। वह तो संस्कृत का सारा रिक्थ लेकर समृद्ध हुई बाद की भाषा (अवधी) में ही सम्भव है[6]। प्राकृत भाषा के जो अपने अभिलक्षण हैं, वे भी इसी प्रकार संस्कृत की परम्परा से जुड़कर कविता को अपूर्व सौन्दर्य प्रदान करते हैं। यही कारण है कि भारतीय भाषा परम्परा में बाद बाद की भाषाओं को कविता के लिए अधिकाधिक समर्थ तथा सम्भावनापूर्ण माना गया है। इस कथ्य के समर्थन में अनेक प्रमाण दिये जा सकते हैं। प्राकृत कवि स्वयंभू का कहना है– देसी भासा उभय तडुज्जलु अर्थात् अपभ्रंश भाषा संस्कृत और प्राकृत से भी उज्ज्वल है। शाकुन्तलम् की टीका करते हुए शंकर ने लिखा है– संस्कृतात् प्राकृतं श्रेष्ठं ततोऽपभ्रंशभाषणम्[7] अर्थात् संस्कृत से श्रेष्ठ प्राकृत है तथा उससे भी उत्तम अपभ्रंश भाषा है। विद्यापति का कथन–देसिल बयना सब सञ मिट्ठा। ते तैसनो जम्पओं अवहट्ठा, प्रसिद्ध ही है॥ १२वीं सदी में वर्तमान संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध मुक्तककार गोवर्धन की उक्ति है वाणी प्राकृतसमुचितरसा बलेनैव संस्कृतं नीता[8](मुक्तक का समुचित रस तो प्राकृत में विद्यमान है, मैं उसे बलपूर्वक संस्कृत में ले आ रहा हूँ।)

व्याकरणिक कोटियों तथा ध्वनि सम्बन्धी वितरण के आधार पर संस्कृत की अपेक्षा प्राकृत में सरलता तथा सुकुमारता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है[9]। कवियों ने प्राकृत कविता के सौन्दर्य परिवर्धन के लिए इसी प्रकार की भाषिक विशिष्टताओं का विनियोग किया है।

संस्कृत से प्राकृत भाषाओं में ध्वनि आदि स्तरों पर घटित परिवर्तनों के कारण शब्दराशि में जो रूपान्तरण हुए उनके कारण प्राकृत के शब्दों में काव्यगत चारुत्व की सम्भावना बहुत अधिक बढ़ गयी। यह चमत्कार शब्द के स्तर पर, अर्थालंकार के स्तर पर तथा ध्वनि आदि अनेक स्तरों पर दृष्टिगोचर होता है। ध्वनि परिवर्तनों के बाद अनेक शब्दों के रूप प्राकृत में एक समान हो गये जिसके कारण वे शब्द श्लिष्ट हो गये हैं, तथा उनके अर्थ प्रदान करने का सामर्थ्य भी बढ़ गया है। प्राकृत के गय का अर्थ केवल गत ही नहीं है गज भी है। सत्थर का अर्थ केवल स्रस्तर ही नहीं है, शास्त्र भी है। मिअ का अर्थ मृत ही नहीं मृग भी हो सकता है। शाकुन्तलम् में अनसूया के कथन में आया हुआ वसन्तोदार शब्द संस्कृत में वसन्तावतार तथा वसन्तोदार दोनों तरह से देखा जा सकता है[10]। भाषिक परिवर्तनों से प्राप्त काव्य सौन्दर्य की इस गुणात्मक अभिवृद्धि पर प्राकृत का विशेषाधिकार है। ऐसे प्रसंगों में संस्कृत की छाया अथवा अनुवादों को देखने से यह बात स्पष्ट होती है कि संस्कृत में ये प्रसंग यथावस्थ रूपान्तरित नहीं किये जा सकते। इस तथ्य को निम्नोक्त उदाहरण से सिद्ध किया जा सकता है–

परिहूएण वि दिअहं घरघरभमिरेण अण्णकज्जम्मि

चिरजीविएण इमिणा खविअम्हो दड्ढकायेण[11]

उपर्युक्त गाथा में प्रयुक्त अण्णकज्जम्मि तथा दड्ढकायेण ये दोनों शब्द प्राकृत की भाषिक विशिष्टता के कारण दो–दो अर्थ दे सकते हैं– अन्यकार्ये तथा अन्नकार्ये, और दग्धकायेन तथा दग्धकाकेन। जबकि संस्कृत छाया से हम किसी एक ही अर्थ को पा सकते हैं। उपर्युक्त गाथा की संस्कृत छाया निम्नोक्त प्रकार से की जा सकती है–

परिभूतेनापि दिवसं गृहगृहभ्रमणशीलेनान्यकार्ये।

चिरजीवितेनानेन क्षपिताः स्मो दग्धकायेन॥[12]

इस गाथा के संस्कृत अनुवाद में कविसम्मत अर्थ नहीं आ पाया है और उसे स्पष्ट करने के लिये अनुवादक भट्ट मथुरानाथ शास्त्री को अन्य अभीष्ट शब्दों को कोष्ठक में रखना पड़ा है–

परिभूतेनापि दिनं गृहं गृहं भ्रामिणान्यकार्येण (–अन्नकार्येण)।

चिरजीवितेन सपदि क्षपिताः स्मोऽनेन दग्धकायेन (–काकेन)॥[13]

प्रस्तुत गाथा किसी अनुताप ग्रस्त वृद्ध का कथन है। कथन के वैशिष्ट्य के कारण उपर्युक्त शब्दों के अर्थ अन्यकार्य तथा दग्धकाय मात्र में नियन्त्रित हो जायेंगे लेकिन पुनः अनेकार्थक शब्द काय के प्रयोग के कारण काक सम्बन्धी अर्थ भी व्यंजित होगा। इसके बाद वाच्यभूत वाक्यार्थ तथा व्यंग्यभूत वाक्यार्थ में उपमानोपमेय भाव होकर उपमा अलंकार ध्वनि व्यंजित होगी। इस क्रम से प्राप्त संलक्ष्यक्रम ध्वनि शब्दशक्ति से उत्पन्न मानी जायेगी। स्पष्ट है कि शब्दों के प्रयोग की यह विशिष्टता केवल प्राकृत काव्य में ही है। संस्कृत छाया अथवा अनुवाद में तो दोनों अर्थों का कण्ठतः कथन करना होगा। इस कारण दोनों के दोनों अर्थ वाच्य हो जायेंगे फलतः उनसे अभिहित होने वाली उपमा वाच्य ही होगी व्यंग्य नहीं। इस प्रकार उत्तम ध्वनिकाव्य का उदाहरण प्राकृतगाथा ही बन पायेगी संस्कृतानुवाद नहीं। एक अन्य उदाहरण पर ध्यान देते हैं–

रयणुज्जल–पयसोहं तं कव्वं जं तवेइ पडिवक्खं

पुरिसायंतविलासिणिरसणादामं विअ रसंतं॥ (वज्जालग्गं ३.२)

इस गाथा में चार पदों में श्लेष है। रयणुज्जल का अर्थ–रचनोज्ज्वल तथा रत्नोज्ज्वल दोनों है। पडिवक्खं से प्रतिपक्षः तथा पतिवक्षः दोनों अर्थ लिए जा सकते हैं। रसंतं का अर्थ रसान्तम् तथा रसत् (शब्द करते हुए) दोनों है। इनमें से तीन श्लेष केवल प्राकृत भाषा में ही सम्भव हैं। केवल पद शब्द अनेकार्थक होने से संस्कृत तथा प्राकृत दोनों में समान रूप से श्लेष का लाभ दे सकता है।

आगे हम संस्कृत भाषा की अपेक्षा प्राकृत भाषाओं में दृष्टिगत प्रमुख ध्वनि परिवर्तनों के काव्यात्मक उपयोगों पर चर्चा करेंगे। इन ध्वनि परिवर्तनों से प्राप्त, शब्दालंकार तथा अर्थालंकार दोनों स्तरों पर चारुत्व का आधान करने वाली, भाषिक विशेषताओं का, महत्त्व की दृष्टि से क्रमशः वर्णन किया जा रहा है–

  • मध्यवर्ती अल्पप्राण व्यंजनों का लोप

प्राकृतों में (विशेषतः महाराष्ट्री प्राकृत में, जो कि पद्य के लिये उपयुक्ततम तथा प्रयुक्ततम भाषा मानी गयी है[14]) असंयुक्त अवस्था में विद्यमान तथा शब्द के आदि में न आने वाले[15] अल्पप्राण व्यञ्जनों– क,ग,च,ज,त,द,प तथा यकार–वकार का प्रायः लोप हो जाता है[16]। इन लुप्त ध्वनियों के पहले और बाद में भी यदि अकार हो तो वहाँ यश्रुति अर्थात् य जैसी ध्वनि का आगम हो जाता है[17]। कुछ विद्वानों का मत है कि महाराष्ट्री को काव्य की दृष्टि से मधुर बनाने के लिये उसे प्रयास पूर्वक मध्यगत अल्पप्राण वर्णों से रहित बनाया गया था[18]। परन्तु यह कथन अतिशयोक्तिपूर्ण है क्योंकि अगर काव्य में प्रयोग करने मात्र के लिये इन शब्दों की ध्वनियों का लोप किया गया होता तो उसी दिशा में परिवर्तित अन्य शब्दों के रूप, जो अब भी हमारी भाषाओं में मिलते हैं, वे नहीं मिलते[19]। वे काव्य तक ही सीमित होकर रह गये होते। यह बात अवश्य सत्य है कि इन व्यञ्जनों के लोप के कारण प्राकृत अत्यन्त मधुर हो गयी है तथा उसके बन्ध सुकुमार हो गये हैं। वस्तुतः उपर्युक्त प्रकार के परिवर्तन भारतीय आर्यभाषाओं के स्वाभाविक रूपान्तर के फलस्वरूप सामने आये हैं जो मुखसुख तथा अन्य ध्वनि परिवर्तन के कारणों द्वारा प्रेरित हैं[20]। इस प्रवृत्ति के कारण काव्यविच्छित्तियों के निम्नोक्त प्रकार प्राकृत कविता में दिखाई पड़ते हैं–

  1. अनुप्रास– प्राकृत शब्दों में प्रयुक्त उपर्युक्त अल्पप्राण व्यंजन अधिकतर विजातीय होते हैं। इन वैरूप्य सम्पादक व्यञ्जनों का लोप हो जाने के बाद तथा कई बार उन लुप्त स्वरों के स्थान पर य–श्रुति या व–श्रुति हो जाने पर व्यंजनों की समानता दिखायी पड़ने लगती है जिससे अनुप्रास अलंकार बरबस उपस्थित हो जाता है। यथा,

अमअमअ गअणसेहर रअणीमुहतिलअ चंद दे छिवसु (गा॰स॰ १.१६)

–अथवा–

अमयमयगयणसेहर रयणीमुहतिलय चंद दे छिवसु

  1. श्लेष – उपर्युक्त ध्वनि परिवर्तनों के कारण विभिन्न ध्वनियों से घटित शब्दों का स्वरूप एक जैसा हो जाता है। इसके कारण वे समान स्वरूप वाले होकर अनेक अर्थ दे पाते हैं। इस परिस्थिति के परिणाम स्वरूप श्लेष तथा श्लेष से उत्थापित उपमा आदि अलंकारों का सुन्दर प्रयोग प्राकृत कविता में हो पाता है। श्लेषोत्थापित समुच्चय अलंकार का एक उदाहरण देखें–

अहिणअपओअरसिएसु पहिअ–सामाइएसु दिअहेसु।

सोहइ पसरिअगीआण णच्चिअं मोरवुंदाणं ॥ (गा॰स॰ ६.५९)

इस गाथा में पओअ से पयोद और प्रयोग, रसिएसु से…..सामाइएसु से श्यामायितेषु और सामाजिकेषु तथा गीआण से ग्रीवाणां और गीतानां दोनों अर्थ लिए जा सकते हैं।

श्लेषोत्थापित उपमा का एक उदाहरण देखें–

सच्छन्दिया सरूवा सालंकारा य सरस–उल्लावा।

वरकामिणि व्व गाहा गाहिज्जन्ती रसं देइ॥ (व॰ल॰ २.४)[21]

इस पद्य में गाथा की तुलना श्रेष्ठ कामिनी के साथ की गयी है। दोनों स्वच्छन्द, सुरूप, सालंकार तथा सूक्तियों वाली हैं। यहाँ तक तो संस्कृत तथा प्राकृत दोनों साथ साथ चलती हैं लेकिन श्लिष्ट शब्द गाहिज्जन्ती प्राकृत की अपनी विशेषता है। गाथा गीयमाना (=गायी जाती) होकर उसी प्रकार रस प्रदान करती है जैसे कामिनी गाह्यमाना (= भोग किये जाने पर)।

श्लेष कई बार रूपक अलंकार को भी सम्भव बनाता है–

न सहइ अब्भत्थणियं असइ गयाणं पि पिट्ठिमंसाइं।

दट्ठूण भासुरमुहं खलसीहं को न बीहेइ॥ (व॰ल॰ ५.१२)

प्रस्तुत गाथा में खल तथा सिंह का अभेद आरोपित किया गया है। यह तभी सम्भव हो पाता है जब गयाणं गतानां और गजानां इन दोनों अर्थों को दे सके। सिंह जिस प्रकार हाथियों की पीठ के मांस को खाता है उसी प्रकार दुष्ट पुरुष परोक्ष में लोगों की निन्दा करता रहता है।

श्वेताम्बर जैन साधु जयवल्लभ का वज्जालग्ग नामक सूक्तिकोश श्लेष के इस प्रकार के काव्यात्मक प्रयोगों के लिए बहुत प्रसिद्ध है[22]

  1. श्लेषोत्थापित अर्थान्तरन्यास–

जह जह वड्ढेइ ससी तह तह ओ पेच्छ घेप्पइ मएण

वयणिज्जवज्जिआओ कस्स वि जइ हुंति रिद्धीओ ॥ (व॰ल॰ २६५, २९.२)

(जैसे जैसे चन्द्रमा बढ़ता है वैसे वैसे, देखो, वह मृग (मद) से युक्त हो जाता है। काश, किसी की भी सम्पत्ति निन्दा से रहित होती!) इस उदाहरण में चन्द्रमा का निन्दित होना तभी उपपन्न होगा जब उसे मद युक्त बताया जायेगा। लेकिन चन्द्रमा तो मद से युक्त नहीं होता, वह तो मृग से युक्त होता है। इसे सम्भव बनाने लिए प्राकृत कवि ने मअ शब्द का उपयोग किया है जो मृग के साथ साथ मद का भी वाचक है। इसी प्रयोग विशेष के कारण अर्थान्तरन्यास अलंकार यहाँ सम्भव हो पाया है।

  1. यमक– मध्यवर्ती व्यञ्जनों के लोप से कई बार भिन्न शब्दों का स्वरूप एक जैसा हो जाता है जिससे यमक अलंकार की सृष्टि होती है। यमक स्वयं तो एक शब्दालंकार है[23] लेकिन यह काव्य में असंगति, विरोध आदि अन्यान्य अर्थालंकारों का भी आधार बन जाता है। गाथासप्तशती की अधोलिखित प्रसिद्ध गाथा का उदाहरण इसके लिए दिया जा सकता है–

मुहमारुएण तं कण्ह गोरअं राहिआए ̆अवणेंतो।

एताणँ वल्लवीणं अण्णाणँ वि गोरअं हरसि ॥ (गा॰स॰ १.८९)

(हे कृष्ण, तुम अपने मुँह की फूँक से राधिका के गोरज को हटाते हुए दूसरी गोपियों के गौरव का भी हरण कर

रहे हो।)

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उपर्युक्त पद्य में पहले गोरअं का अर्थ गोरजः (=गायों के चलने से उठी धूल) है जबकि दूसरे गोरअं का अर्थ है गौरव। प्राकृत भाषा के विशिष्ट ध्वनि परिवर्तनों के फलस्वरूप इन दोनों शब्दों का स्वरूप समान हो गया है, फलतः यहाँ यमक की परिस्थिति उत्पन्न हो गयी है। यमक के बल से यहाँ असंगति अलंकार की भी सृष्टि हो गयी है। कार्य तथा कारण अगर अलग अलग स्थानों पर वर्णित किये जायें तो वहाँ असंगति अलंकार होता है[24]

विंझो ण होइ अगओ गएहिं बहुएहिँ वि गएहिं॥ (व॰ल॰ १८८, १९.३)

(विन्ध्य पर्वत भी बहुत सारे हाथियों के चले जाने से हाथी रहित नहीं होता।) इस उदाहरण में पहले गएहिं का अर्थ है गजैः तथा दूसर गएहिं का अर्थ है गतैः। ज तथा त दोनों के लुप्त हो जाने के कारण[25] दोनों शब्दों का स्वरूप समान हो गया है तथा यमक की परिस्थिति उत्पन्न हो गयी है।

सुकइवयणऽण्णवाओ विचित्तरयणाणि सुत्तिरयणाणि। (गाथारत्नकोश २)

(सुकवियों के वचन के समुद्र से विचित्र बनावट वाले सूक्ति रत्नों को–) इस उदाहरण में पहला रयण शब्द रचना का वाचक है जबकि दूसरा रत्न का वाचक है। च तथा त के लुप्त होने तथा त् के बाद स्वरभक्ति हो जाने से दोनों का रूप समान हो गया है।

जमस्स दण्डस्स सगब्भिआ मे गआ गआ जस्स सिरं कराला[26] (उसाणिरुद्धं १.६९)

(यम दण्ड की तरह मेरी कराल गदा जिस के सिर पर चली) इस उदाहरण में पहले गआ का अर्थ गदा है तथा दूसरे गआ का अर्थ गता है। दोनों में क्रमशः त तथा द के लोप के कारण यह परिस्थिति उत्पन्न हुई है।

  1. सौकुमार्य तथा माधुर्य– उच्चारण में दुष्कर अल्पप्राण वर्णों के लोप हो जाने के कारण प्राकृत कविता से श्रुतिकटुत्व दोष जाता रहता है। प्राकृत कविता के लालित्य के कारकों में से यह अन्यतम है। इसी कारण प्राकृत काव्य के बन्ध सुकुमार हो जाते हैं। इस आधार पर पाश्चात्त्य विद्वान प्राकृत को कविता हेतु बनायी गयी कृत्त्रिम भाषा के रूप में शङ्का करते हैं। प्राकृत कवियों ने प्राकृत की अपेक्षा संस्कृत के श्रुतिकटुत्व की अनेकशः आलोचना की है[27]। उपर्युक्त गुणों के उदाहरण स्वरूप सरस्वती कण्ठाभरण में उदाहृत राजशेखर की कर्पूरमञ्जरी नाटिका से एक प्राकृत शिखरिणी प्रस्तुत है–

परं जोण्हा उण्हा गरलसरिसो चंदणरसो खदक्खारो हारो मलअपवणादेहतवणा।

मुणाली बाणाली जलइ अ जलद्दा तणुलदा वरिट्ठा जं दिट्ठा कमलवअणा सा सुणअणा॥(क॰म॰२.११)

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  1. शब्दशक्तिमूलक वस्तुध्वनि–जब कविता में अनेकार्थक शब्दों का प्रयोग हो लेकिन उनके दूसरे अर्थ प्रसंगवश नियन्त्रित हो जायें तथा अभिधा से एक ही अर्थ आये, ऐसा होने पर भी अगर दूसरे अर्थ की प्रतीति होने लगे तो उस अन्य अर्थ की प्राप्ति में व्यंजना व्यापार को ही कारण माना जाता है। व्यंजना अपना यह काम शब्दविशेष के प्रयोग के कारण ही कर पाती है। काव्य में ऐसा व्यंग्यार्थ यदि प्रमुखता से चमत्कार पैदा कर रहा हो तो उस काव्य को शब्दशक्तिमूलक संलक्ष्यक्रमव्यंग्य काव्य कहते हैं। यह व्यंग्य अर्थ वस्तुरूप और अलंकाररूप दोनों प्रकार का हो सकता है। वस्तुध्वनि का उदाहरण आगे प्रस्तुत है–

जइ सो न एइ गेहं ता दूइ अहोमुही तुमं कीस ।

सो होही मज्झ पिओ तो तुज्झ न खंडए वयणं[28] ॥ (व॰ल॰ ४१७, ४३.५)

(यह खण्डिता नायिका की नायक को सन्देश देने गयी किन्तु उससे रमण करके लौटी दूती के प्रति उक्ति है– अगर वह=नायक घर नहीं आता तो, हे दूति, तुम अधोमुख क्यों हो? यदि वह मेरा प्रिय होता तो तुम्हारे वचन का उल्लंघन नहीं करता।) इस उदाहरण में वयणम् शब्द के अन्य अर्थ वदनम् को खण्डयेत् के साथ मिलाकर देखने से चौर्य रत वाली वस्तु व्यञ्जित होती है। यह शब्दशक्त्युत्थ ध्वनि वयण शब्द विशेष के कारण ही सम्भव हो पायी है।

  • संयुक्त विषम व्यञ्जनों का समीकरण–

प्राकृत भाषा की सबसे बड़ी विशेषता, जो उसे संस्कृत की ध्वनि व्यवस्था से भिन्न करती है, वह है उसमें विषम व्यञ्जनों का समीकरण । संस्कृत में ऐसे दो व्यंजन भी साथ आ सकते हैं जो भिन्न भिन्न वर्गों से सम्बन्धित हों (जैसे प्राप्त, युक्त आदि), अथवा उनमें से एक वर्गीय हो और दूसरा अन्तःस्थ या महाप्राण हो (जैसे योग्य, स्वस्ति आदि)। परन्तु प्राकृत में भिन्न प्रकृति के व्यञ्जनों का संयोग नहीं होता। समीकरण की प्रक्रिया द्वारा ये ध्वनियाँ समान हो जाती हैं। प्राकृत वैयाकरणों के अनुसार विजातीय व्यञ्जनों में से जो निर्बल होता है उसका लोप हो जाता है तथा बचे हुए सबल वर्ण का द्वित्व हो जाता है[29]। व्यञ्जनों के बलाबल का निर्णय करने वाला रेखाचित्र अधोनिर्दिष्ट है–

यदि दो समान बल वाले वर्ण एक साथ आ जायें तो उनमें से पहले वाले वर्ण का लोप तथा बाद वाले वर्ण का द्वित्व हो जाता है[30]। इसके अतिरिक्त कुछ संयुक्त वर्णों का विशेष ध्वनि परिवर्तन भी होता है, जैसे ज्ञ का ण्ण, त्य का च्च इत्यादि[31]

इस वैशिष्ट्य के कारण उत्थापित काव्य सौन्दर्य के कुछ प्रकार अधोवर्णित हैं–

  1. अनुप्रास– संयुक्त वर्णों के समीकरण प्राकृत काव्य में अनुप्रास की मात्रा को संस्कृत की अपेक्षा बढ़ा देते हैं, क्योंकि अनुप्रास समान (अथवा समीकृत) व्यञ्जनों के प्रयोग से ही उत्थापित होता है। प्राकृत में अनेक संयुक्त व्यञ्जन कई बार एक विशेष संयुक्त व्यंजन समूह में ही परिणत होते हैं, जैसे ज्ञ, र्ण तथा न्न तीनों ही प्राकृत में ण्ण ध्वनि में परिणत होंगे। ऐसी परिस्थितियों में अनुप्रास का प्रकट होना अनिवार्य सा हो जाता है, जैसे–

संते पाउअकव्वे को सक्कइ सक्कअं पढिउं। (व॰ल॰ ३.११)

उपर्युक्त उदाहरण में शक्नोति संस्कृतं प्राकृतगत समीकरण सिद्धान्त के फलस्वरूप क्रमशः सक्कइ तथा सक्कअं हो गये हैं जिस कारण अनुप्रास की स्थिति बन पायी है।

  1. श्लेष– कई बार विजातीय संयुक्त वर्णों के समीकरण के कारण दो अलग अलग शब्दों का स्वरूप एक जैसा हो जाता है। इसके कारण श्लेष अलंकार की स्थिति बनती है, जैसे–

किसिओ सि कीस केसव किं न कओ धन्नसंगहो मूढ। (व॰ल॰ ६००, ६२.११)

   (कृश क्यों हो रहे हो केशव, हे मूढ, क्या तुमने धान्य/ सुन्दर रमणी का संग्रह/परिग्रह नहीं किया?)। उपर्युक्त उदाहरण में धन्न शब्द धान्य तथा धन्या दोनों का वाचक है। क्योंकि दोनों शब्दों में समीकरण के अनन्तर धन्न रूप ही बनता है।

  1. शब्दशक्त्युत्थ ध्वनि– शब्दशक्ति से उत्पन्न ध्वनि के प्रसंगों में प्रायः ऐसे शब्द प्रयुक्त होते हैं जिनमें श्लिष्टार्थ प्रदान करने की क्षमता होती है। उपर्युक्त प्रकार से हुए समीकरणों के कारण प्राकृत में ऐसे शब्द उद्भूत हो गये हैं जिनका प्रयोग इस प्रकार की ध्वनि को प्राप्त करने के लिए किया जाता रहा है–

पन्थिअ ण एत्थ सत्थरमत्थि मणं पत्थरत्थले गामे[32]। (व॰ल॰ ४९४)

(हे पथिक, इस पत्थरों से भरे गाँव में बिछौना/शास्त्र बिलकुल दुर्लभ है)। उपर्युक्त उदाहरण में सत्थर शब्द ध्वनि का प्रयोजक है क्योंकि संस्कृत के शास्त्र तथा स्रस्तर दोनों ही शब्द प्राकृत के विशिष्ट ध्वनि परिवर्तनों के कारण सत्थर के रूप में प्राप्त होते हैं।

  1. अन्त्यानुप्रास– हिन्दी में जिसे तुक मिलाना कहते हैं संस्कृत में उसके लिए शब्द है अन्त्यानुप्रास। प्राकृत में दुर्बल वर्णों के स्थान पर सहवर्ती वर्णों के द्वित्व होने से अनेक बार काव्य में तुकों की निष्पत्ति हो जाया करती है जिससे कविता की संगीतात्मकता में पर्याप्त अभिवृद्धि होती है। यह अन्त्यानुप्रास उसी कविता की संस्कृत छाया वाले रूपों में दिखायी नहीं पड़ती। उदाहरण के लिए–

कौलो धम्मो कस्स णो होइ रम्मो[33]

इस उदाहरण में धर्म का रम्य के साथ तुक मिलाया जा सका है तथा काव्य सौन्दर्य में अभिवृद्धि हो

सकी है क्योंकि प्राकृत मे इनके रूप किंचित् भिन्न होकर समान श्रुति वाले हो गये हैं।

णट्ठो चन्दुज्जोओ वासारत्तो हला पत्तो। (शृङ्गारप्रकाश[34])

वर्षारात्रः की जगह वासारत्तो तथा प्राप्तः की जगह पत्तो, इन परिवर्तनों द्वारा उपर्युक्त गाथा में

अन्त्यानुप्रास की संगीतात्मक सृष्टि हो पायी है।

  1. माधुर्य– काव्यशास्त्रियों के प्रेक्षण के अनुसार विषमवर्गीय व्यञ्जनों के समीकृत होकर सवर्गीय संयोग के रूप में प्राप्त हो जाने के कारण काव्य में माधुर्य गुण निष्पन्न हो जाता है। प्राकृत के एक परवर्ती कवि रामपाणिवाद के कंसवहो का एक माधुर्य गुण युक्त उदाहरण प्रस्तुत है–

फुरंतदंतुज्जलकंतिचंदिमासमग्गसुन्देरमुहेन्दुमंडलं।

विसुद्धमो ̆त्तागुणको ̆त्थुहप्पहापलित्तवच्छं फुडवच्छलंछणं॥ (कंसवहो १.४२)

  • मध्यवर्ती वर्गीय महाप्राण व्यञ्जनों का हकारादेश

प्राकृत भाषाओं में ख, घ, थ, ध तथा भ इन चतुर्थ महाप्राण वर्गीय वर्णों के स्थान पर ह का आदेश हो जाता है[35]। वस्तुतः होता यह है कि महाप्राण वर्ण अगर असंयुक्त अवस्था में हों तथा शब्द के आदि में न आयें तो उनके स्पर्श अंश का लोप हो जाता है। स्पर्श अंश का लोप होने पर हकार शेष रहता है। प्राकृत भाषा की इस विशिष्टता के आधार पर प्राकृतकवियों द्वारा निम्नांकित प्रकार के काव्य चारुत्व का लाभ लिया गया है–

  1. यमक–इस प्रकार के स्थलों में यमक की निष्पत्ति प्रायः हकारघटित शब्दों के साथ होती है। उदाहरण के लिए–

                     वेवन्तथोरथणहरहरकअकण्ठग्गहं गोरिं। (वक्रोक्तिजीवितम् पृ॰ ७९)

(काँपते हुए अल्प भार वाले वक्षस्थलों के साथ शिव के द्वारा गले लगायी गयी गौरी को–) यहाँ भर शब्द परिवर्तित होकर हर हो गया तथा अगले हर के साथ मिलकर इसने यमक की स्थिति उत्पन्न की।

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  1. सामान्य श्लेषालंकार– रीदीओ विलिहन्तु कव्वकुसला जोण्हं चओरा विअ। (कर्पूरमंजरी १.१)

(कविता में कुशल कविगण रीतियों की रचना ऐसे ही करें जैसे चकोर ज्योत्स्ना का लेहन करते हैं।) उपर्युक्त पद्य का यह अर्थ तभी समर्थित हो पायेगा जब हम विलिहिन्तु पद का श्लेष से दो अर्थों का ग्रहण करें– विलिखन्तु तथा विलिहन्तु। स्पष्ट है कि ऐसा प्राकृत में ही सम्भव है।

  1. श्लेषोत्थापित उपमा–

निद्धम्मो गुणरहिओ ठाणविमुक्को य लोहसंभूओ।

विंधइ जणस्स हिययं पिसुणो बाणो व्व लग्गंतो॥ (व॰ल॰ ५३, ५.५)

प्रकृत उदाहरण में पिशुन व्यक्ति की तुलना बाण के साथ की गयी है। यह उपमा तभी समर्थित हो पाती है जब अन्यान्य विशेषणों की तरह लोहसंभूओ शब्द भी उपमान तथा उपमेय दोनों के साथ संगत हो सके। प्राकृत की विशेषता के कारण इसके दो अर्थ – लोहसंभूत तथा लोभसंभूत सम्भव हो पाते हैं।

  1. श्लेषोत्थापित अर्थापत्ति– श्लेष के कुछ उदाहरण अधोलिखित हैं–

एक्कोँ च्चिअ दुव्विसहो विरहो मारेइ गयवई भीमो।

किं पुण गहिअसिलीमुहसमाहवो फग्गुणो पत्तो॥ (व॰ल॰ ६३८, ६६.९)

उपर्युक्त श्लोक में विरहो शब्द विरहः तथा विरथः दोनों का वाचक है। इसके कारण भीम (भयंकर) विरह तथा विरथ (रथरहित) भीम (मध्यम पाण्डव) दोनों अर्थ सम्भव हो पाये हैं। ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण कविता में अर्थापत्ति अलंकार की सृष्टि भी हो रही है। अर्थापत्ति अलंकार तब सम्भव होता है जब किसी पर्याप्त प्रसंग की अपर्याप्त वस्तु में व्याप्ति दिखायी जाती है[36]। यह कैमुतिक न्याय द्वारा सिद्ध हो पाता है।

  1. श्लेषोत्थापित विशेषोक्ति–

महु महु इत्ति भणंतहो वच्चदि कालो जणस्सु।

तो वि ण देउ जणद्दउ गोअरिभोदि मणस्सु ॥ (ध्वन्यालोक पृ॰ ५४४)

(मैं मैं/ विष्णु कहते हुए लोगों का समय बीत जाता है। फिर भी देव जनार्दन मनोगोचर नहीं होते।)

इस अपभ्रंश के पद्य में महु महु शब्द मधुमथु (विष्णु) तथा मैं मैं, दोनों का वाचक है। इस प्रकृत श्लेष के कारण विष्णु के पक्ष वाले अर्थ में विशेषोक्ति अलंकार की उद्भावना हो गयी है। कारण के रहने पर भी कार्य का न होना विशेषोक्ति कहलाती है[37]

  1. श्लेषोत्थापित व्याघात[38]

सव्वो छुहिओ सोहइ मढदेउलमन्दिरं च चच्चरअं।

नरणाह मह कुडुंबं छुहछुहिअं दुब्बलं होइ ॥ (व॰ल॰ १६१, १६.११)

(सुधालिप्त होने के बाद मठ, मन्दिर तथा चौराहे सारे सुन्दर लगते हैं, हे राजन्, लेकिन मेरा परिवार क्षुधा से क्षुधित होने पर दुर्बल हो गया है।) इस पद्य में व्याघात अलंकार तभी सृष्ट हो पाता है जब हम छुहिअ पद के द्वारा दो विरुद्ध कार्यों की निष्पत्ति दिखा पायें। ध्यातव्य है कि सुधित तथा क्षुधित दोनों शब्द प्राकृत में छुहिअ के रूप में प्राप्त होते हैं।

  • संयोगपूर्व तथा सानुस्वार दीर्घ स्वर का ह्रस्वीकरण

प्राकृत में दीर्घ वर्ण के बाद यदि संयोग रहे तो उसका ह्रस्व हो जाता है[39]। यह भाषिक परिघटना वस्तुतः लाघव के अनुरोध से होती है। संयोग के बाद यदि ह्रस्व स्वर हो तो वह अपने आप गुरु हो जाता है[40]। अतितरां गुरु की ऐसी प्रवृत्ति संस्कृत में तो है लेकिन प्राकृत में इसका अभाव है। यही स्थिति तब भी होती है जब दीर्घ वर्ण के बाद अनुस्वार होता है। इस प्रवृत्ति से उद्भूत कुछ काव्यात्मक उदाहरण निम्नवत् हैं–

  1. यमक

होसइ किल साहारो साहारे अंगणम्मि वड्ढन्ते।

पत्ते वसन्तमासे वसंतमासाइँ सोसेइ ॥ (व॰ल॰ ६३९, ६६.१०)

(विरहिणी कहती है–मैंने सोचा था कि वसन्त के आने पर आँगन में बढ़ता हुआ यह आम का पेड़ मुझे सहारा देगा। लेकिन यह तो मेरे वसा–आँत तथा माँसों को सुखा रहा है।) इस प्रकार का अद्भुत चमत्कारी प्रयोग इस कारण सम्भव हो पाया है कि प्राकृत में वसान्त्र शब्द का रूप वसंत हो जाता है।

  1. अर्थापत्ति[41]

मासच्छेए जो धाइ सम्मुहो सूरमंडलग्गस्स।

जइ एरिसो ससंको नीसंको केरिसो होइ ॥ (गाथारत्नकोश ५६९)

(मास के समाप्त होने पर जो सूर्यमण्डल की ओर गति करता है–अथवा– माँस के कट जाने पर भी जो शूर की तलवार के सम्मुख दौड़ पड़ता है; अगर शशांक/सशंक ऐसा है तो निःशंक कैसा होगा।) इस प्रसंग में अर्थापत्ति अलंकार तभी संगत हो पायेगा जब हम ससंक को शशांक तथा सशंक दोनों अर्थों में गृहीत करें। प्राकृत में सानुस्वार दीर्घ स्वर के ह्रस्व हो जाने के कारण हम यह लाभ ले पाते हैं।

  • प्राकृत में अनेक वर्णों का अभाव–

प्राकृत में संस्कृत की तरह स्वरों तथा व्यंजनों की बहुलता नहीं है। इसमें अनेक वर्ण अनुपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए ऐ, औ, ऋ, अः, श, ष आदि[42]। ये वर्ण प्राकृत भाषाओं में व्यवहृत नहीं होते। प्राकृत कविओं ने इस अभिलक्षण का प्रयोग अनेकत्र अपनी कविता के सौन्दर्य को बढ़ाने में किया है–

 

  1. अनुप्रास–

सामा सामण्णपआवइणो रेह च्चिअ ण होइ। (वक्रोक्तिजीवित पृ॰ ५७[43])

प्रकृत उदाहरण में स्पष्ट है कि श्यामा शब्द का शकार सकार में परिवर्तित हो गया है जिसके कारण आगे आने वाले सामण्ण शब्द के सकार के साथ मिलकर अनुप्रास की सृष्टि हो रही है।

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  • प्राकृत कविता में प्रयुक्त देशज शब्द

ऊपर चर्चा आ चुकी है कि प्राकृत में तद्भव तथा तत्सम शब्दों के अतिरिक्त देशज शब्द भी प्रयुक्त होते हैं। देशज शब्दों का मूल हमें संस्कृत में नहीं मिलता। प्राकृत कविता में अनेक बार तत्सम–तद्भव शब्दों के साथ देशज शब्दों के प्रयोग से एक विशेष प्रकार की ध्वन्यात्मक चारुता आ जाती है। उदाहरण के लिए–

  1. अन्त्यानुप्रास (तुक)–

पोढ–सुणओ विअण्णो अत्ता मत्ता पई वि अण्णत्थो। (गा॰ स॰ ६.४९)

अत्ता सास के लिए प्रयुक्त देशज शब्द है जो मत्ता के साथ मिलकर अन्त्यानुप्रास को प्रयोजित कर रहा है।

  1. अनुप्राससामान्य–

सो च्चिअ दीसइ गोसे सवत्तिणअणेसु संकंतं। (गा॰ स॰ २.६)

गोसे शब्द प्रभात के लिए प्रयुक्त देशी शब्द है।

जयउ सरसउसइ बुहजणवंदिअअरपाअसेट्ठकंदोट्ठा

उपर्युक्त उदाहरण में कन्दोट्ठ शब्द कमल के लिए प्रयोग में आने वाला देशी शब्द है जो श्रेष्ठ से परिवर्तित तद्भव शब्द सेट्ठ के साथ मिलकर अनुप्रास के सौन्दर्य को प्रकट कर रहा है।

  • प्राकृत में अन्तिम व्यञ्जन का लोप –

प्राकृत भाषा में अन्तिम स्वररहित व्यञ्जन का अभाव होता है[44]। उदाहरण के लिए प्राकृत में सरित् के स्थान पर प्राकृत में सरि, हरित् के स्थान पर हरि, जगत् के स्थान पर जग तथा छन्दस् के स्थान पर छन्द आदि रूप प्राप्त होते हैं। ऐसी स्थितियों में ये परिवर्तित शब्द व्यञ्जन सहित तथा व्यञ्जन रहित दोनों प्रकार के शब्दों के अर्थ देने लगते हैं। इससे श्लेष की स्थिति बनती है तथा श्लेष और अन्य श्लेषोत्थापित अलंकारों का प्रयोग सम्भव हो पाता है। छन्द शब्द का एक उदाहरण प्रस्तुत है–

छन्दं अयाणमाणेहिँ जा किया सा ण होइ रमणिज्जा।

किं गाहा अह सेवा अहवा गाहा वि सेवा वि ॥ (व॰ल॰ २.१०)

(इच्छा/छन्द के बिना जो कुछ किया जाय वह रमणीय नहीं होता है। चाहे गाथा हो अथवा सेवा हो अथवा गाथा और सेवा दोनों हो।) संस्कृत के छन्द (इच्छा) तथा छन्दस् (वृत्त या जाति) दोनों शब्द प्राकृत में छन्द के रूप में मिलते हैं। इसी उपर्युक्त श्लेष के कारण इस पद्य में गाथा तथा सेवा दोनों में उपमानोपमेय भाव व्यंजित हो पाया है।

  • प्राकृतगत सुबन्तरूप वैशिष्ट्य–

प्राकृत में अनेक बार शब्दों के सुबन्त रूप संस्कृत सुबन्तों की अपेक्षा भिन्न होते हैं। ऐसा सामान्यतः इसलिए होता है क्योंकि प्राकृत में सुप् प्रत्ययों के आदेश संस्कृत की अपेक्षा अलग होते हैं। ऐसे शब्द अपने बाद में आने वाले पदों के साथ मिलकर अनेक प्रकार के शब्दालंकारों की सृष्टि कर पाते हैं, जो प्राकृत काव्य की अपनी विशेषताएँ कही जा सकती हैं। एक उदाहरण वाक्पतिराज के गउडवहो (पद्यसंख्या ६) से प्रस्तुत है–

हरिणो हरिणच्छाअं विलास–परिसंठिअं जअइ॥

यहाँ हरेः शब्द के लिए प्राकृत भाषा में प्रयुक्त हरिणो शब्द की ही विशेषता है जिसके कारण वह आगे के हरिण (=हिरन) के साथ मिलकर यमक की छटा बिखेर रहा है।

  • प्राकृत में अनेक व्याकरणिक कोटियों का अभाव–

प्राकृत भाषा में संस्कृत की अनेक व्याकरणिक कोटियाँ लुप्त हो गयी हैं। संस्कृत भाषा में अनेक युगों की भाषिक प्रवृत्तियों का संग्रह दिखायी पड़ता है जिसके कारण संस्कृत बहुस्तरीय और बहुसंरचनात्मक रूप में हमारे सामने प्रकट होती है। भाषाएँ सामान्यतः क्लिष्टता से सरलता की ओर गति करती हैं। इसी कारण प्राकृत में संस्कृत के द्विवचन, आत्मनेपद, चतुर्थी विभक्ति आदि अनेक व्याकरणिक कोटियाँ लुप्त हो गयी हैं अथवा अल्पप्रयुक्त हैं[45]। प्राकृत कवियों ने भाषा की इस विशेषता का अनेकशः उपयोग काव्य सौन्दर्य के परिवर्धन में भी किया है। उदाहरणार्थ–

सा सल्लइ सल्लइ गयवरस्स विंझं मुयन्तस्स॥ (व॰ल॰ १८७, १९.२)

(वह सल्लकी का वृक्ष विन्ध्य पर्वत छोड़ते हुए गजेन्द्र को सालता है।) उपर्युक्त पद्य में शल्यायते (शल्य की तरह लगता है) शब्द आत्मनेपद का त्याग करके प्राकृतगत समीकरण के नियमों के अनुसार सल्लइ रूप को धारण करता है। यह सल्लइ रूप सल्लकी के परिवर्तित सल्लइ रूप के साथ मिलकर यमक अलंकार का उदाहरण बनता है।

  • वर्णों के वर्णान्तरादेश

संस्कृत की बहुत सी ध्वनियाँ प्राकृत भाषा की अपनी ध्वनि प्रणाली की विशेषताओं के अनुसार अन्यान्य ध्वनियों में परिवर्तित हो जाती हैं। इसके कारण भी प्राकृत काव्य में विच्छित्ति वैचित्र्य देखा जाता है। कुछ उदाहरण अधोलिखित हैं–

  1. श्लेष–

अव्वोच्छिण्णपसरिओ अहिअं उद्धाइ फुरिअसूरच्छाओ।

उच्छाहो सुभडाणं विसमक्खलिओ महाणईण व सोओ॥ (सेतुबन्ध ३.१७)

उपर्युक्त स्कन्धक में वीरों के उत्साह की तुलना महानदियों के प्रवाह के साथ की गयी है। दोनों फुरिअसूरच्छाअ हैं। प्राकृत भाषा की विशेषता है कि वह उन्हें एक साधारण धर्म से जोड़ते हुए भी उनके लिए अलग अलग अर्थ समर्पित करती है– स्फुरितशूरच्छाय तथा स्फुरितसूर्यच्छाय।

  1. यमक–

तुइ सण्णिहिदम्मि पेक्खए विविहं णच्चइ णच्चई व सा। (उसाणिरुद्धं २.६६)

नृत्यति नर्तकीव की अपेक्षा णच्चइ णच्चईव में यमक का अतिरिक्त लाभ प्रत्यक्ष है।

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कज्जलकज्जं पि कअं उअरि भमंतेहिँ भमरेहिं। (शृ॰प्र॰ पृ॰ ४५२[46])

कज्जलकार्यं का कज्जलकज्जं हो जाना भी यमक का ही आधान करता है।

उपर्युक्त प्रसंगों का एक अन्य महत्त्वपूर्ण उपयोग यह भी हो सकता है कि इनकी सहायता से हम प्राकृत कविता में मौलिकता की जाँच भी कर सकते हैं। इसके वे चमत्कार जो अनुवादसहिष्णु हैं उन्हें प्राकृत कविता ने परम्परा से प्राप्त किये हैं जबकि अनुवाद–असहिष्णु चमत्कारों को हमें प्राकृत परम्परा की अपनी सृष्टि माननी होगी। अन्यथा मुद्राराक्षस की अधोलिखित गाथा–

छग्गुणसंजोअदिढा उवाअपरिवाडिघडिअपासमुही।

चाणक्कणीइरज्जू रिउसंजमणुज्जआ जयइ[47]

को यदि संस्कृत में कर दिया जाये तो भी उसके अर्थ में किसी भी प्रकार की हानि नहीं होगी[48]। केवल नाटक में नीच पात्र के द्वारा इसकी अनिवार्यप्रयुक्तता व्याहत हो जायेगी। ऐसी कवितायें यद्यपि प्राकृत भाषा में तथा प्राकृतोचित गाथा छन्द में लिखी गयी है फिर भी हमें मानना होगा कि ये संस्कृत से अतितरां प्रभावित हैं तथा उतनी स्वाभाविक नहीं हैं जितनी कि उपर्युक्त कविताएँ।

इस प्रकार उपर्युक्त वर्णनों से स्पष्ट है कि प्राकृत कविता की अपनी भाषिक विशेषताओं के कारण उसमें मौलिक काव्य सौन्दर्य की सृष्टि के अनुकूल सामर्थ्य विकसित हुआ है जो संस्कृतानुवाद के द्वारा गम्य नहीं है।

शब्दों की अनेकार्थकता तथा उससे प्रयुक्त काव्यचारुत्व के कारण प्राकृत कविता प्राचीनकाल से ही प्रसिद्ध रही है। लालित्य, मधुराक्षरत्व, शृंगारिकता के अलावा प्राकृत काव्य अपनी छेकभणितियों के कारण रसिकों में स्वीकृत प्राकृत काव्य संस्कृत के साथ प्रतिद्वन्द्विता करता हुआ दिखायी पड़ता है। यही कारण है कि संस्कृत के काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में उत्तम काव्य के उदाहरणों में प्राकृत की कविताएँ उपन्यस्त होती रही हैं। प्राकृत काव्य के इस प्रकार के चारुत्व में उसकी विशिष्ट ध्वनि प्रणाली तथा अन्य उपरिवर्णित भाषिक विशेषताओं का बड़ा योगदान है।

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After reading this paper an excellent poet of Sanskrit Dr. Shankar Rajaraman writes a Prakrita verse with similar characteristics-

अत्थि ण सो कव्वगुणो पाउअभासेक्कसुलहसंजोओ ।
जो णत्थि बंभवणिआवणिआमहुकेसरम्मि वलरामे ॥

         (अस्ति न स काव्यगुणः प्राकृतभाषैकसुलभसंयोगः।
यो नास्ति ब्रह्मवनितावनिकामधुकेसरे बलरामे ॥ )

     ********************************************************************

 

संक्षिप्त सन्दर्भ सूची

प्राकृत साहित्य के ग्रन्थ–

  1. संस्कृतगाथासप्तशती व्यंग्यसर्वंकषोपेता (१९८३) भट्टमथुरानाथशास्त्री (पुनः॰) मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली
  2. वज्जालग्गं (१९८४) अनु॰ डा̆॰ विश्वनाथ पाठक. पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संस्थान, वाराणसी
  3. गाथासप्तशती (१९९५) अनु॰ डा̆॰ विश्वनाथ पाठक. पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी–५
  4. गाहारयणकोस (१९७५) जिनेश्वरसूरिकृत. सं॰ अमृतलाल भोजक, नगीन जे॰ शाह. एल॰ डी॰ इंस्टिट्यूट आ̆फ़ इंडोलोजी, अहमदाबाद–९
  5. शृङ्गारमंजरी सट्टकम् (१९७८) विश्वेश्वरविरचितम्, सं॰ अनु॰ बाबूलालशुक्ल शास्त्री. विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी
  6. पाइअलच्छीनाममाला (१९६०) महाकवि धनपाल. सं॰ बेचरदास जीवराज दोशी.शादीलाल जैन, बम्बई–३
  7. विमलसूरिविरइयं पउमचरियं (१९६२) सं॰ हर्मन जैकोबी. प्राकृतग्रन्थ परिषद्, वाराणसी
  8. कंसवहो (सं॰ २००२) रामपाणिवादकृत. सं॰ ए॰ एन॰ उपाध्ये. मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली.
  9. गउडवहो (१९९४) अनु॰ मिथिलेश कुमारी मिश्र. चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी
  10. उसाणिरुद्धं (१९९६) रामपाणिवादविरइयं. सं॰ वी॰ एम॰ कुलकर्णी. शारदाबेन चिमनभाई एजुकेशनल रिसर्च सेण्टर, अहमदाबाद
  11. सेतुबन्धमहाकाव्यम् (२००६) अनु॰ डा̆॰ हरिशंकर पाण्डेय. शारदा संस्कृत संस्थान, वाराणसी
  12. जैन, प्रेम सुमन (१९८२) प्राकृतकाव्यमंजरी. राजस्थान प्राकृत भारती संस्थान, जयपुर
  13. बाहरी, हरदेव () प्राकृत और उसका साहित्य . राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
  14. जैन, जगदीशचन्द्र(१९६१) प्राकृत साहित्य का इतिहास. चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी
  15. सूरिदेव, श्रीरञ्जन (१९८४) प्राकृत–संस्कृत का समान्तर अध्ययन. भाषा साहित्य संस्थान, इलाहाबाद
  16. () Kulkarni,V.M. (1988), Prakrit Verses in Sanskrit Works on Poetics. Bhogilal Leherchand Institute of Indology, Delhi.

प्राकृत व्याकरण के ग्रन्थ–

  1. प्राकृतानन्द (१९६२) सं॰ मुनि जिनविजय. संचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर
  2. शेषकृष्णविरचिता प्राकृतचन्द्रिका (१९६९) संशोधक–सुभद्र झा, सम्पादक–प्रभाकर झा. भारतीय विद्या प्रकाशन, वाराणसी
  3. प्राकृतचिन्तामणि (१९८७) श्रीघासीलालजी महाराज. आचार्य श्रीघासीलाल जी महाराज साहित्य प्रकाशन समिति, इन्दौर
  4. प्राकृतकौमुदी(१९८८) श्रीघासीलालजी महाराज. आचार्य श्रीघासीलाल जी महाराज साहित्य प्रकाशन समिति, इन्दौर
  5. प्राकृतशब्दप्रदीपिका नृसिंहशास्त्रिकृता (१९९२) सं॰ डा̆॰ एम॰ गोपाल रेड्डी, वी॰ श्रीनिवास शर्मा. संस्कृतपरिषद्, उस्मानिया विश्वविद्यालय–हैदराबाद
  6. प्राकृतप्रकाशः संजीवनी–सुबोधिनी–मनोरमा–प्राकृतमञ्जरीतिटीकाचतुष्टयेन हिन्द्यनुवादेन च समन्वितः (१९९६) सं॰ आचार्य बलदेव उपाध्याय
  7. हैमप्राकृतव्याकरणम् (१९९६) सं॰ आप्टे, के॰ वी॰. चौखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी।
  8. पिशल्, आर॰, (अनु॰) जोशी,हेमचन्द्र (१९५८).प्राकृत भाषाओं का व्याकरण बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना
  9. जैन, उदयचन्द्र (१९८८) शौरसेनी प्राकृतव्याकरण. प्राकृत अध्ययन प्रसार केन्द्र, उदयपुर
  10. Ananthanarayana, H.S. (1973) A Prakrit Reader. Central Institute of Indian languages. Mysore

 

[1] जयतु सरस्वती बुधजनवन्दिततरश्रेष्ठपादपङ्कजा।

प्राकृतमिव मधुरमुखी संस्कृतमिव रूढमाहात्म्या॥

[2] यद्यपि एस॰वी॰ सोहनी आदि कई विद्वान् हाल की गाहासत्तसई को कालिदास से भी प्राचीन मानते हैं। वे हित्वा हालां इत्यादि मेघदूतस्थ श्लोक (पूर्वमेघ) के हाला पद से हाल की सप्तशती का संकेत मानते हैं। Sohoni, S.V. Kalidasa, Hala Satavahana and Chandrapgupta II. JBRS. Vol. XLI.Pt. 2, p. 229. अन्यत्र भी– सूरिदेव (१९८४) पृ॰ ५५.

[3] प्राकृतकाव्य के रहते कोई संस्कृत कैसे पढ़ सकता है? (वज्जालग्गं ३.११)

[4] गउडवहो ९२

[5] ७.६७

[6] नीक शब्द फ़ारसी भाषा का प्रतीत होता है, जिसका अर्थ अच्छा या नेक होता है। हिन्दी में प्रचलित नेक शब्द इसी का उच्चारणान्तर है। फ़ारसी में इस शब्द के मुक्तपरिवर्त (Free Variants) हैं– नीकू या निकू।

[7] पिशेल(१९५८) पृ॰२ पर हेमचन्द्र जोशी की टिप्पणी।

[8] आर्यासप्तशती १.५२

[9] परुसा सक्कअबंधा पाउअबंधो वि होइ सुउमारो। पुरिसमहिलाणँ जेत्तिअमिहंतरं तेत्तिअमिमाणं॥ अर्थात् संस्कृत के रचनाबन्धकठोर तथा प्राकृत के बन्ध सुकुमार होते हैं। इन दोनों में इतना ही अन्तर है जितना स्त्री और पुरुष (के अवयव बन्ध) में। राजशेखर–कर्पूरमंजरी १–८

[10] शाकुन्तलम् प्रथम अंक, पृ॰ १५, पंक्ति ६१ (सं॰) गौरीनाथ शास्त्री, साहित्य अकादमी।

[11] गाहासत्तसई २.३४

[12] तत्रैव

[13] तत्रैव

[14] महाराष्ट्राश्रयां भाषां प्रकृष्टां प्राकृतं विदुः। (काव्यादर्श १.३४)

[15] स्वरादसंयुक्तस्यानादेः १.१७६

[16] कगचजतदपयवां प्रायो लुक्। हैम॰ १.१७७

[17] अवर्णे यश्रुतिः। हैम॰ १.१८०

[18] देखिये–पिशेल (१९५८) पृ॰८, पृ॰ १८ आदि।

[19] उदाहरण के लिये शीतकाल के लिये प्राचीन राजस्थानी में सीयाळ तथा उष्णकाल के ऊन्हाळ का प्रयोग। भगिनिपति का बहनोई। रसवती का रसोई। गृहकृत्य का भोजपुरी में घरकच। पाद का पाव या पाँव। चतुष्पाद का भोजपुरी में चौआ। आम्रराजि का अमराई, राजिका का राई। ये परिवर्तन इस बात में स्पष्ट प्रमाण हैं कि उपर्युक्त ध्वनि परिवर्तन कृत्रिम नहीं अपितु स्वाभाविक दिशा से निर्देशित हैं।

[20] यद्यपि भाषा में सादृश्य भी ध्वनि परिवर्तन का प्रेरक कारण होता है, लेकिन यह भी एक स्वाभाविक प्रक्रिया है तथा सादृश्य भाषिक परिवर्तन का एक अकेला कारण नहीं है।

[21] एक अन्य उदाहरण–

सालंकाराहिं सलक्खणाहिं अन्नन्नरायरसियाहिं।

गाहाहिँ पणयिणीहिँ व खिज्जइ चित्तं अइंतीहिं॥ (व॰ल॰ २.२)

(रायरसिय शब्द रागरसिक तथा रागरसित दोनों अर्थों को दे रहा है, जिसके कारण गाथा तथा प्रयसी में उपमा सम्भव हो पा रही है।)

[22] वज्जालग्गं (१९८४), भूमिका–xiii–xxvii

[23] अर्थे सत्यर्थभिन्नानां वर्णानां सा पुनः श्रुतिः। यमकम्–॥ (काव्यप्रकाश ९.८३)

[24] विरुद्धं भिन्नदेशत्वं कार्यहेत्वोरसंगतिः। (कुवलयानन्दः ८५)

[25] तथा प्राकृत में अकारान्त शब्दों में ऐस् के स्थान पर भिस् प्रत्यय का भी प्रयोग होने के कारण (हैम॰ ३.७ भिसो हि हिँ हिं)

[26] एक अन्य उदाहरण– अणण्णणाहा अविहा विहाअ णे। (कंसवहो १.३६)

[27] १.डज्झउ सक्कयकव्वं सक्कयकव्वं च णिम्मियं जेण।

बंसहरम्मि पलित्ते तडयडतट्टतणं कुणइ॥

२. पाइयकव्वुल्लावे पडिवयणं सक्कएण जो देइ।

सो कुसुमसत्थरं पत्थरेण दलिउं विणासेइ ॥ (व॰ ल॰ परिशिष्ट ३१* ३–४)

[28] अन्य उदाहरण–

तं नमह भारइं जीए चरणनहदप्पणेसु संकंता।

   बहुवयणा होंति फुडं पणमंता तक्खणे कइणो॥ (गाथारत्नकोश १८)

[29] अनादौ शेषादेशयोर्द्वित्वम् २.८९

[30] देखिए– हैम॰ २.७७ से २.९०

[31] विशेष विस्तार के लिये देखें हेमचन्द्रकृत प्राकृतव्याकरण–द्वितीय पाद सूत्र ।

[32] अत्र यद्युपभोगक्षमोऽसि तदा आस्स्वेति (वस्तुमात्रं) व्यज्यते। काव्यप्रकाश ४.५३

[33] कर्पूरमंजरी १.२३

[34] कुलकर्णी पृ॰ ६९

[35] खघथधभाम् । हैम॰१.१८७

[36] कैमुत्येनार्थसंसिद्धिः काव्यार्थापत्तिरिष्यते।

स जितस्त्वन्मुखेनेन्दुः का वार्ता सरसीरुहाम्॥ (कुवलयानन्द १२०)

[37] कार्याजनिर्विशेषोक्तिः सति पुष्कलकारणे।

हृदि स्नेहक्षयो नाभूत् स्मरदीपे ज्वलत्यपि॥ (कुवलयानन्द ८३)

[38] यद्यथा साधितं केनाप्यपरेण तदन्यथा।

तथैव यद्विधीयेत स व्याघात इति स्मृतः॥ (काव्यप्रकाश १०.१३७–१३८)

[39] ह्रस्वः संयोगे। हैम॰ १.८४

[40] संयोगे गुरु। (अष्टाध्यायी १.४.११)

[41] लक्षण ऊपर निर्दिष्ट है।

[42] ऐ–औ–̆क– ̆प––ऋ–ॠ–लृ–लॢ–प्लुत–श–षाः सर्गः चतुर्थी भ्यसि

प्रान्ते हल् ङञनाः पृथग्द्विवचनं नाष्टादश प्राकृते। (प्राकृतचन्द्रिका १.१३)

[43] कुलकर्णी पृ॰ १८ पर उद्धृत

[44] प्रान्ते हल् ङञनाः पृथग्द्विवचनं नाष्टादश प्राकृते। (प्राकृतचन्द्रिका १.१३)

[45] सुप्तिङ्लिङ्गनराज्झलादिबहुलं षष्ठी चतुर्थ्याः सदा

तादर्थ्योदितङेस्तु वा बहुवचो द्वित्वे प्रयोज्यं सदा॥ (प्राकृतचन्द्रिका १.१४)

[46] कुलकर्णी पृ॰ ८१

[47] मुद्राराक्षस ६–४

[48] ऐसा प्रतीत होता है कि कवि ने मूलतः यह पद्य संस्कृत में ही बनाया होगा। इसकी संस्कृतच्छाया में कहीं भी छन्दोभङ्ग दृष्टिगोचर नहीं होता– षड्गुणसंयोगदृढा उपायपरिपाटिघटितपाशमुखी। चाणक्यनीतिरज्जू रिपुसंयमनोद्यता जयति॥तदेव॥

[i] प्राकृत वैयाकरणों ने व्याकृति की सुविधा तथा लाघव के लिए संस्कृत को प्राकृत का मूल मान लिया है। उन्होंने संस्कृत की अपेक्षा प्राकृत के शब्दों को ३ प्रकारों का बताया है– १. वे शब्द जिनमें प्रकृति तथा प्रत्यय दोनों में विकृति हो वे हैं तद्भव, २. जिनमें केवल प्रत्ययांश में विकृति हो प्रकृत्यंश में नहीं वे हैं तत्सम (तत्सम को संस्कृतसम भी कहते हैं, दे॰ हैम॰ सर्वत्र लबरामवन्द्रे सूत्र की वृत्ति) तथा ३. जिन शब्दों का प्रयोग क्षेत्र विशेष तक सीमित होने के कारण अप्रसिद्ध हों वे हैं देशी। देखिए– प्राकृतचन्द्रिका १. ४–७

प्रकृतिः संस्कृतं तत्र भवत्वात् प्राकृतं स्मृतम्।

तद्भवं तत्समं देशीत्येवमेव त्रिधा मतम्॥

प्रकृतिप्रत्ययांशाभ्यां विकृतं तद्भवं यथा।

गोरीआ देउ सोहग्गं सामिद्धिं पाअडं स्मृतम्॥

यत्केवलं प्रत्ययांशे विकृतं तत्समं यथा–।

हरिणो चरणे चारु नुमो कमलकोमले॥

देशी देशविशेषेण प्रयुक्तमपरिस्फुटम्।

यथा– हल्लो हलं हालः कंदोट्टं सम उप्पवम्॥

अन्यत्र भी–प्राकृतशब्दप्रदीपिका–उपोद्घातश्लोक।

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गीर्वाणवाणीरुचिरावकाशे चरामि वा सुन्दरपारसीके।      मदीयकर्णौ शृणुतः सदैव तवैव सर्वत्रग कृष्ण वर्णान्॥

सदार्यनारीवदनारविन्दे नितम्बिनीनामथ यावनीनाम्।    तवाननाभाभ्रमतोऽरविन्दद्वयाक्ष मेऽक्षीणि धृतव्रतानि॥

به هر رنگی که خواهی جامه می پوش — من انداز قدت را می شناسم

बे̆ हर रंगी कि ख़ाही जामा मी पूश – मन अन्दाज़े क़दत रा मी शनासम

(हे प्रिय, चाहे तुम किसी भी वेश में आ जाओ – मैं तुम्हारे स्वरूप की अलोकसामान्य उच्चता से तुम्हें पहचान लूँगा )

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A paper of mine describing Shri Krishna as a poetic symbol in Sufi literature is published in Tasfiah-A bi-annual multi language journal of Sufism and Islamic Studies.

भारत में इस्लाम केवल मुसल्लह ग़ाज़ियों के ज़रिये ही नहीं बल्कि तस्बीह–ब–दस्त सूफ़ियों की करामात से भी दाख़िल हुआ था। सूफ़ी ‘हमे अज़ ऊस्त’(सारा अस्तित्व उसी परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है), तथा ‘हमे ऊस्त’(सम्पूर्ण अस्तित्व तथा परमेश्वर में कोई अन्तर नहीं है), की मान्यता के क़ायल रहे हैं। उन्हें तो हर देस में हर भेस में अपना महबूब ही दिखाई पड़ता है। जिस जगह धर्माचार्य पत्थर की मूरत भर देख पाता है वहीं प्रेम रंग में सराबोर सूफ़ी ख़ुदा का दीदार करता है।  वे तो जल्लाद से डरते हैं न वाइज़ से झगड़ते। वो समझे हुए हैं उसे जिस भेस में वो आये। यही कारण है कि भारत में आने पर यहाँ के हन्दुओं में पूर्व प्रचलित आध्यात्मिक प्रतीकों से उन्हें गुरेज़ नहीं हुआ। अजनबीपन और अपरिचय का डर तो उनको होता है जिनकी साधना कच्ची होती है। ऐसे लोगों का ईमान डावाडोल होता है । माबूद (उपास्य) को खो देने का, दीन से ख़ारिज हो जाने का डर उनमें समा जाता है। हज़रत अली का क़ौल है–आदमी जिसको नहीं जानता उससे घृणा करने लगता है, या डरने लगता है  (अन्नासु आदाउ मा जहिलू[1])। डरा हुआ आदमी प्रेम नहीं कर सकता वह तो दूसरों को भी डराता है। श्रीकृष्ण का कथन है कि मेरे प्रिय भक्त वे हैं जो न डरते हैं और न डराते हैं[2]। डरने वालों का महबूब की गली में कोई काम नहीं – उनका तो वहाँ प्रवेश ही निषिद्ध है – बर दरे माशूक़े मा तर्सन्देगान् रा कार नीस्त[3]

ईश्वरीय लोगों में यह सामर्थ्य होता है कि वे अहंकार के ज़ाहिरी पर्दे को हटा पाते हैं[4] । वे ईमान (मुखड़े) के साथ कुफ़्र (ज़ुल्फ़) को भी महबूब का जुज़्व (हिस्सा) ही समझते हैं क्योंकि उनके नज़दीक ग़ैरे महबूब किसी चीज़ का वजूद ही नहीं होता –ग़ैरे वाहिद हर चे बीनी आन् बुत अस्त [5]उनका हृदय समन्दर की तरह विशाल होता हैँ[6] जिसमें सारी नदियाँ एकमेक हो जाती हैं-बिना किसी पारस्परिक मतभेद के। उनके हृदय में  सारी इकाइया̆ एक में विलीन हो जाती हैं[7]। सूफ़ियों की यही सार्वजनीननता उन्हें स्वीकार्य बनाती है।

सूफ़ी मत का जन्म भले ही अरब में हुआ हो उसे सर्वाधिक अनुकूल वातावरण भारतवर्ष में प्राप्त हुआ। इसका कारण यह था कि भारतवर्ष में ऐसे अनेक सम्प्रदाय पहले से विद्यमान थे जिनमें सूफ़ियों जैसी मान्यतायें विद्यमान थीं। रिज़वी (२०१४: भूमिका१) के अनुसार–

प्राचीनकाल से ही भारतवर्ष में ऐसे संत होते आये हैं जो अपनी अमृतमयी

वाणी के द्वारा सद्भावों तथा सद्विचारों के प्रचारक रहे हैं। इस वातावरण में

इस्लामी तसव्वुफ़ अथवा सूफ़ीमत का रंगरूप और भी उज्ज्वल हो गया और

सूफ़ियों ने मानव कल्याण के क्षेत्र में विशेष योग दिया।

इसके अतिरिक्त सूफ़ियों के हमे–ऊ,स्त (अर्थात्, सब कुछ परमेश्वर है।) का सिद्धान्त पारम्परिक इस्लाम की अपेक्षा भारतीय दर्शन के अद्वैतवाद के साथ अधिक समान था[8]। साथ आने पर दोनों सिद्धान्तों ने एक दूसरे को प्रभावित किया तथा दोनों एक दूसरे से पुष्ट हुए। इस प्रकार का पारस्परिक आदान प्रदान जीवन्त संस्कृतियों का अभिलक्षण होता है। भारतीय सूफ़ी काव्य ने संस्कृत, प्राकृत तथा अपभ्रंश की साहित्य परम्पराओं से कविता की संरचना तो ली ही उन्होंने अपने सिद्धान्तों को भारतीय परिप्रेक्ष्य में बयान करने तथा लोगों को समझाने के लिए भी भारत में युगों से प्रचलित सांस्कृतिक प्रतीकों का भरपूर उपयोग किया[9]

सूफ़ी काव्यों में अपने प्रारम्भिक समय से ही अनेक प्रतीकों का प्रयोग शुरू हो गया था। इस प्रसंग में इस विषय पर विचार रोचक होगा कि रहस्यवादी काव्य में प्रतीक की आवश्यकता क्यों पड़ती है। वस्तुतः प्रतीक की आवश्यकता तब होती है जब हमारा वर्णनीय तत्त्व निर्गुण तथा सूक्ष्म हो। निर्गुण तत्त्व मानस की गति से परे है। उसकी उपासना सम्भव नहीं। परन्तु उपास्य की उपासना के बिना साधक की गति भी नहीं है। क्योंकि उसे जाने बिना संसार चक्र से छुटकारा नहीं मिलने वाला है। इस समस्या के समाधान के लिये विभिन्न सिद्धान्तियों ने अलग अलग मार्ग निकाले हैं। सूफियों की निर्गुण धारा ज्ञानमार्गियों की तरह नितान्त निर्गुण नहीं है। वहाँ परमेश्वर सगुण और निराकार है। ऐसे निराकार तत्त्व में स्थित गुणों के दिग्दर्शन के लिये सूफ़ियों को अपने प्रारम्भिक काल से ही भिन्न भिन्न प्रतीकों की कल्पना करनी पड़ी। फारसी तथा उससे प्रभावित उर्दू आदि काव्यों में हम एक प्रकार की सरस द्विकोटिकता का अनुभव करते हैं, इसका कारण उपर्युक्त प्रतीक प्रयोग ही है। इन काव्यों का अध्ययन करते हुए हम अनुभव करते हैं कि चर्चा ऐहलौकिक प्रियतम की हो रही है लेकिन अर्थ निराकार परमेश्वर में भी पर्यवसित हो रहा होता है। शृङ्गार रस तथा भक्ति–भाव का ऐसा मिला–जुला स्वरूप भारतीय साहित्य में मूलतः नहीं रहा। संस्कृत की कविता में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण हो जिसमें नायिका की चर्चा करते हुए परमतत्त्व की बात की जा रही हो। इस स्पष्ट विभाजन का कारण है कि भारतीय धर्म ने परमेश्वर को स्वयं देहधारी स्वीकार कर लिया था अतः वह इन्द्रियों के द्वारा संवेद्य हो गया। उसके लिए किसी अन्य प्रतीक की आवश्यकता नहीं पड़ी[10]

प्रतीकों का उपयोग करके कवि निम्नलिखित लाभों को ग्रहण कर पाता है[11]

  • सूक्ष्म भावों को स्थूल रूप में प्रस्तुत कर पाना।
  • अपरिचित वस्तु का किसी परिचित आधार पर परिचय देना।
  • अप्रस्तुत के वर्णन से प्रस्तुत के विषय में जिज्ञासा पैदा करना।
  • विषय वस्तु का ध्वनन।
  • दो विषयों का प्रतिपादन एक साथ करना।

सूफ़ियों ने अलौकिक परमात्म–वस्तु का वर्णन करने के लिए लौकिक प्रतीकों का उपयोग किया है इसका कारण है भारतीय वैष्णव सन्तों की भाँति उनकी जगत् को देखने की अपूर्व दृष्टि। हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने इस प्रवृत्ति को वैष्णवों के चिन्मुखीकरण के समकक्ष रखा है (रिज़वी २०१४: प्राक्कथन ५–६)–

…जगत् के समस्त क्रियाकलाप का चिन्मुखीकरण ही वैष्णव साधकों का

और सूफ़ी साधकों का भी, प्रधान लक्ष्य है। संसार के जितने भी सम्बन्ध हैं

वे सभी जडोन्मुख न होकर यदि चिन्मुख हो जायँ तो मनुष्य के सर्वोत्तम

पुरुषार्थ के साधक हो जाते हैं[12]।…..जो साधारण जगत् का जडविषयक राग

वह चिन्मुख होकर श्लाघ्य हो जाता है। इसी बात को बताने के लिए लौकिक

प्रतीकों की आध्यात्मिक व्याख्या की जाती है।

इस्लाम के आने से पहले ही भारत में श्रीकृष्ण की रसराज के रूप में प्रतिष्ठा हो चुकी थी[13]। श्रीमद्भागवत के व्रजेन्द्रनन्दन कान्हा महाभारत के पराक्रमशील वीरवर श्रीकृष्ण की अपेक्षा हृदय के अधिक निकट लगते थे। लोक परम्परा में गोपियों से उनकी प्रेमगाथायें सर्वत्र व्याप्त थीं। रसीले लोकगीतों में उनके अतिरिक्त कोई और नायक हो भी नहीं सकता था। श्रीकृष्ण की प्रेम लीला के आध्यात्मिक अर्थ निकालने की परम्परा प्रारम्भ से ही वैष्णव सम्प्रदायों में विद्यमान थी। स्वयं श्रीमद्भागवत के अनुसार कृष्ण ने गोपियों के साथ ऐसे रमण किया जैसे कि कोई बच्चा अपने ही प्रतिबिम्ब के साथ खलने लगे–

रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभिर्यथार्भकः स्वप्रतिबिम्बविभ्रमः। (श्रीमद्भागवतम् १०–३३–१६)

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इस स्थिति में यह असम्भव था कि कृष्ण भारतीय सूफ़ी कवियों के लिए प्रतीक के रूप में उपयुक्त नहीं होते। सूफ़ी काव्य में श्रीकृष्ण की उपस्थिति की चर्चा हम सबसे पहले ख़ुदावन्दगार मौलाना जलालुद्दीन रूमी तथा उनके माशूक और मुर्शिद शम्सुद्दीन तबरेज़ी से शुरू करते हैं। मौलाना के भारत के साथ परिचय के सबसे प्रमुख साधन बने थे उनके गुरु एवं परम प्रेमास्पद–शम्सुद्दीन तबरीज़ी। अनेक विद्वानों का मानना है कि शम्स का सम्बन्ध भारत से था । दौलतशाह, जो कि मौलाना के प्राचीन जीवनी लेखक हैं, उनके अनुसार शम्स के पिता नौ–मुसलमान (अर्थात् धर्मपरिवर्तक)  थे तथा उनका नाम – खोविन्द जलालुद्दीन था। Dr. Rasih Guven  ने अपने लेख  Maulana Jalal ul Din and ShamsTabrizi[14] ने प्रबल सम्भावना जताई है कि उनका नाम गोविन्द रहा होगा जो एक भारतीय[15] नाम है। उनके पूर्वज भारत से तबरीज़ व्यापार किया करते थे तथा कालान्तर मे मुसलमान हो गये थे। स्वयं मौलाना शम्स (अर्थात् सूर्य) का सम्बन्ध पूर्व से जोड़कर अनेक बार काव्यात्मक चमत्कार उत्पन्न करते हैं[16] । इससे भी यह पता चलता है कि शम्स मूलतः तबरीज के नहीं थे क्योंकि तबरीज ईरान के पश्चिम में है पूरब में नहीं[17]। मौलाना भारतीय कहानियों तथा दर्शनों से बहुत अधिक परिचित लगते हैं। उन्होंने पंचतन्त्र की अनेक नीतिकथाओं का आध्यात्मिकीकरण अपनी मसनवी में दर्शाया है[18]। सैयद अमीर हसन आबिदी ने अपने लेख में मौलाना की जन्मभूमि बल्ख़ में हिन्दू तथा बौद्ध सभ्यताओं के अवशेषों से उनके प्रभावित होने को अच्छी तरह से इंगित किया है। रूमी अगर अपनी मसनवी की शुरूआत बिना हम्द या नात या मनक़िबत के सीधे बंसुरी के बयान–नैनामा–के साथ शुरू कर रहे हैं, तो उस समय उनके मन में कहीं न कहीं श्रीकृष्ण की बाँसुरी है[19]

बिश्नव अज़ नै चून् हिकायत मी कुनद । व,ज़ जुदाई–हा शिकायत मी कुनद[20]॥ आदि।।

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पारम्परिक व्याख्या में बाँसुरी आदमी के गले की प्रतीक है। वह उसके जीवात्मा की आवाज़ है जिसके खाली छिद्रों के शुरुआती सिरे पर परमात्मा के होंठ हैं। उसी की फूँकी गयी वायु से बाँसुरी गुंजायमान है। ध्यातव्य है कि सूफ़ियों ने ईश्वर की साधना के रूप में संगीत–नृत्य आदि ललित कलाओं का उपयोग किया। ललित कलाओं की विशेषता है कि वे हमारे चित्त की रागात्मक वृत्तियों को उभारती हैं। द्रवित चित्त में कभी उत्तेजनात्मक वृत्तियाँ नहीं आ सकती। किसी के प्रति भी कठोर होने के लिये हमें पहले अपने को कठोर बनाना पड़ता है। इस प्रकार गीत संगीत चित्त को ईश्वराराधन के योग्य बनाता है। वैष्णवों के यहाँ संगीत प्रारम्भ से ही ईश्वराराधन के साधन के तौर पर मान्य है। संगीत की निस्बत से भी श्रीकृष्ण का सूफ़ियों के प्रतीक के रूप में उपस्थित होना स्वाभाविक हो जाता है।

सूफ़ियों को भी कृष्ण कथा के आध्यात्मिक अर्थ से ही स्वाभाविक रूप से अधिक रुचि थी।  श्रीकृष्ण तथा राधा की प्रेम कथायें सूफियों को भी अलौकिक रहस्यों से परिपूर्ण ज्ञात होती थीं। इनके लीला से सम्बन्धित पद तत्कालीन जनता के मानस में बसे हुए थे जिनका प्रयोग करके सूफ़ी सामान्य जनता के निकट हो सकते थे तथा अपने सन्देश को प्रसारित कर सकते थे। उन्होंने इन कविताओं का प्रयोग अपनी आध्यात्मिक महफिलों में शुरू किया। इन कविताओं का समा में गाया जाना मुल्लाओं को अच्छा नहीं लगता रहा होगा। शुद्धतावादियों की इस प्रकार की असहमति को हक़ायक़े हिन्दी में बिलग्रामी ने पूर्वपक्ष के रूप में उठाया है–

यदि कोई कहे कि अपवित्र काफ़िरों का नाम आनन्द लेकर सुनना एवं शरअ के विरुद्ध

साहित्य पर आवेश में आकर नृत्य करने लगना कहाँ से उचित हो गया तो हम कहेंगे

उमर बिन ख़त्ताब से लोगों ने सुनकर यह बात कही कि (क्या) क़ुरान में शत्रुओं का

उल्लेख तथा काफ़िरों के प्रति सम्बोधन नहीं है?

सूफ़ी साधना के इसी प्रकार के भारतीयकरण का एक प्रसंग बिलग्रामी से भी पहले शैख नूर क़ुत्बे आलम ( मृत्यु १४१५) के ख़ानक़ाह से सम्बद्ध भी लिखित मिलता है[21]। इन्हीं कारणों से लोक में प्रचलित श्रीकृष्ण परक पदों को अपने साधना हेतु स्वीकार करने के साथ सूफ़ियों ने इनमें प्रयुक्त प्रतीकों की अपने सम्प्रदायों के अनुरूप विभिन्न आध्यात्मिक (=मजाज़ी) व्याख्यायें प्रस्तुत कीं।  अकबर के समय लिखी अपनी पुस्तक हक़ायक़े हिन्दी में मीर अब्दुल वाहिद बिल्गिरामी (जन्म १५०९ ई॰ ) ने कृष्ण सम्बन्धी प्रतीकों से सूफ़ियों द्वारा लिये जाने वाले अर्थों के भिन्न भिन्न आयामों का विस्तार से वर्णन किया है। वस्तुतः इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक में लेखक ने हिन्दी ध्रुपद और विष्णुपद गानों में लौकिक शृंगार के वर्ण्य विषयों को आध्यात्मिक रूप में समझने की कुंजी दी है[22]। इस पुस्तक से सूफी साधकों की उस उदार दृष्टि का पता चलता है जिससे उन्होंने हिन्दू और मुसलमान धर्म की एकता को खोज निकाला था। बिलग्रामी ने क़ुर्आन और हदीस से प्रमाण देकर अपने आध्यामिक संकेतों की प्रामाणिकता सिद्ध की है। इससे उनकी गम्भीर निष्ठा अद्भुत भक्ति और नितान्त उदार दृष्टि का सन्धान मिलता है। उन्होंने केवल शब्दों के आध्यात्मिक संकेत बताकर ही विश्राम नहीं लिया बल्कि इन शब्दों का आश्रयकरके जो विचार बन सकते हैं और बनते हैं उनको भी समझाने का प्रयत्न किया है[23]

बिलग्रामी के अनुसार–

“यदि हिन्दवी वाक्यों में कृष्ण अथवा उनके अन्य नामों का उल्लेख हो तो उससे रिसालत पनाह सल्लम (मुहम्मद साहब ) की ओर संकेत होता है। और कभी इसका तात्पर्य केवल मनुष्य से होता है। कभी इससे मनुष्य की वह वास्तविकता समझी जाती है जो परमेश्वर के ज़ात की वहदत से सम्बन्धित होती है। कभी इबलीस से भी तात्पर्य होता है। कभी उन अर्थों की ओर संकेत होता है जिनका अभिप्राय  बुत, तर्साबचा, तथा मुग़बचा से होता है”[24]

(मूल फ़ारसी) गर दर कलिमाते हिन्दवी ज़िक्रे किशन या आन् चे असामी ए ऊस्त वाक़ेअ शवद किनायत कुनन्द अज़ जनाबे रिसालत पनाह सल्ल,ल्लाहु अलैहि व सल्लम व गाह बर इंसानो गाह बर हक़ीक़ते ब–ऐतिबारे अह्दिय्यते ज़ात ओ गाह बर इब्लीसो गाह हम्ल कुनन्द बर आन् मा,नी कि अज़् बुतो तर्साबचे ओ मुग़बचे इरादत मी कुनन्द।

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श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व अकेला नहीं अपितु उनके साथ उनके पार्षद, उनका पूरा परिवार तथा उनकी लीलाएँ हैं । बिलग्रामी ने हक़ायक़े हिन्दी नामक अपने ग्रन्थ के  विष्णुपद नामक विभाग में आने वाले नामों की व्याख्या के सन्दर्भ में लगभग उन सभी आनुषङ्गिक नामों के सूफ़ियाना गूढार्थ बताये हैं। उदाहरण के लिये– गोपी या गूजरी का तसव्वुफ़ में तात्पर्य हो सकते हैं–१. फ़रिश्ता, २. मनुष्य जाति की वास्तविकता। कुबरी अथवा कुब्जा का अर्थ है दोषों और त्रुटियों से युक्त मनुष्य। ऊधो (उद्धव) का तसव्वुफ़ में तात्पर्य हो सकते हैं–१.मुहम्मद साहब, २. जिबरील, ३. ईमानदार ज़ामिन । ब्रज अथवा गोकुल शब्दों से १. आलमे नासूत, २. मलकूत या ३. जबरूत ग्रहण किया का सकता है। गंगा या जमुना का अर्थ होता है– वहदत की नदी जो मारिफ़त के समुद्र की ओर बहती हैं। इनका अर्थ हुदूस और इमकान की नहर भी होता है, क्योंकि जन्म लेने वाली वस्तुएँ लहरों एवं नहरों की तरह होती हैं। मुरली अथवा बाँसुरी का तात्पर्य अदम से वुजूद का नमूदार होना होता है। हिन्दवी जुम्लों में अगर कंस का उल्लेख आता हो तो सूफ़ी उससे १. नफ़्स, २. शैतान ३. ख़ुदा के क़हर और जलाल वाले नाम ४. पिछले पैगम्बरों की शरीअत, आदि अर्थ प्रसंगानुसार लेते हैं। सर्प से उनका तात्पर्य नफ़्से अम्मारा[25] से होता है। वृन्दावन, मधुपुरी, मधुवन आदि से सूफ़ी ईमन की वादी का मतलब निकालते हैं। मथुरा का तात्पर्य सूफ़ियों की अस्थायी मक़ाम है। नन्द से मुराद पैग़म्बर मुहम्मद तथा यशोदा ईश्वर की कृपा का द्योतक है[26]। हक़ायक़े हिन्दी में केवल व्यक्ति अथवा स्थानवाचक शब्दों  का ही नहीं अपितु कृष्ण लीला के गीतों में आये विभिन्न अभिव्यक्तियों का आध्यात्मिक अर्थ भी बताया गया है। अनेक स्थानों पर कृष्ण आदि उत्तम पात्रों के इब्लीस आदि अर्थ लेने के कारण यह बिलकुल नहीं लगता कि इन प्रतीकात्मक अर्थों को लेने के पीछे उनकी उन पात्रों के प्रति कोई श्रद्धा बुद्धि है। उनका एकमात्र उद्देश्य यह है कि इन शब्दों की व्याख्या इस तरह से की जाये कि वे सूफ़ी सिद्धान्तों के वाचक हो जायें तथा उनका व्यक्तिगत भाव मिट जाये। उदाहरण के लिये कृष्ण द्वारा गोपियों का रास्ता रोकने के प्रसंग को वे इब्लीस द्वारा साधकों के मार्ग में विघ्न डालना अर्थ लेकर कृष्ण का तात्पर्य शैतान से लेना बताते हैं। जबकि इसका और अधिक सूफी सम्मत अर्थ यह हो सकता था पीरे कामिल प्रारम्भिक साधना पूरी हो जाने के बाद सालिक को ज़ाहिरी शरीअत के रास्ते से रोकता है। इन प्रकार के प्रसंगों से लगता है कि मीर अब्दुल वाहिद बिलग्रामी का प्राथमिक उद्देश्य केवल यह था कि हिन्दवी गीतों का सूफी सम्मत अर्थ लगाकर उन्हें स्वीकार्य बनाया जाय और उनका साधनात्मक लाभ लिया जाये।

सूफ़ियों के ग्रन्थों में इस बात के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं कि अपनी रसमयी साधना के प्रसंग में वे पारम्परिक अरबी तथा ईरानी वस्तुओं की अपेक्षा भारतीय वातावरण के उपादानों में अधिक रम पाते थे। इसका साफ़ कारण, जिसको पहले भी बताया जा चुका है, यह था कि सूफ़ीवाद का यह स्वरूप हिन्दुस्तानी था, इसलिए स्वभावतः उसे यहाँ की वस्तुएँ अधिक हृदयावर्जक लगतीं। एक इसी तरह की घटना का ज़िक्र मुल्ला निज़ामुद्दीन ने किया है[27]

“एक बार सालन के शैख़ पीर मुहम्मद (मृत्यु १६८७) की ख़ानकाह में समा

चल रहा था तथा हिन्दवी गीत गाये जा रहे थे। उपस्थित लोग आनन्दातिरेक

में मग्न थे। जब सूफ़ियों का नृत्य और वज्द समाप्त हुआ, वे उठे और बहुत सुन्दर

कण्ठ से क़ुर्आन की आयत पढ़ी, लेकिन इसका उपस्थित लोगों पर कोई प्रभाव

नहीं हुआ–न तो नृत्य न ही वज्द। इसे देखकर शेख़ मुहम्मदी ने कहा– कितने

आश्चर्य की बात है कि क़ुर्आन सुनने के बावजूद कोई उत्तेजित नहीं हुआ जबकि

हिन्दवी कलाम जिनमें क़ुर्आन के विरुद्ध बाते हैं, सुनकर तुम उत्तेजित हो गये।

इसे सुनकर सैयद अब्दुर्रज़्ज़ाक़ प्रसन्न हुए तथा उन्होंने शैख़ मुहम्मदी के इस

आचरण का समर्थन किया[28]।”

इस प्रकार की व्याख्यायें सूफ़ियों की उदार दृष्टि से अधिक उनकी जनवादिता तथा प्रचार प्रियता की परिचायक हैं। इस प्रकार की व्याख्या से उनकी जिस मानसिकता का द्योतन होता है, वे हैं–

  • कोई भी वस्तु ईश्वर से ख़ाली नहीं है[29]। इसलिये प्रत्येक वस्तु अथवा स्थान से ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। मौलाना रूमी का कथन है– मा,शूके तू हमसाया ए दीवार बे दीवार।

अथवा हाफ़िज़- वीन् अजब बीन् कि चे नूरी ज़ कुजा मी बीनम

  • कोई भी व्यक्ति ईश्वर की प्राप्ति की योग्यता से रहित नहीं है–

आन् हीच सरी नीस्त कि सिर्री ज़ि ख़ुदा नीस्त (हाफ़िज़)

  • सारे शब्दों तथा सारी पुस्तकों का तात्पर्य ईश्वर है, अतः सारी बातों की व्याख्या उसके पक्ष में की जा सकती है[30]

बिलग्रामी ने उद्धृत किया है–जिसकी रूह तजल्ला में रहती है उसके लिये समस्त संसार ईश्वर की पुस्तक है।[31]  तथा ज़ाहिर और बातिन सभी वस्तुओं को हस्ती समझ ले। और सभी वस्तुओं को क़ुरान और उसकी आयतें समझ ले।

इस प्रकार सूफ़ियों ने भारत की सांकृतिक धरोहर का इनकार या उसकी तक्फीर न करके उनका सूफीकरण किया तथा उन्हें और समृद्ध ही किया। बाहमी रवादारी, असंघर्ष, अनिराकरण तथा यदृच्छालाभ द्वारा सन्तुष्ट रहकर निरन्तर परमेश्वर के ध्यान में मग्न रहना ही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है–

आशिक़ान् दर दैर रुह्बान् अन्दो दर मस्जिद इमाम

हर कि बा इश्क़ आशना शुद हीच जा बीकार नीस्त

(आशिक़ मन्दिर में पुजारी और मस्जिद में इमाम बन जाते हैं। जो भी प्रेम से परिचित हुआ

वह कहीं भी बेरोज़गार नहीं रहता॥)

सूफ़ी कवियों में ईरान से ही प्रेम गाथाओं की आध्यात्मिक व्याख्या की रिवायत मौजूद थी। लैला मजनूँ, खुसरौ–शीरीन्, यूसुफ़–ज़ुलैख़ा आदि पौराणिक प्रेम गाथाओं पर विश्वप्रसिद्ध मसनवियाँ लिखी जा चुकी थीं। इसी परम्परा से परिचित सूफ़ियों ने भारत में भी प्रचलित लोकगाथाओं के मजाज़ी स्वरूप का वर्णन  करके हक़ीक़ी अर्थों का दिग्दर्शन कराने की चेष्टा की[32]। ऐहलौकिक प्रेम हेय नहीं है, बल्कि वह तो उस पुल का पहला सिरा है जिसके आख़िरी सिरे पर पारलौकिक सत्य है–لمجاز قنطرة الحقیقة । उत्तर तथा दक्षिण भारत में सूफ़ी प्रेमाख्यान काव्यों की बड़ी समृद्ध परम्परा है। इसे हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने भक्तिकाल की निर्गुण शाखा के प्रेममार्गी सन्तकाव्य के अन्तर्गत रखा है। इसमें प्रमुख कवि हैं उत्तर में मुल्ला दाउद (चन्दायन १३७८–७९) तथा जायसी (१५४०–४२) से लेकर कवि नसीर (प्रेमदर्पण–१९१७–१८) तक, तथा दक्षिण में निज़ामी–(कदमराव पदमराव १४५६ ई॰) से लेकर सिराज औरंगाबादी (बूस्ताने ख़याल १७४९ ई॰) तक[33]। इन हिन्दुस्तानी सूफ़ी प्रेमाख्यान गायकों में सबसे प्रसिद्ध जायसी हैं। इन्होंने पद्मावत के अतिरिक्त श्रीकृष्ण को नायक बनाकर एक काव्य कन्हावत की रचना भी की है। जायसी ने कृष्ण की कथा को प्रेम के वर्णन के लिये सर्वोत्कृष्ट कथा मानी है–

अइस प्रेम कहानी दोसरि जग महँ नाहिं। तुरुकी अरबी फारसी सब देखेउँ अवगाहि॥

(कन्हावत पृ॰ १२ दोहा १४)

इसमें ऊपरी तौर पर तो कृष्ण की लोकप्रसिद्ध गाथा का वर्णन है लेकिन साथ ही उन्होंने कई स्थलों पर कृष्ण कथा के सूफ़ी मतानुसार आध्यात्मिक अर्थों की ओर भी संकेत किया है–

परगट भेस गोपाल गोबिन्दू। गुपुत गियान न तुरुक न हिन्दू॥ (कन्हावत)

कन्हावत के अतिरिक्त अपनी दूसरी कृति पद्मावत में भी जायसी ने कृष्ण के ऐतिहासिक प्रतीक का बार बार उपयोग किया है–

ले कान्हहिँ अकरूर अलोपी । कठिन बियोग जियहिँ किमि गोपी॥ (पद्मावत)

श्रीकृष्ण के प्रतीकों का सुन्दर उपयोग हमें काकोरी के क़लन्दरिया ख़ानक़ाह के संस्थापक हज़रत तुराब काकोरवी (मृत्यु १८०६) के हिन्दवी काव्यों में मिलता है। जब वे श्रीकृष्ण को अपने पीर या महबूब की शक्ल में पेश कर पाते हैं तो इसमें उनका वही विशाल हृदय और मज़बूत ईमान दीख पड़ता है । जहाँ ज़ाहिद को कुफ़्र दीखता है वहीं शाहिद अपना महबूब ढूँढ लेता है।श्रीकृष्ण तथा उनसे सम्बद्ध प्रतीकों का प्रयोग उनके काव्य में कृष्णमार्गी वैष्णव कवियों की तरह ही है । और यह महत्त्वपूर्ण विशेषता उन्हें सभी निर्गुण सन्त कवियों, चाहे वे प्रेममार्गी हों या ज्ञानमार्गी, से पृथक् करती है।

हज़रत तुराब काकोरवी फ़ारसी, अरबी आदि भाषाओं में सिद्धहस्त थे तथा इन सबकी काव्य परम्पराओं से सुपरिचित।  उनके कलाम फ़ारसी भाषा में भी उपलब्ध होते हैं । परन्तु उर्दू कवियों के विपरीत अपनी हिन्दी कविता में उन्होंने फ़ारसी जगत् के काव्य प्रतीकों या रूढियों गुलो–बुलबुल, शीरीं–फरहाद आदि का प्रयोग नहीं किया है । उनके यहाँ तो बसन्त है, होरी है, वर्षा है, हिंडोला है, कोयल है, पपिहे की पियु पियु है, दादुर (मेढक) का शोर है और हिन्दुस्तान की अपनी विशेषता रिश्तों की अहमियत – ननद तोरा बिरना, नन्द के लाला, जसमत के लंगरवा ये सभी प्रचुर मात्रा में हैं । इससे उनका काव्य ठेठ हिन्दुस्तानी सौंधी गन्ध से सुवासित हो गया है । और इसी में तुराब की तुराबिय्यत है[34] । इसी क्रम में दिव्य अथवा लौकिक प्रेम को व्यञ्जित करने के लिये उनके उपमान लैला मजनूँ, शीरीं – फ़रहाद आदि नहीं  बल्कि भारतीय रसिक जनों के प्राणभूत राधा– कृष्ण हैं जिनका बहाना लेकर भक्ति तथा रीति काल के हिन्दी कवियों ने अपने भक्ति और शृङ्गार सम्बन्धी उद्गार प्रकट किये हैं[35]। भारतीय जनमानस इनसे एक विशेष प्रकार की निकटता का अनुभव करता है, चाहे वह किसी वर्ग या धर्म से सम्बन्धित हो। श्रीकृष्ण का साँवला रङ्ग भारतीय उपमहाद्वीप का प्रतिनिधि रङ्ग है । उनकी सरस बातें, तिरछी चितवन, रंगारंग बानक भारतीय जनसमूह के हृदय में धँस गया है  और कवियों का उपजीव्य स्रोत बन चुका है । हज़रत के काव्य में श्रीकृष्ण पूर्णतः रस्य तथा अनुभव कर सकने की सीमा तक वर्णित हुए हैं । यह वर्णन कबीरदास के – “केसौ कहि कहि कूकिये, गुरुग्रन्थसाहब के साँवर सुन्दर रामैया मोर मन लागा तोहे तथा कवीन्द्र रवीन्द्र के एशो श्यामल शुन्दर की अपेक्षा अधिक सरस, रंगीन तथा अनुभाव्य है। ऊपर उद्धृत काव्य केवल कृष्ण के नाम तथा प्रतीकमात्र का उपयोग करते हैं । इनमें कृष्ण अपने सर्वसामान्य रूप में नहीं आते और निर्गुण ब्रह्म की एक छवि उन पर हावी हो रहती है । वस्तुतः श्रीकृष्ण की छवि इस क़दर रंगीन है कि वे सगुणता की प्रतिमूर्ति ही प्रतीत होते हैं । यही कारण है कि भक्तिकालीन निर्गुण धारा के कवियों में परब्रह्म के प्रतीक के रूप में जितना राम का उपयोग किया गया है उतना कृष्ण का नहीं क्योंकि उन कवियों का लक्ष्य अन्ततः निर्गुण तत्त्व ही था। इसके विपरीत तुराब के कृष्ण केवल ध्यानगम्य ही नहीं हैं बल्कि अपने पूरे सौन्दर्य के साथ सपार्षद विद्यमान हैं । उनके पास काली कामर (कम्बल), पिछौरी पाग (मोरपंख का मुकुट) है, मोहनी मूरत–सोहनी सूरत है और आँखें रसीली और लाजभरी हैं । वे ढीठ हैं, लंगर हैं । एक बार उनकी नज़र किसी पर लग गयी फिर छोड़ते नहीं । यहाँ जसमत (यशोमती) भी हैं,नन्द भी हैं,राधा – बृषभान किशोरी भी हैं, दूध–दही का बेचना भी है । उनसे रूठना है– जासो चाहें पिया खेलें होरी– मोसे नहीं कछु काम री गुइयाँ; मनाना है, उनके कठोर व्यवहार के लिये उलाहना देना है, उनकी जबरदस्ती के लिये उन्हें गालियाँ देना हैं । उनकी बेवफ़ाई का बखान है – तोरी प्रीत का कौन भरोसा– एक से तोरे एक से जोड़े । सौतिया डाह है – फाग मा भाग खुले सौतन के रीझे हैं उन पर श्याम री गुइयाँ ॥ पछतावा है – ऐ दई  नाहक पीत करी ॥ राधा का विरह में पीला पड़ना है – कान्ह कुँवर के कारण राधा – तन से भई पियरी दुबरी ॥ इन पुष्ट तथा सरस सचित्र वर्णनों के कारण तुराब के कृष्ण का निर्गुण ब्रह्म में पर्यवसान बहुत अन्त में हो पाता है  ।

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तुराब के काव्य में कृष्ण के लौकिक तथा पारलौकिक अनेक प्रकार के रंग हैं । वह अधिकतर स्थानों पर पीरे कामिल (परिपूर्ण गुरु) के रूप में प्रकट होकर आये हैं । गुरु, शिष्य के अहंकार की चिरसञ्चित मटकी को फोड़ कर उसकी अन्तरात्मा को प्रेम रस में सराबोर कर डालता है । बिल्कुल वही जो कृष्ण गोपियों के साथ करते हैं । ज़बरदस्ती साधना के फाग में प्रेम का रंग लगाता है । वह अबीर घूँघट खोल कर मलता है । दूध–दही बेचने नहीं देता जैसे गुरु सांसारिक कार्यों से साधक को कुन्द कर देता है –फगवा माँगत रार करत है – कस कोई बेचे दूध दही ॥ वह लाज हर लेता है – ताली बजावत धूम मचावत – गाली सुनावत लाज हरत है ,बिलकुल मौलाना रूम के साक़ी की तरह – बरख़ीज ऐ साक़ी बिया – ऐ दुश्मने शर्मो हया ॥

अनेक बार कृष्ण को परब्रह्म के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है । वह अपना मुख सबसे बचाये रखता  है – कुंज़ुन् मख़्फ़ीयुन् (کنج مخفی)[36] की तरह और रसिकों के मुँह पर अबीर मलता है।  वह कान्ह कुँवर रूपी ब्रह्म ही है जिसके विरह में राधा रूपी जीवात्मा तन से पीली और दुबली हो जाती है।

बाद के अनेक उर्दू कवियों ने भी श्रीकृष्ण को उपने काव्य का विषय बनाया है जिसमें अधिकतर तो चरितकाव्य अथवा श्रद्धास्पद की तरह  हैं। इन वर्णनों में सूफ़ियों जैसी द्विकोटिकता का अभाव है। लेकिन यह कहा जा सकता है कि श्रीकृष्ण को उर्दू की परम्परा में चरितनायक के रूप में वर्णन करने का साहस तथा प्रेरणा पूर्वोक्त सूफ़ियों की काव्य परम्परा के कारण ही मिल पाया है। अनेक स्थलों पर उर्दू कवियों ने भी श्रीकृष्णपरक प्रतीकों का सूफ़ियाना उपयोग भी किया गया है। कुछ प्रमुख उदाहरण प्रस्तुत हैं–

मुंशी बनवारीलाल शोला–

तु ही है हुस्ने रुखसारे हक़ीक़त । तु ही है परदा बरदारे हक़ीक़त॥

अलग कब तुझसे तेरी गुफ़्तो गू है। गरज इक तू ही तू है तू ही तू है॥

गोपीनाथ अम्न–

कोई पीताम्बर या जामा ए एहराम में आये

मुहम्मद की गली या कूचा ए घनश्याम में आये

ख़ुदा शाहिद कि सर झुकता है अहले दिल के क़दमों पर

मये साफ़ी से मतलब है किसी भी जाम में आये

मौलाना हसरत मोहानी –

पैग़ामे हयाते जाविदाँ था हर नग़्मा किशन बाँसुरी का

वो नूरे सियाह या कि हसरत सरचश्मा फ़रोग़े आगही का

निहाल स्योहारवी–

आ गया फिर हुस्न दुनिया ए अजल आबाद पर

ज़िन्दगी मथुरा पे बरसी आले ईजाद पर

कायनाते जुज़्व ओ कुल का राज़दाँ पैदा हुआ

मुख़्तसर ये है कि आक़ा ए जहाँ पैदा हुआ।

उपर्युक्त शाइरों के उदाहरणों में सीमाब अकबराबादी, निहाल स्योहारवी, नज़ीर बनारसी आदि के कृष्ण परक कलाम काबिले गौरो जिक्र हैं। श्रीकृष्ण की लीलाओं के गान के लिये नजीर अकबराबादी बहुत ही प्रसिद्ध हैं। कृस्न कन्हैंया का बालपन, जनम कन्हैयाजी और हरि की तारीफ़ में  आदि कथात्मक कवितायें कृष्ण लीला की उज्ज्वल तस्वीर खींचते हैं।  लेकिन सबसे रहस्यात्मक नातिया कलाम मोहसिन काकोरवी का है जिसमें ज़ाहिरी तौर पर श्रीकृष्ण को मुहम्मद साहब के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त किया गया है। क़सीदे के शुरुवाती शेर हैं–

सम्ते काशी से चला जानिबे मथुरा बादल

अब्र के दोश पे लाती है सबा गंगाजल

देखिये होगा सिरीकृष्न का दरशन क्यूँकर

सीना–ए–तंग में दिल गोपियों का है बेकल

ध्यान देने की बात है कि जिस राधा कृष्ण के प्रतीक को लेकर हिन्दी के रीतिकालीन कवियों ने मुख्यतः शृंगारिक रचनायें की सूफ़ी कवियों ने इन्हीं प्रतीकों का उपयोग अपने सम्प्रदाय की आध्यात्मिक व्याख्या के लिए किया। इस प्रकार उन्होंने कृष्ण परक इन प्रतीकों को अर्थों के नये आयाम प्रदान किये तथा फ़ारसी काव्य की चिर परिचित द्विकोटिकता (=मजाज़ी तथा हक़ीक़ी) की पंक्ति में इन भारतीय प्रतीकों को भी जोड़ दिया।

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 चयनित सन्दर्भ

फ़ारसी

(फारसी पुस्तकों के सन्दर्भ में क्रमशः पहले लेखक या संपादक का नाम , फिर तिरछे अक्षरों में पुस्तक का नाम , कोष्ठक में पुस्तक की विषयवस्तु हिन्दी में , प्रकाशक का नाम , प्रकाशनस्थान तथा प्रकाशनवर्ष दिये  गये हैं ।)

जमानी , करीम – शरहे जामे ए मसनवी (मसनवी की व्याख्या)–इन्तिशाराते इत्तेलाआत, तेहरान

१३९०हिजरी ।

जमालजादे,मुहम्मद अली –बांगे नाय (मसनवी की कहानियां ) – इन्तिशाराते अंजुमने किताब ,

तेहरान – १३३५ हिजरी ।

जर्रीनकूब,अब्दुल हुसैन – पिल्ले पिल्ले ता मुलाकाते खुदा ( मौलाना की जीवनी) –इन्तिशाराते इल्मी ,

तेहरान – तीसवां संस्करण  १३८९ हिजरी ।

ज़र्रीनकूब, अब्दुल हुसैन–दुम्बाले  ए जुस्तो जू दर तसव्वुफ़े ईरान (ईरानी सूफ़ीवाद पर प्रामाणिक पुस्तक ) मुवस्सिसे

इन्तिशाराते अमीर कबीर , तेहरान –१३८९ हिजरी।

फरुजान फर , बदीउज्जमान –शरहे हाले मौलवी (मौलाना की जीवनी) , किताबफरूशे जवार ,मशहद–

१३१५ हिजरी ।

मौलाना , जलालुद्दीन मुहम्मद इब्ने मुहम्मद (व्या॰) नसीरी, जाफर ; शरहे मसनवी ए मानवी (दफ्तरे

      यकुम), इन्तिशाराते तर्फन्द , –  तेहरान , १३८० हिजरी ।

मौलाना, जलालुद्दीन मुहम्मद इब्ने मुहम्मद (सं॰) निकोल्सन ,आर॰ ए॰;मसनवी ए मानवी–

     पादानुक्रमसहित, मास्को संस्करण, इन्तिशाराते हिरमिस , (चतुर्थ संस्करण) १३८६ हिजरी ।

मौलाना, जलालुद्दीन मुहम्मद इब्ने मुहम्मद (सं॰) कदकनी, मुहम्मद रजा शफीई – दीवाने शम्स तबरीज

    (मौलाना के दीवान का संक्षिप्त तथा सटिप्पण संस्करण) ,  इन्तशाराते सुखन– तेहरान , १३८८ हिजरी ।

मौलाना, जलालुद्दीन मुहम्मद इब्ने मुहम्मद (सं॰) निकोल्सन ,आर॰ ए॰– मसनवी ए मानवी, हुनरसराये

गूया– तेहरान , १३८९ हिजरी ।

English-

Arberry, A.J. – Tales from Masnavi , George Allen and Unwin LTD, Ruskin House

Museum Street , London – 1961

(Editors) Banani,Amin; Hovannisian,Rechard ; Sabagh, Georges – Poetry and Mysticism in Islam : The Heritage of Rumi , Cambridge University Press – 1994

(Editor) Quasemi, Sharif Husein ; Maulavi Flute ,New age International (P) Limited. Publishers, New Delhi et.c.-1997

Rizvi, Syed Athar Abbas. A History of Sufism in India (Vol.1). Munshiram Manoharlal Publishers Pvt. Ltd. New Delhi. (IVth reprint)2012

Rizvi, Syed Athar Abbas. A History of Sufism in India (Vol.2). Munshiram Manoharlal Publishers Pvt. Ltd. New Delhi. 1983

(ed.)Singh, Abhay Kumar (March 2016) Mithra- The Journal of Indo Iranian Studies. Bareily : Indo Iranian Studies Centre, MJP Rohilkhand University.

Hindi-

(सं॰) अख़्तर, जाँनिसार. हिन्दोस्तां हमारा. हिन्दोस्तानी बुक ट्रस्ट, बम्बई।

तिवारी, रामपूजन. सूफ़ीमत साधना और साहित्य. ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी. सं॰ २०२५

(सं॰) पाठक, शिवनन्दन सहाय. कन्हावत (मलिक मुहम्मद जायसी कृत महाकाव्य). साहित्य भवन प्रा॰ लिमिटेड, इलाहाबाद. १९८१

पाण्डेय, श्याम मनोहर. मध्ययुगीन प्रेमाख्यान.लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद. १९८२

(अनु॰) रिज़वी, सैयिद अतहर अब्बास (संवत् २०१४). हक़ायक़े हिन्दी (मीर अब्दुल वाहिद बिल्ग्रामी). काशी : नागरी प्रचारिणी सभा.

शुक्ल, बलराम. सूफ़ी तुराब के कान्ह कुँवर (शाह तुराब की हिन्दी ठुमरियों की समीक्षा). पुस्तक वार्ता (म॰गा॰ अं॰   हि॰ वि॰ वि॰ वर्धा का प्रकाशन)–नवं॰ दिस॰ २०१५.

सिंह, कन्हैया. हिन्दी सूफ़ी काव्य में हिन्दू संस्कृति का चित्रण और निरूपण. भारती भण्डार, लीडर प्रैस–इलाहाबाद. १९७३

Urdu-

मौलवी, जलालुद्दीन मुहम्मद इब्ने मुहम्मद (अनु॰) हुसैन, काजी सज्जाद ;मसनवी ए मानवी(अनुवाद तथा

    टिप्पणी) ,सबरंग किताबघर, दिल्ली १९७४ ई॰

[1] النَّاسُ عادا مَا جَهِلُوا

[2] यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।(श्रीमद्भगवद्गीता १२–१५)

[3]बर दरे मा,शूक़े मा तर्सन्दगान् रा कार नीस्त–जुम्ले शाहानन्द ईन् जा बन्दगान् रा बार नीस्त– दीवाने शम्स ग़ज़ल सं॰–३९६, बैत सं॰१.

[4]मर्दाने ख़ुदा पर्दा ए पिन्दार दरीदन्द–यानी हमे जा ग़ैरे ख़ुदा यार नदीदन्द। फ़रूग़ी बुस्तामी–ग़ज़लियात, ग़ज़ल सं॰ २२६, बैत सं॰ १

[5]ग़ैरे वाहिद हर चे बीनी आन् बुत–स्त । मस्नवी ए मानवी–६.४७

[6]अन्दर दिले मर्दाने ख़ुदा दर्या ई–स्त। दीवाने शम्स

[7]चून्क यकहा मह्व शुद आनक तु ई । मस्नवी ए मानवी–१.९१

[8] विस्तृत विवेचन–सूफ़ी सिद्धान्त तथा भारतीय दृष्टि– बलराम शुक्ल (अप्रकाशित शोध पत्र)

[9] विस्तृत विवेचन के लिए बत्रा (सं॰ २०२७ : ७०५–७५८)

[10] ‘This multi-layered explanation is a distinctive feature of the entire Persian love poetry where the mundane love certainly beckons to the celestial one. In Sanskrit literature this tendency is totally absent. The nature of mundane love has been taken to be totally different than that of the celestial love = Bhakti. The first one falls in the category of Rasa while the other is Bhava’ From an unpublished paper titled- Kathakautukam : Sanskrit rendering of Yusuf-Zulaykha of Jami, Dr. Balram Shukla.

[11] बत्रा, श्रीनिवास पृ॰ २१०–२११

[12] तु॰ श्रीमद्भागवतम्– तावद्रागादयःस्तेनास्तावत्कारागृहं गृहम्।

तावन्मोहो अङ्घ्रिनिगडो यावत्कृष्ण ते जनाः ॥ (१०.१४.३६)( हे कृष्ण, जब तक हम तुम्हारे नहीं हुए होते हैं, तभी तक  राग–द्वेष हमारे ध्यान को चुरा पाते हैं, घर तभी तक कारागार की तरह हमारे स्वतन्त्रता का हनन करने वाला होता है, अज्ञान तभी तक हमारे पैर की बेड़ी बना रहता है।)

[13] विशुद्धतावाद से प्रदूषित कुछ हिन्दी साहित्य के कुछ आधुनिक विचारक यह मानते हैं कि श्रीकृष्ण का शृङ्गारिक रूप भक्तिकाल की देन है,

तथा उनके इस रूप की प्रतिष्ठा प्रारम्भ में श्रीमद्भागवत तथा बाद में जयदेव आदि अर्वाचीन कवियों के द्वारा हुई। यह धारणा आर्यसमाज

आदि सुधारवादी आन्दोलनों के कारण और अधिक बद्धमूल हो गयी। परन्तु भारतीय साहित्य का अखण्ड रूप से पर्यालोचन करने पर पता

चलता है कि श्रीकृष्ण का ललित रूप कम से कम २००० वर्षों पुराना है। गाथासप्तशती, जिसका समय कुछ विद्वान् कालिदास से भी पहले का

मानते हैं, में राधा तथा कृष्ण के प्रेमपरक गाथाओं को देखने से यह बात स्थापित हो जाती है।

[14]  The Maulavi Flute–१९९७

[15] वैष्णव सम्प्रदायगत हिन्दू नाम है।

[16] बर् आ ऐ शम्से तबरेज़ी ज़ मश्रिक। दीवाने शम्से ग़ज़ल सं॰ २७०७, बैत सं॰ १०

[17] परन्तु अगर कूनिया की अपेक्षा देखा जाये तो तबरीज पूरब में ही है।

[18] विशेष विवेचन–नैतिकता से आध्यात्मिकता की ओर पंचतंत्र और मसनवी ए मानवी, प्रकाश्यमान लेख– बलराम शुक्ल,

[19] Maulana Jalal ud Din Rumi, His times and Relevance to Indian Thought- SAH Abidi; Maulavi flute pp. 214-225

[20] बाँसुरी से सुनो जो कहानी वह कह रही है, वह अपने विरह की शिकायत कर रही है।

[21] “It has been recorded that….. there during the Sama gathering even the Vishnupadas were recited, when it was objected to the Sheikh said to have replied that even Qur’an has the stories of Firaun, Haman and Namrud” S.Z.H. Jafri (March 2016 :13)

[22] हक़ायक़े हिन्दी, प्राक्कथन (हजारी प्रसाद द्विवेदी)

[23] तदेव

[24] इसके समर्थन के लिये बिल्ग्रामी ने मस्नवी उद्धृत की है–

  बुतो तर्साबचे नूरी,स्त ज़ाहिर कि अज़ रू ए बुतान् दारद मज़ाहिर।

    कुनद ऊ जुम्ले दिलहा रा वसाक़ी गही गर्दद मुग़न्नी गाह साक़ी ॥

   (बुत तथा तर्साबचा खुले हुए नूर हैं जो हसीनों के रुख़ से चमकते रहते हैं। यह प्रकाश    

    हृदयों का विश्राम स्थान बन जाता है। कभी गायक बन जाता है और कभी साक़ी।) (वही पृ॰ ७३)

[25] नफ़्से अम्मारा को हम भौतिक प्रवृत्ति के रूप में समझ सकते हैं।

[26] वही

[27] S.Z.H. Jafri (March 2016 :21)

[28] मुल्ला निज़ामुद्दीन अंसारी, मनाक़िबे रज़्ज़ाक़िया, लखनऊ, १३१३ हिजरी, पृष्ठ–१४–१५ (उद्धृत)

[29] तु॰ ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। (ईशोपनिषद् १)

[30] आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते। (हरिवंशपुराण)

[31] ब–नज़्दे आन् कि जानश दर तजल्ला–स्त हमे आलम किताबे हक़ तआला–स्त, वही पृ॰ ७४

[32] पहिले हिन्दुई कत्था कही। पुनि रे काहुँ तुरुक लै कही॥

पुनि हम खोलि अरथ सब कहा। जोग सिंगार बीर रस अहा॥ (कुतुबन–मृगावती छन्द ४२७, सं॰ माताप्रसाद गुप्त)

[33] विस्तृत सूचना के लिये देखें कन्हावत, भूमिका पृ॰ ६८ से ७१।

[34]तुराब – تراب का अर्थ अरबी में मिट्टी होता है ।

[35]राधिका कन्हाई के सुमिरन कौ बहानौ है । (भिखारीदास– रीतिकालीन हिन्दी कवि)

[36]كنت كنزاً مخفياً فاحببت أن أعرف فخلقت الخلق لكي أعرف» हदीसे नबवी

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व्याकरणिक कोटियों का अभिनवकृत दार्शनिक उपयोग[1]

                                                                          -डा. बलराम शुक्ल                  सूत्राम्भसं पदावर्तं पारायणरसातलम्  ।  धातूणादिगणग्राहं ध्यानग्रहबृहत्प्लवम्

धीरैरालोकितप्रान्तं अमेधोभिरसूयितम् । सदोपभुक्तं सर्वाभिरन्यविद्याकरेणुभिः  ॥

नापारयित्वा दुर्गाधममुं व्याकरणार्णवम्। शब्दरत्नं स्वयंगम्यम् अलं कर्तुमयं जनम्[2]

भारतीय ज्ञान परम्परा में असंख्य विद्वानों की शृंखला के मध्य अनेक महान् विद्वान् प्रकाश स्तम्भ की भाँति विद्यमान हैं जिनकी आभा, सहस्राब्दियों का समय बीत जाने के बाद भी; उनके स्थानों में आमूलचूल सामाजिक परिवर्तन हो जाने के बावजूद, मन्द नहीं पड़ सकी है। महर्षि वेदव्यास, आचार्य पाणिनि तथा भगवान् शंकराचार्य के साथ महामाहेश्वर अभिनवगुप्तपादाचार्य ऐसे ही महापुरुषों में से एक हैं। आचार्य पाणिनि सीमान्त प्रान्त के शलातुर ग्राम (सम्भवतः आधुनिक लाहौर) के निवासी थे। उन्होंने अष्टाध्यायी की रचना की जो भारत की सांस्कृतिक एकता की मूल भाषा संस्कृत को ठीक ठीक समझने में हजारों साल तक उपयुक्त होती रही है। लाहौर अब हमारे पास नहीं है लेकिन अष्टाध्यायी अब भी हमें अपनी सांस्कृतिक निधि को सुरक्षित करने में निरन्तर सहयोग कर रही है। अभिनव गुप्त आज से लगभग एक हजार वर्ष पहले कश्मीर में  वर्तमान थे। उन्होंने अद्वैत दर्शन के जिस काश्मीर संस्करण का व्याख्यान किया वह भारत की दार्शनिक स्मृति में अमिट है। उनके द्वारा काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों के बारे दी गयी व्याख्यायें आज तक अन्तिम मानी जा रही हैं। आज शारदादेश कश्मीर का पर्याय नहीं है। भारत की अखण्ड सांस्कृतिक भावना भी वहाँ धूमिल हो रही है, लेकिन वहाँ से उपजे अभिनवगुप्त और उनके सिद्धान्त अब भी अक्षुण्ण हैं। यह दुस्संयोग ही है कि प्रस्तुत पत्र में चर्चा के विषय पाणिनि तथा अभिनव दोनों ही अपनी ज़मीन पर अपदस्थ हो चुके हैं। वहाँ उनको समझने की बात छोड़ दें उनका नामलेवा कोई नहीं रहा। लेकिन फिर भी, राजनैतिक कुचक्र सरस्वतीपुत्रों के माहात्म्य को ऐकान्तिक रूप से समाप्त नहीं कर पाये हैं।

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अभिनवगुप्त शैवदर्शन, तन्त्र तथा काव्यशास्त्र की परम्परा के अपूर्व व्याख्याकार हैं। वे सुदीर्घ कालावधि में फैली चिन्तन परम्पराओं को समग्रता में देखकर समेकित रूप में व्याख्या करते हैं, इसलिए उनके दर्शन एवं तन्त्र से सम्बद्ध ग्रन्थ, टीकाग्रन्थ व स्तोत्र तथा फुटकर काव्य आदि मिलाकर परम्परा की व्याख्या का महावाक्य बनता है (त्रिपाठी २०१६:४)। अभिनव का जो भी अभिनवत्व है वह उनकी व्याख्या का ही है। उन्होंने व्याख्याओं के द्वारा परम्परा को जो योगदान दिया वह मूल ग्रन्थों के प्रणयन से कम नहीं है। उन्होंने अपनी व्याख्याओं से कश्मीर के त्रिक दर्शन को एक समन्वित रूप दिया, नाट्यशास्त्र की महावाक्यात्मक कृति के रूप में सप्रमाण विवेचना प्रस्तुत की (त्रिपाठी २०१६:७), ध्वनि तत्त्व को पुनरुज्जीवित किया तथा वैष्णव आधारकारिकाओं का शैवीकृत रूप परमार्थसार भी प्रस्तुत किया[3]

अपने विशिष्ट व्याख्यान प्रकार में अभिनव ने व्याकरण शास्त्र का अद्भुत तथा अपूर्व उपयोग किया है। व्याकरणशास्त्र सामान्यतः सभी शास्त्रों का उपकारक है इसलिए कोई भी व्याख्या व्याकरण की सहायता के बिना असम्भव है। लेकिन अभिनव के व्याख्या ग्रन्थों में हम व्याकरण शास्त्र की कोटियों का असाधारण उपयोग पाते हैं। प्रकृति तथा प्रत्यय के ज्ञान से शब्द के बाह्य स्वरूप की वास्तविक पहचान हो पाती है तथा इसी कारण किसी भी ग्रन्थ की गुत्थियाँ सुलझाने के लिए टीकाकार व्याकरण की सहायता लेते हैं। लेकिन व्याकरणशास्त्र का उपयोग अभिनव व्याख्येय ग्रन्थ के केवल बाह्य शब्द स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए नहीं करते बल्कि इसका प्रयोग वह अपनी दार्शनिक मान्यताओं के प्रतिपादन तथा स्पष्टीकरण में भी करते हैं। व्याकरण शास्त्र के इस विशिष्ट उपयोग से अभिनव का सम्पूर्ण व्याकरण तन्त्र पर असाधारण अधिकार द्योतित होता है।

अभिनव व्युत्पत्त्यै सर्वशिष्यता[4] तथा बहुभिर्बहु बोद्धव्यं[5] के मूर्तिमान् उदाहरण थे।  ज्ञान के प्रति अपनी प्रगाढ पिपासा के चलते अभिनव ने प्रायः सभी शास्त्रों का अध्ययन उस समय के विद्वानों के पास जाकर किया था। परन्तु व्याकरण शास्त्र तो उनके घर की विद्या थी। व्याकरण के उनके गुरु स्वयं उनके पिता नरसिंह गुप्त (चखुल अथवा चुखुलक) थे जिनसे उन्होंने महाभाष्य का अध्ययन किया था। कश्मीर में पाणिनीय व्याकरण, विशेषतः महाभाष्य के अध्ययन की समृद्ध परम्परा रही है। व्याख्यान के क्रम में अभिनव में नूतन आयामों को प्रकट करने की जो क्षमता दिखायी पड़ती है, उसमें महाभाष्यकार पतञ्जलि का बहुत बड़ा योगदान देखा जा सकता है। उनके नाम के विषय में परम्परा में जो व्याख्यायें मिलती हैं उसमें एक के अनुसार उन्हें महाभाष्यकार पतञ्जलि का अवतार बताया जाता है। अभिनवगुप्तपाद शब्द में गुप्तपाद का अर्थ सर्प अथवा शेषनाग है। इस प्रकार इनके नाम का अर्थ होगा– शेषनाग अर्थात् पतञ्जलि के नवीन अवतार[6]। इस व्याख्या से पता चलता है कि उस समय उनकी प्रसिद्धि एक प्रख्यात वैयाकरण के रूप में थी। जब हम उनके ग्रन्थों का अध्ययन करते हैं तो पदे पदे उनके व्याकरण ज्ञान तथा उसके अपूर्व उपयोग से चकित रह जाते हैं। आगे के पृष्ठों में हम उनके व्याकरण ज्ञान के तत्त्वशास्त्रीय उपयोग के कुछ प्रमुख बिन्दुओं की ओर ध्यान आकृष्ट करेंगे।

अभिनवगुप्त व्याकरण के प्रक्रिया तथा दर्शन दोनों पक्षों से सुपरिचित थे तथा उन्होंने दोनों का अपनी व्याख्याओं में यथास्थान उपयोग किया। व्याख्येय ग्रन्थों के सम्प्रत्ययात्मक बीजशब्दों के दार्शनिक तात्पर्य को स्पष्ट करने के लिए वे उन शब्दों की व्युत्पतियाँ प्रस्तुत करते हैं। सामान्यतः, वे व्याकरण शास्त्र की प्रविधियों का उपयोग करते हुए एक शब्द की अनेकानेक व्युत्पत्तियाँ देते हैं। प्रत्येक व्युत्पत्ति से उनका तात्पर्य उस सम्प्रत्यय विशेष के किसी नये आयाम को सुस्पष्ट करना होता है।

परात्रिंशिका (या परात्रीशिका) ग्रन्थ की अपनी व्याख्या के प्रारम्भ में ही वे देवी शब्द की व्युत्पत्ति के लिए पाणिनि के धातुपाठ में स्थित दिव्[7] धातु के सभी अर्थों को अपने दर्शन के आयाम में घटा कर प्रदर्शित करते हैं। शिवाद्वैत दर्शन के अनुसार शिव प्रकाशात्मक तथा उनकी शक्ति विमर्शात्मिका है। सम्पूर्ण सृष्टि इस प्रकाशात्मा का विमर्श ही है। उपर्युक्त प्रसंग में अभिनव के अनुसार जब परा वाणी, पश्यन्ती तथा मध्यमा के स्वरूप में आकर जब पर संविद् के रूप में स्वयं अपना ही विमर्श करती है तो वह देवी शब्द से कही जाती है–

तत्पश्यन्तीमध्यमात्मिका स्वात्मानमेव वस्तुतः परसंविदात्मकं यदा विमृशति परैव च संविद् देवीत्युच्यते[8]

उसे देवी इस कारण से कहा गया है कि वह देव अर्थात् भैरवनाथ[i] की शक्ति है (भैरवनाथस्यैव देवत्वमिष्यते च्छक्तेरेव भगवत्या देवीरूपता) भैरव अर्थात् सबको व्याप्त करने वाला समष्टि चैतन्य देव इसलिए हैं क्योंकि–

  1. वह पश्यन्ती आदि शक्तियों के माध्यम से बाह्य जगत् की सृष्टि तक अपने विमर्श रूपी आनन्द में क्रीडा करते हैं। (क्रीडा)
  2. विश्व को अतिक्रान्त करने के कारण सबसे उत्कृष्ट स्थिति वाले भगवान् भैरव उसी अवस्था में स्थित रहने की इच्छा से युक्त हैं। (विजिगीषा)
  3. संसार में, जो असंख्य प्रकार के ज्ञान, स्मृति, संशय तथा निश्चय आदि व्यवहार हैं, वह सब वस्तुतः वही करते हैं । (व्यवहार)
  4. बाह्यरूप में भासित जगत् में जगत् के स्वरूप में भासित होने के कारण (द्युति)
  5. उनके प्रकाश के वश में आये हुए उन्मुख सभी लोगों के द्वारा उसकी स्तुति की जाती है। (स्तुति)
  6. अपनी इच्छापूर्वक सभी स्थानों तथा सभी कालों में उनकी गति सम्भव है। (गति)

इसी प्रकार क्रम दर्शन के एक पारिभाषिक शब्द चक्र को उन्होंने चार धातुओं से निष्पन्न बताया है ताकि दार्शनिक दृष्टि से इस शब्द के प्रकार्यों को स्पष्ट किया जा सके[9]

  • यह चमकता है। (कसि विकासे)
  • यह आत्मिक तृप्ति देता है।(चक तृप्तौ)
  • यह बन्धन को काटता है (कृती छेदने)
  • इसमें क्रियाशक्ति है। (डुकृञ् करणे)

वे यह भी दिखाते हैं कि अर्थ के निम्नोक्त आयाम क्रम सम्प्रदाय में किस प्रकार सुसंगत हैं और शरीर में विभिन्न चक्रों पर एकाग्रता के द्वारा इनका साक्षात्कार भी किया जा सकता है। अभिनव अपने अनुभव द्वारा उपार्जित रहस्यों का समर्थन पारम्परिक शास्त्रीय ज्ञान द्वारा करते हैं। इसलिए उनका शास्त्रीयज्ञान पाण्डित्य प्रदर्शन मात्र नही रह जाता। देशपाण्डे (१९९५ ६) का उत्प्रेक्षण है–

उन (अभिनव) के मत में, आध्यात्मिक ज्ञान की पूर्णता क्रमशः तीन अवस्थाओं से प्राप्त                 होती है–गुरुतः, शास्त्रतः, स्वतः, अर्थात् गुरु से, शास्त्र की युक्ति से और स्वानुभव से। अपने निजी अनुभवों के कारण ही अभिनव गुप्त को शिवाद्वय दर्शन का श्रेष्ठतम आचार्य माना जाता है[10][ii]

अभिनव कुल सम्प्रदाय के विविध पक्षों को स्पष्ट करने के लिए कुल शब्द के व्याकरणात्मक व्युत्पत्ति का सहारा लेते हैं। वे इस शब्द को कुल संस्त्याने बन्धुषु च धातु से निष्पन्न करते हैं– कोलति इति कुलम्। इसका अर्थ वे करते हैं – स्थूल–सूक्ष्मपर प्राण–इन्द्रिय–भूत–आदि। क्योंकि वे समूह में रहते हैं तथा उनका कार्यकारण सम्बन्ध होता है[11]

इसी प्रकार कुल सम्प्रदाय एवं प्रत्यभिज्ञा दर्शन के प्रसंग देवी के लिए प्रयुक्त महाभागा के विविध अर्थों को स्पष्ट करने के लिए वे इसके चार अलग अलग विग्रह देते हैं[12] तथा इन विग्रहों द्वारा इस शब्द को त्रिक दर्शन की अवधारणा में सम्मत पराभट्टारिका शक्ति के स्वरूप वर्णन में उपयुक्त करते हैं–

  • महान् भागो यस्याः
  • महान् (शिवः) भागो यस्याः
  • महान् (बुद्ध्यादिः) भागो यस्याः
  • महस्य–सर्वतोऽखण्डितपरिपूर्णनिरर्गलनिरपेक्षस्वातन्त्र्यजगदानन्दमयस्य आ–ईषत् भागाः–सुखांशलक्षणा यतः।

संस्कृत के सभी व्याख्याकार सामान्यतः व्याकरणात्मक व्युत्पत्तियों का उपयोग अपने अपने शास्त्रीय सिद्धान्तों को सुस्पष्ट करने के लिए करते रहे हैं लेकिन अभिनव यहीं तक सीमित नहीं हैं। वे भाषिक प्रयोगों को दार्शनिक तत्त्वमीमांसा की व्याख्या के लिए कुंजी के रूप में प्रयोग करते हैं क्योंकि उनके अनुसार सारे भाषिक प्रयोग इन तत्त्वों के क्रम में ही विकसित हुए हैं–

न तैर्विना भवेच्छब्दो नार्थो नापि चितेर्गतिः॥ (परात्रिंशिका पृ॰८०)

(जड–शक्ति–शिव के त्रिक के बिना शब्द, अर्थ अथवा चेतना की गति सम्भव नहीं है)

परात्रिंशिका के प्रारम्भ में ही देवी शब्द की निरुक्ति प्रदर्शित करने के बाद अभिनव प्रश्न उठाते हैं कि देवी के साथ सामानाधिकरण्य में उवाच क्रिया कैसे संगत हो सकती हैं[13]? त्रिक दर्शन में देवी (शक्ति) चिदात्मक शिव के साथ एकाकार हैं। वह सभी वस्तुओं के हृदय में रहती हैं। वह न केवल प्रत्येक सत्ता में प्रत्यक्षतः अनुभव योग्य हैं अपितु प्रत्येक मानवीय अनुभव की आधार भी हैं। उनके लिए परोक्ष, अनद्यतन[14] भूतकाल के अर्थ में प्रयुक्त उवाच क्रिया कैसे लग सकती है? (काल्पनिकं च अनद्यतनत्वम् अकाल्पनिके संविद्वपुषि कथम्)।  उवाच का अर्थ यहाँ वस्तुतः पप्रच्छ (पूछा) है, इसलिए यह प्रश्न भी उठता है कि ज्ञान तथा चैतन्य की सम्पूर्णता का प्रतिनिधित्व करने वाली देवी को पूछने की आवश्यकता कैसे पड़ सकती है। पूछना एक ऐसी क्रिया है जो ज्ञान की अल्पता के कारण उद्भूत होती है, जो देवी में सम्भव नहीं है। अनेक शैव दार्शनिकों ने विभिन्न ग्रन्थों में इस विचित्र प्रश्न के उत्तर देने के प्रयत्न किये हैं, लेकिन अभिनवगुप्त का समाधान अधिक सूक्ष्म और व्याकरणिकता से युक्त है।

उनके अनुसार देव्युवाच में उवाच पद प्रथम पुरुष का नहीं अपितु उत्तम पुरुष का है। इसका अर्थ है – मैं, जो कि देवी हूँ, उसने पूछा । लेकिन प्रश्न की क्रिया में कर्ता इस तरह से शामिल रहता है कि वह क्रिया उसके लिए परोक्ष नहीं हो सकती, फिर उसके लिए उत्तम पुरुष का प्रयोग सुसंगत नहीं हो सकता। अभिनव के पास इसका व्याकरणिक उपाय है। कात्यायन का एक वार्तिक है जिसके अनुसार लिट् लकार उत्तम पुरुष का प्रयोग वक्ता अपने शयन तथा नशे की स्थिति का वर्णन करते हुए कर सकता है[15]। पतञ्जलि इसमें जोड़ते हैं कि जागृत अवस्था में भी यदि व्यक्ति का मन उस जगह अवस्थित नहीं है तो वहाँ भी लिट् लकार का उत्तम पुरुष में प्रयोग हो सकता है। अभिनव कहते हैं कि देवी उवाच में देवी का तात्पर्य है पश्यन्ती तथा मध्यमा। वे अपने आप के बारे में विमर्श करती हैं– परा वाक् स्वरूपिणी मैंने ही इस प्रकार कहा था पश्यन्ती तथा मध्यमा की स्थिति वहाँ है जहाँ मायिक जगत् की उत्पत्ति प्रारम्भ हो चुकी है। उस धरातल पर स्थित होकर  जब वह परा का परामर्श करती है तो परा को भूत (सामान्य) की तरह मानती है। केवल भेदावभास के द्वारा उज्जीवित होने वाले आन्तरिक तथा बाह्य इन्द्रियों के मार्ग से परे है–परा, इसलिए उसे वे परोक्ष की तरह मानती हैं। अद्यतन की धारणा एक काल्पनिक धारणा है अतः वह अकाल्पनिक परा के विषय में संगत नहीं है, इस कारण वह अनद्यतन भी है। इस प्रकार लिट् लकार के तीनों शर्तों के पूरे हो जाने के कारण यहाँ लिट् लकार उत्तम पुरुष एकवचन का प्रयोग किया गया है। इस प्रसंग में उत्तम पुरुष इसलिए संगत है क्योंकि परा की अवस्था में ज्ञेय वस्तु का नितान्त अभाव रहता है इसलिए वह वक्ता के लिए परोक्ष है[16]। लिट् लकार के ये तीन अभिलक्षण इस प्रसंग में वस्तुतः धात्वर्थ से सम्बद्ध न होकर इसके बहु आयामी तथा समकेन्द्रित कर्ता से सम्बन्धित हैं[17]। इस प्रकार व्याकरण के नियम विशेष का आधार लेकर अभिनव ने यहाँ त्रिक दर्शन की एक बड़ी गुत्थी ही नहीं सुलझायी, बल्कि इस दर्शन में वास्तविकता के विभिन्न स्तरों तथा उनके पारस्परिक सम्बन्धों की भी अच्छी तरह से व्याख्या कर दी।

abhinavagupta

अभिनव ने भाषा के वैखरी रूप के द्वारा सम्बद्ध होने सकने वाले प्रथम, मध्यम तथा उत्तम पुरुष को त्रिक दर्शन के तीन तत्त्वों–नर, शक्ति तथा शिव का वाचक माना है। उनके अनुसार जो केवल जड प्रकाश्य है, जिसे इस दर्शन में नर या अणु भी कहते हैं, वह प्रथम पुरुष का विषय है। उदाहरण के लिए– घटः तिष्ठति (घड़ा पड़ा है) अभिनव इसे अपरा शक्ति का नाम देते हैं[18]। जो वस्तु इदंतया (यह है इस रूप में) भासित होते हुए भी सम्बोधन के योग्य हो,  वह मध्यम पुरुष का विषय होता है। उस वस्तु का इदंभाव, सम्बोधित करने वाले के अहं भाव से आच्छादित हो जाता है। उदाहरण के लिए त्वं तिष्ठसि (तुम स्थित हो) अभिनव इसे शक्ति का परापर स्वरूप कहते हैं। अहं तिष्ठामि (मैं रुकता हूँ।) इत्यादि प्रयोगों में जो स्वतन्त्रता का विमर्श होता है वह शिव की परा शक्ति का विमर्श है जो वस्तुतः शिव से भिन्न नहीं है। शिव सबसे उत्कृष्ट है इसी कारण इसका वाचन करने वाले भाषिक पुरुष को उत्तम पुरुष कहते हैं। अभिनव इस प्रसंग में रोचक रीति से भगवद्गीता का एक श्लोक उद्धृत करते हैं तथा व्याकरण और दर्शन के उत्तम पुरुष की एकता सिद्ध कर देते हैं[19]

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।

अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥ (भगवद्गीता १५.१८)

अभिनव कहते हैं कि स्वयं श्रीकृष्ण ने स्मद् (अहम्) के सामानाधिकरण्य वाले अस्मि का प्रयोग करके अपने को क्षर तथा अक्षर दोनों से उत्तम बताया है, इसलिए यहाँ स्पष्ट है कि उत्तम पुरुष का वाच्य उत्तम शिव ही है। आगे अभिनवगुप्त युष्मद तथा अस्मद् के भाषिक प्रयोग की विशिष्टताओं का दार्शनिक उपयोग करते हैं, अथवा यह कहें कि वे भाषिक प्रयोगों की उपपत्ति दार्शनिक रहस्यों को समझा कर करते हैं। वे बताते हैं कि  वैयाकरणों के निकाय में प्रसिद्ध ‘अलिङ्गे युष्मदस्मदी (अर्थात् युष्मद् तथा अस्मद् में लिङ्ग नहीं होते)’ का कारण क्या है[20]?

अनुत्तर तत्त्व त्रिक दर्शन में भैरववाची है जिससे परे कोई नहीं है। परात्रिंशिका में अभिनव ने इस शब्द की १६ प्रकार से व्याख्या की है[21]।अन्तिम व्याख्या में उन्होंने व्याकरण शास्त्र की सूक्ष्मताओं का सहारा लेकर समझाने का प्रयत्न किया है कि तरप् प्रत्यय का प्रयोग होने पर भी यह शब्द सर्वोत्कृष्ट का वाची कैसे बनता है[22]

अभिनव का दर्शन शिवाद्वैत है। शिव तथा शक्ति परस्पर भिन्न नहीं हैं[23] तथा उनसे सृष्ट जगत् भी उनसे वस्तु भिन्न नहीं है। एक से ही अनेक का आभास हुआ है– एकं वस्तु द्विधा भूतं द्विधा भूतमनेकधा[24] इसलिए इस दर्शन में सिद्धान्त है – सर्वं हि सर्वात्मकम् (सभी वस्तुएँ सभी वस्तुओं की स्वरूप हैं)। अभिनव गुप्त इस सिद्धान्त का उपयोग भाषिक प्रयोगों में होने वाले प्रथम–मध्यम–उत्तम पुरुषों के पारस्परिक व्यत्यय को समझाने में करते हैं[25]। हम देखते हैं कि भाषा में जहाँ प्रथम पुरुष का प्रयोग करना होता है वहाँ मध्यम या उत्तम पुरुष का प्रयोग कर दिया जाता है, तथा इसी तरह अन्यत्र भी होता है। अभिनव कहते हैं यह तो इष्टापत्ति है। इसी से तो प्रकट होता है कि सभी वस्तुएँ सर्वात्मक हैं और एक दूसरे का स्वरूप धारण कर लेती हैं–

  • नर–शक्ति–शिव के त्रिक में तात्त्विक भेद नहीं है इसीलिए तो प्रथम पुरुष के द्वारा उक्त होने वाले नर (जड) के लिए हम मध्यम तथा उत्तम पुरुष का प्रयोग भी देख पाते हैं– जैसे शृणुत ग्रावाणः[26] (ऐ पत्थरो, सुनो) या मेरुः शिखरिणाम् अहम्[27] (पर्वतों के बीच मैं मेरुपर्वत हूँ) इसके साथ ही भाषा में अहं चैत्रो ब्रवीमि (मैं चैत्र बोल रहा हूँ) यह प्रतीतिपूर्वक प्रयोग भी होता है जिसका तात्पर्य है कि अस्मत् का अर्थ शिव जड वस्तु के साथ तादात्म्य प्राप्त करता है।
  • युष्मद् की प्रतीति का विषय शक्ति तत्त्व भी अनेक बार जडात्मकता को प्राप्त करता है। अभिनव का उदाहरण है त्वं गतभयधैर्यशक्तिः (तुम भय तथा धैर्य की शक्ति से रहित हो)[28] इसके अतिरिक्त सम्मानसूचक भवान् शब्द अथवा गुरवः, पादाः इन विशेष शब्दों से द्योतित तो युष्मद् द्वारा बोधित अर्थ (शक्ति) होता है परन्तु इनका प्रयोग प्रथम पुरुष में होता है।
  • भाषिक प्रयोगों में जब हम अपने किसी प्रिय के लिए कहते हैं– प्रिये मैं तुम ही हूँ, तो उसे सम्बोधित करके उसके शरीर से तादात्म्य स्थापित करने के कारण शिव तत्त्व (अस्मदर्थ) ऐसा लगता है कि अपने स्वरूप को छोड़कर जड (इदमर्थ) तथा शक्ति (युष्मदर्थ) की कोटि तक उतर आता है। इसके अलावा, मैं कौन हूँ, यह मैं हूँ, अरे वाह मैं, मुझे धिक्कार है, इत्यादि भाषिक अभिव्यक्तियों में भी अस्मदर्थ (शिव) अपने अप्रतिहत स्वातन्त्र्य को गौण बनाकर इदन्तया प्रतीत होता है। हे मैं इस अभिव्यक्ति में हम देख सकते हैं कि शिव परापर शाक्त (सम्बोधनात्मक युष्मदर्थ) का स्पर्श कर रहा है।

संस्कृत अथवा किसी भी भाषा के प्रयोग में हम देखते हैं कि प्रथम तथा मध्यम पुरुष एक साथ आयें तो मध्यम पुरुष, मध्यम तथा उत्तम एक साथ आयें तो उत्तम पुरुष, तथा सभी एक साथ आयें तो उत्तम पुरुष अवशिष्ट रहता है तथा उसी को द्योतित करने वाली क्रिया का प्रयोग होता है। पाणिनि ने भी एक विशेष प्रविधि से इसकी व्यवस्था दी है[iii]।  अभिनव इस भाषिक परिघटना का दार्शनिक रहस्य बताते हैं–।

एकात्मक होने के कारण परमतत्त्व प्रतिपक्षविहीन होता है। जब वह शक्ति स्वरूप में होता है तब शिव ही उसका प्रतियोगी होता है। एक ही शिवतत्त्व जड रूप में आकर अनेक रूपों में भासित होने लगता है। इसीलिए तो घटः, घटौ तथा घटाः के लिए प्रयुक्त तिष्ठति, तिष्ठतः तथा तिष्ठन्ति क्रियाएँ एक–एक क्रियाएँ ही प्रयुक्त होती हैं। ये क्रियाएँ एक ही शिव तत्त्व की क्रिया शक्ति के द्वारा सम्पादित की जाती हैं[29]

जब नर, शक्ति तथा शिव का एकसाथ परामर्श होता है तो वे बाद बाद वाले के स्वरूप में विलीन हो जाते हैं। इसका कारण यह है कि पूर्व पूर्व वालों (जड तथा शक्ति) का वास्तविक रूप बाद बाद वाला (शक्ति तथा शिव) ही है। इसलिए, स च त्वं च के साथ तिष्ठथः (मध्यम पुरुष) क्रिया का प्रयोग होता है तथा स च त्वं अहं च के साथ  तिष्ठामि (उत्तम पुरुष) की क्रिया का प्रयोग होता है। संस्कृत के वैयाकरणों ने तो इसका अनुशासन किया है, लेकिन पालि, आन्ध्र तथा अन्य द्राविड भाषायें जहाँ व्याकरण नहीं है वहाँ भी इसी प्रकार की भाषिक परिघटना देखी जाती है[30]

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उपर्युक्त प्रकार का अपूर्व शास्त्र–समन्वय हमें अभिनव के यहाँ ही देखने को मिलता है[iv]। अन्यत्र भी वे काव्यशास्त्र के सिद्धान्तों की व्याख्या अपने दार्शनिक चिन्तन के प्रकाश में करते हैं वैसे ही दर्शन को भी काव्य के उदाहरणों से स्पष्ट करते हैं। अनेक स्थलों पर उन्होंने नाटकों से मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति वाले पद्य उद्धृत किये हैं तथा और उनका उपयोग दार्शनिक सूक्ष्मताओं को स्पष्ट करने में किया है (देशपाण्डे १९९५१:४)। व्याकरण तथा दर्शन को तो उन्होंने परस्पर एक दूसरे के यमल के रूप में ही ग्रहण किया है। तोरेला (१९९९ :१३२) ने अभिनव की इस विशेषता के सम्बन्ध में ठीक ही कहा है

“Such a kind of sophisticated operation – to translate grammatical paradigms into

Theological ones, and vice versa- is not new to him. He moves with elegance

and suppleness between two factually different dimensions, nourishing one through

the other  thus pointing, through the liberty of his exegeses, to the unpredictability

of  the paths of supreme consciousness[31].”

भाषा दर्शन में प्रत्यभिज्ञा दार्शनिकों का बहुत बड़ा योगदान है। वे भाषा की विभिन्न अवस्थाओं परा–पश्यन्ती–मध्यमा तथा वैखरी को परमशिव के जागतिक विमर्श की अवस्थाओं के साथ समान्तर तथा पर्याय के रूप में ग्रहण करते हैं अतः उनके मत में परस्पर द्वारा एक दूसरे की व्याख्या स्वाभावतः सम्भव है। अभिनव भाषिक व्यवहार को आन्तरिक वस्तुसत्ता की प्रतीति का सच्चा अनुसरणकर्ता मानते हैं तथा इसी कारण वे वस्तु तत्त्व को परिभाषित करने के लिए भाषिक व्यवहारों तथा उसके व्युत्पादक–व्याकरण शास्त्र का प्रचुर उपयोग करते हैं– वचनक्रमश्च हार्दीमेव प्रतीतिं मूलतोऽनुसरन् तत्प्रतीतिरसरूपतया प्रतीतेरपि एवंरूपत्वमवगमयेत्। (परात्रिंशिका पृ॰ ८०)

 

                            सन्दर्भ ग्रन्थ सूची

                                           मूल ग्रन्थ

परात्रिंशिका अभिनवगुप्तकृततत्त्वविवेकटीकोपेता. (सं॰) मुकुन्दरामशास्त्री. कश्मीर सिरीज आ̆फ़ टेक्स्ट एंड स्टडीज़-18, १९१८,(पुनः॰) अरोमा पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली १९९१.

श्रीमद्भगवद्गीता अभिनवगुप्ताचार्यव्याख्योपेता. (सं॰) वासुदेवलक्ष्मण पणशीकर. (पुनः॰) श्रीलालबहादुरशास्त्रीसंस्कृतविद्यापीठम्. नवदेहली–२००९

परमार्थसारः अभिनवगुप्तपादानाम्.भाष्यकृत् योगराजाचार्यः. श्रीरणवीरकेन्द्रीयसंस्कृतविद्यापीठम्. जम्मूपुरम्. १९८१

Isvarapratyabhijnakarika of Utpaldeva with the Author’s Vrtti, Critical edition and annotated translation by Raffele Torella. Motilal Banarasidass Publishers Private Limited, Delhi. 2002.

Paratrishika (trans) Jaidev Singh. Motilal banarasidas- Delhi

                                               अध्ययन

रस्तोगी, नवजीवन (२०१३) काश्मीर शिवाद्ववाद में प्रमाणचिन्तन. लालभाई दलपतभाई भारतीय संस्कृति विद्यामन्दिर, अहमदाबाद।

देशपाण्डे, ग॰ त्र्य॰ (१९९५) अभिनवगुप्त. (हिन्दी अनु॰) मिथिलेश चतुर्वेदी. साहित्य अकादमी, नई दिल्ली

Torrella, Raffele (1999) “Devī Uvāca”, or Theology of the Perfect Tense. Journal of Indian Philosophy 27: (Pp)129-138.

त्रिपाठी, राधावल्लभ (२०१६) अभिनव हैं अभिनव–दसवीं सदी के सौन्दर्यशास्त्री का संसार. प्रतिमान. सी एस डी एस (प्रकाश्यमान)।

http://www.sanskrit-sanscrito.com.ar/pt_br/escrituras-escrituras-do-trika-par%C4%81tr%C4%AB%C5%9Bik%C4%81vivara%E1%B9%87a-portugues-6/795 (4.07.2016  को देखा गया)

Endnotes–

[1] इस पत्र की विषय वस्तु के लिए मैं प्रो॰ अरिन्दम चक्रवर्ती, आचार्य–दर्शन विभाग, हवाई विश्वविद्यालय; का कृतज्ञ हूँ।

[2] व्याकरणशास्त्र अगाध समुद्र की तरह है जिसे पार किये बिना व्यक्ति शब्द रूपी रत्नों को प्राप्त नहीं कर सकता। इस व्याकरण रूपी समुद्र में सूत्र ही जल है, पद ही भँवर है, पारायण ही इसका धरातल है, धातुपाठ तथा उणादिपाठ आदि मगरमच्छ की तरह हैं, अवधान ही इसे पार करने के लिए बड़ी नाव है, समस्त शास्त्रविद्यारूपी हथिनियों के द्वारा इसका निरन्तर सेवन किया जाता है। धैर्यशाली विद्वान् इसके दूसरे किनारे को देख पाते हैं जबकि धारणा शक्ति से रहित मूर्ख व्यक्ति इससे ईर्ष्या करते रह जाते हैं।                                                                                                                            —-काव्यालंकार (भामह) ६.१–३

[3] आधारं भगवन्तं शिष्यः पप्रच्छ परमार्थम्॥

आधारकारिकाभिस्तं गुरुरभिभाषते स्म तत्सारम्।

कथयत्यभिनवगुप्तः शिवशासनदृष्टियोगेन॥ (परमार्थसार २.३)

[4] विशिष्ट ज्ञान के लिए सबकी शिष्यता स्वीकार कर लेनी चाहिए।

[5] बहुत लोगों से बहुत चीज़ों का ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए। (सभारञ्जनशतक–नीलकण्ठदीक्षित)

[6] देशपाण्डे (१९९९ : २)

[7] दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिगतिषु (धातुपाठ दिवादि १)

[8] परात्रिंशिका पृ॰ ८

[9] देशपाण्डे (१९९५ :१२०)

[10] परात्रिंशिका व्याख्या (पृ॰३७–३८) तथा तन्त्रालोक (२.४९) में अभिनवगुप्त ने इन तीनों साधनों के विकल्प को भी बताया है–

एकवारं प्रमाणेन शास्त्राद् वा गुरुवाक्यतः। ज्ञाते शिवत्वे सर्वस्थे प्रतिपत्त्या दृढात्मना॥

करणेन नास्ति कृत्यं क्वापि भावनयापि वा॥

तथा, तन्त्रालोक–

गुरोर्वाक्याद्युक्तिप्रचयरचनोन्मार्जनवशात् समाश्वासाच्छास्त्रं प्रति समुदिताद्वापि कथितात्।

विलीने शङ्काभ्रे हृदयगगनोद्भासिमहसः प्रभोः सूर्यर्स्येव स्पृशत चरणान् ध्वान्तजयिनः॥

[11] कुलं स्थूलसूक्ष्मपरप्राणेन्द्रियभूतादि समूहात्मतया कार्यकारणभावाच्च। (परात्रिंशिका पृ॰ ३२)

[12] परात्रिंशिका पृ॰ ६६–६९

[13] इस समस्या का सूक्ष्म विवेचन राफ़ेल तोरेला (1999) ने अपने पत्र  “ Devī Uvāca”, or Theology of the

Perfect Tense में कुशलता पूर्वक किया है।

[14] परोक्ष अर्थात् वह क्रिया जो वक्ता ने न देखी हो। अनद्यतन वह क्रिया जो आज न हुई हो।

[15] सुप्तमत्तयोरुत्तमः। महाभाष्य २

[16] एवं भगवती पश्यन्ती मध्यमा च स्वात्मानमेव यदा विमृशति अहमेव परावाग्देवतामयी एवमवोचमिति तदा तेन रूपेणोल्लसन्मायारम्भतया स्वात्मापेक्षतया तन्मायीयभेदानुसारात्तामेव पराभुवं स्वात्ममयीं भूतत्वेनाभिमन्वाना भेदावभासप्राणनान्तर्बहिष्करणपथव्यतिवर्तिनीयत्वात्परोक्षतया…….इत्यनवस्थितं काल्पनिकं चाद्यतनत्वमकाल्पनिके संविद्वपुषि कथमिति न्यायाद्भूतानद्यतनपरोक्षार्थपरिपूरणात्परोक्षोत्तमपुरुषक्रमेण विमृशेद् अहमेव सा परावाग्देवीरूपैव सर्ववाच्यवाचकाविभक्ततयैवमुवाचेति तात्पर्यम्। सुप्तोऽहं किल विललाप इति ह्येवमेवोपपत्तिः। तथाहि — तामतीतामवस्थां न स्मरति प्रागवेद्यत्वादिदानीं पुरुषान्तरकथितमाहात्म्यादतिविलापगानादिक्रियाजनितगद्गदिकादिदेहविक्रियावेशेन वा तदवस्थां चमत्कारात्प्रतिपद्यते नह्यप्रतिपत्तिमात्रमेवैतन्मत्तः सुप्तो वाहं किल विललाप इति मदस्वप्नमूर्छादिषु हि वेद्यविशेषानवगमात्परोक्षत्वं परावस्थायां तु वेद्यविशेषस्याभाव एव — इति केवलमत्र वेदकवेद्यतादात्म्यप्रतिपत्त्या तुर्यरूपत्वान्मदादिषु तु मोहावेशप्राधान्यात् — इतीयान् विशेषः परोक्षता तु समानैव। (परात्रिंशिका पृ॰ ८–९)

[17] “The three features of the perfect do not concern action but its stratified or concentric agent” (Torrella

1999: 134)

[18] मुख्यतया तु विच्छिन्नैव इदन्ता प्रतीयते यत्र भगवत्या अपराया उदयः। (परात्रिंशिका पृ॰ ७८)

[19] नरशक्तिशिवात्मकं हीदं सर्वं त्रिकरूपमेव। तत्र यत् केवलं स्वात्मन्यवस्थितं तत् केवलं जडरूपयोगि मुख्यतया नरात्मकं घटस्तिष्ठतीतिवदेष एव प्रथमपुरुषविषयः शेषः। यत् पुनरिदमित्यपि भासमानं यदामन्त्र्यमाणतया आमन्त्रकाहम्भावसमाच्छादिततद्भिन्नेदम्भावं युष्मच्छब्दव्यपदेश्यं तच्छाक्तं रूपं त्वं तिष्ठसीत्यत्र ह्येष एव युष्मच्छब्दार्थ आमन्त्रणतत्त्वं च। तथाहि यथाहं तिष्ठामि तथैवायमपीति। तस्याप्यस्मद्रूपावच्छिन्नाहम्भावचमत्कारस्वातन्त्र्यमविच्छिन्नाहञ्चमत्कारेणैवाभिमन्वान आमन्त्रयते यथार्थेन मध्यमपुरुषेण व्यपदिशति सेयं हि भगवती परापरा। सर्वथा पुनरविच्छिन्नचमत्कारनिरपेक्षस्वातन्त्र्याहंविमर्शेऽहं तिष्ठामीति पराभट्टारिकोदयो यत्रोत्तमत्वं पुरुषस्य। (परात्रिंशिका ७३–७५)

[20] परात्रिंशिका पृ॰ ७६

[21] तद् व्याख्यातमिदमनुत्तरं षोडशधा। (परात्रिंशिका पृ॰ ३१)

[22] वही पृ॰ २९–३०

[23] शक्तिशक्तिमतोरभेदात्।

[24] एक वस्तु (शिव) दो (शिव–शक्ति) में विभाजित हुआ तथा वही बहुतों (आभासरूप संसार) में प्रकट हुआ। (परात्रिंशिका पृ॰ ७९)

[25] सर्वं हि सर्वात्मकमिति नरात्मानो जडा अपि त्यक्ततत्पूर्वरूपाः शाक्तशैवरूपभाजो भवन्ति — शृणुत ग्रावाणः मेरुः शिखरिणामहं भवाम्यहं चैत्रो ब्रवीमीत्यपि प्रतीतेः। शाक्तमपि युष्मदर्थरूपमपि नरात्मकतां भजत एव शाक्तरूपमुज्झित्वा त्वं गतभयधैर्यशक्तिरित्यनामन्त्रणयोगेनापि प्रतिपत्तेः। भवानित्यनेन पादा गुरव इत्यादिप्रत्ययविशेषैश्चापरावस्थोचितनरात्मकप्रथमपुरुषविषयतयापि प्रतीतिसद्भावात्। त्यक्तशाक्तरूपस्यापि चाहंरूपशिवात्मकत्वमपि स्याद्वयस्ये दयिते त्वमेवाहं भवामीति प्रत्ययात्। शिवस्वरूपमपि चोज्झितचिद्रूपमिव नरशक्त्यात्मकं वपुराविशत्येव। कोऽहमेषोऽहमहो अहं धिग् माम् अहो मह्यमित्यादौ ह्यहमिति गुणीकृत्याविच्छिन्नं स्वातन्त्र्यं मुख्यतया तु विच्छिन्नैवेदन्ता प्रतीयते यत्र भगवत्या अपराया उदयः। हे अहमित्यादौ परापरशाक्तस्पन्दस्पर्श एव शिवस्य। (परात्रिंशिका पृ॰ ७७–७८)

[26] महाभाष्य ३.१.१

[27]भगवद्गीता १०.२३

[28] इस उदाहरण में चूँकि सम्बोधन अभिप्रेत नहीं है इसलिए अभिनव इस युष्मद (त्वम्=तुम) को जड भाव में आपन्न मान रहें हैं।

[29] एकात्मकत्वे ह्यप्रतियोगित्वात् शिवताप्रतियोगिसम्भवे शाक्तत्वमनेकतायां भेद एव नरात्मभाव एकस्यैव घटो घटौ घटा घटपटपाषाणा इत्यपि हि तिष्ठति तिष्ठतस्तिष्ठन्तीति चैकेनैव क्रियाशक्तिस्फुरितमेवैतद्। (परात्रिंशिका ७९)

[30] अत एव नरशक्तिशिवात्मनां युगपदेकत्र परामर्श उत्तरोत्तरस्वरूपानुप्रवेश एव — तस्यैव वस्तुतस्तत्परमार्थरूपत्वात्स च त्वं च तिष्ठथः स च त्वं चाहं च तिष्ठाम इति प्रतीतिक्रम एवाकृतकसंस्कारसारः शाब्दिकैर्लक्षणैरनुगम्यते तथा च निजभाषापदेष्वपि संस्कारस्य यत्र नामापि नावशिष्यते बौद्धान्ध्रद्रविडादिषु तत्राप्ययमेव वाचनिकः क्रमो वचनक्रमश्च हार्दीमेव प्रतीतिं मूलतोऽनुसरन् तत्प्रतीतिरसरूपतया प्रतीतेरप्येवंरूपत्वमवगमयेत्। (परात्रिंशिका पृ॰ ७९–८०)

[31] व्याकरणिक कोटियों का दार्शनिक कोटियों में और दार्शनिक कोटियों का व्याकरणिक कोटियों में अनूदित कर देने का

विशिष्ट व्यापार अभिनव के लिए नया नहीं है।  वे इन दो, सूचनात्मक दृष्टि से भिन्न, आयामों में से सुन्दर सहज रीति से एक से दूसरे का पोषण करते हुए चलते हैं। अनेकशः व्याख्याओं की छूट लेते हुए अभिनव, परम चैतन्य के मार्ग की पूर्वानुमान–भिन्नता को प्रकट करते हैं।

[i] पर्यन्तपञ्चाशिका नामक ग्रन्थ में कुलमत के अनुसार तथा प्रत्यभिज्ञा के विपरीत अभिनव गुप्त ने ३७ तत्त्व गिनाये हैं। सैतीसवाँ तत्त्व उन्होंने भैरव को बताया है जिसे कुल सम्प्रदाय में अनुत्तर भी कहा गया है। …. सर्वाभिव्यापक समष्टि चैतन्य अनुत्तर (परतत्त्व अथवा परा संविद) कहलाता है। (देशपाण्डे १९९५ : १३ एवं २४)

[ii] तुलना करें–

अनपेक्षितगुरुवचना सर्वान् ग्रन्थीन् विभेदयति सम्यक्।

प्रकटयति पररहस्यं विमर्शशक्तिर्निजा जयति॥

(गुरु के वचनों की अपेक्षा किये बिना जो सभी गाँठों को ठीक तरह से खोल कर गम्भीर रहस्यों का उद्घाटन कर देती है वह अपनी विमर्श शक्ति सर्वोत्कृष्ट है। )

[iii] अष्टाध्यायी १.२.७२ त्यदादीनि सर्वैर्नित्यम् सूत्र के अनुसार त्यदादिगण में पढ़े गये शब्द जब वाक्य में किसी भी अन्य के साथ पढ़े जाते हैं तो वे ही शेष बचते हैं बाक़ी लुप्त हो जाते हैं। त्यदादिगण सर्वादिगण के अन्तर्गत पढ़ा गया एक अन्तर्गण है जिसमें त्यद्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस्, एक, द्वि, युष्मद्, अस्मद्, भवतु, किम्, इतने शब्द समाहित होते हैं। इनके शेष बचने का उदाहरण है– रामः च स च = तौ, रामः च स च सा च = ते। अब प्रश्न यह है कि त्यदादि गण के ही शब्द अगर एक साथ पढ़े जायें तो कौन शेष बचे? इस प्रश्न के समाधान के रूप में महाभाष्य में एक वार्तिक आया है त्यदादीनां मिथः सहोक्तौ यत् परं तच्छिष्यते (वार्तिक सं॰ ८०१)। अर्थात्, जब त्यदादिगण में पढ़े गये शब्द एक साथ आ जायें तो उन में जो शब्द गण में बाद में पढ़े गयें हैं वे शेष रहते हैं। उदाहरण के लिए स च यश्च = यौ। प्रथमपुरुष के लिए प्रयुक्त हो सकने वाले जितने भी शब्द हैं युष्मद् सबके बाद है इसलिए इनके साथ युष्मद् शेष रहता है। युष्मद् के भी बाद अस्मद् है इसलिए अस्मद् किसी के साथ भी प्रयुक्त हो शेष बचता है।

[iv] यद्यपि शंकराचार्य ने भी व्याकरण की कोटियों का अनेक स्थानों पर अपने मत को प्रकट करने में उपयोग किया है लकिन इस विषय में उदाहरणों की जितनी प्रचुरता अभिनव गुप्त में है सम्भवतः उतनी अन्य किसी में नहीं। उदाहरणके रूप में प्रस्तुत है भगवद्गीता २.१६ में आये तत्त्वदर्शिनः शब्द की व्याख्या– तदिति सर्वनाम् सर्वं च ब्रह्म तस्य नाम तदिति तद्भावः तत्त्वम् ब्रह्मणो याथात्म्यम्। तत् द्रष्टुं शीलं येषां ते तत्त्वदर्शिनः तैः तत्त्वदर्शिभिः।

सहृदय शास्त्र

पण्डित विद्यानिवास मिश्र आधुनिक युग में भारतीय संस्कृति एवं साहित्य की अखण्डता के अनुपम दिग्दर्शक हैं। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान की पत्रिका का नवीन अंक उनके कर्तृत्व के विभिन्न आयामों पर केन्द्रित है। श्री दयानिधि मिश्र जी द्वारा सम्पादित इस अंक में अनेक महत्त्वपूर्ण लेख हैं।

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पण्डित जी के ‘सहृदय’ तथा ‘रागबोध और रस’ कृतियों को आधार बनाकर मेरे द्वारा प्रस्तुत एक लेख ‘सहृदय शास्त्र’ भी इसमें सम्मिलित है–

पण्डित विद्यानिवास मिश्र के कर्तृत्व के सभी आयामों में समन्वय की निरन्तर तथा सघन अनुभूति होती है। उनमें परम्परा के साथ आधुनिकता, शास्त्र के साथ लोक, कला के साथ वैज्ञानिक दृष्टि की जो दुर्लभ उपस्थिति दिखायी पड़ती है, उसमें यौगपद्य ही नहीं सुसमन्वय भी है। उनके लेखन में प्राप्त इस प्रकार के समन्वय का कारण यह है कि वे परम्परा का अखण्डतया दर्शन कर पाते हैं। परम्परा में कहाँ कहाँ कितने मोड़ और विचलन हैं तथा उन विचलनों के बावजूद उसमें एक अन्तर्निहित अक्षुण्ण सातत्य है, इन सब सूक्ष्मताओं को वे निर्भ्रान्त रूप से जान पाते हैं। परम्परा की सन्धियों की सूक्ष्मता से पहचान कर पाने के कारण ही वे उसके विभिन्न सोपानों में अखण्डता का प्रत्यक्ष कर पाते हैं। आपाततः खण्ड खण्ड दीखने वाले भावों में अनुस्यूत एक तत्त्व का दर्शन कर पाना भगवद्गीता (१८.२०) के अनुसार सात्त्विक बुद्धि का लक्षण है। इस सात्त्विक बुद्धि को मिश्र जी ने सहृदयता के रूप में समझा है तथा उसे एक सामाजिक तैयारी कहा है (मिश्र १९९४:२९)। यह तैयारी वस्तुतः परम्परा को अविकल रूप में समझना है। विभिन्न कालों में प्राप्त परम्परा के विविध रूपों पर श्रद्धा रखते हुए उसके इदमित्थं अवगाहन करने से ही यह सिद्धि प्राप्त हो पाती है। संकुचित दृष्टि तथा पूर्वगृहीत मान्यताओं के चलते परम्परा की किसी भी एक कड़ी के प्रति अनादर अथवा अश्रद्धा वश उसका त्याग वस्तुतः सम्पूर्ण परम्परा से ही हाथ धोना है, क्योंकि सभी सम्भावित कड़ियों की समञ्जस उपस्थिति का नाम ही परम्परा है। एकत्वदृष्टि के विकसित होने के कारण सात्त्विक बुद्धि वाले व्यक्ति में भय अथवा विद्वेष नहीं रह जाता। वह जानता है कि एक ही तत्त्व है जो काल भेद से भिन्न भिन्न रूपों में प्रकट हो रहा है। रूमी के शब्दों में कहें तो ‘वह यार एक ही है पर दूसरों के अलग अलग लिबासों में ज़ाहिर होता है[1]’। इस वास्तविकता को समझकर सात्त्विक बुद्धि किसी का निराकरण नहीं करती। छान्दोग्योपनिषद् के शान्तिमन्त्र में ऋषि ने इसी अनिराकरण के लिए प्रार्थना की हैमाऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोद् अनिराकरणमस्तु अनिराकरणम् मेऽस्तु। यह प्रार्थना बहुत मूल्यवती है– मैं अस्तित्व का निराकरण न करूँ, अस्तित्व मेरा निराकरण न करे। दोनों पक्षों की ओर से अनिराकरण हो–मेरा भी निराकरण न हो। जो अस्तित्व का निराकरण कर देता है, उसका निराकरण स्वयं हो जाता है। परम्परा अथवा समष्टि वस्तुतः व्यष्टि का ही परिवर्धित रूप है अथवा यह कहे कि व्यष्टि उसके अङ्ग की तरह है, इसलिए निराकरण की क्रिया आत्मघात जैसा दुस्साहस है जो अल्पदृष्टि से प्रसूत होता है।

आज का युग अथवा यह कहें कि पण्डित विद्यानिवास मिश्र का युग दुर्योग से अनेक तरह की खण्डित दृष्टियों का युग रहा है। उपनिवेशवाद तथा अन्यान्य कारणों से हमारे समाज के हर वर्ग में अनेक वैचारिक दल उत्पन्न हो गये थे जो परम्परा के किसी न किसी अंश का निराकरण ही करते थे। पारम्परिक विद्वानों के दो दलों में से एक तो आधुनिक कालखण्ड की चिन्तन पद्धति को निराकृत करता था जबकि दूसरा सुधारवादी दल सभी प्रकार के प्रदूषणों का कारण किसी मध्यकाल विशेष को मानता था। नवीन वैदेशिक शिक्षा के उन्माद में कोई वर्ग पूरी भारतीय परम्परा को निरर्थक मानकर केवल वर्तमान को ही अपने त्राण का साधन मानता था, जबकि किसी के लिए भारत में सभ्यता की शुरुआत ही मध्यकाल से नज़र आती थी। ऐसा नहीं है कि ये वर्ग अब सक्रिय नहीं हैं। ये चिन्तनवर्ग अब भी हैं और अनेक बार तो लगता है कि वे और बद्धमूल हो रहे हैं।

पूर्वोक्त सबका समन्वय करने वाली, सब को मान देने वाली फिर भी इन सबसे अलग–विलक्षण एक और दृष्टि रही है। वह है भारत की सभी परम्पराओं को समग्रता में स्वीकार करने वाली दृष्टि। यही दृष्टि भारत की अपनी दृष्टि है। पण्डित विद्यानिवास मिश्र इसी अनिराकरणवादी विचारधारा के उज्ज्वल प्रवक्ता हैं। सम्पूर्ण परम्परा के गहन अध्ययन तथा मनन के फलस्वरूप उपजी अव्यवच्छिन्न स्मृति के कारण उनका सम्पूर्ण लेखन भारतीयता का प्रतिनिधि स्वर बन गया है। याज्ञिकी उपनिषद् के मन्त्र[2] में आये हुए अनिराकरण शब्द की व्याख्या करते हुए पुरुषोत्तमानन्द तीर्थ ने इस शब्द का अर्थ अविस्मृति बताया है। वस्तुतः निराकरण करने का मतलब भूलना ही तो है। इसी कारण से मिश्र जी ने सरस्वती को सहृदय व्यापार की देवता  मानते हुए उसे जातीय स्मृति से अभिन्न माना है (मिश्र१९९४:२९)। परम्परा की निरन्तर स्मृति से हमारा भावबोध सघन होता है तथा हमें सहृदयता की उपलब्धि होती है। यह स्मृति नित्य अभ्यास से सिद्ध होती है। अभ्यास के अभाव में रससामग्री के सामने रहने पर भी, सहृदयता का लाभ नहीं होने के कारण, रसानुभूति नहीं होती। सुन्दरकाण्ड में सीता की खोज के प्रसंग में वाल्मीकि ने इस उपमा का बहुत सुन्दर उपयोग किया है–

तस्य संदिदिहे बुद्धिर्मुहुः सीतां निरीक्ष्य तु।

आम्नायानामयोगेन विद्यां प्रशिथिलामिव॥ ५.१३.३७

(हनुमान् की बुद्धि सीता को सामने देखकर भी सन्देह ग्रस्त हो गयी। जैसे उचित अभ्यास के अभाव में अधीत विद्या भी बुद्धि पर नहीं चढ़ती।  )

इसी पारम्परिक जातीय स्मृति को साहित्यिकों ने वासना, संस्कार तथा वैयाकरणों ने आगम प्रमाण भी कहा है। आगम के अभाव में प्रमाता अपने ही तर्क का अनुसरण करता हुआ कोरा बुद्धिवादी बनकर रह जाता हैं–कियद्वा शक्यमुन्नेतुं स्वतर्कमनुधावता[3] हृदय तत्त्व के निर्माण में सम्पुञ्जित अनुभवों की महती भूमिका है। हृदय तत्त्व का परिचय पण्डित विद्यानिवास मिश्र ने निम्नवत् कराया है–

वह मन नहीं है, वह बुद्धि भी नहीं है, वह मन और बुद्धि को समाविष्ट करने

वाला चैतस तत्त्व है,  अर्थात् उसमें राग द्वेष परिष्कृत रूप में अर्थात् सर्वमयीकृत

रूप में रहते हैं।  उसमें बुद्धि के विविध स्तर भी और संस्कार भी रहते हैं, पर वहाँ

तर्क के स्थान पर अन्तर्ज्ञान रहता है[4]। दूसरे शब्दों में प्रतिभा रहती है, जो सकल

अनुभवों की राशि को सम्पुञ्जित करके विशाल सर्वग्राह्य अनुभव का आकार ग्रहण

करती है (मिश्र १९९४:भूमिका)।

प्रतिभा के उपर्युक्त वर्णन में मिश्र जी के सामने भर्तृहरि के वाक्यकाण्ड में प्रतिपादित प्रतिभा का स्वरूप अवश्य प्रकट रहा होगा, जिसमें भर्तृहरि कहते हैं–

उपश्लेषमिवार्थानां सा करोत्यविचारिता।

सार्वरूप्यमिवापन्ना विषयत्वेन वर्तते ॥ २.१४५ ॥

अस्तु, रसानुभूति सहृदयों को ही हो पाती है[5] और सहृदयता की प्रमुख शर्त है–परम्परा की अविच्छिन्न स्मृति। यदि हम वाल्मीकि की रचनाओं में वेदों की ऋचाओं की अनुगूँज न सुन सकें अथवा कालिदास की कविता में पूर्वोक्त दोनों के दर्शन न कर पायें, या कामायनी में उसके पहले की सभी अनुस्यूत परम्पराओं को पहचान न पायें तो हमारा बोध रस्यता को प्राप्त नहीं हो सकेगा, और बक़ौल मिर्ज़ा ग़ालिब यह खण्ड–दर्शन, बच्चों के तमाशे में पर्यवसित हो रहेगा–

दज्ले में क़तरा दिखायी न दे और जुज़्व में कुल

                                    खेल लड़कों का हुआ दीदः–ए–बीना न हुआ॥

यह अखण्ड दर्शन, यह समन्वयात्मक अनिराकरणवादिता मिश्र जी के सभी लेखनों में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होती है। सहृदय, रागबोध  तथा रस आदि विषयों पर उनके लेखन की विवेचना करते हुए हम उनकी इसी दृष्टि को सर्वत्र व्याप्त देखते हैं।

सहृदय भारतीय रसशास्त्र का एक बहुत महत्त्वपूर्ण तत्त्व है परन्तु परम्परा ने उसकी पर्याप्त चर्चा प्रस्तुत नहीं की है। पण्डित विद्यानिवास मिश्र ने काव्यशास्त्र तथा अन्य स्रोतों से सहृदय तत्त्व से सम्बन्ध रखने वाले बिखरे सूत्रों को एकत्र करके जो दो व्याख्यान दिये हैं उनसे निश्चित रूप से भारतीय रस शास्त्र का महान् उपकार हुआ है। इस पुस्तक का महत्त्व स्वयं उनके शब्दों में इस प्रकार है–

इस छोटी सी पुस्तिका में सहृदय की अवधारणा की न केवल पीठिका

दी गयी है, न केवल वैचारिक और व्यावहारिक पीठिका दी गयी है अपितु

सहृदयता का स्वतन्त्र शास्त्र बिना शास्त्र के दावे के आकारित करने का

प्रयत्न भी हुआ है। (मिश्र १९९४:भूमिका)

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सहृदय से सम्बन्धित विचारों को शास्त्रीयता की भूमि पर आधारित करते हुए भी उन्होंने अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा से उसमें कई जगह अनेक नयी छटायें जोड़ी हैं। उनके अनुसार यह चर्चा शास्त्र से एकदम हटकर नहीं है और शास्त्र से एकदम बँधकर भी नहीं है (वही १५)। इस प्रकार इन व्याख्यानों की प्रतिपादन शैली में भी एक तरह से समन्वय का निर्वाह किया गया है। प्रत्येक युग में शास्त्रों के प्रणयन की शैली यही रही है। शास्त्रकार अपनी पूर्ववर्ती परम्परा को आत्मसात् करके तथा उसे अपनी भावभूमि बनाकर ही कुछ नवीन प्रतिपादन के योग्य हो पाता है– तिष्ठत्येकेन पादेन गच्छत्येकेन बुद्धिमान्[6]। स्थिर तथा देर तक रहने वाला शास्त्रीय विकास इसी प्रकार से सम्भव है।

अपने पहले व्याख्यान में आचार्य मिश्र ने सहृदय तत्त्व की पीठिका के रूप में साहित्य शब्द की ६ व्युत्पत्तियाँ तथा उनके अनुसार साहित्य के विभिन्न अर्थ दिये हैं। साहत्यिक सम्प्रेषण एक अपूर्व कोटि का सम्प्रेषण होता है, जिसका तात्पर्य केवल कहना और समझना मात्र नहीं बल्कि हृदय से हृदय का योग, भावना–तादात्म्य अथवा स्वरूप विमर्श है। साहित्य का अर्थ शब्द तथा अर्थ आदि के सहभाव के साथ साथ कवि तथा सहृदय का समान भूमि पर स्थित रहना भी है। कविता के स्तर पर ये दोनों अपने हृदय की क्षुद्र ग्रन्थियों को बिसरा कर समान अर्थात् सदृश और संवादी हो जाते हैं। कवि तथा सहृदय के इस प्रकार के अपूर्व सम्बन्ध को समझाने तथा उसके समर्थन के लिए आचार्य जी ने ऋग्वेद के वाक् (१०.१२५) तथा ज्ञान (१०.७१) इन दो सूक्तों का भरपूर उपयोग किया है।

सबसे पहले उन्होंने बृहस्पतिसूक्त से सक्तुमिव तितउना पुनन्तः (ऋग्वेद १०.७१.२) मन्त्र को लिया है तथा इसकी प्रकृत प्रसंग के अनुकूल नवीन व्याख्या प्रस्तुत की है। परम्परा में इस मन्त्र के विविध व्याख्यान का लम्बा इतिहास है। यह मन्त्र समन्वय तथा सख्यभाव के प्रतिपादन की दृष्टि से इतना महत्त्वपूर्ण है कि निरुक्तकार यास्क से लेकर महाभाष्यकार पतञ्जलि तक ने इस मन्त्र की अपने अपने प्रसङ्गों के अनुकूल व्याख्या की है।  यास्क इस मन्त्र में स्थित अत्र पद का अर्थ वाणी का विषय मानते हुए एषाम् का अर्थ विद्वान् लेते हैं[7]। पतञ्जलि ने व्याकरण शास्त्र के १३ गौण प्रयोजनों की चर्चा करते हुए इसी मन्त्र को वैयाकरणों के पक्ष में व्याख्यात किया है। उनके अनुसार अत्र का तात्पर्य है व्याकरण शास्त्र तथा एषाम् का अर्थ है वैयाकरण जन[8]। वेद की इस प्रकार की सर्वमुखी व्याख्या परम्परा से लाभ लेते हुए तथा उसमें महत्त्वपूर्ण योगदान देते हुए पण्डित विद्यानिवास मिश्र ने इसी मन्त्र की व्याख्या कवि तथा सहृदय के पक्ष में प्रस्तुत की है। सहृदय तत्त्व की व्याख्या के लिए वेदों से उपोद्बलन प्रस्तुत करके उन्होंने अपने सिद्धान्त के लिए अत्यन्त दृढ भूमि का आधार लिया है। यहाँ उनका शास्त्रकारत्व पक्ष अत्यन्त स्फुट होकर सामने आता है। इस मन्त्र के रस प्रक्रिया से सम्बन्धित अर्थ की भूमिका उन्होंने निम्नवत् प्रस्तुत की है–

इस मन्त्र में एक साथ भाषा और साहित्य के चरम प्रयोजन के रूप में

सख्य की पहचान की प्रतिष्ठापना की गयी है। सखा–सखी का अर्थ है

कहीं न कहीं मानसिक स्तर पर जुड़ने वाला। सख्य और कुछ नहीं,

आभ्यन्तर संवाद है। मनुष्य को वाणी मिली ही है इसलिए कि वह

आभ्यन्तर संवाद स्थापित कर सके। (मिश्र१९९४:२१)

उन्होंने सूक्तगत सखायः शब्द का अर्थ साफ़ साफ़ शब्दों में सहृदय लिया है (मिश्र१९९४:२१)। इसी बृहस्पति सूक्त के एक अन्य मन्त्र की प्रकृतोपयोगी व्याख्या करने के अनन्तर वे सम्पूर्ण वाक् सूक्त को सार्थ उद्धृत करते हैं। उन्होंने साहित्यशास्त्रियों द्वारा कृति–कृती–कृतिज्ञ इस त्रिपुटी के प्रतिपादन में इसी सूक्त को मूल माना है। वह वाक् अर्थात् सरस्वती का तत्त्व ही है जो एक साथ कवि भी है और सहृदय भी, स्रष्टा भी है और भावक भी (वही २४)। उपर्युक्त सूक्तों का विश्लेषण करके उन्होंने सहृदय की तीन विशेषताएँ बताई हैं (मिश्र१९९४:२७)–

  • पर्युत्सुक अर्थात् सबके साथ साझेदारी की उमंग से भरा हुआ। यह अर्थ उन्होंने सखा (ऋग्वेद १०.७१.२) शब्द से लिया है। सखा शब्द के मूल में सच् धातु है जिसका अर्थ होता है समवेत होना[9]
  • अपूर्वानुभव सम्पन्न अर्थात् परिचित शब्दों तथा अर्थों के होने के बावजूद उनसे व्यञ्जित होने वाले काव्यात्मक भावों को समझ लेने की क्षमता वाला। यह अर्थ उन्होंने वाक्सूक्त के दूसरे मन्त्र के आधार पर काव्य प्रक्रिया को मीमांसाशास्त्र सम्मत यज्ञीय अपूर्व के साथ मिलाकर प्राप्त किया। इसके बारे में आगे चर्चा की जायेगी।
  • अभ्यस्त अर्थात् काव्यार्थ की प्रक्रिया के सम्बन्ध में विशेष प्रशिक्षण से सम्पन्न। यह अर्थ उन्होंने बृहस्पति सूक्त के उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे (ऋग्वेद १०.७१.४) आदि मन्त्र के आधार पर ग्रहण किया है।

इसके अतिरिक्त उन्होंने अथर्ववेद ६.६४ को उद्धृत करते हुए सामञ्जस्य को भी सहृदयता के लिए आवश्यक तत्त्व माना है। सहृदय के लिए आवश्यक है कि उसका हृदय कृति तथा कवि के साथ सामञ्जस्य पूर्ण तथा समान हो। समानता का अर्थ  सबका मिलकर सहभागी होना तथा तत्सुखसुखित्व है। इसका आधार है मन का मन से मिलना तथा हृदय का स्वेच्छा से विवश हो जाना (मिश्र१९९४:२८)।

द्वितीय व्याख्यान में आचार्य मिश्र ने हृदय संवाद और रसनिष्पत्ति में सहृदय के योगदान को स्पष्ट किया है। उनके अनुसार सहृदय में काल, देश की सीमाओं को अतिक्रान्त करने की योग्यता होनी चाहिए। यह योग्यता पर्युत्सुकीभाव है। पर्युत्सुकीभाव एक ऐसी उत्सुकता है जो अन्य सभी भावों को परिप्लुत कर देती है। सहृदय काव्य के सतही अर्थ तक सिमट कर परितुष्ट नहीं होता। यह अपरितोष की निरन्तरता ही उसके सामने घण्टानुरणन की तरह आते हुए व्यंग्यार्थ की परत परत खोल कर रख देती है। अगर वह सतही अर्थों पर ही सीमित हो जाये तो उसे अन्यान्य अर्थ प्राप्त न हों।

कवि तथा सहृदय में परस्पर सामञ्जस्य की अपेक्षा होती है। कृति के माध्यम से कवि के हृदय तक पहुँचने की शर्त केवल सहृदय के लिए ही नहीं होती। जिस प्रकार एक सम्प्रेषणात्मक कृत्य की सफलता श्रोता की अनुकूलता की अपेक्षा करती है उसी प्रकार रचयिता की रचना की पूर्णता के लिए शर्त है कि वह सहृदय के हृदय के साथ संवाद करे। आचार्य मिश्र ने इस संवाद को बहुत बहुत विशद रीति से समझाया है। उनके अनुसार इसका तात्पर्य एकरूपता नहीं बल्कि इस तरह निकट दीखना है कि बार बार देखने और एकत्व के अनुसन्धान की आकांक्षा बनी रहे  (मिश्र१९९४:३८)। सहृदय वह प्रमाता है जिसके हृदय में कवि धड़कता है। कवि की रिक्तता जिसमें पूरी होती है। वह कवि का सातत्य होता है। दोनों के बीच संवाद का स्वरूप यह होता है कि–उसकी किसी रिक्तता की पूर्ति मुझमें हो रही है , मेरी अस्मिता की पूर्ति उससे हो रही है जो मेरे लिए धड़क रहा है (मिश्र२००३:३९)। इस तरह का संवाद कैसे संभव हो पाता है जो देश और काल सभी के खाइयों को पाट दे? मिश्र जी के अनुसार सहृदय और कवि के बीच रचना सेतु अथवा अन्तराल है। यह अन्तराल ही दोनों को एक दूसरे को समझने का, देखने का अवसर देता है।

सहृदय हृदय संवाद रचना के पूर्ण होने की शर्त है और यह पूर्णता एकाग्रता से प्राप्त होती है। एकाग्रता को समझाते हुए आचार्यश्री ने कहा है कि पूर्वानुभूत समस्त उपयोगी विषयों के साथ कवि की एकात्मता को एकाग्रता कहते हैं। इसी के फलस्वरूप कवि के सामने सभी काव्यक्षम शब्द हाथ बाँधे चले आते हैं तथा एक भाव के अनेकानेक आयाम प्रकट होते हैं, जैसा कि रुद्रट ने कहा है–मनसि सदा सुसमाधिनि विस्फुरणमनेकधाऽभिधेयस्य[10] यह वस्तुतः वही सघन स्मृति है जिसकी शुरुआत में चर्चा की गयी है। सहज भाव से सुख और दुःख को पहचानने को  हृदय के साथ संवाद माना गया है। इस सहज भाव को प्राप्त करना कठिनतम सिद्धि है इसी कारण हृदय संवाद को दुःसाध्य वस्तु माना गया है (मिश्र१९९४:३६)। इसके लिए दोनों को तीव्र अभ्यास योग की आवश्यकता होती है, कारक (कवि) को भी और भावक (सहृदय) को भी।

सहृदय के सन्दर्भ को समाप्त कर आचार्य मिश्र उसे और स्पष्टता देने के लिए रस की प्रक्रिया पर चर्चा की है। परन्तु इस चर्चा में उन्होंने पुनरावर्तित शब्दों या तर्कों का आश्रय न लेते हुए रस सिद्धान्त के कई ऐसे अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला है जिनका संकेत तो परम्परा ने किया था परन्तु विशदीकरण आज तक नहीं हो सका था। इस प्रकरण में जिन प्रसंगों का उपयोग किया गया है वे काव्यशास्त्र से बाहर के भी हैं। इस प्रकरण से भी आचार्य मिश्र का तीर्थकारित्व सिद्ध होता है। रस सिद्धान्त को समझाने के लिए मिश्र जी ने जिस अद्भुत सामग्री का प्रयोग किया है वह है यज्ञीय प्रक्रिया की व्याख्या में मीमांसकों द्वारा उपयुक्त अपूर्व का सिद्धान्त।

मीमांसको की दार्शनिक पद्धति में कर्म का इतना अधिक महत्त्व है कि वे ईश्वर को भी शुभाशुभफल प्रदाता के रूप में स्वीकार नहीं करते। उनके अनुसार कर्म करने के बाद उससे अपूर्व नामक शक्ति उत्पन्न होती है। यह अपूर्व हमारी आत्मा के साथ संश्लिष्ट हो जाता है तथा शुभ और शुभ अशुभ फलों तक कर्म के सातत्य को सुनिश्चित करता है। यज्ञ पहले सम्पन्न हो जाता है और उसका फल विलम्ब से मिलता है, ‍ऐसी स्थिति में हम उसी कर्मविशेष का यह फलविशेष है यह कैसे कहा जा सकता है, इस समस्या के समाधान करने के लिए मीमांसकों को इसकी आवश्यकता पड़ी। अपूर्व वह तत्त्व है जो कर्म तथा फल दोनों बीच रहकर कर्मचक्र की अटूट सततता को नियत करता है–अपूर्वं क्रियाजन्यकालान्तरभाविफलाव्यवहितपूर्वस्थम्[11]  फल तो कर्म से ही मिलता है लेकिन अपूर्व उन दोनों के बीच द्वार (मीडयम) का कार्य करता है[12]। यह तो हुआ अपूर्व का स्वरूप। लेकिन पण्डित जी ने अपूर्व के जिस आयाम की समानता रस प्रक्रिया के साथ देखी है, वह है– पूर्व दृष्ट तथा पूर्व ज्ञात वस्तुओं से अपूर्व अर्थात् कुछ नवीन, प्रत्यग्र तथा अनदेखे की प्राप्ति।  उन्हीं के शब्दों को उद्धृत करें–

…प्रत्येक यज्ञानुष्ठान से कुछ अपूर्व मिलता है, यज्ञ में मन्त्र वही रहते हैं, वही होता अध्वर्यु उद्गाता

रहते हैं, पूर्वविहित वही क्रम रहता है, तब भी अपूर्व कैसे प्राप्त होता है…….कुछ वैसा यहाँ भी होता

है। वही वस्तु, वे ही अभिनेता, वे ही नाट्य मुद्रायें, वे ही आहार्य, वे ही वाद्य–गीत के प्रकार

…. तो भी बार बार नया बार बार अपूर्व अपूर्व कुछ क्यों मिलता है? गहराई से मीमांसा करें

तो लगेगा पूर्वज्ञात से अपूर्व की सिद्धि में ही तो रस है। (मिश्र१९९४:३९)

बार बार दुहराये जाने पर भी नयेपन की अनुभूति ही उच्चकोटि की रचना की सही कसौटी है। प्रिय वस्तु में पुनरुक्ति नहीं होती[13]। क्योंकि इसमें रस शामिल होता है। रस के अनुभव में परत्व की सीमाएँ टूट जाती हैं। तुच्छ ममत्व भी नहीं रहता। इस रस का अनुभव हम अपने स्वरूप के अनुभव की तरह अभिन्न प्रकार से करते हैं[14]। और उपनिषदों ने यह बहुत साफ़ साफ़ समझा दिया है कि व्यक्ति अपने से ही प्रेम करता है[15]। डर और द्वेष की सम्भावना तो किसी दूसरे के उपस्थित रहने पर ही हो सकती है[16]। यह अपूर्वता ही रस प्रक्रिया का सबसे बड़ा अभिलक्षण है। रस प्रक्रिया में साधारणीकरण व्यापार के द्वारा क्षुद्रता समाप्त होकर अखण्डता का अनुभव किया जाता है। अखण्डता में पुनरुक्ति का अनुभव भला कैसे हो सकता है? उस स्थिति में तो अन्य कोई भी विशेष अनुभव प्रमाता के पास नहीं आता। आचार्य मिश्र के मन्तव्य के अनुसार अपूर्व तथा रस के बीच उपर्युक्त उपमानोपमेय को हम निम्नवत् दिखा सकते हैं–

यज्ञसम्भार →           अपूर्व →         स्वर्ग

काव्यसामग्री →          रस →           काव्यास्वाद

आचार्य मिश्र ने दोनों प्रक्रियाओं में केवल सादृश्य मात्र नहीं दिखाया है बल्कि उन्होंने संकेत दिया है कि रस की की इस प्रक्रिया की व्याख्या पद्धति का मूल यह याज्ञिक अपूर्व ही है। उनके इस प्रतिपादन को भारतीय काव्यशास्त्र के विकास में एक नई कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए। विचार करने पर इस प्रतिपादन की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार प्रकट होती हैं–

  • कविता की व्याख्या में अपूर्व शब्द निश्चित रूप से उन्होंने अभिनव गुप्त से लिया है। अभिनव गुप्त का अपूर्वं यद् वस्तु प्रथयति विना कारणकलां [17]आदि श्लोक उनको बहुत प्रिय है, जिसमें अपूर्व शब्द आया हुआ है। लेकिन इस श्लोक अपूर्व का मतलब अलौकिक अथवा अद्भुत ही है। इस अपूर्व को मीमांसकों के पारिभाषिक अपूर्व शब्द से मिलाकर देखना आचार्य मिश्र का मौलिक अवदान है। एक बार जब अपूर्व को पारिभाषिक मान लिया गया तो उन्हें इस पारिभाषिक शब्द से सम्बन्धित तमाम अवधारणाओं का अपनी व्याख्या में उपयोग करने का लाभ मिल गया और उन्होंने किया भी।
  • अपूर्व शब्द को मीमांसीय अपूर्व के साथ जोड़ने में उनकी सहायता उस भारतीय दृष्टि ने की है जो सम्पूर्ण अस्तित्व को यज्ञ के रूप में देखती है। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त से लेकर बृहदारण्यक आदि उपनिषदों में भोजन से लेकर मैथुन तक फैले कार्यमात्र को यज्ञीय शब्दावली में देखने का प्रयत्न किया गया है। भारतीय विचारकों को यज्ञ भावना इतनी प्रिय क्यों है? इसका उत्तर सम्भवतः हमें पाणिनि में मिल सके। पाणिनि ने पहचाना है कि यज्ञ के मूल में जो यज् धातु है उसके तीन अर्थ हैं–क) देवपूजा, ख) संगतिकरण तथा ग) दान[18]। सभी श्रेष्ठ कार्यों में संगतिकरण अर्थात् मिल जुल कर कार्य की निर्वृत्ति तथा दान अर्थात् स्व का उत्सर्ग, ये भावनायें अवश्य रहती हैं। इसीलिए कहा गया है – यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म[19]। श्रीकृष्ण ने यज्ञ के दायरे को पर्याप्त विस्तृत किया तथा उसके भौतिक स्वरूप की अपेक्षा आध्यात्मिक स्वरूप को श्रेष्ठ मानकर सभी कर्मों को यज्ञ की भावना से करने का उपदेश किया तथा ऐसा नहीं करने पर बन्धन के भय से आगाह किया–यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः[20]।  उनके अनुसार सृष्टिकर्ता ने सृष्टि के समय ही प्रजाओं को यज्ञ के साथ उत्पन्न किया ताकि उनका अस्तित्व सुचारु रूप से बना रहे[21]। ऐसे में रस तत्त्व को यज्ञीय प्रक्रिया के साथ जोड़कर उन्होंने परम्परा का निर्वाह तो किया ही साथ ही साथ रस तत्त्व के साथ श्रेष्ठता तथा समादर के भाव को और भी द्विर्बद्ध किया।
  • नाटक को यज्ञ के रूप में देखने की अवधारणा हमें कालिदास के विक्रमोर्वशीयम् में मिलती है। कालिदास ने इस धारणा को प्राचीन मुनियों से उद्धृत किया है– देवानामिदमामनन्ति मुनयः शान्तं क्रतुं चाक्षुषं[22], जिससे पता चलता है कि यह सादृश्य दर्शन अत्यन्त प्राचीन है। आचार्य मिश्र का इस सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण योगदान यह है कि उन्होंने इस यज्ञीय रूपक को केवल नाट्य तक सीमित नहीं रहने दिया बल्कि उसकी व्याप्ति काव्यमात्र तक मानी। यह परिघटना ऐसी ही है जैसे बहुत पहले नाट्य के प्रसंग में सीमित रस तत्त्व को आलंकारिकों ने काव्य मात्र में प्रयोज्य माना था। परम्परा के छूटे अंशों का इस प्रकार का विस्तार आचार्य मिश्र जैसा परम्परा में अवगाढ व्यक्तित्व ही कर सकता था।

रस स्वरूप का विमर्श करते हुए आचार्य मिश्र ने इसे अपनी क्षुद्र सीमाओं का विस्तार कहा है। इसीलिए उन्होंने रस को सकल होने–अखण्ड होने का की प्रवणता कहा है। “रस विशेषीकृत राग–द्वेषादि विकारों का एक ऐसा संस्कार है जो दुःखप्रद या सुखप्रद नहीं होता, वह दुःख–सुख को सर्वमय बनाकर एक ऐसे संवेदन में रूपान्तरित कर देता है, जिसमें अपनी अस्मिता खो नहीं जाती विस्मृत हो जाती है, जातीय वासना बन जाती है। यह बनना ही रस है” (मिश्र१९९४:४२)।

सहृदय तथा रस के सम्बन्ध में आचार्य मिश्र के मौलिक विचारों पर विचार के बाद उनकी प्रतिपादन शैली के कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा रुचिकर होगी।

आचार्य मिश्र की स्थापनाएँ महत्त्वपूर्ण होते हुए भी किसी बड़ी मौलिकता के दावे से रहित तथा मृदु एवं गम्भीर हैं। इससे उनके व्यक्तित्व की गम्भीरता तथा विनम्रता द्योतित होती है। परम्परा की अपूर्ण समझ के कारण चिन्तन में आयी एकाङ्गिता और विद्रूपता को उन्होंने स्थान स्थान पर पहचाना है तथा उसका स्पष्ट शब्दों में कारण निर्देश पूर्वक खण्डन किया है। इस खण्डन में उन्होंने सर्वत्र समन्वय का पक्ष ही लिया है। उन्हें कल्याण का अतिशुद्धतावाद तथा आधुनिक चिन्तकों के द्वारा परम्परा का विकृत प्रस्तुतिकरण दोनों समान रूप से अनिष्ट हैं, क्योंकि ये दोनों पक्ष एकाङ्गी हैं और एकाङ्गी पक्ष से परम्परा का सौन्दर्य नष्ट होता है। स्थान–स्थान पर उन्होंने परम्परा का विरूपण करने वालों की ख़बर ली है। एक दो उदाहरण इस प्रसंग में पर्याप्त होंगे।

पाश्चात्त्य आलोचकों को भारतीय कलाकृतियों की समग्रता भीड़ लगने लगती हैं। आचार्य जी ने इसका कारण उनके असमग्र दर्शन को बताया है। उनके अनुसार वे लोग पदार्थों के खण्ड खण्ड करके गिनने लगते हैं, उनमें विद्यमान सम्बद्धता के सौन्दर्य को नहीं देख पाते। भारतीय रूप इतना निखार अपने परिवेश की सजग चिन्ता से प्राप्त कर पाता है (मिश्र१९९४:१५ तथा २००३:२९)। इसी तरह उन्होंने उन आलोचकों का खण्डन किया है जिन्होंने अधूरी जीवन दृष्टि और शुचिवादिता के कुसंस्कार के कारण प्राचीन संस्कृत साहित्य को अवज्ञा भाव से ऐन्द्रियक अथवा एरोटिक काव्य कहा है। इस प्रसंग में उन्होंने शृंगार की उदात्तता को इन शब्दों में कहा है– “बन्धुता की चरम अभिव्यक्ति है शृंगार..। शृंगार भावों का ईश्वर है, उसमें एक विशेष प्रकार का सुख है। अपने को अनुकूल लगने वाला सुख छोटा सुख है। बड़ा सुख वह है जिसको हम प्यार करते हैं, उसको जो अच्छा लगता है वह हमको भी अच्छा लगता है।….शृंगार जिन दो बातों पर टिका होता है, वे हैं प्रिय के सुख से सुखी होना और प्रिय के ऊपर अटूट विश्वास होना” (मिश्र१९९४:२४ तथा २००३:४२)। सहृदयता के विषय में उनका कथन है कि यह न तो न कविता के शौक़ से आता है, न ज़िन्दगी में तमाशबीन बनने से आता है और न ही नैतिकता के प्रति सजगता से आता है। यह तो भीतर से भीगने से आता है (मिश्र१९९४:२४)।

असहमति के प्रत्येक स्थल पर अपूर्ण चन्तनों के खण्डन के साथ उन्होंने समन्वित भारतीय दृष्टि को भी प्रतिस्थापित किया है। कला कला के लिए है अथवा कला समाज के लिए, आधुनिक चिन्तन धारा में यह विवाद गर्मागर्म बहस का विषय है। आचार्य मिश्र ने इस चिन्तन को जीवन के प्रति अपूर्ण दृष्टि का परिणाम बताया है–दुर्भाग्यवश आधुनिक समय में पूरी तरह से संपृक्त होने के बावजूद हमारे जैसे लोग परम्परा की धारा से जुड़े होने के कारण किनारे वालों की मानसिकता पर तरस ही खाते हैं (मिश्र२००३:४८) उनके मत में तो मानव शुभ की आकांक्षा में अकुलायी धार में कला और जीवन के अस्तित्व ऐसे ही हैं जैसे जल और तरंग के अस्तित्व होते हैं। कहीं कहीं आधुनिक आलोचकों पर वे तीखा व्यंग्य भी करते हैं– …हृदय सबके भीतर होता है, सहृदय बनने की तैयारी सब जगह नहीं होती। आज कल के ज़माने में तो और नहीं होती(मिश्र१९९४:४४)। अन्यत्र उन्होंने पश्चिमी आलोचकम्मन्यों पर टिप्पणी करते हुए कहा है– इन्हें आलोचक कहना ग़लत होगा, बहुत कम के पास लोचन हैं, उन्हें कहना चाहिए–साहित्य का इतिवृत्त लेखक (मिश्र१९९४:२५)।

“सम्पत्तियों के समान वितरण” जैसे आन्दोलनों से भरे इस युग में उन्होंने चेताया है कि हमारी संस्कृति में समानता का भाव “इक्वल डिस्ट्रीब्यूशन” तक ही सीमित नहीं है– समानता का अर्थ बराबरी नहीं है, अलग–अलग हिस्से का बटवारा भी नहीं है, उसका अर्थ सब मिलकर सहभागी होना है, दूसरे के द्वारा उपभोग को और उसकी परितृप्ति को अपना उपभोग और अपनी परितृप्ति मानना है। इस समानता का आधार है मन से मन का मिलना(मिश्र१९९४:२८)।

आचार्य जी के लेखन अथवा भाषण के क्षण में सम्पूर्ण परम्परा उनकी गहन स्मृति में एकक्षणावच्छेदेन सन्निहित रहती है। विषयों के सम्बन्ध में उनके कथन शास्त्र तथा अनुभव दोनों से पुष्ट होते हैं। अनेक बार शास्त्रकारों की भाँति उनके वाक्य सूत्रात्मक हो जाते हैं, जिनकी व्याख्या कुछ सीमा तक वे स्वयं करते हैं। उनके सूत्रात्मक वाक्य स्वल्पाक्षर में विषय को पूर्णतः परिभाषित कर देते हैं। सूत्रात्मक सूक्तियों के कुछ उदाहरण निम्नवत् हैं– •सहज होना ही सबसे कठिन है, •रस कुछ और नहीं, सकल होने की, अखण्ड होने की प्रवणता है, •सहृदय होता है कवि का नैरन्तर्य , • यह विस्थापन यज्ञ की भाषा में आनुष्ठानिक मृत्यु है, • त्रिभङ्ग ही सौन्दर्य है, आदि आदि।

नवीन दृष्टियाँ विकसित करने के अतिरिक्त शास्त्रकारों का एक कार्य और होता है। और वह है परम्परा के बीज सम्प्रत्ययों पर समय के प्रवाह के कारण पड़ी धूल को झाड़ पोछ कर उनके वास्तविक स्वरूप को प्रकट करना। निरुक्तशास्त्र, व्याकरण आगम तथा आधुनिक भाषा विज्ञान के एक साथ पण्डित होने के कारण तथा परम्परा की गहरी अन्तर्दृष्टि रखने के कारण पण्डित विद्यानिवास मिश्र ने संस्कृति की कई बीज शब्दों के धुँधले पड़ गये तत्त्वों को प्रकट किया है। उदाहरण के लिए, कला शब्द के कोशगत अर्थ– खण्ड को लेकर सौन्दर्यशास्त्रीय व्याख्यान (वही, पृ॰ १५), अथवा सरस्वती के सम्बन्ध में उनकी दृष्टि (वही पृ॰ २९ तथा २००३:३१)। समान को अस् धातु का वर्तमानकालिक आत्मनेपदी कृदन्तरूप स्वीकार करना उनको व्याकरण शास्त्र का अद्भुत प्रयोक्ता सिद्ध करता है[23]। इसी प्रकार उनका श्रद् तथा हृद् को एक ही शब्द के दो रूप मानते हुए (वही पृ॰ २९) वे निरुक्त शास्त्रियों की शैली का आश्रय लेते हैं। अंग्रेज़ी का लव़ शब्द संस्कृत के प्रेम के समकक्ष नहीं हो सकता, इसके लिए वे भाषावैज्ञानिक दृष्टि का आश्रय लेते हुए लव़ को संस्कृत के √लुभ् धातु से सम्बद्ध मानते हैं (वही पृ॰३१)।

परम्परा का इस प्रकार अखण्ड तथा अगाध अवगाहन करके पण्डित विद्यानिवास मिश्र ने उसे सम्यक् रूप से समझने में, प्रस्तुत करने में तथा अनेकानेक समुज्ज्वल रत्नों को प्राप्त करने में जो सफलता प्राप्त की है वह निश्चित रूप से असामान्य है। नदी पर बने पुलों पर चढ़ कर गुज़रने वाले नदी की गम्भीरता का ठीक ठीक अनुमान नहीं कर सकते। उसके लिए तो नदी का तलस्पर्शी अवगाहन करना अनिवार्य होता है। संस्कृत के प्राचीन कवि मुरारि मिश्र ने इस सम्बन्ध में बहुत सुन्दर बात कही है– समुद्र तो वानरों ने भी पार किया लेकिन उसकी गम्भीरता का सही अनुमान तो केवल मन्दराचल पर्वत को है जो उसके तल तक जल में पैठ पाया[24]। अथवा एक अर्वाचीन कवि नरेश सक्सेना के शब्दों में इसी भाव को दुहरायें–

पुल पार करने से

पुल पार होता है

नदी पार नहीं होती

नदी पार नहीं होती नदी में धँसे बिना

नदी में धँसे बिना

पुल का अर्थ भी समझ में नहीं आता

नदी में धँसे बिना

पुल पार करने से

पुल पार नहीं होता

सिर्फ़ लोहा लंगड़ पार होता है

कुछ भी नहीं होता पार

नदी में धँसे बिना

न पुल पार होता है

न नदी पार होती

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         संक्षिप्त सन्दर्भ

पण्डित विद्यानिवास मिश्र की रचनाएँ

मिश्र, विद्यानिवास.(१९९४). सहृदय. नई दिल्ली : साहित्य अकादमी.

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(सं॰, व्या॰) मिश्र, विद्यानिवास.(२००५). श्रीगीतगोविन्दम् व्याख्यानटीकासमन्वितम्. वाराणसी : संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालयः.

मिश्र, विद्यानिवास.(२०००). तुम चन्दन हम पानी. नयी दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस.

(सं॰) मिश्र, गिरीश्वर.(२०१६). विद्यानिवास मिश्र रचना संचयन. नयी दिल्ली : साहित्य अकादमी.

Misra, Vidyaniwas. (2001). The Descriptive Technique of Panini : An Introduction. Varanasi : Ratna Publication

                                  अन्य सामग्री

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[1] हर दम ब लिबासे दिगरान् यार बरामद। (यद्यपि इस शे,र को कुछ लोग रूमी का न मानकर प्रक्षिप्त स्वीकार करते हैं)

[2]नमो ब्रह्मणे धारणं मे अस्त्वनिराकरणं धारयिता भूयासं

कर्णयोः श्रुतं मा च्योढ्वं ममामुष्य ओम्॥ २.९। इस उपनिषद् को महानारायण अथवा नारायण उपनिषद् के नाम से भी जाना जाता है।

[3] वाक्यपदीय वाक्यकाण्ड ४८९

[4]  तुलना करें जलालुद्दीन रूमी– ज़ीरकी बफ़रूशो हैरानी बख़र। ज़ीरकी ज़न अस्तो हैरानी नज़र॥ (बेच दो अपनी तर्क बुद्धि    

  को और ख़रीद लो हैरानी। क्योंकि तुम्हारी तर्क बुद्धि तुम्हारी तुम्हारा भ्रम है और हैरानी तुम्हारी नज़र है।)

[5] सवासनानां सभ्यानां रसस्यास्वादनं भवेत्। निर्वासनास्तु रङ्गान्तः काष्ठकुड्याश्मसन्निभाः॥ (साहित्यदर्पणः ३.८ पर धर्मदत्त के नाम से उद्धृत)

[6] बुद्धिमान् व्यक्ति एक पैर स्थिर रखता है तथा दूसरे से गति करता है।

[7] निरुक्तम् अध्याय४. पाद २. खण्ड १०

[8] महाभाष्यम् प्रथमाह्निकम्

[9] षच समवाये– पाणिनीय धातुपाठ, भ्वादि ९९७.

[10] काव्यालङ्कारः १.१५

[11] सर्वलक्षणसंग्रहः, पृ॰ १७

[12] “अपूर्वम् (यागेन फलप्राप्तौ द्वारम्) A Potency produced by Yāga that leads to its result. A link between Yāga and Svarga.” प्रकरणपञ्चिका– Glossary of Technical Words, P.463

[13] पिये जणे णत्थि पुणरुत्तं। (गाथासप्तशती)

[14] स्वाकारवदभिन्नत्वेनायामास्वाद्यते रसः। (साहित्यदर्पणः ३) पण्डितराज जगन्नाथ ने तो आवरणों से रहित प्रत्यक् चैतन्य को ही रस कह दिया है–…..भग्नावरणा चिदेव रसः।

[15] आत्मनस्तु कामाय सर्वः प्रियो भवति। बृहदारण्यकोपनिषद्

[16] द्वितीयाद्वै भयं भवति।

[17] ध्वन्यालोकलोचन प्रथम उद्योत १

[18] यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु। भ्वादि १००२

[19] शतपथ ब्राह्मण १.७.१.१५

[20] श्रीमद्भगवद्गीता ३.९

[21] श्रीमद्भगवद्गीता ३.१०–११

[22] विक्रमोर्वशीयम् १

[23] ध्यातव्य है कि समान शब्द को सामान्यतया सम्+आ+√नी धातु से अथवा सम्+√अन् धातु से निष्पन्न किया जाता है। (देखिए वाचस्पत्यम् पृ॰ ५२३२)

[24] अब्धिर्लङ्घित एव वानर भटैः किन्त्वस्य गम्भीरतामापातालनिग्नपीवरतनुर्जानाति मन्थाचलः। (अनर्घराघव–१)

A long awaited and much needed volume titled “Contribution of Woman to Sanskrit, Pali and Prakrit Literature” got published from Gandhinagar Gujarat. The book being a Felicitation Volume of Prof. Hansaben Hindocha has been edited by Sh. Manibhai Prajapati. It contains many valuable essays and research papers on Women writers and scholars of ancient and modern India.

shambhavi

This volume also includes my paper on a great grammarian of our time Prof. Pushpa Dikshit Ji. She is a poet par excellence and this paper deals with her lyrical poetry “ShambhavI”. An abridged version of this paper had appeared in “Sanskrit Pratibha” Sahitya Akademi. Here is the complete version of the same-

pushpa

 

                                  ॥शाम्भव्याः कथ्यं शिल्पं च॥

पर्यालोचनायै प्रकृतं शाम्भवीनाम काव्यं श्रीमत्या पुष्पादीक्षितया विरचितं प्रत्यग्रतमं गीतिकाव्यम्। पाणिनीयव्याकरणे सर्वतोमुखीं नवीनां वैज्ञानिकीं दृष्टिमेषा उद्भासितवतीति सर्वत्रापि पण्डितसमुदायेऽत्यन्तमादृतेति नास्ति संस्तावावश्यकता मनागप्यस्याः। मध्यप्रदेशस्य जाबालिपुरे (जबलपुरे) प्राणाचार्याणां पण्डितसुन्दरलालशुक्लानां गेहे १९४२ तमे ऐशवीये  लब्धजन्मान एता पितुरेव प्रारम्भिकं संस्कृतमध्यैषत।जाबालिपुरविश्वविद्यालयत एवैताभिः सस्वर्णपदकं प्रथमश्रेण्यां स्नातकोत्तरपरीक्षोत्तीर्णा। विद्यावारिध्युपाधिञ्च रानीदुर्गावतीविश्वविद्यालयादधिगत्य मध्यप्रदेशशासनस्य उच्चशिक्षाविभागे स्थित्वा शासकीयकन्यास्नातकोत्तरमहाविद्यालयादिषु ३९ वर्षाण्यध्यजीगपन्। एतर्हि च सेवानिवृताः सत्त्योऽहर्निशं विविधविधाभिः संस्कृतं सेवमाना विद्यन्ते।पाणिनीयव्याकरणं नवीनरीत्या व्याचक्षाण आसां ग्रन्थराशिः एतासां कीर्तिं चतुर्षु दिक्षु तनोतितराम्। चतुर्षु खण्डेषु अष्टाध्यायीसहजबोधेन पाणिनीयप्रक्रियां सम्यक्प्रदर्श्य शास्त्रीयशैल्या एतां नवीनां पद्धतिं स्थापयितुं दीक्षितमहाभागा नव्यसिद्धान्तकौमुद्याः कतिचन भागान् रचयितुं दीक्षिता दृश्यन्ते। येषु खलु पञ्च भागाः प्रकाशितचरा अपि। तत्र व्याकरणस्य गहनतमा अद्यावधि अव्याख्याता स्वरतद्धितप्रभृतयो विषया निश्चप्रचं ग्रन्थ्युद्ग्रन्थनपुरस्सरं अवगमिताः। काव्यक्षेत्रेऽपि समुज्ज्वलया सोर्ज्जया च कवितया एताः संस्कृतसामाजिकेषु भूयसा प्रशस्ता। अद्य यावदेतासां अग्निशिखा शाम्भवी इत्यभिधौ काव्यसंग्रहौ प्रकाशितौ। एताभिः शङ्करदेशिकसन्दृब्धायाः सौन्दर्यलहर्याः, पूर्णचन्द्रशास्त्रिरचितस्य अपराजितवधूनाम्नश्च महाकाव्यस्य हिन्दीभाषयानुवादो विहितः। दीक्षितमहाशया न केवलं स्वलेखन्या नैजविचारान् समाजे प्रसारयितुं यततेऽपितु कर्मयोगपूतैः स्वकर्मभिरप्यहर्निशं संस्कृतसंस्कृत्योः सेवने निरन्तरं निरताः सन्ति। छत्तीसगढ़प्रदेशे नैकेषां संस्कृतविद्यालयानां स्थापना आभिः कृता। निखिलेऽपि भारते वर्षे स्थाने स्थाने व्याकरणस्य शाला एताभिः समायोज्यन्ते। एतेषां गृहे विलासपुरस्थे तु आवर्षं संस्कृतजिज्ञासुच्छात्राणां वासो भवति। सम्प्रति पाणिनीयशोधसंस्थानस्यैता आध्यक्ष्यं वहन्ति। एतानि विशिष्टकार्याणि सम्भावयता २००४ तमे वर्षे एताभ्यः भारतीयगणतन्त्रस्य राष्ट्रपतिना विशिष्टसम्मानः प्रदत्तः। महामहोपाध्यायादिसम्मानना अन्याश्च भूयांसः उपाधयोऽपि समये समये आभिरलंकृताः।

अधुना एतासां काव्यगुणान् सामान्यतया पर्यालोच्य शाम्भवी–सङ्कलनं वयं चर्चिष्यामहे।

संस्कृतकविताया नैकसहस्राब्दव्यापकं साहित्यं कालकलनां तर्जयदिव नैरन्तर्यैण प्रवहति। यस्मिन् साहित्ये श्रुतिः कदाचिदाविरभूत् उपनिषद उपनिषत्कृता रामायणरामणीयकमुदभूत् भगवद्गीता गीता तस्मिन्नेवैतर्हि अपि कविगणा निरन्तरम् अविच्छिन्नतया कवयन्ति। सत्यपि अविच्छेदे साहित्यस्य भिद्यत एव प्रतियुगं प्रतिकवि च साहितीपरिदृश्यं– यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तत इति सिद्धान्तितत्वात्[1]।यथा स्वधुरि बम्भ्रम्यमाणापि पृथ्वी सूर्यमपि प्रकारान्तरेण परिक्राम्यति तथैव आत्मनोऽनुभवान् सस्वरां कुर्वन्नपि कविः लोकदशामपि सुनिपुणं वर्णयति। वस्तुतः कविः स्वानुभववर्णने तथा अवितथः मार्मिकश्च भवति यथा तस्य कथ्यानि लोके सर्वैरपि आत्मनीनतया स्वीक्रियन्ते। यद्यपि कविरेकः प्रजापतिः स्वतन्त्रः काव्यजगत् स्रष्टुं तथापि तत्रापि लोकः कस्मिंश्चिदंशे तं नियमयति एव। लोकातिवर्तने अप्रयुक्तत्वदोष[2]प्रसक्तेः। कान्तासम्मिततयोपदेशकः कविः लोकमेव कृतार्थयितुमीहते। एवम्प्रकारेण कविः लोकाद् अर्थान् गृहीत्वा लोकायैवार्पयति। केवलं स्वीयाया अलौकिकप्रतिभायाः संस्पर्शेन तान् नवनवान् रसप्रवणांश्चमधुमास इव द्रुमान् विधाय। प्रतियुगं समाजप्रवाहानुगुणमेव रचयति कविः। तदैव काव्यस्य सर्वजनसंवेद्यत्वसम्भवः। संवेद्यत्वसामान्ये एव लोकशिक्षणसामर्थ्यं काव्यस्य। एवमद्भुतं कविकर्म न नितान्तं लोकविभिन्नम् न च एकान्ततया लोकसम्भिन्नम्। आद्ये दुर्बोधत्वम् द्वितीये पुनः इतिहासादिप्रसङ्गः कथ्यस्य प्रसजतः।

सुदूरं परिवर्तिते वर्तमानयुगे नवीनस्य लोकस्य नवीनाः एव भूयस्यः समस्याः प्रादुर्भूताः। यासामपनोदनाय नवीनैव काचित् प्रखरा शैली अपेक्षिता भवति। सा च युगप्रवणा शैली आधुनिकसंस्कृतकविभिः सृष्टा सुनिपुणं ससाफल्यं च प्रयुक्ता अपि। सैव शैली अस्माभिः दीक्षितमहाशयासु दरीदृश्यते। यस्यां नवीना शब्दसंघटना, नवीनो भावबोधः, नवीनानि च्छन्दांसि प्रखरता च अपूर्वा सर्वत्र राराज्यते।

दीक्षितमहाशयाया वर्तते काव्यद्वयं– प्रथमा अग्निशिखा द्वितीया च शाम्भवी। वस्तुतः एते कवयित्र्याः वैयक्तिकसामाजिकभावबोधयोः क्रमेण प्रातिनिध्यं विधत्तः। विप्रलम्भशृङ्गाररसस्य या मर्मस्पृग् वर्णना अग्निशिखायामुपलभ्यते सा संस्कृतसाहित्येऽधुनावधि कयाचित् कवयित्र्या न घटिता प्रायेण। तव नामाक्षराणि, तव वीतदये हृदये, मम वामनवृत्तिरियं, कोणमेकं देहि मे इत्यादयः कविताः रचयित्र्याः प्रत्यक्षतः हृदयान्निःसरन्त्य इव प्रतीयन्ते।

अग्निशिखायां संस्थिता व्यष्टिमात्रविषयिणी वेदना शाम्भवी–संग्रहे समष्टितया परिणता । समाजे दुर्घट्यमानानि सर्वप्रकारकाणि पतनानि  लक्ष्यीकृत्य रचयित्र्याः स्वान्तःस्था घनीभूता वेदना काव्यतया निर्गलितेव दृश्यते। मनोवेदना मे विरामं न याति इति कविता एतस्याः प्रमुखं निदर्शनम्। अनेकशतवर्षैः सततं परिपोषितायाः भारतीयपरम्पराया विनाशाय धूमकेतुभूतायाः पश्चिमभूमीभवायाः संस्कृतेः उत्तराधरप्रभावा एतां क्षणमपि स्थातुं न ददति। तेषु दुष्प्रभावेषु विद्यन्ते सामाजिकविषमताः, यूनां स्वच्छन्दचारित्वं, अशनायापीडितानां चीत्कृतयः, प्रदूषिता शासनव्यवस्था, विदुषां च नैरन्तर्येण ह्रासः। देशं भुञ्जानानां दुष्टप्रशासकानां दुर्दृश्यमेकमत्र दरीदृश्यताम्–

त्रिलोकीं निगीर्यापि तुष्यन्ति नो ये तदीये करे लोकपोषस्य भारः।

अनाथाः प्रजाः यद् रुदन्तीति दृष्ट्वा मनोवेदना मे विरामं न याति[3]

शाम्भव्यामनेकशः प्राश्निकशैल्या स्वीया विचारा अनया प्रकटिताः। सर्वे एते प्रश्ना अस्मान् चिन्तनाय विवशयन्ति यदेतस्मिन् जगति अस्माकं जीवनस्य किमुद्देश्यं परिशिष्टम्। गोवधस्य सन्दर्भे कवयित्र्याः मानसं समर्यादामस्मत्संस्कृतिं  शस्त्रपराहतां दृष्ट्वा समाकुलं जायते। ब्रूहि कोऽस्मिन् युगे कालिदासायते इत्यभिधे काव्ये स्वीये अनुयुङ्क्ते सा–

क्षीणदुग्धा विवत्सा बुभुक्षाकुला साश्रुनेत्रा गवाशैर्विकृष्टा मुहुः।

गा नदन्तीः समुत्प्रेक्ष्य शृङ्गाटके बन्धनच्छेदनैः को नु गोपायते[4]

महतां पुण्यानां परीपाकभूतमिदं यद्भारते जन्म । परन्तु एतद् गर्वास्पदं वस्तु स्वीयया वाचा महता कण्ठेन केऽधुना वर्तन्ते ये ख्यापने वाचालाः सन्ति?

महापुण्येन जातं जन्म येषां भारते वर्षे।इमं दर्पं स्ववाचा तेषु विख्यातुं यतन्ते के[5]?॥

संवेदनाराहित्यस्य परां काष्ठा द्योतयन्ती सा ब्रूते–

यदा सीमासु रक्तै रञ्जिता वीरा विहन्यन्ते।तदा ये गीतवादित्रेषु रज्यन्ते जनास्ते के[6]

एतादृशा अनेके प्रश्ना विद्यन्ते ये गीतिकाव्यानां सार्थकतायै नवीनं कलेवरं विश्राणयन्ति।

इति शोचति भारतभूमिरिय[7]मिति कविता सुदीर्घा तोटकच्छन्दसि निबद्धा । अत्र अर्वाचीनसमाजस्य दुरवस्थानां चित्रणं निपुणं कृतम्। समस्तजनताहितावहं वर्णाश्रमं धर्मं विप्लावितं वीक्ष्य तस्या मनः दूयते कविताश्च एताः समुत्पद्यन्ते। विद्यार्थिनां प्रथमाश्रमवासिनां विसङ्गतावस्थायाश्चित्रणं दृश्यताम्–

समिदाहरणाय समाकुलिता असुभिर्गुरुभिर्बहुधा तुलिताः।

न मनोरथमत्तगजाकुलिता अनवाप्तिशुचापि न ये लुलिताः।

वटवः पटवो मम कुत्र गता इति शोचति भारतभूमिरियम्॥

स्त्री वेदेषु पुरन्ध्री शब्देन गीयतेतराम्। तयैव धार्यते कुटुम्बं समाजश्च। तस्याम् उत्पथप्रवृत्तायां समाजः राष्ट्रं च रसातलं यातः।स्त्रीणां दुरवस्थायाश्चित्रमेकं प्रस्तूयते तया गृहीतम्–

गृहिणीस्तनपानपरं शिशुमप्यपहाय धनार्जनकार्यरता।

ऋजुता समता न नतिर्न धृतिर्नहि सा रमणीषु मनोरमता॥

अवसादपरा गृहकार्यविधौ बहिरेत्य समाजकृते निरता।

वनिता क्व गता गृहधर्मपरा इति शोचति भारतभूमिरियम्॥

कलहायमानाभ्यां दम्पतीभ्यां वस्तुतः शिशवः पीड्यन्ते–

जननीजनकौ कलहे निपुणौ शिशवः क्व नु यान्तु दुराधिवृताः।

उच्छिन्ने वर्णधर्मे शास्त्राणि लुप्यन्ते येन मठमन्दिराणि धर्मध्वजिनां कुचक्राणां केन्द्राणि जायन्ते–

जना धर्मे रता पाखण्डकूपे दर्दुरायन्ते– समूलं सस्वरं वेदार्थमाख्यातुं यतन्ते के ।

अन्यत्रापि – प्रवृद्धा धर्मदेष्टारो यथा वर्षासु मण्डूकाः इत्यादि।

शास्त्राणि एव शक्नुवन्ति रक्षितुं परम्परामिति दीक्षितमहाशयायाः परमाशयः। तेषां सर्वदिक्कं विनाशं दृष्ट्वा तेषां विलापः काव्ये सर्वत्र दरीदृश्यते–

समारूढाश्चलच्चित्ता युवानः पानमत्ताश्चेत्।

रुदन्तः शास्त्रसम्भाराः कथं रक्षां प्रकुर्वीरन्[8]

जानीमश्च वयं यदेष न केवलमासीत् रोदनमात्रम्। हार्दिकदुःखादुत्थितया करुणया सहैव एताः शास्त्ररक्षणेऽपि यथा महतोत्साहेन रताः सन्तिसामाजिकजीवने तेन दृढीक्रियते सूक्तिरेषा– मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनामिति।

शासका एव धर्मप्रतिष्ठापका भवन्ति। तैः स्वकीयेन धर्ममयेनाचरितेन समाजः शिक्षयितव्यः येन लोकाः सच्चरित्रा भवेयुः। यथा महामतिश्चाणक्यस्य मतम्–राज्ञि धर्मिणि धर्मिष्ठाः पापे पापाः खले खलाः।राजधर्मानुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः[9]।परन्तु अद्यतने समाजे अधार्मिकैरेव दुःशासनैः शासकैः सर्वनाशस्थितिरुत्पादितास्ति–

क्व नृपाः प्रजया पितृतुल्यमताः इति शोचति भारतभूमिरियम्।

आधुनिकी तथाकथिता शिक्षापि नैतिकं पतनं रोद्धुं न प्रभवतीति कवयित्र्या वाग्बाणानां शरव्यभूता जातास्ति–ऋषिज्ञानं व्युदस्य व्यायता शिक्षापिशाचीयम्।

महति जनसम्मर्देऽपि य एकाकितादंशः वर्तते स आधुनिकयुगस्य विडम्बनास्ति। पारस्परिकसंवेदनाभाव एतस्य कुफलम्। एतस्याः काव्ये मर्मस्पृक् चित्रणमेतस्य प्राप्यते तत्र तत्र–किं करोमि मदीयगेहे कोऽपि मां नहि परिचिनोति।तथा च–न सूपे सम्प्लुता दर्वी रसं सूपस्य जानीते। वसन् लोके व्यथां लोकस्य नो जानाति लोकोऽयम्॥कुटुम्बानां विखण्डनं, तत्र ज्ञातीनां मध्ये अविश्वासोत्पन्नं महद् वैमनस्यं शाम्भव्याः गहनचिन्तास्वन्यतमा–इयं सन्दृश्यते दन्दह्यमानज्ञातिधूमा दिक्। स्वपक्षान् कर्तयित्वा व्योमगामी तेभिलाषोऽयम्। तत्र कारणं प्रेम्णः अवमानना–जने प्रेमप्लुते ताटस्थ्यमाबध्नाति लोकोऽयम्। अथ च

तिरस्कृत्य स्वबन्धूनां गणं वाक्यैः प्रतोदाभैः। प्रभूणां सारमेयं मोदकैः प्रीणाति लोकोऽयम्[10]

स्वतन्त्रता या हुतात्मभिः प्राणान् पणीकृत्य लब्धा तस्योपभोगं गृध्नवोअयोग्या यत् कुर्वन्ति तत् लेखिकायाः हृदयं व्यथयितुमलं अनेकशश्च अनेकैश्च बिम्बैस्तेषामनुवर्णनं प्राप्यते काव्ये–

मया खातं सरः क्लेशादिमे नक्रा विगाहन्ते। श्रमं स्वीयं वृथा जानन् जनः शून्यप्रभो जातः॥

यथाकालं मयोप्तं बीजमन्यो लोलवीत्येषः। क्षुधार्तां बन्धुतां पश्यन् जनः शून्यप्रभो जातः[11]॥(जनः शून्यप्रभो जातः)। किं करोमि इति सम्पूर्णापि कविता एतमेव वञ्चितत्वभावं नितरां प्रकटीकुरुते–

पालितो बहुलालितो विनियोजितो गृहरक्षणे यः। बहुतिथे काले गते स द्वारशुनकस्त्वंकरोति॥

अथवा– मदीयेनान्धसा पुष्टा मदीयप्राङ्गणे जुष्टा। बलिं ध्वाङ्क्षा मुषित्वा मामपाकर्तुं समीहन्ते॥

अपूज्यानां पूजा पूज्यानां च व्यतिक्रमः उभयमपि हृदयशल्यमिव अद्यत्वे प्रवर्तमानं तया भूयः चित्रितम्–

“अकारं नो इकारं नो उकारं नैव जानन्ति। तथाप्युच्चैः पुरस्कारैः प्रशस्यन्ते नरास्ते के”॥ (नरास्ते के)

विदुषां वंशधराणामविद्वत्त्वम् शास्त्रसंरक्षिकायास्तस्याः चिन्ताविषयः – “स्फुटन्ति यस्य कण्ठमाप्य सर्वशास्त्रफक्किकाः। अहो तदात्मजा जडा भवन्ति केन हेतुना[12]?”॥

आधुनिकतायाः दुष्परीणामाः यथा किंकर्तव्यविमूढता, असन्तोषः, भयं इत्यादीनि काव्येष्वेतेषां यत्र तत्र स्थितिमन्ति सन्ति।एताः सामाजिकविरूपताः कवयित्र्या क्वचिदभिधया क्वचिद् व्यञ्जनया  अन्योक्त्या काव्यक्षमैः प्रतीकैश्च प्रदर्शिताः।

न केवलं शुष्कदुःखप्रदर्शनं काव्येऽत्र अपितु काव्यमाध्यमेन जनजागरणं विधाय एतदुन्मूलनायापि दृढपरिकारा वर्तन्त एताः। अत एव काव्येषु एतस्याः न केवलं समस्यानां परिगणनमात्रं विहितं अपितु समाधाना अपि तत्र प्रदत्ताः। यतन्ते के इति काव्ये भूयसां ज्वलतां प्रश्नानामुत्थापनपुरस्सरं तया अन्ते प्रश्नोत्तरशैल्या उत्तरमपि प्रस्तुतम्- “ततं नाडीषु येषां राष्ट्रभक्तानामसृक् शुद्धम्। यतन्ते ते यतन्ते ते यतन्ते ते यतन्ते ते”॥

तया इष्टं यद् देशस्य युवानः पाश्चात्त्यसंस्कृतितिमिरान्तरायनाशाय सूर्यवद् भासन्तामिति– “निलीना भारतीया संस्कृतिर्यत् पश्चिमध्वान्ते। तदुद्धाराय खे मार्तण्डवत् भातुं यतन्ते के”?॥

ऋषिप्रणीतोऽध्यात्मिको मार्गस्तस्या मते सर्वासामपि समस्यानां समाधायकः वर्तते इति–“सर्वभूते यदा स्वाकृतिर्दृश्यते सर्वदुःखे यदा स्वव्यथा भुज्यते”।तथा च– “व्यापकं सर्वधीसाक्षितत्त्वं तदा चक्षुषोरग्रतो हन्त कृष्णायते”॥

कवयित्री जानीते यदेतेषां औत्तराधर्याणां सर्वेषां बीजं किम्। सा न केवलं बाह्यानि लक्षणानि दृष्ट्वा समाजरोगस्य स्वकल्पितानि निदानानि प्रस्तौति अपितु तत्तत्समस्यानां मूलमवगाह्य भाषते सा। स्वकीयकाव्यबीजं विवृण्वती सा शाम्भव्याः प्राक्कथने आन्तराभिधे वक्ति- “एतद्(–जीवरूपचिदानन्दकला–) विज्ञानमेवास्ति सूत्रं येन विकीर्णमिदं जगत् पिनद्धुं शक्यते। इदन्तु मानुष एव काये सम्भवति। किन्त्वनादिवासनाक्लिन्नचेता अयं नानायोनिषु बम्भ्रमितोऽप्यत्र बम्भ्रमीतीति दर्शं दर्शं चेखिद्यते मे चेतः। एतदेवास्ति कवित्वबीजं मम कवितायाः॥”[13] इति।  सर्वेषु अपि जीवेषु परमेश्वरस्य आत्मनः चित्कलाया दर्शनेन एकत्वदर्शनेन इति यावत् जगतः सर्वासामपि समस्यानां समाधानमिति ब्रुवन्त्या कवयित्र्या चिरन्तनं समाधानं प्रादायि यदासीत् पूर्वतनैः ऋषिभिर्निदर्शितम्–“तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः[14]”। सा प्रार्थयति–“जातिसम्प्रदायमप्युपेक्ष्यतां सखे आत्मवज्जनेषु किं न दृश्यतां सखे”। “विश्वमित्थमेकमेव दृश्यतां सखे भ्रान्तधारणाधुना विभिद्यतां सखे”[15]

इतिवत् तत्तत्तत्त्वानां कणेहत्य निन्दां कुर्वाणा वस्तुतः सा आधुनिकस्य सर्वविधस्य पतनस्य कारणानि प्रदर्शयितुमीहतेजनेषु च स्वकवितामाध्यमेन संवेदनशीलतां उद्भावयितुमिच्छति येन देशस्य प्रकृता दुरवस्था नश्येत् देशः स्वोचितामवस्थां च प्राप्नोतु।

 

शाम्भवीगतान् सन्देशान् विविच्याधुना तद्गगतं शिल्पं विचारयामः। शाम्भव्याः वैशिष्ट्यं सर्वप्रमुखमेतदस्ति यदत्र छन्दांसि तु प्रायेण नवायन्ते परन्तु भाषा चिरन्तनपण्डितानामिव सुश्लिष्टा वर्तते। एतया दृशा शाम्भवी युङ्क्ते प्राचमर्वाचा। अत्र काव्ये प्रायेण ग़ज़लशैल्याः प्रयोगो विहितोऽस्ति यः खलु अर्वाचीनसंस्कृतस्य लक्षणेषु अन्यतमः। एवं भावदृष्ट्या अथ च च्छन्दःप्रयोगदृष्ट्या उभयथापि कृतिरियं आधुनिकसंस्कृतसाहित्यस्य लक्ष्माणि बिभर्ति। एवं सत्यपि यानि स्खलनानि दृश्यन्ते सामान्यतया आधुनिकेषु कविषु भाषादृशा तानि सर्वथा अत्र नैव विद्यन्ते। न च्युतसंस्कृतित्वं नापि बन्धशैथिल्यं न चच्छन्दोभङ्गः क्वचिदपि । सर्वत्रापि विद्यते शास्त्रोपस्कृतशब्दसौन्दरी गिरि निरन्तरश्लिष्टत्वघनता च भाषायाम्।

आदौ तावद् भाषिकानि वैशिष्ट्यानि शाम्भव्याश्चर्चयामः। यथोक्तं पूर्वं दीक्षितपुष्पा न केवलं वैयाकरणी अपितु पदशास्त्रस्य पाणिनिसम्मतार्षप्रक्रियायाः पुनरुद्धारिका। सा अध्ययनाध्यापनग्रन्थसन्दर्भादिकर्मभिः अहोरात्रं पाणिनिशास्त्रे आकण्ठं प्रमग्ना तिष्ठति। अत एव तस्याः उद्भवन्त्यः कविताः पाणिनीयशास्त्रस्य माहात्म्यस्य निदर्शनानि भूत्वा बहिरायान्ति। व्याकरणशास्त्रस्य विशिष्टप्रयोगाः तथा सारल्येन स्वाभाव्येन च तस्याः काव्यं आगता यथा अप्रासङ्गिकत्वमादधतो न प्रतीयन्ते अपितु रसपोषणमेव विदधति। तत्रोदाहरणानि कानिचन वक्ष्यामः–“पितरः स्पृहयन्ति निवापकृते कृतघातिसुतेषु तरन्ति न ते”।

अत्र कृतघातिसुतेषु इति अत्र सप्तमी विशिष्टेन कात्यायनवार्तिकेन[16] अनुशिष्टा सती दुष्टवंश्यानां तेषामनर्हत्वं विशिष्य सूचयति। वैयाकरणसुलभप्रयोगाणां तत्र तत्र शृङ्खला दृश्यते येन ते ते विषमप्रयोगा बुद्धौ तिष्ठन्ति। तेषां च प्रयोगाणां कृत एते काव्यांशा उदाहरणत्वेनाप्यानेतुं शक्याः–“उदरम्भरिशास्तृजनाः क्षुधयार्तजनेषु न किं पितरन्त्यधुना”।“लघयन्ति गुरूनपि तत्त्वदृशः श्रुतिमार्गचरं दरयन्त्त्यधुना”॥

“शठवञ्चकलम्पटमित्रयुता अतिमन्दधियो गरयन्त्यधुना”[17]

कर्तुः क्यङ् सलोपश्च (अष्टाध्यायी ३–१–११) इति सूत्रस्य उदाहरणमिव प्रतीयमानं पद्यमिदं दृश्यताम्–

कलौ तार्क्ष्यायते काकः कलौ वीरायते क्लीबः । कलौ शश्वायमानस्त्वं सभायां कत्थसे धीमन्॥

गृहं वनायते इतिकाव्ये तु क्यङ्ङन्तैरेव शब्दैः अन्त्यानुप्रासयोजना कृतास्ति। तत्र शब्दाः सन्ति– वनायते, तृणायते, रणायते, कणायते, फणायते, क्षणायते, व्रणायते, गणायते, शणायते पणायते च। अत्र सर्वेऽपि शब्दाः णोपधा इत्यपि अवधेयम्।न जाने इतिकवितायामपि क्यङ्ङन्तभूयस्त्वम्॥

इच्छार्थकसन्प्रत्ययघटितशब्दैः कल्पितान्त्यानुप्रासप्रयोगरमणीयतरस्य पद्यस्योदाहरणमस्ति पिपृच्छिषा[18]नाम काव्यम्। तत्र भवन्ति एते सन्नन्ताः– लुलोभिषा, जिजीविषा, संजिगमिषा, यियतिषा, लिलङ्घिषा, पिपृच्छिषा, तितर्जिषा, जिगदिषा, शिशङ्किषा, दिदधिषा।पदे पदेशाम्भवीगताभिः कविताभिः दीक्षितमहाशयायाः वैयाकरण्यत्वख्यापनं जायते। दीक्षितपुष्पा गलज्जलिकादीनां अन्त्यानुप्रासयुक्तानां काव्यानां कृते पाणिनीयशास्त्रस्य ज्ञानं नान्तरीयकं मनुते। समानप्रत्ययनिष्पन्नानां शब्दानां समध्वनितया ते शब्दाः अन्त्यानुप्रासरूपेण सुन्दरतया व्यवस्थापयितुं शक्यन्ते। एतदेव मनसिकृत्य तया स्वकर्तृकस्य तिङ्कृत्कोशस्य अपरं नाम कविकर्मरसायन[19]मित्यपि कृतमस्ति। उदाहरणस्वरूपं ‘लोकोऽयम्’ इति काव्ये अन्त्यानुप्रासाय त एव तिङन्तशब्दाः चिताः येषु आकारान्तो धातुः स्यादङ्गं वा येषाम् आकारान्तं भवेत् यथा– आबध्नाति लोकोऽयम्– भाति लोकोऽयम्। संमृद्नाति लोकोऽयम्। माति लोकोऽयम्। याति लोकोऽयम्। स्नातिलोकोऽयम्। जानातिलोकोऽयम्। रातिलोकोऽयम्। निद्रातिलोकोऽयम्। मालातिलोकोऽयम्। विक्रीणातिलोकोऽयम्। प्रीणातिलोकोऽयम्। एवमेव तुमुन्नन्तानाम् आकारान्तधातूनाम् प्रयोगः अन्त्यानुप्रासरूपेण यतन्ते के इत्यस्मिन् काव्ये कृतमस्ति। विख्यातुं, समाधातुं, दातुं, पातुं इत्यादिशब्दाः यथा। जनः शून्यप्रभो जातः इत्यस्मिन् शत्रन्तशब्दाः गच्छन्, भुञ्जन्, संरक्षन् इत्यादयः अन्त्यानुप्रासतया उपात्ताः, के?इत्यस्मिन्नपि काव्ये तथैव। किं करोमीत्यस्यां कवितायां तु आद्योपान्तमुदाहरणं विद्यते च्विप्रत्ययान्तस्य ।समीहन्ते इत्यस्मिन् काव्ये ऋकारान्तधातुभिः सह तुमुनः प्रयोगं कृत्वा शब्दाः निदर्शिताः–सर्तुं, स्मर्तुं, उद्धर्तुम् इत्यादयः।रुदन्तः शास्त्रसम्भारा इतिकाव्ये श्नुविकरणानां धातूनां विधिलिङः प्रथमपुरुषबहुवचनपदैः अन्त्यानुप्रासयोजना विहितास्ति– कृण्वीरन्,विधुन्वीरन्, विचिन्वीरन् इत्यादिभिः  शब्दैः।निष्फलं करोति इति कविता तु मन्ये यङ्लुक्प्रयोगनिदर्शनायैव लिखिता स्यात्। १९ पद्येषु आहत्य ३४ उदाहरणानि प्रदत्तानि ईट्सहितानि[20] – चेक्षिपीति, दन्दशीति, दोदवीति, मम्मनीति, मोमुचीति इतिवत्।विडम्बनम्कविता उदाहरणभूतास्ति कर्मणि  भावे च प्रयोगाणाम्। विलीयते,विगीयते, विहीयते, विनीयते, दीयते, प्रतीयते,  पिधीयते आदयः शब्दाः अन्त्यानुप्रासाय सञ्चिताः। तत्स्थेषु चतुर्षु पद्येषु तु व्याकरणप्रक्रिया एव उपमानरूपेण उपस्थापिताः सन्ति। एते स्मारयन्ति कालिदासादीनां[21] केषांचित् प्रयोगान्–

पूर्ववत्सना समो जनोऽपि नैव दृश्यते। व्यत्ययो न येन कस्यचित्पदे विधीयते॥

पञ्चसङ्ख्यया यथा मुधैव षट्त्वमाप्यते। अग्रगण्यता तथाद्य दुर्जने निधीयते॥

नावैयाकरणः इत्थं निदर्शनानि सञ्चेतुमर्हति।

कानिचित् स्थलानि तथापि सन्ति यत्र व्याकरणस्य अतिसन्निवेशः कष्टायते। प्रसभनिवेशवशात् अप्रासङ्गिकतया केवलमुदाहरणप्रदर्शनमात्रफलानि क्वचित्क्वचित्प्रतीयन्ते पद्यानि यथा नरास्ते क इति कवितायां सुरुचिपूर्णानां पद्यानां मध्ये इदम्– “समायान्ति स्वकं गेहं यदा विप्रास्तपोनिष्ठाः। समुत्थाय प्रहर्षैर्नाभिवन्दन्ते नरास्ते के” ॥

अन्त्यानुप्रासाग्रहाधिक्यात् क्वचित् अप्रयुक्तपदानामपि प्रयोगेणाप्रयुक्तत्वमागतं काव्ये, यथा–“कथं ते वाङ्मधूकैर्ब्रह्मणा जीवं विषिन्वीरन्। बध्नीयुरित्यर्थे अस्य पदस्य प्रयोगः लौकिकसंस्कृतेऽल्पीयः। तथैव “समालिङ्ग्य प्रकामं कण्ठमुच्छेत्तुं यसन्तः के”, इत्यत्र अनुपसृष्टयसतेः प्रयोगोऽपि।

छन्दःप्रयोगेषु यन्नावीन्यं तदत्र पारसीकच्छन्दःशास्त्रमनुरुध्य पश्यामःयथावसरम्।इति शोचति भारतभूमिरियमिति काव्ये प्राचीनं तोटकच्छन्दः नवावतारे सम्प्रस्तुतोऽस्ति[22]। आधुनिकसंस्कृतगीतिकारैर्न केवलं पारसीकच्छन्दसां प्रयोगः कृतः अपितु संस्कृतपरम्परायां पूर्वत एव विद्यमानानां संगीतानुगुणानां छन्दसामपि अन्ते अन्त्यानुप्रास (रदीफ़) संघटनापुरस्सरं तानि ग़ज़लोपयुक्तानि कृतानि गीत्यनुकूलानि वा। यथा भट्टमथुरानाथेन शास्त्रिणा स्वीये न गता न गता इत्यभिधायां कवितायाम्[23] तोटकच्छन्दः गलज्जलिकायै प्रयुक्तम्। दीक्षितपुष्पया पुनः तदेव प्राचीनं सगणचतुष्टयेन निर्वृत्तं तोटकच्छन्दः[24] सध्रुवपदगीतये प्रयुक्तम्–

अतिघस्मरकालगतिः सकलं कवलीकुरुते जगतः कुहरम्।

परिनृत्यति तीक्ष्णकृपाणधरा तृणके गगने समदृष्टिरियम्॥

हृदये पिहिता विषयस्य रतिर्जरयत्यनिशं वयसो निचयम्।

अरुचिर्विषयेषु मनागपि नो इति शोचति भारतभूमिरियम्[25]

अत्र प्रतिद्वितीयपादान्तं अन्त्यानुप्रासः द्रष्टुं शक्यः– कुहरम्–दृष्टिरियम्–निचयम्–भूमिरियम् इतिवत्। वस्तुतः गीतीकृतमेतच्छन्दः। अस्मादेव कारणात् अधःप्रदत्ते पद्ये यतिभङ्गदोषस्योद्भावनं दुःशकम्–

स्वकुटुम्बिजने निरपत्रपदारकुलं प्रतिकूलकटूक्तिपरम्।

अवहेलनमेव धवस्य समत्वविधिं कलयन्त्यभिमानधरम्[26]

यथा आर्याच्छन्दसः पूर्वरूपां गाथां वयं द्वादशाष्टादशमात्रासु अवश्येन यतियुक्तास्यादिति नियममुपकल्प्य सदोषां न प्रख्यापयामः तद्वत्– “ओदंसअन्ति दअमाणा पमदाओ सिरीसकुसुमाइं”[27]।तत्र कारणं गीतत्वमेतस्य। शाम्भव्यां कतिधा न विचिन्त्य मनो व्यथते[28] इतिकवितापि अस्मिन्नेव छन्दसि संघटनायां चास्ति।

पारसीकच्छन्दसां प्रयोगविषयेअधुना यत्किञ्चिदुच्यते।  संस्कृतकविभिः अन्यभारतीयकविभिरिव सर्वेषामपि पारसीकच्छन्दसां प्रयोगो न कृतः। तैः सामान्यतया तान्येव च्छन्दांसि प्रयुक्तानि  यानि सरलानि, तालसंगीतानुगुणानि च सन्ति। तानि च तादृशानि येषु समानगणा आवर्तन्ते । जटिलसंरचनावतां छन्दसां प्रयोगः अल्पीय एव दृश्यते[29]। तथैव दृश्यते शाम्भव्यां धृतासु गलज्जलिकासु अपि छन्दसां प्रयोगविषयः।शाम्भव्यां संकलितेषु ३३ कवितासु प्रायेण १४ छन्दांसि प्रयुक्तानि। तेषु दर्शितं नावीन्यमत्र प्रचीयते।

भूयिष्ठप्रयोगविषयाणि च्छन्दांसि तु पञ्चषाण्येव सन्ति पारसीकानि आधुनिकसंस्कृतकवितासु। तेष्वपि प्राथम्यं भजति–हज़ज मुसम्मन सालिम नामच्छन्दः यस्य पारसीकच्छन्दोविद्भिः गणव्यवस्था एवं प्रदत्तास्ति– मफ़ाईलुन्   मफ़ाईलुन्   मफ़ाईलुन्   मफ़ाईलुन् । भारतीयगणव्यस्थानुसारेण एतदेव एवं कथयितुं शक्यतेयमाता   राजभा  ताराज  मातारा यमाता गा  (अथवा, यमाता राजभा गा गा x ४=। ऽ ऽ ऽ      । ऽ ऽ ऽ    । ऽ ऽ ऽ     । ऽ ऽ ऽ)। एतस्य च्छन्दसः नाम भारतीयपिङ्गलज्ञैः विधाता[30] इति कृतम्। जयकीर्तिः (छन्दोऽनुशासने २–१७) हेमचन्द्रश्च (छन्दोऽनुशासने २–२०) अस्य नाम क्रमशः वृद्धिः व्रीडा इति च कुरुतः। शाम्भव्यां धृताषु ३३ कवितासु चतुर्दश किल अस्मिन्नेव च्छन्दसि विद्यन्ते। अनेनैव द्योत्यतेऽस्य लोकप्रियता छन्दसः। तानि प्रयुक्तानि पद्यानि सन्ति–

१–अवैरे सज्जने निष्कारणं वैरायते मूढः।

जने दुर्दान्तदौरात्म्ये कुलीनो भाति लोकोऽयम्॥ (लोकोऽयम्)

२–इयं सन्दृश्यते दन्दह्यमानज्ञातिधूमा दिक्।

पताकां मन्यमानस्त्वं सभायां कत्थसे धीमन्॥ (सभायां कत्थसे धीमन्)

३–स्वकीयैः शोणितैः प्रेम्णा मया या भूरि संसिक्ता।

अये सा वाटिका घूकैः समाक्रान्ता कथं वर्ते ॥ (कथं वर्ते)

४–महापुण्येन जातं जन्म येषां भारते वर्षे।

इमं दर्पं स्ववाचा तषू विखयातुं यतन्ते के॥ (यतन्ते के)

५–न कान्तिस्तादृशी वक्त्रे न शान्तिस्तादृशी स्वान्ते।

अशिष्टेनाध्वना गच्छन् जनः शून्यप्रभो जातः ॥ (जनः शून्यप्रभो जातः)

६–जगत्यस्मिन् विशाले नृत्यतीयं शाम्भवी शक्तिः।

तदीयं ताण्डवं दृष्ट्वा न कम्पन्ते नरास्ते के ॥ (नरास्ते के)

७– यशांस्युच्चैरुलूकानां यतो गर्वेण गीयन्ते।

अरे तेनैव रज्जौ पन्नगाः सत्यं प्रतीयन्ते॥ (कीदृशः कालः)

८– जना अश्मप्लवैरात्मानमुद्धर्तुं समीहन्ते।

शिचस्तन्त्यां निबद्धा पक्षिणः सर्तुं समीहन्ते॥ (समीहन्ते)

९–पिशाचानां समाक्रन्दो दिगन्ते श्रूयते भीमः।

कदाचाराः समन्तात् सभ्यतां वेगेन कृण्वीरन्॥ (रुदन्तः शास्त्रसम्भाराः)

१०–क्षणं पार्श्वे वसन्तस्तत्क्षणं दूरे सरन्तः के?

समालिङ्ग्य प्रगाढं कण्ठमुच्छेत्तुं यसन्तः के ? (के?)

भारतीयच्छन्दःशास्त्रदृष्ट्या पश्यामश्चेत् इदं वृत्तं अनुष्टुभ एव केषुचित् नष्टभेदेषु अन्यतमं भवितुमर्हति प्रतिपादं अष्टाक्षरघटितत्वात्।

पञ्चचामरच्छन्दः प्राचीनं स्तवादिषु प्रयुज्यमानं वृत्तं। गलज्जलिकास्वस्य प्रयोगो नवीनः। पारसीकच्छन्दःशास्त्रिभिरस्य बह्रे हज़ज मुसम्मन मक़बूज़ इतिनाम कृतमस्ति मफ़ाइलुन् मफ़ाइलुन् मफ़ाइलुन् मफ़ाइलुन् इति गणव्यवस्था चास्य निर्दिष्टा। शाम्भव्याम् निर्भयाभ्रमाम्यहम्, कालिका करालिकेति इतिकवितयोः इदं प्रयुक्तम्–

न चञ्चुरीति चेतनासु चण्डचित्तमर्कटो न दन्दशीति मर्मजालकेषु कामकर्कटः।

न दन्दहीति मां भयेन कालदण्डचर्पटो जगज्जटालजङ्गलेषु निर्भया भ्रमाम्यहम्॥

प्रमाणिकाच्छन्दोऽपि केन हेतुना[31] इत्यत्र प्रयुक्तमेव सान्त्यानुप्रासा।

प्रमाणिकाच्छन्दसः प्रथमं लघ्वक्षरं यदि हीयते तदा यच्छन्दः प्राप्यते तच्चामरमिति कथ्यते छन्दोविद्भिः। प्राचि संस्कृतेऽल्पप्रयुक्तमपि एतद् अपभ्रशंकालिकं छन्दः आधुनिकैरपि प्रयुज्यते। पारसीकसाहित्येऽस्य नामास्ति–बह्रे हजज़ मुसम्मन महज़ूफ़ अश्तर मक़बूज़, गणव्यवस्था चास्यास्ति–फ़ाइलुन् मफ़ाइलुन् मफ़ाइलुन् मफ़ाइलुन्इतिवत्। शाम्भव्याम् एतत् प्रयुक्तमस्ति– गृहं वनायते[32] इति गलज्जलिकायाम्–

वीतरागता यदा तदा गृहं वनायते। त्वं प्रतीयसे यदा तदा जगत् तृणायते॥

चातकेन किं कृतम्[33], विडम्बनम्[34] इत्यपि  एतस्मिन्नेव च्छन्दसि।

प्रमाणिकाया एव प्रथमं लघ्वक्षरं ह्रसयित्वा प्रतिपादान्तं एकलघ्वक्षरस्य योजनेन नवीनं कञ्चित् छन्द उद्भाव्य अनया कवयित्र्या रचितम् निष्फलं करोति[35] इति काव्यम्राजभा जभान राजभा जभान राजभा ल इतिवद् व्यवस्थया। जगन्नाथप्रसादभानुना एतद्वृत्तंचञ्चला नाम्ना समाम्नातम्[36]

एष भोगसागरे निमज्जितोऽपि जर्गृधीति। हन्त नास्ति कोऽपि यो तृषाग्निना न दन्दहीति॥

प्रमाणिका द्विगुणिता सती पञ्चचामरत्वं गच्छति। तदीयमपि प्रथमलघ्वक्षरं हृत्वा चामरं द्विगुणितं कृत्वेति यावत् कवयः प्रयुञ्जते। भानुः तस्य अपरे नाम्नी निर्दिशति तूणम् सोमवल्लरी चेति[37]अहर्निशम्[38]इत्यभिधकाव्यमपि अस्मिन्नेव च्छन्दसि सन्दृब्धमस्ति–

नो अरातियोगतो न मित्रविप्रयोगतः कूटकारिलोकतो मनःप्रमाथिशोकतः।

न त्रितापतो न देहपाततो बिभेम्यहं किं तथापि मे मनः समाकुलत्यहर्निशम्॥

एतदेव च्छन्दः अन्त्यमेकं लघुं एकं गुरुं च हृत्वा लघूकृत्य (राजभा जभान राजभा जभान गा इति व्यवस्थया) अपि  शाम्भव्यां गलज्जलिका रचिता। छन्दःप्रभाकरे एतदीयं नाम राग इत्यस्ति[39]। नवीन एष प्रयोगः संस्कृते–“विश्वबन्धुता गता गवेष्यतां सखे राष्ट्रभावना जने निवेश्यतां सखे”! (विश्वबन्धुता गता[40])

चतूरेफिका स्रग्विणी पिङ्गलेनोक्तत्वात् प्राचीनं छन्दः परन्तु आधुनिकसंस्कृतसाहित्ये तस्य नवैव कश्चिदवतारः दृश्यते। स च गीतिगलज्जलिकाद्यनुकूलं विधाय तस्याः प्रस्तुतिः। पारसीकभाषाछन्दःसु अपि एतच्छन्दोऽनेनैव रूपेण विद्यते। तत्र तदीयं नाम बह्रे मुतदारिक मुसम्मन सालिम इति वर्तते गणव्यवस्था च तस्यास्ति फ़ाइलुन् फ़ाइलुन् फ़ाइलुन् फ़ाइलुन् इति। शाम्भव्यां ग्रामवधूटी इतिकविता अस्मिन्नेव च्छन्दसि–

यत्क्षणेऽहं दुकूलैर्वृता ज्ञातिभिस्तत्क्षणं लौकिकज्ञानमाच्छादितम्।

अन्यपादानुगामिन्यहं कारिता यन्त्रितं दामभिश्चित्तमेकं सखे॥

मनोवेदनमिति[41]ब्रूहि कोऽस्मिन् युगे कालिदासायते[42]कवितापि अस्मिन्नेव च्छन्दसि।

न्यस्तशस्त्रं जनं वीक्ष्य शूरायते याचमानं जनं वीक्ष्य दूरायते ।

बान्धवर्द्धौ सदा दन्तकूरायते जायते तावता मे मनोवेदनम्॥

चतुर्भिर्यकारैघटितं भुजङ्गप्रयातं पारसीकच्छन्दःशास्त्रे बह्रे मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम इति नाम्ना प्रसिद्धम्। तत्रास्य गणव्यवस्थाफ़ऊलुन् फ़ऊलुन् फ़ऊलुन् फ़ऊलुन् इतिवन्निर्दिष्टा वर्तते। शाम्भव्यामेकत्र मनोवेदना मे विरामं न याति इत्यत्र तच्छन्दः प्रयुक्तम्।

अन्यत् प्रयुक्तं छन्दः गीता, गीतिका, हरिगीतिका वा वर्तते। एतस्य च्छन्दसः इदम्प्रथमतया प्राप्तिः प्राकृतपैङ्गले भवति। तत्रैतस्य नाम गीता[43] इति प्रथितमस्ति। हिन्दीशैल्याः पारसीककविभिः एतद् भूयिष्ठं प्रयुक्तं दृश्यते। पारसीककवितायां एतस्य नाम बह्रे कामिल मुसम्मन सालिमइत्यस्ति यत्र गणव्यवस्था तद्विदां मते वर्तते–मुतफ़ाइलुन् मुतफ़ाइलुन् मुतफ़ाइलुन् मुतफ़ाइलुन्इति। गतशताब्द्याश्छन्दोविदा दुःखभञ्जनशुक्लेन अस्य संस्कृतीकरणं विधाय मात्रिकवृत्तेषु अस्मै स्थानं प्रादायि[44]। वार्णिकभेदः अपि अस्य च्छन्दसः तेन गीतिका नाम्नानुमतः– ससजं भरौ सलगा यदा कथिता तदा खलु गीतिका[45]। शाम्भव्यामप्यस्य मात्रिकरूपमेवादृतमस्ति–

नो कर्मफलसमवाप्तये लब्धा जनिर्धरणौ मया।

असकृन्नुनोद भवाय मां तव हृदवसतिलुलोभिषा ॥ (पिपृच्छिषा)

पारसीके मुफ़्तइलुन् मफ़ाइलुन् इतिगणव्यवस्थया प्रसिद्धश्छन्दः विद्यते यस्य नाम जगन्नाथप्रसादभानुना नित[46] इति कथितम् यस्य भानस राजभा लगा इति व्यस्था सम्मतास्ति। छन्दःप्रभाकरे भानुना नराचिकेति नाम्ना स्मृतमिदम्[47]।  शाम्भव्यां अस्य च्छन्दसः द्वितीयलघुवर्णं गुरूकृत्य ताराज राजभा लगा इति रीत्या काव्यं रचितं न जाने इतिशीर्षकेण–

जाने न किं मदागतं दुःखायते सदा सुखम्। स्नेहोऽपि दूष्यते छलैः कारायते निजं गृहम्॥

किं करोमीति[48] कवितायां कवयित्र्या नवीनमेव च्छन्दः गृहीत्वा तस्य गलज्जलिकार्थं प्रयोगं कृतवत्यस्ति। एष प्रयोगः पुराणरीतिव्यतिक्रमणेन नूनं श्लाघ्यतमः–”गर्दभं गान्धारवाजी प्रश्रयेण नमस्करोति। मृगयुभीतेयं मृगी सिंहं शरणमङ्गीकरोति”॥

पारम्परिकच्छन्दसां पारम्परिकरूपेणापि प्रयोगः शाम्भव्यां प्राप्यते। यथा प्रीयते नो मनो मे इति कवितायांमन्दाक्रान्ताच्छन्दसः प्रयोगः, मन्येऽहम्, गङ्गे इतिकाव्ययोःच आर्याच्छन्दसः प्रयोगः दर्शनीयः। नो तथा दृश्यते जनः इतिकवितायां अनुष्टुभः अपूर्वः प्रयोगः अन्त्यानुप्राससंसयुक्तः कृतः अस्ति[49]

काव्यस्य गीतेश्च एकत्रावस्थापनं गलज्जलिकाकाव्यस्य वैशिष्ट्येष्वन्यतमम्। एतद्द्वयमपि वयं शाम्भव्यां लभामहे। तस्य कारणमस्ति च्छन्दसां शुद्धतमः प्रयोगः। सामान्यतः आधुनिककवयः पारसीकवार्णिकवृत्तानि मात्रिकीकृत्य प्रयुञ्जते येन संगीततत्त्वं तत्रत्यं विहन्यते[50]। अत्र सुविहितप्रयोगतया सफलगीतिकाव्यत्वमेतस्य संग्रहस्योद्भूतं दृश्यते॥

गलज्जलिकाप्रयोगे दोषाभासाः अपि केचनात्र प्रदर्श्यन्ते। सामान्यतया गलज्जलिकानां प्रथमपद्यस्य उभयपङ्क्तौ अन्त्यानुप्रासः भवति यत् पारसीकसाहित्यवद्भिः मत्ल,अ इत्युच्यते। परन्तु नवाचारः एष आधुनिकानां यत्ते एतं नैव प्रयुञ्जते। शाम्भव्यामप्यनेकत्र एवं कृतं यथा– सभायां कत्थसे धीमन्, कथं वर्ते, यतन्ते केइत्यादि गलज्जलिकासु।

गलज्जलिकायां न केवलमन्त्यशब्दानाम् अपितु उपान्त्यवर्णानामपि  समतुल्यस्वराणां समावृत्तिरावश्यकी। अशक्तिवशात् अज्ञानवशाद् अन्यथा वा संस्कृतकवयः एतन्न प्रयुञ्जते। एतादृशस्खलनं शाम्भव्यामपि विद्यते क्वचित् यथा सभायां कत्थसे धीमन् इत्यस्यां गलज्जलिकायाम्।

सामान्यतः गलज्जलिकायां एकस्यैव शब्दस्य वारं वारं अन्त्यानुप्रासतया योजनं स्पृहणीयं न मन्यते कविभिः यतस्तेन कवेः शब्दसामर्थ्यस्य अल्पत्वं द्योत्यते। शाम्भव्यां भूरिशः दृश्यते एतद् यथाजनः शून्यप्रभो जातः इत्यस्मिन् त्रिः पश्यन्निति, यतन्ते के इत्यस्मिन् दातुमिति द्विरावृत्तम्, एवं बहुत्र।

अलङ्काराणां मनोहारिणी विच्छित्तिः शाम्भव्यां सर्वत्रास्ते। अलङ्कारेषु परम्परितरूपकं यथा– “सहते न मनोभवचन्द्रपरिप्लुतयौवनवारिधितीव्ररयम्”[51]।वृत्त्यनुप्रासः–“ननु मुष्टिमितैरपि तुष्टिपराः। नरमांसबुभुक्षुतरक्षुसमाः”। “अहन्ता ते दुरन्ता नारिहन्ता शास्त्रमन्ता नो। इदन्ता तेऽनुगन्तेयं सभायां कत्थसे धीमन्”॥“बन्धुतापि किं धुता। एते प्रत्यग्रप्रयोगाः नितान्तरमणीयाः। अप्रस्तुतप्रशंसायाः सुन्दरं साम्राज्यं शाम्भव्यां सर्वत्र दृश्यते। तयैव स्त्रीणां विडम्बनात्मिकावस्था निपुणं प्रस्तुता अवलोक्यताम्–“नामरूपतोऽपि या पयोनिधौ विलीयते। हन्त तेन सागरेण सापगा विगीयते”॥ (विडम्बनम्) । स्त्रीपुंसयोर्मध्ये प्रेमव्यवहारे यदन्तरं तदन्यत्रापि सङ्कलने अग्निशिखाभिधे वर्णितं स्मृतिपथमवतरति–

 

मम निश्छलशुभ्रजले हृदये तवरूपमिदं प्रतिबिम्बयुतम्।

मलिने मुकुरे भवतो हृदये मम रूपमिदं न हि संक्रमितम्॥

उपदेशकाव्यस्य भूषणमस्ति अभिधाप्रधानता तथापि व्यञ्जनोत्थापिता उत्कृष्टकाव्यगुणा अपि तत्र तत्र काव्ये विलसन्तितराम्। “स्वपक्षान् कर्तयित्वा व्योमगामी तेऽभिलाषोऽयम्”– अत्र शब्दशक्त्युत्थः ध्वनिः पक्षशब्दपक्षे द्रष्टव्यतां वहति। तथैव–“घुणो भुङ्क्ते स्ववंशं रीतिरेवैतादृशी लोके” इत्यत्रापि। पाश्चात्त्यसंस्कृतिनिरसनप्रसङ्गे प्रतीचीशब्दः किमपि सौन्दर्यातिशयं पुष्णाति–“सदा प्राच्येव सूते भास्करं दीप्तं प्रभातार्थम्। प्रतीच्यां वर्धितास्ते स्नेहबन्धा नावसीयन्ते”॥ (कीदृशः कालः)

गलज्जिकायां विविधविषयत्वं भवति। प्रत्येकं च पद्यं तत्स्थं विषयदृशा स्वातन्त्र्यं भजते। अतः अनेकशः उपदेशपराणां पद्यानां मध्ये हार्दा रागात्मका अपि भावा व्यक्ताः सन्ति। तेषु पुनः काव्यत्वम् अतितरां वर्तते–

मया ते नामधेयं श्वाससन्तानेषु संयुक्तम्।सखेमैत्री त्वदीया पश्य वज्रान्ता कथं वर्ते॥

ग्रामवधूटी कविता सकलापि अनुरागवती विप्रलम्भशृङ्गाररसाढ्या–

चन्दनैश्चर्चितं ते वपुर्दृश्यते व्योममध्यस्थिते शीतरश्मेस्तनौ।

हन्त हस्तौ प्रसार्योपतिष्ठे यदा मेघमालाभिराच्छाद्यते तत् सखे॥

उपरितनं पद्यं कालिदासीयं – त्वामालिख्येत्यादि[52] मेघदूतस्थं काव्यं प्रसभं स्मारयति।गङ्गे इति काव्यं सर्वथा भिन्नरसं भक्तिभावाख्यं धत्ते।

शाम्भवी वस्तुतः गीतिकाव्यम्। सर्वत्र रागानुगुणा शब्दशय्या विराजते–

निर्वृतिं लभे यथा दुकूलतूलविष्टरे पांसुधूसरे रमे तथैवतार्णसंस्तरे।

अद्य नो कदाशया सदाशये कृतं पदं किं तथापि मे मनः समाकुलत्यहर्निशम्॥

काव्ये भावप्रवाहसौन्दर्यं दर्शयितुमिदं उदाहर्तुं शक्यते–

विभाति या सृतिः प्रफुल्लकेतकीव दन्तुरा प्रवातनीतमेघमालिकेव सास्ति भङ्गुरा।

अतोऽखिलं विहाय केशवाङ्घ्रिसङ्गभासुरा जगज्जटालजङ्गलेषु निर्भया भ्रमाम्यहम्॥ (निर्भया भ्रमाम्यहम्)

स्वभावानुगुणं कवयित्र्याः शैली महौजस्का वीर्यवती चास्ति। अनाचारिषु तस्याः वाणी कदापि मृदुः नास्ति। तस्याः सखरा वाणी एवं द्रष्टुं शक्यते –

प्रवृत्तं नाटकं कीदृङ् नटाः सर्वे खरा यत्र। अवार्ये प्रेक्षणे नृत्यन् जनः शून्यप्रभो जातः॥

खरीवात्सल्यवत् पित्रोर्वृथा स्नेहातिरेकोऽयम्। कुमार्गे प्रस्थिता याभ्यां न सन्ताना विनीयन्ते॥

कालिका करालिका कविता तथा ऊर्जिता यथा एतं पठित्वा अक्ष्णोरग्रे स्वयं कालिकावतीर्णेव विभाव्यते–

सहस्रदीर्घबाहुदण्डजालपूरिताम्बरा पिशाचकैर्नरीनृतीत्यनन्तसक्थिडम्बरा।

सदा निशुम्भशुम्भयोर्वधाय जातसङ्गरा कटत्कटत्स्वरेण चाकटीतु मुण्डमालिका[53]

काव्यानि रसानुगुणवस्तुव्याख्यानपराणि वस्तूनि कानिचन। अलङ्कारसन्निवेशरसिकता पाण्डित्यादिप्रदर्शनम् सामान्यतः कविताप्रवाहं तदीयं लक्ष्यं चावरुन्ध एव। संस्कृते शास्त्रकाव्यानां अलङ्कारप्रधानानां च काव्यानां परम्परा भूयस्तरास्ति। संस्कृतस्य प्रकृतिरपि तादृशी समृद्धिशालिनी अस्ति यत् कवयः शास्त्रेणालङ्कारप्रदर्शनेन वा प्रलुभ्यन्ते। काव्यकर्तव्याच्च च्यवन्ते। शाम्भव्यामपि यत्र यत्र व्याकरणप्रयोगाणां प्राधान्यमिष्टं तत्र तत्रकाव्यरसप्रवाहः स्तिमितः दृश्यते। कविता तु स्वामपहाय कस्यचिदप्यन्यस्य मुख्यत्वं न सहते। तथापि सन्देश एतासां कवितानां स्पष्टः ऊर्जितः चास्ति। व्याकरणस्य सायासनियोजनेनापि अत्र द्व्याश्रयता, द्विसन्धानता शास्त्रकाव्यता वा संक्रान्तास्ति। तथापि भूयस्यस्तादृश्यः कविता विद्यन्ते यासु काव्यप्रवाहः  उपसर्जनीकृतशास्त्रालङ्कारः रसाधिक्यं परिपुष्णाति यथा अहर्निशम् आदिषु कवितासु।

चर्चयानया निश्चप्रचमेतद् यद् ओजस्विना अदुष्टेन चकाव्यशिल्पबलेन शाम्भवी स्वीयोदात्तसन्देशसम्प्रेषणे नितरामवाप्तसाफल्या गीतिकृतिरिति।

 

 

 

 

 

 

संकलिताः सन्दर्भाः–

संस्कृतम् –

शर्मा, शिवदत्त तथा शर्मा, काशिनाथ (सम्पा॰).१८९४. ‘प्राकृतपिङ्गलसूत्राणि’ – लक्ष्मीनाथभट्ट विरचितया व्याख्ययानुगतानि , निर्णयसागर प्रैस मुम्बई ।

श्रीदुःखभञ्जनकविः. १९३३.वाग्वल्लभः (तदात्मजश्रीदेवीप्रसादकविचक्रवर्तिना कृतया वरवर्णिनी–टीकया समलङ्कृतः).चौखम्बा संस्कृत सिरिज़ आफिस, बनारस सिटी।

झळकीकरः, वामनाचार्यः (बालबोधिनीकारः).१९५०. माम्मटः काव्यप्रकाशः. भाण्डारकरप्राच्यविद्यासंशोधनमन्दिरम्, पुण्यपत्तनम्।

रामकृष्णकवि, एम्॰ (सम्पा॰).१९५०.जानाश्रयी छन्दोविचितिः.श्रीवैंकटेश्वर ओरिएण्टल इंस्टीट्यूट, तिरुपति।

पाठक, जगन्नाथ (प्रकाशाभिधहिन्दीव्याख्याकारः).१९६५. सलोचनः ध्वन्यालोकः.१९६५. चौखम्बाविद्याभवन वाराणसी।

व्यास, डा̆॰ भोलाशंकर (सम्पा॰).१९५९. प्राकृतपैङ्गलम्. प्राकृतग्रन्थपरिषद् , वाराणसी–५।

देवनाथ, रामानुज (२०१३) .छन्दोमाला. संस्कृतप्रतिभा (संयुक्ताङ्कः जनवरी २०१३–दिसम्बर२०१३ संयुक्ताङ्कः) –पत्रिकायां प्रकाशितं नवीनं शास्त्रम्, साहित्य अकादमी, दिल्ली।

दीक्षित, पुष्पा. २०१२.शाम्भवी. राष्ट्रियसंस्कृतसंस्थानम्, नवदेहली।

हिन्दी –

‘भानु’, जगन्नाथ प्रसाद.१९३६.छन्द प्रभाकर. जगन्नाथ प्रेस, बिलासपुर ।

प्रसाद,डा̆ शिवनन्दन.१९६४. मात्रिक छन्दों का विकास, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना ।

डा̆॰नरेश.१९९१. ग़ज़ल : शिल्प एवं संरचना. हरियाणा साहित्य अकादमी, १५६३,सैक्टर १८–डी, चण्डीगढ़

फ़ारसी–

शमीसा, डा̆॰ सीरूस. १३९३ हिजरी. आशनाई बा उरूज़ो क़ाफ़िये. नश्रे मीत्रा, तेहरान, ईरान ।

[1]आनन्दवर्धनेन ध्वन्यालोक ३–४२ कारिकाया वृत्तावुद्धृतः।

[2]काव्यप्रकाशः उल्लास७–सूत्र७१

[3]शाम्भवी ६३ (सर्वत्रापि इयं संख्या पृष्ठाङ्कं द्योतयति)

[4]शाम्भवी ५३

[5]शाम्भवी १७

[6]शाम्भवी २५

[7]शाम्भवी २

[8]शाम्भवी ६२

[9]चाणक्यनीतिः १३–८

[10]शाम्भवी ९

[11]शाम्भवी २०

[12]शाम्भवी ७३

[13]शाम्भवी– आन्तरम् vii-viii

[14]ईशावास्योपनिषत्–७

[15]विश्वबन्धुता गता, शाम्भवी ४९

[16]अर्हाणां कर्तृत्वेऽनर्हाणामकर्तृत्वे तद्वैपरीत्ये च (वा॰ १४८७–१४८८) सिद्धान्तकौमुदी, कारकादिविभक्तिप्रकरणम्।

[17]शाम्भवी ५ तत्करोति तदाचष्ट इति णिच्।

[18]शाम्भवी १२

[19]प्रतिभाप्रकाशन, दिल्लीतः प्रकाशमायातः।

[20]यङो वा– अष्टाध्यायी ७.३.९४

[21]स हत्वा वालिनं वीरस्तत्पदे चिरकाङ्क्षिते।
धातोः स्थान इवादेशं सुग्रीवं संन्यवेशयत्॥ रघुवंशम् १२.५८, तत्रैव १५.७,१५.९

[22]शाम्भवी २–४

[23]फ़ारसी छन्द तथा उनका संस्कृत काव्य में अनुप्रयोग

[24]ननु तोटकमब्धिसकारयुतम्। वृत्तरत्नाकरः–

[25]शाम्भवी २–४

[26]शाम्भवी २–४

[27]अभिज्ञानशाकुन्तलम् १–

[28]शाम्भवी ४६

[29]फ़ारसी छन्द तथा उनका संस्कृत काव्य में अनुप्रयोग (अप्रकाशितनिबन्ध)–बलरामशुक्ल

[30]लहौ विद्या लहौ रत्नै लखौ रचना विधाता की (छन्दप्रभाकर पृ॰–७०)

[31]शाम्भवी ७३

[32]शाम्भवी १४

[33]शाम्भवी ४५

[34]शाम्भवी ५६

[35]शाम्भवी ७२

[36]छन्दःप्रभाकर १७७

[37]छन्दःप्रभाकर १७१

[38]शाम्भवी ४२

[39]छन्दःप्रभाकर १६१

[40]शाम्भवी ४९

[41]शाम्भवी ३९

[42]शाम्भवी ५३

[43]जहि आइ हत्थ णरेंद विण्ण वि पाअ पंचम जोहलो – जहि ठाइ छट्ठहि हत्थ दीसइ सद्द अन्तहि णेउरो।

सइ छन्द गीअउ मुद्धि पीअउ सव्वलोअहि जाणिओ – कइसिट्ठि सिट्ठउ दिट्ठउ पिंगलेण बखाणिओ ॥ (प्राकृतपैङ्गलम् –२–१९६)

[44]अष्टाधिका किल विंशतिश्च कला भवेयुरथो पदे। इषुषट्शराशुगपञ्चमात्रिकनिर्मितायतयतिपदे॥

चरमोपगेन तथा भवेद् गुरुणैककेन नियोजिते। हरिगीतवृत्तमिदं फणीश इति प्रवक्ति विशेषिते ॥

[45]वाग्वल्लभ पृ॰ २४२

[46]छन्दप्रभाकर पृ॰ २४४

[47]छन्दःप्रभाकर पृ॰ १२६

[48]शाम्भवी २२–२४

[49]शाम्भवी ६०, राधावल्लभत्रिपाठिनापि समष्टिसंग्रहे धृतायां स्वीय–शनैः शनैः इतिकवितायां एष प्रयोगः कृतः।

[50]फ़ारसी छन्द तथा उनका संस्कृत काव्य में अनुप्रयोग (अप्रकाशितनिबन्ध)–बलरामशुक्ल

 

[51]शाम्भवी ४

[52]मेघदूतम् २–३८

[53]शाम्भवी ७१

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Here I post 41 slides regarding Prakrit Language as a supplement to the class lecture for my Students of M.A. Final Year. Special thanks to Shri Ankur Nagpal, a techno-savvy Sanskritist to have ppt files converted into JPG to appear on the Blog!!

 

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क→लोप

काअ, सउन्दला

मुह, सहि, लिहइ,साहा

ग→लोप

सुहओ, णिओओ,

घ→ह

मेहो, लहु

 
लोप

सूई, आयरिओ, वअणं,

ज→लोप

राइ,

 

पाडणम्

पढइ

(न)

लोप

गया,

रहो, कहेइ, णाहो, अह, तह, पाहेओ

लोप

जइ(जे), रोअणं, पाअ

साहु, वहू, राहिआ, छुहिअ

पडणं, मणोरहो

प→लोप, व

पावं, दीवावली, रूवं, ताव,

ह, भ

मुत्ताहलं, रेभो

सोहणो, लोहो,

वँ

 

जउँणा

लोप,(आदि) ज

पइ, पिअ,जमो,

(ल)

(र)

लोप

(ब)

 

(श), संकर,

ष→स

सेसो, एसा

 

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