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प्रथम आचार्य गोकुल प्रसाद त्रिपाठी संस्कृत सम्मान–२०२०
(सखि, देखौ री माल गुपाल गुही)

जब मुझे गुरुवर आचार्य राधावल्लभत्रिपाठी जी की सुन्दर वर्तुलाकार स्वहस्तलिपि में इस सम्मान की घोषणा से सम्बद्ध पत्र प्राप्त हुआ तो मुझे अतीव गौरव तथा विशेष कृतकृत्यता का अनुभव हुआ। कृतकृत्यता विशेषरूप से इस कारण से है कि जिस विशाल वृक्ष की छाया में हम वर्षों पोषण पाते रहे हैं, यह पुरस्कार उस वृक्ष का रोपण तथा परिवर्धन करने वाले महनीय व्यक्तित्व आचार्य गोकुल प्रसाद त्रिपाठी के नाम पर प्रारम्भ होने वाला प्रप्रथम सम्मान है। आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी हम जैसे अनगिनत अध्येताओं के लिए आदर्श तथा प्रोत्साहक हैं जिनके समस्त कृत्य शिष्यों के परम उपकार के लिए हैं। निम्नोक्त अन्योक्ति जैसे उन्हीं के लिए कही गई हो–
मूलं भुजंगैः शिखरं प्लवंगैः शाखा विहङ्गैः कुसुमानि भृङ्गैः।
नास्त्येव तच्चन्दनपादपस्य यन्नाश्रितं सत्त्वभरैः समन्तात्॥
मेरी कविताओं के विकास तथा उनकी सुप्रस्तुति में उनका अकथनीय योगदान है। उनकी विद्वत्ता के विविध आयामों से मैं निरन्तर प्रेरित होता रहता हूँ। इस सम्मान के लिए शास्त्रज्ञता के अतिरिक्त कविता को भी निकष के रूप में रखा गया है। यह उपक्रम वस्तुतः भारतीय विद्वत्परम्परा की चिरन्तन सन्तुलित दृष्टि का भी पुरस्करण है– जो साभिमान यह कहती रही है –
काव्येषु कोमलधियो वयमेव नान्ये
तर्केषु कर्कशधियो वयमेव नान्ये।
यह सम्मान वस्तुतः मेरे गुरुजनों, माता पिता तथा सभी स्निग्ध बन्धुओं का है। मैं उनकी ओर से इसे सहर्ष ग्रहण करते हुए अपने आपको सौभाग्यशाली समझता हूँ।
इस अवसर पर मेरे हर्ष की तर्जुमानी रीतिकालीन महाकवि देव के निम्नलिखित सवैये की धन्यधन्य गोपिका प्रायः कर सके, जो सबको यह कहती फिर रही है कि उसे कृष्ण (राधावल्लभ) ने ‘अपनी माला’ उतार कर पहना दी है–

हरि के वह आजु अकेले गई हरि के हरि के गुन रूप लुही
उसने अपनौ पहिराय हरा मुसुकाय के गाय के गाय दुही ।
“कवि देव” कछू की न कोई कहौ तबतैं इतनी अनुराग छुही
सबहीं तैं इहै कहै बाल बधू सखि देखौ री माल गुपाल गुही

सम्मानार्पण के समय आचार्य त्रिपाठी द्वारा रचित तथा वाचित 2-2 सुन्दर शार्दूलविक्रीडित –

किं माघस्तनुते त्विषावलयितां मालामहो मौक्तिकीं

किं वाऽयं भवभूतिरेव करुणागीतिं स्वयं गायति।

प्राप्तः किन्नु नवावतारमथवा किं हाफिजो गालिब-

स्त्वित्थं यस्य वचोविलासविषये तन्वन्ति तर्कान् बुधाः।।

भाषाशास्त्रविशारदः सुनिपुणोऽसौ संस्कृते प्राकृते

स्निग्धं चापि सदा स्मितं वहति यः सौम्याननः स्वानने।।

पाण्डित्यस्य गतः प्रकर्षमपि यो नो चापि गर्वान्वितः

सोऽयं श्री बलरामशुक्लसुकविः सद्विद्यया वर्धताम्।।

 

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हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक आचार्य विजयबहादुर सिंह जी तथा हिन्दी के शब्दों पर दुर्लभ संशोधक श्री अजित वडनेरकर जी से मिलना बहुत समृद्धिकारी रहा। कार्यक्रम के अन्त में श्रोताओं ने विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनन्द लिया।

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वेदान्तदेशिक (१२६८–१३६९ ई॰) मध्यकाल में दक्षिण भारत के महत्तम विद्वानों में से थे। वे दार्शनिक, कवि, सन्त, सम्प्रदायोत्तेजक सब कुछ थे। वे विशिष्टाद्वैत दर्शन के महनीय आचार्य थे। इसके वडकलै सम्प्रदाय में उन्हें भगवान् वेंकटेश्वर के घण्टे का अवतार बताया जाता है। उनके विस्तृत रचना संसार में स्तोत्र, प्रबन्धकविता, नाटक, खण्डकाव्य, धर्मशास्त्र,वैज्ञानिक ग्रन्थ तथा विविध टीकाएँ सभी सम्मिलित हैं। संस्कृत तथा तमिळ के अतिरिक्त उन्होंने प्राकृत भाषा में भी साहित्य रचना की। १०१ स्कन्धक छन्दों में रचित उनका स्तोत्रकाव्य अच्चुअसअअं (अच्युतशतकम्) अत्यन्त भावप्रवण रचना है जिसे प्रियवयस्य तथा संस्कृत के उत्कृष्ट कवि श्री बी॰ एन्॰ शशिकिरण जी ने स्नेहपूर्वक उपलब्ध कराया। यद्यपि कविता बहुत उत्तम कविता कोटि की है लेकिन इसमें विशिष्टाद्वैत मत के मन्तव्यों तथा उसके भौगोलिक सन्दर्भों का सन्तुलित मात्रा से अधिक प्रयोग सामान्य पाठक के लिए इस कृति के प्रभाव को कई बार सीमाबद्ध करता सा प्रतीत होता है। बहुत स्थानों पर कवि ने चिरन्तन प्राकृत कवियों की तरह प्राकृतभाषा के ध्वनिपरिवर्तनों के कारण अनन्यलभ्य चमत्कारों का सुन्दर प्रयोग किया है। उनके अनेक भावप्रवण प्राकृत पद्यों में से एक उदाहरण निम्नवत् है–

अच्चुअ विसअक्कंतं भवण्णवावट्टभमिणिउड्डिज्जंतं।
जणणी थणंधअं विअ मामुद्धरिऊण सेवसु सअं पच्छं॥९३॥

(अच्युत विषयाक्रान्तं भवार्णवावर्तभ्रमिमज्जन्तं।
जननी स्तनन्धयमिव मामुद्धर्तुं सेवस्व स्वयं पथ्यम्॥)

हे अच्युत (विष्णु), इन्द्रियों के विविध विषयों से घिरे हुए, और भवसागर की भँवर में के घुमाव में डूबते हुए मुझे बचाने के लिए पथ्य (उचित) उपाय आप स्वयं ही खोजो। ऐसे ही जैसे दूध पीते बच्चे को यदि किसी भी प्रकार की असमर्थता या कोई रोग हो जाए तो उसकी रक्षा के लिए शिशु को दवा नहीं दी जाती बल्कि माता ही पथ्य का सेवन करती है।

पथ्य शब्द में प्रयुक्त श्लेष, भवार्णवावर्त–आदि में रूपक अतीव हृद्य हैं लेकिन सबसे सुन्दर प्रयोग उपमा का है जो भक्त की बालवत् असहायता द्योतित करते हुए कवि की वाग्वैदग्धी से कविता को मधुरतर बना दे रही है।
यह स्तोत्र १९४० में मद्रास के गीताचार्य मुद्रणालय में मुद्रित है जिसके पर्यवेक्षक तथा परिष्कारक श्रीकृष्णमाचार्य स्वामी तथा श्रीकाञ्ची प्रतिवादिभयंकर अण्णंगराचार्य हैं। मूल में स्थित “उद्धरिऊण” पद की जगह पुस्तक में संस्कृत छाया में “उद्धृत्य” पद दे दिया गया है। सामान्यतः प्राकृत में –तूण अथवा –ऊण प्रत्यय संस्कृत के क्त्वा अथवा ल्यप् के स्थान पर लगाया जाता है। इसी प्रायिकता को देखते हुए छायाकार ने “उद्धृत्य” यह अनुवाद दिया है। परन्तु यदि यह पाठ लेकर अर्थ करें तो पद्य का सारा सौन्दर्य ही नष्ट हो जाता है। प्राकृत में क्त्वान्त की जगह तुम्–अन्त रूप तो इष्ट है लेकिन तुमुन्नन्त की जगह क्त्वान्त के रूप –ऊण का भी प्रयोग होता रहा होगा जिसका यह उदाहरण लगता है। व्याकरण पहली वाली स्थिति का अनुशासन तो करता है (हेम॰ २.१४६, क्त्वस्तुमत्तूणतुआणाः), परन्तु दूसरी स्थिति के लिए प्रमाण मृग्य है।
भमिणिउडिज्जन्तं वस्तुतः भ्रमि+ नि+ब्रोड्यमानम् इति एवास्ति –निमज्ज्यमानमित्यस्यार्थे।
प्राकृतगाथासप्तशत्यां अस्य सुन्दरः प्रयोगो विद्यते–

तालूरभमाउलखुडिअकेसरो गिरिणईए पूरेण ।
दरबुड्डउबुड्डणिबुड्डमहुअरो हीरइ कलम्बो ॥ ३७
अस्य च्छाया यथा –

[जलावर्तभ्रमाकुलखण्डितकेसरो गिरिनद्या: पूरेण। दरमग्नोन्मग्ननिमग्नमधुकरो ह्रियते कदम्ब:।।]
णिबुड्ड एव धातुः पुनःप्राकृतीकरणस्य परिघटनया बकारं संलोप्य णिउड्ड– इतिरूपेण स्थितः दृश्यते।

{Prof. J.r. Bhattacharyya ‘s addition —
Hemacandra in his grammar prescribes the sutra for धात्वादेश – मस्जे/मज्जेराउड्ड-णिउड्ड-बुड्ड-खुप्पाः (8/4/101). So आउड्डइ, णिउड्डइ, बुड्डइ, खुप्पइ may be used in Prakrit in the meaning of निमज्जति | In Bengali too (rural bengal culture) we use the term बुडे याओया (जाओआ) in the meaning of sinking.

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११वीं शताब्दी के ऐतिहासिक एवं मिथकीय महानायक परमारवंशीय महाराज भोजदेव (1010-1055 ई॰) मध्यकाल में भाषा, साहित्य तथा ज्ञान के बहुत बड़े पोषक थे। जैन तथा वैदिक दोनों ही परम्पराओं में उनके मिथकीय वर्णन प्राप्त होते हैं । उनका रचना विश्व उनके राज्य की तरह ही विशाल था। उनकी रचनाओं में विषयों का आश्चर्यजनक विस्तार तथा औदार्य है। काव्य, साहित्यशास्त्र जैसी ललित विधाओं से लेकर व्याकरण, ज्योतिष, खगोलशास्त्र, वास्तु जैसे तकनीकी तथा वैज्ञानिक विषयों पर भी उनकी बृहद् रचनाएँ प्राप्त होती हैं। उनके द्वारा रचित सरस्वतीकण्ठाभरण नामक व्याकरण ग्रन्थ सम्भवतः व्याकरण वाङ्मय का सबसे विशाल सूत्रात्मक ग्रन्थ है। ३६ अध्यायों में परिसमाप्त उनकी कृति शृङ्गारप्रकाश भी साहित्यशास्त्रीय ग्रन्थों के मध्य सबसे विस्तृत और नवीन प्रमेयों से परिपूर्ण है। समराङ्गणसूत्रधार ८३ अध्यायों में विभाजित मन्दिर तथा सामान्य वास्तु का विश्वकोशीय ग्रन्थ है। इसी प्रकार अनेकानेक ग्रन्थों की रचना का श्रेय महाराज भोज को है।
संस्कृत के साथ महाराज भोज ने प्राकृत कविता को भी बहुमान दिया। आनन्दवर्धन द्वारा साहित्यशास्त्र में प्राकृत पद्यों को उदाहृत करने की परम्परा को उन्होंने नई ऊँचाई प्रदान की। प्राकृत पद्यों को सबसे अधिक उद्धृत करने वाले काव्यशास्त्रकार सम्भवतः भोजदेव ही हैं। उनके द्वारा उदाहृत सुन्दर तथा दुर्लभ पद्यों को प्राकृत साहित्य के विद्वान् वी॰ एम॰ कुलकर्णी (१९८८) ने पाठसंशोधन पूर्वक Prakrit Verses in Sanskrit Works on Poetics ग्रन्थ में उद्धृत किया है। किसी सर्वसेन नामक प्राकृत कवि को तो भोजराज ने इतना अधिक उद्धृत किया है कि उनके उद्धरणों से ही इस कवि के ग्रन्थ हरिविजय को प्राप्त सा कर लिया गया गया है । स्वयं भोजराज के नाम से भी २ प्राकृत शतक काव्य विरचित बताए जाते हैं। ये दोनों काव्य कूर्मशतक के नाम से हैं तथा दोनों में आदि कच्छप की प्रशंसा में १०९ गाथाएँ संकलित हैं। विशेष बात यह है कि ये दोनों शतक भोजदेव की राजधानी धारा (धार) के भोजशाला नामक स्थान में विद्यमान एक प्रस्तर पट्ट पर उत्कीर्ण हैं। इन दोनों की भाषा महाराष्ट्री प्राकृत है। “इव” के अर्थ में “नाइ” तथा ‘भूता’ के लिए ‘हूआ’ के स्थान पर ‘हुआ’ के प्रयोग से पता चलता है कि भाषा में तत्कालीन अपभ्रंश का प्रभाव यत्र तत्र है। धार के शिक्षा निदेशक के॰के॰ लेले ने भोजशाला से १९०३ में उत्कीर्ण प्रस्तर पट्ट की खोज की तथा सरकारी अभिलेखशास्त्री प्रो॰ ई॰ हुल्त्श के संज्ञान में लेकर आए। प्राकृत के पाणिनि कहे जाने वाले जर्मन विद्वान् प्रो॰ रिचार्ड पिशेल ने इन्हें सम्पादित करके “एपिग्राफिका इण्डिका” के ८वें अंक (१९०५–१९०६) में प्रकाशित कराया। पत्थरों पर उत्कीर्ण कविता के दुर्लभ उदाहरण होने के कारण तथा कच्छप प्रतीक पर पूर्णतः आधारित होने के कारण भारतीय प्रतीक शास्त्र की दृष्टि से ये कविताएँ अतीव महत्त्वपूर्ण हैं।
प्रो॰ पिशल के सटिप्पण सम्पादन के आधार पर प्रो॰ वी॰ एम॰ कुलकर्णी ने इनका अंग्रेजी अनुवाद तथा साथ में एक सानुवाद शब्दावली भी प्रस्तुत की। उन्होंने अनेकत्र त्रुटित पाठों के सुधार के सफल यत्न भी किये हैं। अनुवाद कुछ प्रसंगों को छोड़कर प्रायः समुचित है। इसकी संस्कृत च्छाया नहीं अभी भी करणीय है। इन पुस्तकों का प्रकाशन “कूर्मद्वयशतकम्” के नाम से २००३ में अहमदाबादस्थित प्राकृत एवं जैनविद्या के समृद्ध संस्थान “लालभाई दलपतभाई भारतीय संस्कृति विद्यामन्दिर” के निदेशक प्रो॰ जितेन्द्र बी॰ शाह के प्रयत्नों से हो सका।

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पहले शतक का नाम अवनिकूर्मशतम् है। शतक के कई पद्य अच्छे हैं। आश्चर्य है कि कच्छप की प्रशंसा करते हुए भी इसमें कहीं भी समुद्रमन्थन के प्रसंग में मन्दराचल का वहन करने वाले कच्छपावतार विष्णु का सम्बन्ध दिखाई नहीं पड़ता। वह कछुआ जो प्राचीन विश्वासों के आधार पर पृथ्वी का वहन करता है उसके धैर्य की प्रशंसा इसमें की गयी हैं। काव्य का भारी दोष यह है कि इसमें भावों और मुहावरों की इतनी अधिक पुनरावृत्ति है कि पढ़ते हुए कई बार मन उद्विग्न हो जाता है। कुल मिलाकर ४ या ५ विचारों को लेकर ही सारा शतक लिख दिया गया है, जैसे – कच्छप का पृथ्वी धारण रूप परोपकारी स्वरूप की प्रशंसा, उसके अतिरिक्त अन्य भारवहन समर्थों या असमर्थों की घोर निन्दा, कच्छप की जन्मदात्री माँ कच्छपी की कृतकृत्यता, उसके अतिरिक्त बाकी माँओं की असफलता। ऐसे लगता है किसी ने शीघ्रता में पद्य प्रणयन मात्र की क्रीडा की हो। इस शिथिलता को देखते हुए कहा जा सकता है कि प्रस्तुत रचना रामायणचम्पू जैसे अद्भुत काव्य की रचना करने वाले भोजराज की नहीं हो सकती। सम्भवतः इनके आश्रित किसी कवि की रचना उनके नाम से प्रसारित कर दी गई हो, यद्यपि अन्त में लिखी एक सुन्दर गाथा भोजदेव को ही इस ग्रन्थ का कर्ता मानती है –
कुम्मस्स वि वीसामो दिन्नो एक्केण भोअराएण।
हरिऊण वेरिआसं कुम्मसयं विरइयं जेण ॥१०७॥
(कूर्मस्यापि विश्रामो दत्तः एकेन भोजराजेन।
हृत्वा वैर्याशां कूर्मशतं विरचितं येन॥)
(धरणी को धारण करने के कारण अत्यधिक श्रान्त) कच्छप को भी केवल एक भोजराज ही विश्राम दे सके। जिन्होंने शत्रुओं की आशाओं को विफल करते हुए कूर्मशत की रचना कर डाली।
– इस पद्य में विद्यमान कूर्मशत पद में सुन्दर श्लेष है। उत्तम प्रकार से प्रजापालन तथा शत्रुशमन करते हुए भोज ने मानों पृथ्वी का भार उद्वहन करने में समर्थ १०० कच्छप (कूर्मशत) पैदा कर दिए। इसके अतिरिक्त शत्रुशामक भोज ने कूर्मशतक की रचना की।

भावों की पुनरावृत्ति के होने पर भी अनेकत्र इस कविता में कच्छप के रूपहीन, जातिहीन होने पर भी चारित्रिक गुणों के कारण उसके विश्ववन्द्य तथा सर्वोत्कृष्ट हो जाने की घटना को जिस मार्मिकता के साथ बार बार दर्शाया गया है वह भाव बहुत ही मूल्यवान् है। कवि इस भाव को इस प्रकार बार बार सामने रखता है कि यह सन्देश सार्वभौम हो उठता है कि गुणों से ही व्यक्ति माहात्म्य को प्राप्त होता है। जन्म के समय की सामाजिक श्रेणियाँ अथवा रूप इत्यादि अध्यवसायी को बहुत देर तक ऊँचाई पर जाने से रोक नहीं सकते। इस प्रकार यह कविता अद्यतन युग में सामाजिक सन्देश को भी देती प्रतीत होती है–
जाई देव्वायत्ता चरिअं पुण होइ पुरुससाहीणं।
अज्झवसायं पेच्छह केरिसओ सो हु कुम्मस्स॥२०॥
(जातिर्दैवायत्ता चरितं पुनर्भवति पुरुषस्वाधीनम्।
अध्यवसायं प्रेक्षध्वं कीदृशः स खलु कूर्मस्य॥)
(जाति अथवा जन्म तो भाग्य के अधीन है परन्तु आचरण स्वयं व्यक्ति के अधीन है। कच्छप का अध्यवसाय तो देखो यह किस प्रकार का है।)
 
अथवा–
विरएउ धुअं देवो भुअणस्स वि उप्परे तहा वि बला।
निअचरिएहिं पेच्छह कुम्मो च्चिअ उप्परे जाओ॥९७॥
(विरचयतु ध्रुवं देवो भुवनस्यापि उपरि तथापि बलात्।
निजचरितैः प्रेक्षध्वं कूर्म एव उपरि जातः॥)
(ब्रह्मा ने भले ही ध्रुव को संसार के ऊपर बना कर रख दिया हो लेकिन फिर भी, देखो, उसे धता बताते हुए अपने उत्कृष्ट आचरण से कच्छप ही ऊपर = उत्कृष्ट सिद्ध हुआ।)

एक अन्य  सुन्दर गाथा प्रस्तुत है–
कुम्मेण को णु सरिसो विणा वि कज्जेण जेण एक्केण।
जह निअसुहस्स पट्ठी तह दिण्णा भुअणभारस्स॥
(कूर्मेण को नु सदृशो विनापि कार्येण येनैकेन।
यथा निजसुखाय पृष्ठं तथा दत्तं भुवनभाराय॥)
(कच्छप की बराबरी कौन कर सकता है जिसने बिना किसी स्वार्थ के ही जिस तरह अपने सुखों को पीठ दिखा दिया उसी प्रकार पृथ्वी के भार को पीठ दे दी। )
पीठ दिखाना विमुख होने के अर्थ में मुहावरा है। पीठ देना इस प्रयोग के द्वारा कवि ने चमत्कार पूर्वक एक ही प्रयोग से दो सुन्दर अर्थों की प्राप्ति कर ली है।

संस्कृतविद्या–धर्मविज्ञान संकाय में हालिया नियुक्ति के प्रकरण में संस्कृत–जनों में ही दो मत हो गये हैं। यह पर्याप्त दुःखद है। संस्कृत–जनों में जो लोग विवेकशील हैं उन्हें बड़ी ही दुविधा का सामना है। इस नियुक्ति का समर्थन करने वालों के पास संस्कृत की सार्वजनीनता धूमिल हो जाने का तर्क है तो इसका विरोध करने वालों के पास संस्कृत विद्या के मूल रूप तथा उसकी वास्तविक भावना को बचाए रखने की चिन्ता। लेकिन, इस प्रकरण में समर्थन और विरोध की धुन्ध के पार अगर हम अगर कुछ देख पाएँ तो हमें पता चलेगा कि इसके बहाने संस्कृत की परम्परा और भारतीय हिन्दू मानसिकता को हीन, दक़ियानूसी सिद्ध करने के दुष्प्रयास जारी हैं। इसकी आड़ में संस्कृत को लेकर जो अवैज्ञानिक, मूर्खतापूर्ण बातें कही जा रही हैं उनका समर्थन कोई भी संस्कृतज्ञ अथवा भारत–विद्या को ठीक से समझने वाला नहीं करेगा।
इस प्रकरण के माध्यम से संस्कृत के चिरशत्रुओं को स्वर्णिम अवसर हाथ लगा है। इनमें से कुछ लोग अज्ञान से उपहत हैं तो कुछ लोग अपनी विचारधारा के इस तरह ग़ुलाम हैं कि उसे सिद्ध करने के लिए भाषाशास्त्र अथवा इतिहास किसी के भी अननुकूल बातें करने से गुरेज़ नहीं करते। प्रसंग की सूक्ष्मता का विवेक किए बिना और संस्कृत से सम्बद्ध अनगिनत मुस्लिम छात्रों और अध्यापकों की संख्या को नज़र–अन्दाज़ करते हुए कुछ (प्रियदर्शन) इस प्रसंग को राम–शम्बूक से जोड़ रहे हैं तो कुछ (वुसअतुल्लाह) इसे पाकिस्तान में अहमदियों के दमन से जोड़कर देख रहे हैं। अनेक प्रज्ञाहीन इसे संस्कृत–बैशिंग (दमन) का एक दुर्लभ अवसर मानकर जो मन में आये कह रहे हैं। अभी एक (कु)प्रसिद्ध विद्वन्मन्य का विचित्र सूचनाओं से भरा लेखन पढ़ने में आया। इनका कहना है कि संस्कृत की पैदाइश ईरानी और प्राकृत के मेल से हुआ। इनका अद्भुत लेखन उद्धृत है–

” असल में संस्कृत एक खिचड़ी या मेलजोल से बनी भाषा है। बहुत प्राचीन समय में ईरानी शासकों के काल में जंबूद्वीप में सत्ता के मुख्य पदों पर ईरानी काबिज हो गए थे। ये लोग बाद में बहुत लंबे समय तक सभी शासकों के समय अपने प्रमुख पदों पर बने रहे। इन ईरानियों की भाषा का जब प्राकृत भाषा के साथ मेल हुआ तो एक नवीन भाषा का जन्म हुआ। इसी भाषा में जंबूद्वीप की आरंभिक रचनाओं का जन्म हुआ। फिर इसमें ऋग्वेद लिखा गया। इसीलिए ऋग्वेद के बहुत से शब्द जेंदावेस्ता में हूबहू मिलते हैं।”
ध्यान से कई बार इस उपर्युक्त मूर्खतापूर्ण अंश को पढ़िए। क्या खोज है! बिलकुल इतिहास और भाषाशास्त्र को उलट पलट कर देने वाली। भाषाशास्त्र के सामान्य अध्येता को भी वेद और अवेस्ता के पौर्वापर्य का पता होता है। अवेस्ता में विद्यमान अपभ्रंशीकरण की प्रवृत्ति उसे निश्चित रूप से वेदों से परवर्ती सिद्ध करती है। लेकिन इन्हें इन शब्दों का अर्थ भी नहीं मालूम। इन्हें यह भी पता नहीं कि ईरानी कोई भाषा नहीं बल्कि भाषा परिवार है जैसे आर्य परिवार। उसके अन्दर अवेस्ता तथा प्राचीन शिलालेखीय फ़ारसी नामक दो प्रमुख भाषाएँ आती हैं। लेकिन इनको इससे क्या? इन्हें तो यह भी पता नहीं कि अवेस्ता और ज़ेन्द–अवेस्ता में क्या भेद है। ज़ेन्द बहुत बाद में अवेस्ता पर पहलवी भाषा में लिखी गई टीका मात्र है। लेकिन चूंकि इन्हें पढ़ने वालों में भी बराबर का अज्ञान व्याप्त है इसलिए पाठकों को भी इससे क्या? लेकिन ये विद्वान् जिस अदक्षिण मार्ग से सम्बद्ध
हैं उनके यहाँ रात दिन वैज्ञानिक सोच की दुहाई दी जाती है। उनके प्रति प्रश्न यह बनता है कि वे अपनी स्वार्थपूर्ण बातों के समर्थन में निर्लज्जता भरे अवैज्ञानिक तर्क कब तक देंगे?
आगे यह दुर्धर्ष विद्वान् लिखता है–

“अब्राहम की अग्निपूजक पीढियां संस्कृत में सदियों से किसी और का प्रवेश नहीं होने देना चाहती हैं।
बी.एच.यू. में फिरोज के प्रकरण को इस रूप में देखेंगे तो सब समझ आ जाएगा।”

इस वाक्य को पढ़कर बड़े से बड़ा इतहासविद् और देवशास्त्री अपने बाल नोंच लेगा। लेखक भारतीयों को अब्राहम की अग्निपूजक पीढ़ी कह रहा है। कहाँ से कहाँ का सम्बन्ध बिठाया है। सब जानते हैं कि अब्राहम तथा उससे उत्पन्न तीनों प्रमुख धर्म – यहूदी, ईसाई और इस्लाम निराकार ईश्वर की उपासना के क़ायल हैं…. अग्निपूजक हैं पारसी या ज़रदुश्ती जो कथमपि अब्राहमिक नहीं बल्कि आर्य हैं। इस असम्भव गँठजोड़ को फिर हिन्दुस्तान ले आकर सीधे काशी हिन्दू वि॰वि॰ के संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय में दाख़िल कर रहे हैं।

इस अंश को पढ़ कर पता चल जाना चाहिए कि इस प्रकरण का दुरुपयोग कुछ संस्कृत(ति)–द्वेषी लोग संस्कृत विरोध के लिए कर रहे हैं।

आगे वह एक ऐसी बात कहते हैं जिसका राह चलते कोई भी नारे की तरह प्रयोग करके संस्कृत को एक एड़ लगा लेता है–

“बाद में ब्राह्मण-व्यवस्था ने संस्कृत को इतना ग्लोरीफाई और अछूत बना दिया कि वह एक खास वर्ग की भाषा हो गई।”

इसका सीधा तात्पर्य यह है कि पुरोहित वर्ग द्वारा उपगृहीत हो जाने के कारण संस्कृत सीमित हो गई या मर गई। अब, इन लोगों के अद्भुत मस्तिष्क में कभी यह प्रश्न क्यों नहीं आता कि पालि, अपभ्रंश या पुरानी हिन्दी जैसी भाषाएँ क्यों सीमित या नष्ट हो गईं? उन्हें तो किन्हीं पुरोहितों ने नहीं जकड़ रखा था?
वस्तुतः भाषा का परिवर्तित होना या नष्ट होना उसकी स्वाभाविक प्रक्रिया है। आज से २५०० वर्षों या उससे भी बहुत पहले जो संस्कृत भाषा प्रचलित थी समय बीतने के साथ उसका कमरंग होना नितान्त भाषावैज्ञानिक परिघटना है। भाषाओं का नष्ट होना आश्चर्यजनक नहीं बल्कि संस्कृत की भाँति किसी भाषा का हज़ारों वर्षों तक समाज में अनेक स्तरों पर सघनतया उपस्थित रहना आश्चर्यजनक है। इस असंभव से कृत्य को सम्भव बनाने के लिए विद्वानों , कवियों, दार्शनिकों, व्यासों, पुरोहितों सहित भारतीय समाज के सभी वर्गों ने पीढ़ियों तक कितना परिश्रम किया है, क्या इसको ये लोग कभी भी पहचान पाएँगे या इस भारतीयों की इस अभूतपूर्व उपलब्धि पर गर्व कर सकेंगे? क्या उन्हें पता है कि जिस संस्कृत व्याकरण को वे अज्ञानवश कठिन कह कर कोसते हैं वह (ख़ुद चाम्स्की के अनुसार) संसार का पहला व्युत्पादनात्मक व्याकरण है, जिसके बारे में प्रख्यात ईरान–विद् मार्टिन हेग ने कहा था– “काश, ईरानियों ने भी पाणिनि, कात्यायन और पतञ्जलि की तरह वैयाकरण पैदा किए होते तो आज अवेस्ता भाषा को समझना इतना कठिन न होता”।

दुर्भाग्य या सौभाग्य से भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में लोगों को बिलगाने के बहाने बहुत हैं जबकि ऐसे तत्त्व बहुत कम हैं जो लोगों को एक साथ जोड़ सकें। सौभाग्य से संस्कृत इनमें से एक प्रखर तथा व्यापक तत्त्व है। भारत की भावना से द्वेष करने वालों को ऐसे योजक तत्त्वों से स्वाभाविक कष्ट होता। ऐसे लोगों के संस्कृत द्वेष का कारण वस्तुतः संस्कृति–द्वेष है। इन लोगों को यह कष्ट भी है कि संस्कृत इतनी तीव्रता से विमर्श के केन्द्र में क्यों आ रही है। इन्हें किसी भी तरह के संस्कृत विभाग मे किसी भी हिन्दू या मुस्लिम की नियुक्ति या उसके विरोध में रुचि नहीं है। उन्हें तो संस्कृत की उपस्थिति मात्र से अरुचि है। इसलिए बिना सोचे समझे ये उसका विरोध करते हैं।
संस्कृत के पुराधाओं को आगे आकर प्रकृत प्रसंग का कुछ मध्यम मार्ग निकालना चाहिए तथा संस्कृत के चिर विरोधियों को उनकी मूर्खतापूर्ण टिप्पणियों का अवसर नहीं देना चाहिए।फ़िल हाल तो अयोग्य विश्वविद्यालयीय प्रशासन के चलते स्थानीय स्तर पर इस विवाद का अन्त नहीं दीखता।

प्रस्तुत गाथा में श्लेष के द्वारा महाराष्ट्री प्राकृत की भाषिक विशेषताओं की तुलना महाराष्ट्री नायिका के सौभगत्व के साथ की गयी है। यहाँ, महाराष्ट्री प्राकृत के पक्ष में उसकी 3 भाषिक विशेषताएं दिखाई गई हैँ जो इस प्रकार हैं –
१. इसमें संस्कृत की तरह विषम व्यंजनों का संयोग प्राप्य नहीं है। जैसे ‘प्राप्त’ का ‘पत्त’।
२. इसमें अनादि तथा असंयुक्त मध्यगत अल्पप्राण व्यंजनों के लोप की प्रवृत्ति होती है। जैसे ‘गत’ का ‘गअ’।
३.इसमें स्वाभाविक छ के अतिरिक्त एक नैमित्तिक छ भी होता है जो क्ष के स्थान पर आदिष्ट होता है। जैसे ‘रक्षा’ का ‘रच्छा’।

गाथा इस प्रकार है –

अविसमसंजोअसुहा गयमज्झअविंजणा महुरवण्णा।
कं ण परिवट्टिअच्छा गेण्हइ मरहट्ठिआ हिअए?।।

(अविषमसंयोगसुखा गतमध्य{क}व्यंजना मधुरवर्णा।
कं न परिवर्तिताक्षी/परिवर्तित-च्छा गृह्णाति महाराष्ट्री हृदये?।।)

सरलता से प्राप्त होने के कारण सुखद {अविसमसंजोअसुहा}, मध्य (कटिभाग) की व्यंजना (प्राकट्य) से रहित {गयमज्झअविंजणा} , सुन्दर रंग वाली {महुरवण्णा}, चंचल आँखों से युक्त {परिवट्टिअच्छा} महाराष्ट्री (नायिका) की तरह –

विषम संयोग से रहित होने के कारण सरलता से उच्चारण योग्य {अविसमसंजोअसुहा}, मध्यगत (क-ग आदिअल्पप्राण) व्यञ्जनों से रहित {गयमज्झअविंजणा}, मधुर वर्णों वाली {महुरवण्णा}, परिवर्तित छ-वर्ण वाली {परिवट्टिअच्छा} महाराष्ट्री (प्राकृत भाषा) किसका हृदय न चुरा ले?!”

 

 

 

The poem (विडम्बना) incorporated in course

Jamia Millia Islamia has a vibrant Sanskrit department. Though newly established, this department has emerged as a prominent centre for Sanskrit studies in delhi with its diligent faculty members and capable guidance of Prof. Girish Pant as a head of the department. In designing of course too, the faculty has shown several innovations by introducing courses like modern Sanskrit literature and Sanskrit journalism etc.
I was delighted to see one of my poems “विडम्बना” in a paper of modern Sanskrit literature. I thank all the faculty members for choosing the same to be taught with great masters of Sanskrit literature.
Text and Hindi translation of the poem composed in classical style using शालिनी metre, are as follows –

विडम्बना

स्वल्पो धर्मश्चर्यते चेत्कदाचित्
संजायन्ते दीर्घदम्भातिरेकाः ।
स्नेहेऽत्यल्पे वर्षविप्रुट्पवित्रे
सम्पद्यन्ते वासनापल्वलानि ॥

दभ्रे दाने कुत्रचिद्दीयमानेऽ
प्यादीप्यन्ते दर्पदुर्वारवेगाः ।
एकं वाक्यं स्थाप्यते चेत्प्रशस्तौ
तस्मिन् क्षिप्ता जायते चाटुचम्पूः ॥

एकं पुष्पं कोरकादुद्गताङ्गं
तच्छेदार्थं कण्टकानां सहस्रम् ।
स्तोका शुक्तिर्भ्रूणसंजातमुक्ता
भाग्याद्वक्रात् सा लुठन्नक्रचक्रा ॥

एको जीवो छागवत्साभजीवो
दैवाहूता भूरिशो मृत्युदूताः ।
एकं चित्तं किञ्चिदाध्यातसत्त्वं
तन्मोहायाभाति सर्वत्र माया ॥

एकोद्गन्तुं वर्तिका वर्तमाना
तामुत्कर्तुं सोद्यमः श्येनसंघः ।
अर्धप्राणा कम्पमानान्तरैणी
शूरायन्ते तत्र हाऽश्रान्तसिंहाः ॥

पद्मासद्माभाति के पद्मिनी तां
हन्तासारैर्हन्ति शीतं तुषारैः ।
एकं फुल्लं पाटलस्य प्रसूनं
भीष्मग्रीष्मं भृष्टवत् तिग्मपादैः ॥

-हिन्दी–

१–हम थोड़ा सा कभी धर्म कर आचरण कर पाते हैं तो पाखण्डों की अति हमारे पीछे पड़ जाती है। बरखा की बूंदों जैसे पवित्र प्रेम की थोड़ी सी झलक भी अगर हमें मिल पाई तो दूसरी वासना के जोहड़ उछड़ने लगते हैं।

२– थोड़ा सा भी अगर हम दान कर पाते हैं तो आत्मप्रशंसा का दुर्वार वेग उसे सारा का सारा नष्ट भ्रष्ट कर देता है। अगर हम किसी के परति प्रशंसा का एक वाक्य कहने जाते हैं तो उसी में चाटुकारिता का पूरा चम्पू प्रक्षिप्त हो जाता है।

३–एक फूल कली से मुँह निकालता है तो उसे बींधने के लिये हजारों काटे तैयार रहते हैं। इधर सीपी के भ्रूण में मोती विकसित नहीं हुई कि घड़ियालों की पङ्क्तियाँ उसे घेर लेती हैं।

४–बकरी के बच्चे जैसी आधी जान वाली जान पर दुर्दैव के बुलाये यमराज के दूतों का जमघट हो उठता है। चित्त ने कहीं थोड़ा सा सत्त्व गुण क्या ग्रहण किया उसे मोहित करने के लिये माया विश्वव्यापिनी हो उठी।

५– बेचारी बटेर उड़ना सीख कर उठी ही थी कि उसके लिये बाजों का पूरा झुण्ड तैयारी करने लगा। आधे प्राण का अन्दर ही अन्दर काँपती हिरन का बच्चा जिस पर शेर बिना थके शूरता दिखाते हैं।

६–जल में शोभा की निवासभूत पद्मिनी सुशोभित ही हो रही थी कि हाय! तुषार ने धारा बाँध कर उसे नष्ट कर दिया। गुलाब का एक फूल खिला ही चाहता था कि गर्मी ने उसे कठोर किरणों से भून के रख दिया।77072436_10215894758623495_9028559239500529664_o

Śtāvadhāniracanāsaṃcayanam (Sanskrit poetry collection of Śtāvadhāni Dr. R. Ganesh) published by Sahitya Akademy.

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साहित्य अकादमी ने आधुनिक संस्कृत के महान् कवियों में अन्यतम शतावधानी डॉ॰ रा॰ गणेश की ७ सुन्दर काव्यकृतियों “साप्तपदीनम्” का “शतावधानिरचनासञ्चयनम्” के नाम से प्रकाशन किया है। शतावधानी गणेश आधुनिक भावबोध से सम्पन्न अत्यन्त प्रौढ एवं ऊर्जस्वल कवि हैं। इनकी कविता के रसन से आधुनिक युग में संस्कृत के प्रति यत्किञ्चित् नैराश्य भी जाता रहता है। संस्कृत जनों के लिए यह संकलन अत्यन्त उपादेय है ही साथ ही जो भी जन समकालीन संस्कृत साहित्य में रुचि रखते हैं उन सबके लिए यह संग्रह अवश्य द्रष्टव्य है। पुस्तक के प्रारम्भ में कवि के आत्मकथ्य के बाद उनके रचनावैशिष्ट्य से सम्बन्धित लगभग २१ पृष्ठों का सम्पादकीय है (इसे https://www.academia.edu/…/%E0%A4%B6%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A…
पर प्राप्त किया जा सकता है।)
संकलन में पद्यों को सुबोध तथा सुपरिचित बनाने के लिए लगभग ६०० टिप्पणियाँ जोड़ी गई हैं। पुस्तक की सुप्रस्तुति तथा उसे सर्वशुद्ध रूप में लाने में स्वयं कवि Ganesh Kavi तथा बन्धु शशिकिरण का अपूर्व योग रहा। वस्तुतः अधिकतर कार्य इन्हीं महानुभावों द्वारा किया गया। इस संकलन की परिकल्पना आचार्य Rdhavallabh Tripathi जी द्वारा की गयी थी। उन्हें धन्यवाद कि इस कार्य के लिए उन्होंने मुझे चुना– सम्भावनागुणमवैमि तमीश्वराणाम्। प्रूफ़ संशोधन के लिए मित्रों तथा छात्रों Aneesh Mishra Tekchand Pratihar सर्वेश त्रिपाठी Suhasini Mishra Kr Mohit Ganesh Tiwari के योगदान अविस्मरणीय हैं। सुन्दर तथा सुरुचिपूर्ण प्रकाशन के लिए साहित्य अकादमी के सम्बद्ध विद्वानों Kumar Anupam जी तथा अजय शर्मा जी का आभार।
मेरे लिए सौभाग्य तथा हर्ष का विषय है कि इस पुस्तक के माध्यम से संस्कृत के जीवित आश्चर्य शतावधानी रा॰ गणेश के साथ मेरा नाम जुड़ सका!

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शतावधानिनः रा॰ गणेशस्य सौरभ्यामृतस्यन्दिभ्यः काव्यारामेभ्यः समुच्चित्य समुच्चित्य सप्तानां काव्यगुच्छानां– सुमनोमयम्, अग्राम्यम्, उज्ज्वलज्वाला, भावयित्री, अनन्योक्तिः, मुक्ताशु (शू) क्तिः, शतावधानशक्वरी इत्यभिधानां संग्रहः ऐदम्प्राथम्येन प्रकाशमायाति साप्तपदीनमिति नाम्ना। शब्दार्थसौन्दर्यदृष्ट्या, भाषापरिपाकपरिपूर्णतया, प्रतिपदं संस्कृतसाहित्यस्य सहस्राब्दव्यापिसमृद्धपरम्परायाः प्रगाढं स्मारकत्वात् आधुनिकजागतिकभावावगाहकत्वाच्च अयं संग्रहः प्राचीनमाधुनिकं च संस्कृतकाव्यवाङ्मयं सीव्यतीव प्रतिभाति। सत्सु अपि एवंविधेषु सर्वेषु गुणेषु शतावधानिकृतिरियं कविवैशिष्ट्याधिक्यात् प्रायः पूर्वेषामपि काव्येभ्यः तत्र तत्र अतिरिच्यते। काव्यस्यास्यास्वादः प्रचुरप्रस्तुतनवरसरसनक्षण इव, विद्वदौषधपानमिव, पुराणकथारण्यरमणमिव इव, छन्दोवाटिकाविहरणम् इव, नवीनशब्दपरिचयोत्सव इव रसिकजनमनोभिः नितरां स्पृहणीयो भवति।

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