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                               निश्शब्द–नूपुर

                            (रूमी की १०० ग़ज़लों का हिन्दी अनुवाद)

                                                      -प्रकाशन पूर्वसूचना-

(DNA- Fariha Iftekhar)

https://www.dnaindia.com/delhi/report-rumi-s-ghazals-will-soon-be-available-for-hindi-readers-2638134

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To bring the work of the globally celebrated Persian poet and Sufi mystic Maulana Jalaluddin Balkhi popularly known as “Rumi” to Indian readers, a Delhi University professor has translated 100 of his unknown ghazals to the Hindi language. This will be the first time when such a volume of Rumi’s work will be translated to Hindi directly from Persian. The translation available as of now is mostly done from English versions of the poet’s work.

According to Dr Balram Shukla, who teaches Sanskrit at the University and has a masters degree in Persian, he has been working on this project for the past six years. “Rumi is not a just a poet, he is a magician. I read him while pursuing masters in the Persian language and literature. I was mesmerised by the beauty of his writing. I wanted to make his work accessible for our Hindi readers. So, I decided to translate some of his finest ghazals in Hindi. It turned out to be a delightful journey,” he said.

The book, Nihshabd Noopur, which is divided into three parts — Baab-e-talab (spiritual yearning), Baab-e-tarab (divine ecstasy) and Baab-e-visaal (union)– will hit the stands in August with the help of Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya, Maharashtra. “Even though I have tried my best to match the Persian rhythm while translating these ghazals, it still can not match the elegance of Persian language,” Shukla said.

However, it was not an easy task for the professor. “Being fluent in the Persian language does not mean it was an easy task. I had come in contact with several scholars in Iran during the process. I used to call them every time when I got stuck while translating. I wanted to keep the beauty of Persian intact,” he said.

The publication of Shukla’s work has been sponsored by the Iran government under its ambitions “Translation of Persian” (ToP) project.”The Iran government is very keen on the cultural exchange by making our literature accessible to the people of other countries. We are currently supporting many such works globally under our ToP scheme, wherein we encourage the translation of Persian literature in other languages. And, this work is unique as it has been done directly from Persian,” said Ali Dehgahi, cultural counselor at Iran Culture House in the national Capital.

According to the Head of Department (HoD) at DU’s department of Persian, Dr Aleem Ashraf Khan, the work will help to make Rumi’s work more “reachable” in India. “A large section of our population consists of Hindi reader and they are presently deprived of Rumi’s work. Not everyone can read English. It will help more people to read and know about the eternal poet,” he said.

                                 समीक्षा

                प्रो. गिरीश्वर मिश्र (कुलपति, महात्मा गान्धी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय; वर्धा – महाराष्ट्र)

मौलाना जलालुद्दीन रूमी की १०० ग़ज़लों का मूल फ़ारसी से हिन्दी अनुवाद  ‘निःशब्द–नूपुर’ का प्रकाशन एक स्वागत योग्य घटना है। इस संकलन का प्रकाशन ईरान सरकार के आर्थिक सहयोग से महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा तथा राजकमल प्रकाशन, दिल्ली के संयुक्त तत्त्वावधान में किया गया है। इस पुस्तक की बड़ी विशेषता यह है कि इसके द्वारा रूमी सम्भवतः पहली बार सीधे फ़ारसी से हिन्दी में अनूदित हुए हैं। इस पुस्तक में पहले फ़ारसी ग़ज़लों का देवनागरी में लिप्यन्तरण प्रस्तुत किया गया है तदनन्तर उनका हिन्दी अनुवाद दिया गया है। अन्त में मूल ग़ज़लों को फ़ारसी लिपि में भी रखा गया है। पुस्तक के अन्त में दिये गये महत्त्वपूर्ण परिशिष्टों में फ़ारसी काव्य भाषा को समझने के महत्त्वपूर्ण उपकरण जुटाए गए हैं। इसमें ग़ज़लों में प्रयुक्त सभी छन्दों को ईरानी तथा भारतीय काव्यशास्त्रीय रीति से गणनिर्देश पूर्वक समझाया गया है, क्लासिकल फ़ारसी कविता के लिए आवश्यक संक्षिप्त फ़ारसी व्याकरण जोड़ा गया है तथा प्रत्येक शब्द का अर्थ भी दिया गया है। इस प्रकार अनुवाद मात्र न होकर प्रस्तुत पुस्तक रूमी–रीडर के तौर पर काम कर सकने योग्य है।
रूमी सम्पूर्ण विश्व में अपनी आध्यात्मिक कविता मसनवी के कारण अत्यधिक प्रसिद्ध हैं। उनकी ग़ज़लें मसनवी की अपेक्षा कम प्रसिद्ध हैं। रूमी की दीवाने शम्स में संकलित ग़ज़लें ऊर्जस्वी काव्य के दुर्लभ उदाहरणों में से हैं। रूमी की ग़ज़लें सामान्य कविताओं की तुलना में भिन्न क़िस्म की हैं। इनके प्रत्येक ग़ज़ल का प्रत्येक शे,र अनुभूति की परिपूर्णता से उच्छलित है। रूमी प्रेम से आपादमस्तक भरने के बाद ही उन्होंने कविताएँ लिखनी शुरू की थी। उनकी कविता मात्र काव्यात्मक चमत्कारों को प्रदर्शित कर रसिकों को लुब्ध करने तक पर्यवसित नहीं होती, वह हृदय से निकल कर मस्तिष्क और हृदय को भिगोती हुई आत्मा तक का स्पर्श कर लेती है। सामान्यतः कवियों की पहुँच केवल कविताओं तक ही होती है, वे कविताओं को साध्य मानते हैं। परन्तु रूमी के पास कुछ ऐसी वस्तु भी है जिसके आगे उन्हें अपनी कविताएँ गौण लगती हैं। जब वे कोई ग़ज़ल शुरू करते हैं तो उस रस सागर से निकले हुए होते हैं, और ग़ज़ल के समाप्त होते–होते वे फिर उसी की याद में विह्वल होने लगते हैं। यही कारण है कि उनकी लगभग अधिकांश ग़ज़लों के अन्त में ख़ामोशी और चुप रहने की नसीहत का भाव ज़रूर दिखाई पड़ता है। उनकी उच्चकोटि की रसप्लुत कविता भी उन्हें महाभाव की निरन्तरता में कुछ क्षणों का बाधक ही बनती है। इस प्रेम की परम स्थिति में नख से सिख तक डूबे रूमी जब इहलोक तक वहाँ की कुछ भी ख़बर ले आते हैं तो वह हमारे लिए आश्चर्यकारी ही होता है। अनुभूतियों की यह अपरिचित विलक्षणता हमें किसी दूसरे कवि के यहाँ नहीं मिल पाती। इसी कारण रूमी के बारे में प्रचलित है कि वे शाइर नहीं साहिर (जादूगर) हैं।इसलिए इनकी कविताएँ साहित्यिक उपलब्धि के साथ–साथ आध्यात्मिक साधना की सामग्री भी हैं। वे व्यक्तित्व के परतों को खोलती हैं। उनकी समस्याओं को पहचानती हैं। उनका इलाज सुझाती हैं, और यदि उनका निरन्तर मनन किया जाए तो वे हमारा अन्तस भी परिवर्तित करती हैं।
रूमी द्वारा प्रवर्तित सूफ़ियों के मौलवी सम्प्रदाय ने समा अर्थात् आध्यात्मिक नृत्य को भी अपने सम्प्रदाय में सम्मिलित किया था। उनकी गजलें मुख्यतः दफ की थाप और नै (बाँसुरी) की लय पर गाने के लिये अथवा गाते नाचते हुए निकली हैं । इस कारण इन गजलों में जो ऊर्जा, जो प्रवाह, जो संगीतात्मकता अथवा जो लयात्मकता मिलती है वह अन्य किसी भी फ़ारसी कवि के यहाँ दुर्लभ हैं। इनके गजलों में आन्तरिक अन्त्यानुप्रास(=काफिये) प्रयोग प्रचुर है जिनसे कविता में अभूतपूर्व लयात्मकता आ जाती है। फ़ारसी में इन छन्दों को देखें तो बहुत ही सुन्दर तथा संगीतात्मक प्रतीत होती हैं जबकि उनका अनुवाद करने पर वह स्वभावतः नष्ट हो जाता है। प्रस्तुत संकलन में जान बूझ कर ऐसी गजलों को अनुवाद के लिये चुना गया है जो कथ्य प्रधान हैं तथा जिसमें सुन्दर तथा उच्च काव्यार्थ की व्यञ्जना है। अतः फ़ारसी के किसी अध्येता को यह संकलन रूमी का प्रतिनिधि संस्करण न लगे यह स्वाभाविक है। इसका प्रमुख कारण यह है कि यह संग्रह हिन्दी भाषी पाठकोंको रूमी से सीधे सीधे साक्षात्कार करने केलिये किया गया है।
संकलन का एक आधार भारतीय पाठक की काव्य–रुचि भी है। फ़ारसी कविता कीअनेक काव्य रूढियाँ या प्रचलन ऐसे भी हैं जो भारतीय मानस को विचलित कर सकती हैं। कारण यह है कि काव्य प्रयोग अथवा उपमानों में बहुत से भाषा–सापेक्ष होते हैं, जो दूसरी भाषा केलिए अजीब भी लग सकते हैं। ऐसी गजलों की प्रस्तुति से बचा गया है। अन्यथा रसनिष्पत्ति की अपेक्षा रसभंग की आशंका अधिक हो जाती। मौलाना की ग़ज़लों में कई शे,र ऐसे हैं जो सुन्दर और महत्त्वपूर्ण तो हैं, लेकिन उनमें कई कई अन्तःकथाएँ, मिथक तथा ऐतिहासिक संकेत भी मौजूद हैं, जिनको जाने बिना उन शे,रों को नहीं समझा जा सकता। प्रक्रिया गौरव की आशंका से बचने के लिए ऐसे श,रों को प्रस्तुत संग्रह में कम से कम ग्रहण किया गया है।
प्रस्तुत संग्रह को तैयार करने के लिए अनुवादक द्वारा कई तरह के प्रामाणिक तथा मूल फ़ारसी स्रोतों से सहस्राधिक ग़ज़लों का पारायण करने के बाद उनके मध्य से १०० ऐसी ग़ज़लों का चुनाव किया गया है जिनका अनुवाद सम्भव हो सके तथा अनुवाद के बाद वे भारतीय जनमानस के लिए आस्वादन की दृष्टि से उपयुक्त हों। प्रस्तुत संग्रह को रूमी के एक लोकप्रिय संग्रह के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है तथा इसके प्रकाशन का लक्ष्य यह है कि पाठकों के लिए दुरूह हो कर भार न बन जाए। अतः ऐसी ग़ज़लों से जान बूझ कर बचा गया है जिनमें अरबी तथा ईरानी पृष्ठभूमि की अपरिचित पुराकथाओं अथवा गहन काव्यरूढियों का प्रयोग किया गया है। यद्यपि इसी तरह के वे शे,र जिनका काव्यात्मक मूल्य  अधिक है, उन्हें सम्मिलित किया गया है।प्रस्तुत संकलन के ३ विभाग हैं। पहला बाबे तलब (साधन खण्ड), दूसरा बाबे तरब (विभूति खण्ड) तथा तीसरा  बाबे विसाल (भरतवाक्य)।
प्रस्तुत अनुवाद दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में अध्यापक डा॰ बलराम शुक्ल द्वारा किया गया है। डा॰ शुक्ल संस्कृत के अतिरिक्त फ़ारसी भाषा में भी दक्ष हैं।इश्क़ो आतश नाम से इनकी फ़ारसी ग़ज़लों का एक संग्रह ईरान से भी प्रकाशित हो चुका है। इन्होंने फ़ारसी तथा भारतीय भाषाओं के पारस्परिक अन्तःसम्बन्ध पर अनेक विचारपूर्ण लेख लिखे हैं। इनके शोध का प्रमुख क्षेत्र भारतीय ज्ञान विज्ञान के फ़ारसीकरण से सम्बन्धित है।
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                                             ईरान में लोकार्पण (१८।०८।२०१८)

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https://financialtribune.com/articles/art-and-culture/92036/rumi-s-ghazals-in-hindi

Sunday, August 19, 2018

Rumi’s Ghazals in Hindi

(Financial Tribune- Iran- 10.08.2018)

Abook of Hindi translation of a selection of Rumi’s ghazals was unveiled at a ceremony in Hozeh Honari (Art Bureau) in Tehran on Saturday in the presence of its translator Balram Shukla.

Rumi was a 13th century Persian poet, scholar and mystic. His poems have been widely translated into many of the world’s languages

The selected poems, about a hundred ghazals, have been rendered into Hindi by Professor Shukla of Delhi University.

This is the first time such a volume of Rumi’s work has been translated into the Hindi language directly from Persian.

Earlier translations were mainly from the English versions of the poet’s work, Dnaindia.com reported.

A ghazal is a poetic expression of both the pain of loss or separation and the beauty of love in spite of that pain.

Shukla who teaches Sanskrit and has a master’s degree in Persian, has been working on the book for the past six years.

“I read Rumi’s works while pursuing (my) MA in Persian language and literature. I was mesmerized by the beauty of his writing and wanted to make his work accessible to our Hindi readers. So I decided to translate some of his finest ghazals into Hindi,” Dnaindia.com quoted Shukla as saying.

“Even though I have tried my best to follow the tone and rhythm of the Persian ghazals in translation, my work still cannot match the beauty of the original poetry.”

A deep grasp of Rumi’s original poetry requires excellent command of Persian language. With such command, one may succeed in peeling back the multitude layers of meaning.

Shukla has picked the title “Nihshabd Noopur”, meaning dancing in silence in Hindi language for the book, “since many of Rumi’s ghazal’s end by inviting people to silence”, Shukla told the Financial Tribune.

Silence is really valuable in ethics and mysticism, a concept visited also by other Persian mystics and poets like Sa’di.

It is believed that it is in silence that the soul gets the chance to look inward and opens a window for the voice of God to be heard.

Shukla’s book is divided into three parts: Baab-e-talab (spiritual yearning), Baab-e-tarab (divine ecstasy) and Baab-e-visaal (union).

Printed by Rajkamal Prakashan Publishing House in India, the translation was made possible through collaboration between Translation of Persia, a Tehran-based center active in translating and publishing of Persian works into other languages and Mahatma Gandhi International Hindi University based in the city of Wardha in India.

 

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Poster prepared by Hoze e Honri, Tehran-Iran to inform the occasion of book launching

Report of Fars News

https://www.farsnews.com/news/13970527000948/درخشش-شاگرد-به-مانند-استاد-دهرمیندرنات-اشعار-مولوی-به-هندی-ترجمه-شد-

به گزارش خبرنگار کتاب و ادبیات خبرگزاری فارس، مراسم رونمایی از کتاب «گزیده غزلیات مولوی به زبان هندی» ترجمه بلرام شکلا استاد زبان سانسکریت دانشگاه دهلی هند و شاعر پارسی‌گو ظهر امروز در سالن سلمان هراتی حوزه هنری برگزار شد.

* حسینجانی: پروفسور شکلا توانست همانند استادش دهرمیندرنات بدرخشد

سعیده حسینجانی مدیر مرکز ترجمه حوزه هنری در سخنرانی اظهار داشت: پروفسور شکلا چهره شناخته شده زبان فارسی و سانسکریت در هند هستند.صاحب نام بوده و به چند زبان شعر می‌گویند. او توانسته در اشعارش زیبایی‌های درونی و محتوایی را نشان دهد.

به گفته مدیر مرکز ترجمه حوزه هنری بلرام شکلا این اقبال را داشت که اولین شعرها را از زبان خود آغاز کرد و سپس شعر فارسی را سرود که اشعار فارسی او چیزی از سانسکریت کم ندارد. او توانست با سرودن شعر در وصف حضرت علی (ع) به مانند استادش دهرمیندرنات بدرخشد و به نوعی ادامه دهنده راه او باشد.

وی افزود:‌اشعار او مقفی و موزون است و حتی قافیه‌های درونی را در اشعارش رعایت کرده است. او توانسته پس از خواندن 4 هزار غزل صد غزل از مولوی را برگزیده و با توجه به فرهنگ و رسوم مردم هند آن را انتخاب و ترجمه کند.

حسینجانی در بخش دیگری از سخنان خود با بیان اینکه در این کتاب یک صفحه شعر به زبان فارسی و به خط هندی و در مقابل شعر به زبان هندی آورده شده، گفت:‌در این کتاب علاوه بر درج شعر، آموزش وزن شعر فارسی، دستور زبان فارسی، معنای لغات فارسی درج شده است. بنابراین کتاب یک ترجمه صرف نیست.

مدیر مرکز ترجمه حوزه هنری با بیان اینکه این ترجمه از جمله مهمترین اثار از اشعار مولانا به زبان فارسی و هندی خواهد بود، گفت:‌این اثر اولین ترجمه مستقیم از فارسی به هندی محسوب می‌شود. بنابراین ظرایف و عرفان موجود در ابیات مشهود است.

وی در پایان سخنان خود گفت: ما در مرکز ترجمه یک داستان نوجوان و شعر معاصر ایرانی را به زبان هندی ترجمه کرده بودیم و امیدواریم به زودی شعر معاصر بانوان را هم توسط پروفسور شکلا ترجمه کنیم.

در ادامه این مراسم سفیر و رایزن فرهنگی هند در ایران درباره کتاب به ایراد سخن پرداختند.

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* رایزن فرهنگی هند در ایران: دعا می‌کنم این کتاب در هر خانه‌ای در هندوستان جای‌گیر شود

رایزن فرهنگی هند در ایران گفت: مولانا در تمام عالم بسیار معروف است. خصوصا در هندوستان احتیاج به معرفی ندارد.

وی با بیان اینکه انگلیسی‌ها فاصله میان ما و زبان فارسی را قطع کردند، گفت: آنها زبان انگلیسی را جایگزین زبان فارسی کردند ولی پیش از آن نویسنده و خواننده فارسی در کشورمان بسیار داشتیم.ما اکنون هم در خانه‌هایمان مولوی،حافظ و سعدی می‌خوانیم. ولی از قرن حاضر فارسی کمی از ما دور شده و ما جدا شده‌ایم.

رایزن فرهنگی هند در ایران ضمن اشاره به اینکه ما خیلی خوشحالیم هر دو کشور علاقه و دوستی را برای برقراری روابط باستانی که قرن‌ها داشته‌ایم نشان می‌دهندف گفت: سیاستمداران خود در حوزه سیاسی در حال فعالیت هستند اما ما از مسیر شعر فارسی می‌توانیم مسائل زندگی مردم را برطرف کنیم. توحید و علم عرفانی محتوای شعر حافظ بوده و مولانا اسراری را بیان کرده که مخاطب را به سوی خدا رهنمون می‌شود. جای خوشحالی است که از پروفسور شکلا اثری از مولانا ترجمه شده است. دعا می‌کنم این کتاب در هر خانه هندوستان جای‌گیر شود.

حجت‌الاسلام محمدرضا زائری در سخنان کوتاه گفت: موضوع ترجمه آثار بسیار مهم است. مولانا شخصیت بسیار مهمی دارد پس ترجمه چنین آثاری می‌تواند مفید باشد.

وی به خاطره‌ای از دهرمیندرنات اشاره کرد و گفت: یادش بخیر چند سال پیش کنارم نشسته بود و می‌گفت همانطور که امروز بشر برق را به خانه‌ها می‌رساند، آب را با لوله‌کشی به خانه‌ها آورده است ما نیازمند آن هستیم که حرف علی بن‌ابیطالب را به دست همه برسانیم؛ بنابراین بخشی از این رسالت در این کتاب آمده و امیدوارم پروفسور شکلا پایدار بماند و مهر و محبت هم پایدار باشد.

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* بیدج: مترجمان سفیران فرهنگی هستند

موسی بیدج شاعر و مترجمه زبان عربی در این مراسم گفت: بلرام شکلا را حدود 10 سال پیش برای اولین بار شناختم. همان دوران که من دبیر همایش شاعران ایران وجهان بودم. همزمان با روز حافظ در حافظیه 4 هزار نفر جمع شده بودند. قصد داشتیم به نمایندگی از 50 کشور یک شاعر را انتخاب کنیم تا شعر بخواند. بنده با توجه به موسیقی و شعر هندوستان شکلا را انتخاب کردم. شعری خواند که 4 هزار نفر منقلب شدند. او شعر حافظ را با صدا، موزون و مقفی خواند.

وی افزود: استعداد شگرف شکلا از آن زمان نه تنها بر من بلکه بر بسیاری از هم قطارانم پوشیده نماند. من خوشحالم چنین کار بزرگی انجام داده چرا که یکی از مشکلاتی که میان ما و جهان  سوء تفاهم ایجاد کرده عدم ترجمه است. ما ترجمه می‌کنیم اما پراکنده است. خوشحالم مرکز ترجمه به مدیریت خانم حسینجانی و آقای قزوه چنین کاری را سرانجام رسانده است.

وی در پایان سخنان خود گفت: مترجمان، سفیران فرهنگی هستند. باید آثاری رااز هر زبانی برگردان کنند. ما باید کسانی همچون شکلا داشته باشیم که آثار را به دو زبان برگردان کنند. در حال حاضر رسانه‌ها سیاسی حرف می‌زنند اما باید امروز فرهنگ به میان بیاید و سخن بگوید.

نسرین دستان طراح جلد این اثر نیز با بیان اینکه مدت‌ها بود برای کتاب طراحی نمی‌کردم اما مفتخر به همکاری با پروفسور هستم، گفت: سعی کردم در حد توانم درخواست‌های مطرح شده درباره طرح جلد و موضوعیت کتاب، همچنین شان و مقام حضرت مولانا را بتوانم ترسیم کنم. با توجه به اشتراکات فرهنگی میان هند و ایران از قدیم تا امروز خواستم به شکلی ساده طرح ارائه شود بنابراین از رنگ استفاده کردم زیرا رنگ قرمز فرهنگ قالب در هند است.

بیات استاد دانشگاه، فرزانه اعظم‌لطفی، دکتر کیومرثی و سماواتی همه از اساتید زبان و ادبیات فارسی درباره کتاب و پروفسور شکلا صحبت کردند.

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* قزوه: بیشترین نسخ خطی فارسی در هند است

علیرضا قزوه نیز در پایان این مراسم گفت: شکلا جای خالی استاد دهرمیندرنات را باید پر می‌کند. این یعنی رسالت ادبیات روی دوش شما آقای پروفسور سنگین و انتظارات از شما بسیار است.

وی با تبریک روز ملی هند تصریح کرد: اهمیت هندوستان برای ما زیاد است چرا که بیشترین کتاب‌های نسخ خطی فارسی در ایران وجود ندارد بلکه در هندوستان قرار دارد، همان کتاب‌هایی که جزو میراث ما به شمار می‌آید. این آثار بیش از آنکه در ایران باشد در هندوستان قرار دارد.

مدیرمرکز آفرینش‌های ادبی حوزه هنری با تاکید بر اینکه اگر هندی‌های فارسی‌سرا را از شعر ما کم کنید عیار شعر فارسی کاهش می‌یابد، گفت: درست است ما قللی چون حافظ و سعدی داریم ولی در هندوستان نیز شاعران بزرگی داریم که به زبان فارسی تسلط کامل داشتند.

قزوه ضمن تاکید بر اینکه مجموعه‌هایی وجود دارد که منتشر نشده باقی است، گفت: شعر یک شاعر هندی مثل نظامی دارای قوت است. در انشای فارسی، هندوها پا به پای ما پیش آمدند و به نویسندگان و منشی‌های ما رسیدند. اگر تذکره‌های فارسی را شمارش کنیم درمی‌یابیم بخش تولید شده تذکره‌ها در هندوستان از ایران بیشتر است. همین طور فرهنگنامه‌های تالیفی که نشان می‌دهد هندوستان نزدیک‌ترین همسایه ماست که کار فرهنگی بزرگی انجام داده پس باید روی این فرهنگ مشترک کار کرد.

این شاعر با بیان اینکه ما هندوها را به ایرانی‌ها بد معرفی کرده‌ایم، گفت: ما باید نشان دهیم یک میلیارد هندو موحد هستند، آنان به توحید معتقدند، چند وقت پیش کتاب‌هایی به سانسکریت توسط دکتر خواجه‌پیری خریداری شده بود که تماما روی چوب هزاران نام خداوند به نام جوشن کبیر حک شده بود. همانطور که ما شیعیان خدا را با هزار نام زیبا تسبیح می‌کنیم آنها نیز خدا را تسبیح می‌کنند. پس باید تجدید نظری صورت بگیرد و از نو مردم هند به ایرانیان معرفی شوند.

وی در پایان سخنان خود درباره پروفسور شکلا گفت: بلرام یک معلم است، او دارای شاگردان بسیاری است. وضعیت شعر پارسی امروز در هندوستان خیلی خوب شده است و فکر می‌کنم تا 50 سال آینده شعر پارسی در هند همچنان زنده خواهد ماند.

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* شکلا: زبان فارسی در هند کمرنگ شده اما از بین نخواهد رفت

پروفسور بلرام شکلا در پایان این مراسم پیش از رونمایی از کتاب گفت: بسیار خوشحالم در این جمع حضور دارم چراکه قرار است از ترجمه هندی مولانا رونمایی شود. چندین کتاب تاکنون از مولانا به هندی چاپ شده که البته تماما پراکنده ترجمه شده است. اما ویژگی این اثر این است که از فارسی مستقیما ترجمه شده است.

وی افزود: اگر همکاری اساتید و حمایت دولت ایران نبود انتشار کتاب غیرممکن بود. اساتید دانشگاه بسیار کمک کردند تا من توانستم کتاب را ترجمه کنم.امروز خط فارسی فقط در دانشگاه‌ها خوانده می‌شود بنابراین این موضوع مرا ناراحت می‌کرد چرا که این دو کشور به هم بسیار نزدیک هستند در صورتی که ما ناچار بودیم حافظ و مولانا را از انگلیسی بخوانیم. بنابراین کار را شروع کردم و اساتید یارایم بودند. اگرچه زبان فارسی در هندوستان کمرنگ شده اما به حدی با سانسکریت و هندی همراستاست که از بین نخواهد رفت.

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انتهای پیام/

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Translation of स्मितरेखा

Hindi Translation of a Sanskrit story स्मितरेखा, originally written by Prof. Radha Vallabh Tripathi,स published with a title मुस्कान की लकीर, in April-June 2018 Issue of बहुवचन (Vol.57, A Special number based on Stories of Indian language) a bi-Monthly journal of Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishvavidyalaya,Wardha. ISSN-2348-4586. Pp. 280-284

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The original story has been written by Prof. Radha Vallabh Tripathi and is included in the collection named “Smitarekha”. The original story runs as follows-

 

                                           स्मितरेखा (संस्कृतमूलम्)

 

-अरे रघुवीर…! त्वम्?

बहोः कालादनन्तरं रघुवीरेण समागमो जातः। आपणे गच्छन्नासम्। तत्रासौ सहसा दृष्टः। अहमेव रघुवीरं पर्यचिनवम्। रघुवीर एवासीत्, नासीत् शङ्कालेशावकाशः। सैव गम्भीरता, सैव मलिना मुखच्छाया। तादृशा आकृतिविशेषाः कथं विस्मर्यन्ते!

परन्तु स मां नैव प्रत्यभ्यजानात्। – अहं भवद्भिः कुत्र मिलितः? -सोऽपृच्छत्।

अरे आवां महाविद्यालये सहपाठिनौ आस्व। अहमस्मि रहमानः।

ओः…ओः..अरे प्रियभ्रातः रहमान-अली! अहं तु मन्ये सर्वेऽपि सखायो मां विस्मृतवन्तः। अरे त्वया अहं प्रत्यभिज्ञातः। त्वं महानसि। तव सदृशः कः स्यात्।

इत्थं “यू आर ग्रेट, यार!” – इति मुहुर्महुर्लपन् स माम् आलिङ्गत्।

एतादृशी एव प्रकृतिस्तस्य तदानीमप्यासीत्। चिरपरिचितानपि नैव परिचिनुयात्, कदाचित् सहसा अपरिचातानामपि कृते चिरपरिचितत्वमाविष्कुर्वन् तैः सह यद्वा तद्वा चिरमालपेत्।

अतीतेषु दशसु वर्षेषु रघुवीरो मम सहपाठी अभूत्। रहस्यमयता सदैव तदीये आचरणे भवति स्म। अत एव वयं तस्य सर्वं कार्यकलापं कौतुकेन अपश्याम। कदाचित् स अत्यन्तम् उदासीन इव अस्मिन् लोके भवन्नपि अन्यत्र गत इव अदृश्यत। क्वचित् सोऽस्मासु तथा सम्मिलितो भवति यथा जन्मान्तरीयं सख्यं सर्वैरस्माभिस्तस्य स्यात्।

रघुवीरः सम्प्रति अतितरां गम्भीर इवालक्ष्यत। “अत्रैव निकटमहं निवसामि” – स आह- “यदि समयः स्यात् आगच्छ, किञ्चित्कालं स्वैरमालपामः”…

तेनानुरुद्धोऽहं तस्य गृहमगच्छम्। लघुगृहम्। परन्तु अत्यन्तं सुरुच्या परिष्कृतं सुसज्जितम्। कणे कणे कोणे कोणे रघुवीरस्य कमनीया छायेव दरीदृश्यते। गृहे स एकाकी। सेवकः तेनादिष्टः चायं निर्माय आनीतवान्। चायम् उपस्पृशन्नहं तमनुयोजयामि स्म – अन्यत् सर्वमुपपन्नम्? कथय कीदृशस्ते कालो गच्छति?

— किं कथयामि मित्र! मम तु सर्वं गतम्– इत्युक्त्वा प्ररुदन्निव सनिःश्वासं हृतसर्वस्व इवासावदृश्यत।

— अरे – अहं सविस्मयं तस्य कृते सहानुभूतिं च प्रकटयन्नवदम् – किं सञ्जातम्?

मम स्वरे विद्यमानया करुणया स समधिकतरं द्रवीभूतः। – “मम प्राणप्रिया … सा

गता”… इति निगदतस्तस्य कण्ठोऽवरुद्धः, लोचने बाष्पकषायिते च जाते।

-ओह! – अहं सहानुभूतिगर्भितेन स्वरेण अवदम्ष अथ च – “मया तु न ज्ञातं यत् त्वया कदा परिणीतमि”ति च वक्तुकाम आसम्, परन्तु तदीयामतिगम्भीरां मुखाकृतिं निर्वर्ण्य तूष्णीमभवम्।

रघुवीरो वक्तुमारभत – जानात्येव भवान् यदहं विरागी। न परिग्रहः कदापि कृतः। सा स्वयमेव मद्गृहं प्राप्ता। अहं तु उद्याने निष्कुटं परिष्करोमि स्म। सा आगत्य मम पादयोः स्वमुखं न्यदधात्।

….शिशुरेव साऽऽसीत्। निरीहनयनाभ्यां मां निध्यायति। अरे कस्येयं कुत इयमागता – इति चमत्कृतोऽहं विषण्णां मार्गभ्रष्टां तां चुचुत्कारैः सान्त्वयामि स्म।…. अहमचिन्तयम् – इयं शिशुरेव वर्तते… कस्माच्चित् प्रतिवेशिगृहादागता स्यात् – उच्छलन्ती कूर्दमाना यथा आगता तथा गमिष्यति — परन्तु सा न गता। सा मदीया जाता। अहं तस्या नामापि न जानामि। को वदतु किं स्यात् तस्या नाम? मयैव तस्या नामकरणमकारि। निम्मीः इति।”

अहमस्मये। यदा रघुवीरोऽस्माभिः सह अध्यैति स्म महाविद्यालये तदा निम्मीनाम्नी चलचित्राभिनेत्री तस्मै भृशं रोचते स्म। मन्ये

निम्मीं प्रति तदानीन्तनमाकर्षणमिदानीं यावत्तथैव लसति तदीये चित्ते।

भूयोऽपि रघुवीरः स्वकथामग्रे ततान – “मया बहुशः प्रयतितं कस्तावदस्या अभिभावक इति ज्ञातुम्, वृत्तपत्रेषु विज्ञापनं दत्तम् यत् यस्य कस्यापि इयं स्यात् स आगत्य परिचिनोतु, नयतु चैनाम्, अनन्तरं पुलिसस्थानकं गत्वा तत्रापि सूचना प्रदत्ता। परन्तु न कोऽपि तस्याः परिवारजन आयातः। सा तु तपस्विनी सर्वथा मां प्रपन्ना…”

– परं सा तु अवश्यं जानीयात् कुत्र आसीत् तस्या गृहम् – त्वया नैव पृष्टं कुत्र ते गृहम् – कुत आगतेति –

– अरे निम्मी किं ब्रूयात् – वराकी – सा वक्तुं शक्नुयात् किम्?

अहं मनस्यकरवम् – अरे, तर्हि मूका आसीदस्य प्रिया निम्मीः। यदि सा लेखितुं अज्ञास्यत् तर्हि लिखित्वा स्वगृह- सङ्केतमदास्यत्। परन्तु अयं कथयति यत् सा शिशुरेव आसीत्। अतो पठितुं लेखितुमपि क्व जानीयाद्वराकी?

रघुवीरः पुनरपि स्वकथावितानं ततान – “मम गृहे कोऽपि नास्ति। जानासि एव त्वं यदहमस्मि चिरकुमारः..”

— एवम्, एवम् – अहं सस्मितमवदम्।

रघुवीरस्य अनेकाभिश्चिरण्टीभिः प्रणयवृत्तानि अस्माकं महाविद्यालये प्रसरन्ति स्म। कदाचिदसौ विमलया संवदति, कदाचित् कमलया अल्पाहारगृहे चायं पिबन् दृश्यते। न कयापि स्थिरः सम्बन्धस्तस्य तिष्ठति। अद्य अस्या अधरोष्ठौ चुम्बितौ, अतः परं न सा किमपि कर्तुं ददाति इति विवादो जातः, तस्मिन् दिने तया स्वयमेवालिङ्गनं दत्तम् इत्येवं स्वीया गौरवगाथा अपि स सरहस्यं उपांशु जपति स्म अस्माकं मित्रमण्डल्याम्।

शीलया सार्धं तस्य प्रेमसम्बन्धाः दीर्घावधि प्रचलिताः। इदानीमवश्यम् उभौ विवाहं करिष्यत इति सर्वे अमन्यन्त। रघुवीरोऽपि शीलायाश्चिन्तायां चर्चायां चानिशं निमग्नो अदृश्यत। परन्तु कदा उभयोः सम्बन्धः सर्वथा विघटित इति नाज्ञायत। – अरे स तु पुरुष एव नास्तीति – कस्यैचित् सहपाठिन्यै शीला उक्तवतीति किंवदन्ती अपि कर्णाकर्णिकया स्यन्दमाना सर्वत्र प्रससार। रघुवीरस्तु रमेशस्य अंसे स्वकपालं विनिवेश्य प्ररुदन् क्वचिज्जगाद – “मित्र, मया ज्ञातं सा डाकिनी वर्तते। अभिचारकर्म करोति …नेदानीं कयापि चिरण्ट्या सम्बन्धं योजयिष्यामि, चिरकुमार एव स्थास्यामि…”

रघुवीरः स्वकथावितानमग्रे अतनोत् – ” अस्म्येव चिरकुमारः, परन्तु यतः प्रभृति सा मम गृहं स्वयमागता, ततः प्रभृत्यहं गृहस्थ इव सञ्जातः। यत् किमपि तस्यै रोचते तदानयामि आपणात्। दुग्धं बिसकूटं च सा मदीयेऽङ्के उपविष्टा भुङ्क्ते। सा सर्वथा मयि विश्वसिति। किं वच्मि…जन्मान्तरीय एव मम तया सम्बन्धः स्यादन्यथा कथं नु घटेत एतावान् प्रेमा? कार्यालयादागमने मम यदि विलम्बः स्यात् होरार्धमात्रमपि तर्हि सा भामिनी कोपभवन आत्मानं काराबद्धां विधाय तिष्ठति, न खादति न पिबति, साभियोगं केवलं मां निध्यायति, बहुकालं संवाहिता, सचुचुत्कारम् अङ्के धारिता, समाश्वासिता कथञ्चित् करोति प्रणयं मम हस्तादेव कवलमेकं द्विचतुरान् वा कवलान् ग्रहीतुम्। किं कथयामि.. एतादृशः प्रगाढोऽनुरागः नान्यत्र कुत्रापि प्राप्येत। अहं शनैः शनैः सर्वथा तस्या वशंवदो जातः। सापि सर्वस्य गृहस्य रक्षां सावधानतया करोति.. सैव मम गार्हस्थ्यधूः सञ्जाता।

“क्रमेण च कृतं मधुमास इव वसन्तेन वसन्त इव पुष्पेण नवयौवनेन तस्याः कमनीये कलेवरे पदम्। समधिकतरं निशिता जातास्तस्य कटाक्षपाताः। भवांस्तु जानात्येव – उपदिशति कामिनीनां यौवनमद एव ललितानि इति। तस्याः कृते अहं चिन्तितो जातः। अस्यां वीथ्यां प्रागेव आहिण्डन्ते तस्यां वासनाकलुषितया दृष्ट्या तं गिलन्तस्ते गुण्डाः। किं करोमि, कथमस्याः परिणयं घटयामि केनापि सत्पात्रेणेति चिन्तितोऽहं जातः…”

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अरे कथं शृङ्गाररसप्रसङ्गे सहसैवेयं वात्सल्यवर्षा? रघुवीरः स्वप्रणयिन्याः धर्मपुत्र्या वा स्मृतौ पुनरपि विषादमग्न इवादृश्यत। अवर्धत च मे कौतूहलम्। –

ततः किम्? तस्या विवाहस्त्वया कारितः?” – अहमपृच्छम्।

— अरे का कथा परिणयस्य तस्यास्तपस्विन्याः? – स सनिःश्वासं विदीर्णहृदय इव नैराश्य- निमग्न इवाब्रवीत् – अनुरूपवरान्वेषणे मया सर्वा दिशः पाविताः। कुत्र कुत्र न गतवान्। प्राप्तोऽपि आसीत् एकः युवा वरः। सोऽपि मत्प्रतिवेशिन एव पालितपुत्रः। परन्तु अस्मिन्नेव काले वज्रपातः सञ्जातः। अद्यापि विश्वसितुं न प्रभवामि… ” इति निगदन् रघुवीरः दुःखावेगवशात् तूष्णीम्भूतः।

अहमवदम् – “धैर्यं धारयतु भवान्। एतादृश एवायं संसारः। किमुच्येत? भवतु, किमत्याहितम्?”

“अरे अत्याहितमेव तादृशं सञ्जातम्…सा वृश्चिकरोगेण ग्रस्ता..” इति

कथयतस्तस्य पुनरपि वागवरोधोऽभूत्।

– “अहो अत्याहितम्!” – अहमवदम्–

“सत्यमनर्थः सञ्जातः.. ममैव मूढस्य प्रमाद आसीत् – तस्या उरसि आसीत् एकश्चणकपरिमितो ग्रन्थिः। मयैव अवधानं न दत्तम्। सा तु मुग्धा। सा किं बुध्यतां नाम? क्रमेण च सा ग्रन्थिः प्रावर्धत। एकदा मम दृष्टिस्तां लालयतस्तस्यां ग्रन्थौ निपपात। अहमाशङ्कितोऽभूवम्। अनयं च निम्मीं चिकित्सकस्य पार्श्वे।

ततः प्रभृति निम्या उरसि प्ररूढा सा ग्रन्थिर्मम मनोग्रन्थिः सञ्जाता। यथा यथा वर्धते सा तथा तथा मम मनसि शयो वर्धते। चिकित्सका अप्याहुः भवता विलम्बः कृतः। इदानीं ग्रन्थिः प्रवृद्धा। शल्यक्रियां करिष्यामः, परन्तु वक्तुं न प्रभवामः – इयमरोगा भविष्यति वा न वा।

शल्यक्रियामधिकृत्य श्रावं श्रावं चिकित्सकानां वचांसि मदीये हृदये शल्यानि भवन्ति। तेषामपि अपराध आसीत्। तैः सद्यः शल्यचिकित्सा न कृता, त आहुः औषधानि दद्मः, कदाचित् तैरेव ग्रन्थिरियं सङ्कुचन्ती शुष्कायेत। परन्तु एते चिकित्सकाः! किमेते

जानन्ति? यद्यहमभवं विदेशे कस्मिंश्चद् योरोपदेशे तदा एतत् सर्वं नाभविष्यत्, तत्र यदि कश्चित् चिकित्सक एतादृशीमनवधानतां विदध्यात्, तर्हि न्यायालये अभियोगे प्रवृत्ते कोटिकोटिडालराणि देयानि स्युः …

भवतु….अन्ततः शल्यक्रियामेव ते अकार्षुः। सञ्जातायां शल्यक्रियायां त आहुः – “सफला जाता शल्यक्रिया — स्वीकुर्वन्तु वर्धापनानि” इति। कियती अनवधानता .. निम्याः उरसि या बाधा आसीत् सा तु न दूरीभूता। सा कष्टम् उच्छ्वसिति, केवलं मां सकरुणं निध्यायति। किमपि न वक्ति .. स शनैः शनैरीश्वरसमीपं यान्तीव, परमशान्ति- मनुभवन्तीव लक्ष्यते। मद्वियोगमुत्प्रेक्षमाणायास्तस्या नयनयोरश्रुधारा निस्सरति। अहो ते दिवसाः, अहं तां समाश्वासयामि – मा भैषीर्निम्मि, त्वमवश्यं नीरोगा भविष्यसि, परन्तु सा त्वजानात् —

पुनरपि रघुवीरस्य स्वरो बाष्पकषायितः। तथापि कथां स सन्ततयति स्म – “महती पीडा आसीत् तस्या उरसि। केवलमनुभवति, किमपि न वक्ति निम्मीः। अहं तस्या नयने नयनं ददान एव जानामि।

“चिकित्सकास्ते धूर्ताः… केवलमाश्वासनं ददति- व्रणः वर्तते। व्रणः शुष्कः स्यात् तदा इयं स्वस्था स्यात् — एवं यद्वा तद्वा कथयन्ति –अरे मूढाः, किमेतावदेव युष्माकं ज्ञानम्- एतावती विशेषज्ञता?” इति निगदन् रघुवीरो आवेशवशाद् रक्तमुखः कोपाटोपस्फुरिताधरः क्षणं कामपि अदृश्यान् शत्रून् प्रहरन् प्रत्यादिशन् इव स्थितः।

— ततस्ततः? – अहमपृच्छम्।

“तस्मिन् दिने तां कष्टमुच्छ्वसन्तीं दर्शं दर्शं किमप्यत्याहितमाशङ्कमानोऽहं कार्यालयादवकाशं गृहीतवान्। द्वित्रेभ्यो दिनेभ्यस्तया न किमपि भुक्तमासीत्। अहं

दुग्धं ददामि, बिसकूटं तस्या मुखं यावदानयामि। सा न प्रणयं करोति। मदीयेऽङ्के एव मम

स्मितरेखा/78

वक्षसि मुखं संस्थाप्य स्थिता। अहं तां संवाहयामि। केवलं मन्दं मन्दं सीत्कृतिं सा करोति। एवमेव सीत्कृतयः शनैः शनैः शिथिलायिताः, उच्छ्वासा अपि न श्रूयन्ते स्म। तर्हि सुप्तेयं तपस्विनी अन्तत इति कलयित्वा अहं तां शयने स्वापयितुमुत्थापयामि तावत् किं पश्यामि … अरे किमहं पश्यामि यत् सर्वं समाप्तम्, गतैव सा.. तस्याः शिरोऽधो ललम्बे। अहो लुण्ठितोऽस्मि, वञ्चितोऽस्मि… ”

अहं समाश्वासनकलायां पटुर्नास्मि। स च रोदिति स्म। यथाकथञ्चिदहमवदम् — “धैर्यं धारयतु भवान्। अवश्यभवितव्ये किं क्रियेत।”

स करकर्पटेन अश्रूणि प्रमार्जयन्नवदत् – “तथापि अहं त्वरितं कारयानं निस्सार्य चिकित्सालयं गतस्तामङ्क एव धृत्वा.. चिकित्सक आह- “अधुना न किमपि कर्तुं शक्यते।” चिकित्सालयस्य समीपमेवासीत् श्मशानभूमिः, तत्रैव गोगर्तम् उत्खाय एनां मृताजिरशरणां कुर्म इति चिकित्सालयकर्मचारिण आहुः, परन्तु तेषां वचनं नाहमशृणवम्। अहं तां तथैवानीतवान् गृहम्। स्वगृहवाटिकायमेव मया निखातः स्वयमेव तस्याः कृते गोगर्तः। स्वयं च सा तत्र शायिता।…”

एतत् श्रुत्वा चकितोऽहमचिन्तयम्- अरे किमयं विक्षिप्तः सञ्जातो यत् सा स्वप्रिया अनेन स्वकीये उद्याने एव मृताजिरशरणीकृता। तथापि रघुवीरस्य व्यथान्वितामाकृतिं दर्श दर्शं शनैरवमनोचम् – रघुवीर, किमेतत्, त्वया कृतम्, तां श्मशानं नीत्वा दाहसंस्कारः कथं न कृतः, एतत् सर्वं तु युष्माकं धर्मस्य विरुद्धमेव.. यत् त्वया कृतम्..”

रघुवीर आह – अरे रहमानभ्रातः, किं वक्ति भवान्? कोऽत्र धर्माधर्मविचारः … निम्याः को धर्मः, सा एतादृशतुच्छधर्माधर्मविचारेभ्य उपरि तिष्ठति। सा महान् आत्मा।”

सत्यम्, सत्यम् – अयं सर्वथ विक्षिप्तो जात इति विचिन्तयन्नहमवदम्।

— उद्याने तस्याः समाधिर्निर्मितः, तत्र प्रतिजदिवसं सायं प्रातः पुषअपाञ्जलिं समर्पयामि… यत्र कुत्रापि सा स्यात्..सुखेन वसतु… अस्ति तस्याः स्मृतिर्मम पार्श्वे… इति कथयन्नसौ पादपीठके स्थापितं चित्रसङ्ग्रहमादाय मह्यं ददान आह – पश्यतु भवान् तस्याश्चित्राणि…..

अहं चित्रसङ्ग्रहमुद्घाटितवान्। चित्राणि दर्शं दर्शमहमाकाशाद् भूमौ निपतितः।।

तर्हि सा मानवी नासीत् — इथि मम मुखान्निःसृतम्।

— सत्यमुक्तं भवता। निम्मी मानवी नासीत्, सा आसीत् कि देवी – रघुवीर आह।

चित्रसङ्ग्रहे पामेरियन्-जातेः कस्याश्चित् शुन्याः चित्राणि आसन्।

अहं रघुवीरस्य मुखमवालोकयम् — अथ्यन्तं सूक्ष्मा स्मितरेखा कदाचित् तत्रासीत्— विद्यार्थइजीवने स यदा यदा एऴं करुणापूर्णं यत्किमपि वक्ति स्म, तदा ईदृशी स्मितरेखा तु पश्चात् तस् मुखे स्फुटं दृश्यते स्म।

 

                                                                   मुस्कान की लकीर      (अनुवाद

-अरे रघुवीर…! तुम?

बहुत दिनों के बाद रघुवीर से मिलना हुआ था। बाज़ार जा रहा था। वहीं वह अचानक दिखा। मैंने ही रघुवीर को पहचाना था। रघुवीर ही था, मुझे इसमें बिलकुल सन्देह नहीं हुआ। वही गम्भीरता, वही मुरझाया हुआ चेहरा। वैसे ख़ास चेहरे भला कैसे भुलाये जा सकते हैं!

लेकिन वह मुझे नहीं पहचान पाया। – मैं आप से कब मिला? –उसने पूछा।

अरे हम दोनों कालेज में साथ पढ़ते थे। मैं हूँ रहमान।

ओहो..अरे रहमान अली भाईजान -! मुझे तो लगा था कि मेरे सारे दोस्त मुझे भूल चुके। अरे तुमने मुझे कैसे पहचान लिया। तुम तो महान हो। तुम्हारे जैसा कौन होगा।

ऐसे यू आर ग्रेट, यार!” – बार बार कहते हुए वह मुझसे लिपट गया।

तब भी उसका स्वभाव ऐसा ही था। कई बार पुराने परिचितों को भी नहीं पहचान पाता था तो कभी अनचीन्हों से भी पुराना परिचय निकाल कर उनसे देर तक कुछ भी बतियाता रहता था।

बीते १० साल रघुवीर मेरे साथ पढ़ा था। उसके व्यवहार में हमेशा एक रहस्यमयता रहती थी। इसलिए हम उसके क्रिया कलाप को कौतूहल से देखा करते थे। कई बार वह हम लोगों से ऐसे मिलता जैसे हम सब से उसकी पिछले जनम की दोस्ती हो।

अभी रघुवीर बहुत संजीदा लग रहा था। उसने कह–”मैं यहीं नज़दीक ही रहता हूँ, अगर टाइम हो तो आओ, कुछ बातें करेंगे।”

उसके आग्रह पर मैं उसके घर गया। घर छोटा था। लेकिन बड़ी ही सुरुचिपूर्ण ढंग से और करीने से सजा हुआ था। घर के कोने कोने से मानो रघुवीर की सुन्दर छवि झलक रही थी। घर में वह अकेला था। नौकर उसके आदेश पर चाय बनाकर ले आया। चाय पीते हुए मैंने उससे पूछा– “और सब ठीक है? कहो तुम्हारा समय कैसा बीत रहा है?

— क्या कहूँ दोस्त, इतना कहकर उसने साँस छोड़ी और रुआँसा होकर ऐसे कहने लगा जैसे कि उसका सब कुछ लुट गया हो– मेरा तो सब कुछ चला गया।

— अरे क्या हुआ?– अचरज से भर कर मैं उसके लिए सहानुभूति प्रकट करते हुए बोला।

मेरी आवाज़ में जो करुणा थी उससे वह और अधिक फूट पड़ा। ” वह मेरी जान से भी प्यारी…चली गयी” इतना कहते हुए उसका गला रुँध गया और आँखें आँसुओं से भर आयीं।

  • ओह! … सहानुभूति भरी आवाज़ में मैं बोल पड़ा। इसके बाद “मुझे पता ही नहीं था कि तुम्हारी शादी कब हुई” यह बोलने वाला था लेकिन उसकी गम्भीर मुखाकृति को देखकर मैं चुप रह गया।

रघुवीर ने बोलना शुरू किया कि तुम तो जानते ही हो कि मैं दुनिया से दिल लगाने वाला नहीं रहा। मैंने ख़ुद कभी कुछ स्वीकार नहीं किया। वह स्वयं ही मेरे घर आई। मैं तो बगीचे में क्यारी की सफ़ाई कर रहा था। उसने आकर मेरे पैरों पर अपना मुँह रख दिया।

बच्ची ही थी वह। निरीह आँखों से वह मुझे देख रही थी। अरे यह किसकी है, कहाँ से आई है, यह सब सोचते हुए चमत्कृत होकर मैंने राह भटकी हुई उस दुखित जीव को चुचकार कर ढाँढस बँधा रहा था। “बच्ची ही है यह” मैंने सोचा, किसी पड़ोसी के घर से आई और फिर नहीं जा नहीं पाई। उछलती कूदती यह जैसे आई है वैसे चली भी जाएगी। वह मेरी हो गई। मैं उसका नाम भी नहीं जानता हूँ। कौन बताए उसका नाम क्या है? मैंने ही उसका नाम रख दिया– निम्मी।

मैं मुस्कुराया। जब रघुवीर हमारे साथ पढ़ता था तब उसे हीरोइन निम्मी बहुत पसन्द थी। मुझे लगा कि निम्मी के प्रति उसका लगाव अब तक उसके मन में बरक़रार था।

रघुवीर ने अपनी कहानी आगे बढ़ाई “मैंने बहुत कोशिश की कि उसका पालनहार कौन है जान सकूँ। अख़बारों में विज्ञापन दिये कि जिस किसी की यह हो आकर पहचान ले, और ले जाए। इसके बाद पुलिस स्टेशन जाकर सूचना भी दी, लेकिन उसके परिवार का कोई भी नहीं आया। वह बेचारी तो जैसे मेरी शरण में ही आ गयी थी… ”

– लेकिन वह तो ज़रूर जानती रही होगी कि उसका घर कहाँ था–वह कहाँ से आई– तुमने नहीं पूछा कि तुम्हारा घर कहाँ है?

– अरे निम्मी क्या बताती। बेचारी क्या बता सकती थी?

मैंने सोचा कि ओह तो इसकी प्यारी निम्मी गूँगी थी। अगर वह लिखना जानती तो लिखकर अपने घर का पता दे देती, लेकिन यह तो कह रहा है कि – बच्ची ही थी वह। फिर तो पढ़ना लिखना क्या ही जानती होगी बेचारी?

रघुवीर ने फिर अपनी रामकहानी आगे बढ़ाई– ” मेरे घर में कोई नहीं है। तुम तो जानते ही हो कि मैंने शादी नहीं की…।”

– “बिलकुल, बिलकुल”– मैंने मुस्कराकर कहा।

हमारे कालेज में रघुवीर के कई लड़कियों के साथ प्रेम प्रसंग की बहुत सी कहानियाँ मशहूर थीं। कभी वह विमला से बातें करता था तो कभी कमला के साथ कैंटीन में चाय पीता हुआ दिखाई पड़ता था। किसी के भी साथ उसका रिश्ता देर तक नहीं रह पाता था। “आज उसके होंठ चूम लिए थे, लेकिन इसके बाद उसने कुछ भी नहीं करने दिया और हमारा झगड़ा हो गया। दूसरे दिन आकर उसने खुद गले लगा लिया”, इस तरह की अपनी गौरव गाथा हमारी मित्र मण्डली में रहस्यपूर्ण तरीक़े से वह बताता रहता।

शीला के साथ उसका अफ़ेयर बहुत लम्बा चला। सब मान रहे थे कि अब ये दोनों शादी ज़रूर कर लेंगे। रघुवीर भी रात दिन शीला की बातों में और उसकी सोच में डूबा दिखाई देता था। लेकिन उन दोनों का सम्बन्ध कब बिलकुल टूट गया यह बात कोई जान नहीं पाया। यह अफ़वाह ज़रूर चारों ओर कानों कान फैल गयी थी शीला ने अपनी किसी सखी से बताया था कि – अरे वह तो नामर्द है। रघुवीर ने भी रमेश के कन्धे पर अपने गाल रखकर कहीं रोते हुए कहा था, दोस्त! मुझे पता चला कि वह चुड़ैल है। जादू टोना करती है। अब मैं किसी भी लड़की के साथ रिश्ता नहीं जोड़ूंगा। कुँवारा ही रह जाउंऊँगा।

अपनी कहानी आगे बढ़ाते हुए रघुवीर ने कहा– “हूँ ही मैं कुँवारा। लेकिन जबसे वह मेरे घर में ख़ुद आई तब से मैं गृहस्थ जैसा हो गया। जो भी चीज़ उसे अच्छी लगती, उसे मैं बाज़ार से ले आता हूँ। मेरी गोद में बैठ कर वह दूध बिसकुट खाती है। उसे मुझ पर पूरी तरह से विश्वास है हो चला था। क्या कहूँ किसी जनम का सम्बन्ध है था मेरा उसके साथ, नहीं तो इतना प्रेम कहाँ सम्भव हो पाता है? ”

आफ़िस से आने में अगर मुझे आधा घण्टा भी देर हो जाए तो वह रूठ कर अपने को कोपभवन में बन्द कर लेती, न खाती न पीती, केवल शिकायती नज़रों से मुझे देखती रहती। बहुत देर तक जब मैं उसे सहलाता, चुमकार कर गोद में लेता, ढाँढस बँधाता तब जाकर कहीं वह मेरे हाथ से केवल एक या दो चार कौर खाती। क्या कहूँ इतना गाढ़ा अनुराग कहीं भी और नहीं मिल सकता। मैं धीरे धीरे पूरी तरह उसके अधीन होता चला गया। वह भी सारे घर की रखवाली चौकन्ना होकर करती थी। जैसे वह मेरी घरवाली हो गई हो।

“धीरे धीरे उसके लुभावने तन में युवावस्था ने ऐसे ही प्रवेश किया जैसे मधुमास में वसन्त आता है और वसन्त में नये फूल खिलने शुरू होते हैं। उसकी कनखियाँ खूब तीखी हो गयीं। तुम तो जानते ही हो सुन्दरियों को यौवन ही हाव भाव सिखा देता है। उसको लेकर मुझे चिन्ता होने लगी। इस गली में उसे वासना की नज़रों से निगलते हुए से गुण्डे पहले ही घूम रहे थे। क्या करूँ, इसकी कोई अच्छी जोड़ी कैसे लगे इसको लेकर मैं चिन्तित हो गया….।”

अरे शृङ्गार रस के प्रसंग में अचानक वात्सल्य की बारिश कैसे होने लगी? रघुवीर अपनी प्रिया या अपनी मुँहबोली बेटी की याद में फिर ग़मगीन हो गया। मेरा कौतूहल बढ़ रहा था।–

“फिर क्या हुआ? उसकी शादी तुमने करवाई? “- मैंने पूछा।

“– अरे शादी की नौबत कहाँ आई उस बेचारी की….? “निराशा में डूबते हुए उसने साँस छोड़ते हुए उसने टूटे हुए दिल से कहा। उसके मेल का जोड़ा मैंने चारो ओर ढूँढा। कहाँ कहाँ नहीं गया। मिला भी था एक नौजवान वर मुझे। वह भी मेरे पड़ोसी का पाला हुआ बेटा था। लेकिन उसी समय जैसे कि वज्र पड़ गया। आज भी

मैं विश्वास नहीं कर पाता।” यह कहता हुआ रघुवीर दुख के वेग से चुप रह गया।

मैंने कहा – “धीरज रखो। दुनिया ऐसी ही है। क्या कहा जाए? क्या अनर्थ हो गया था ये बताओ।”

“अरे अनर्थ ही हो गया…..। उसे कैंसर हो गया था….।”

यह कहते हुए उसका गला फिर रुँध गया।

“––अरे बहुत बड़ा अनर्थ हो गया!––” मैंने कहा।

“सही में अनर्थ हो गया। उसके सीने पर एक चने के बराबर गाँठ थी। – मैं ही मूर्ख था जिसने ध्यान नहीं दिया..। वह तो भोली भाली थी। उसे क्या पता? धीरे धीरे वह गाँठ बढ़ने लगी। एक बार उसे लाड करते हुए मेरी नज़र उस गाँठ पर पड़ी। निम्मी को मैं डा̆क्टर के पास ले गया।

उसके बाद निम्मी के सीने में पड़ी गाँठ मेरे मन में भी पड़ गई। जैसे जैसे वह बढ़ रही थी, मेरी चिन्ता भी बढ़ती जाती। डा̆क्टरों ने भी कहा– आपने देर कर दी। अब तो गाँठ बढ़ गयी है। आपरेशन करेंगे, लेकिन कह नहीं सकते कि यह स्वस्थ हो पाएगी या नहीं।

डा̆क्टरों की आपरेशन के बारे में बातें सुन सुन कर मेरे दिल में जैसे शूल चुभ रहे थे। उनकी भी ग़लती थी। उन्होंने तुरन्त तो आ̆परेशन किया नहीं। उन्होंने कहा हम दवाइयाँ दे देंगे, शायद उसी से यह गाँठ छोटी होकर सूख जाय। लेकिन ये डा̆क्टर! क्या जानते हैं ये? अगर मैं किसी यूरोप के देश में होता तो यह सब नहीं होता। वहाँ अगर कोई डा̆क्टर इस तरह की लापरवाही करता तो मुक़दमे में उसे करोड़ों डा̆लर देने पड़ते….।

अन्ततः उन्होंने आ̆परेशन ही किया। आ̆परेशन होने के बाद उन्होंने कहा– बधाइयाँ, आ̆परेशन सफल हो गया “। लेकिन निम्मी के सीने में जो दर्द था वह तो खतम नहीं हुआ। कितनी बड़ी लापरवाही हुई। वह कठिनाई से साँसें ले रही थी और करुणा पूर्वक केवल मुझे देख रही थी। ईश्वर के पास जाती हुई वह बिना कुछ बोले परम शान्ति का अनुभव कर रही थी। उसे पता था कि मुझसे बिछड़ जाएगी और इसलिए उसकी आँखों से आँसू बहते थे। हाय रे वह दिन–, मैं उसे ढाँढस बँधा रहा था– घबराओ मत निम्मी, तुम जरूर ठीक हो जाओगी, लेकिन वह तो जानती थी–

फिर से रघुवीर की आवाज़ आँसुओं से भर्रा गई। फिर भी वह कहानी कहता रहा–” उसके सीने में बड़ा दर्द था। वह केवल सह रही थी, कुछ भी बोल नहीं पा रही थी। उसकी आँखों में आँखें डाले यह मैं ही जान रहा था।”

धूर्त डा̆क्टर केवल आश्वासन दे रहे थे। “घाव बाक़ी है, घाव जैसे ही भरेगा वैसे ही यह ठीक हो जाएगी।” बार बार वे ऐसा ही कुछ कुछ कह रहे थे। अरे मूर्खो, क्या इतना ही तुम लोगों का ज्ञान है, क्या यही तुम लोगों की स्पेशियलिटी है ” यह कहते हुए गुस्से से रघुवीर का मुँह लाल हो गया, उसके होंठ थर्राने लगे। एक पल के लिए किन्हीं अदृश्य शत्रुओं को मानो मारता लताड़ता हुआ ठिठका रहा।

उसके बाद क्या हुआ?– मैंने पूछा।

” उस दिन उसकी कठिनाई से चलती साँसों को देखकर मुझे किसी अनर्थ की आशंका हो गई थी और मैंने आ̆फ़िस से छुट्टी ले ली थी। दो–तीन दिनों से उसने कुछ भी नहीं खाया था। मैं दूध देता था, बिस्किट देता था लेकिन उसका खाने का मन नहीं होता। मेरी गोद में ही मेरे सीने पर सर रखकर पड़ी रही। मैं उसे सहला रहा था। वह केवल धीरे धिरे सिसकियाँ ले रही थी। उसकी सिसकियाँ धीरे धीरे और ढीली पड़ने लगीं। अब उसकी साँसें भी नहीं सुनाई पड़ रही थीं। तब मैंने समझा बेचारी सो गयी। यह समझ कर ज्यों ही मैंने बिस्तर पर सुलाने के लिए उसे उठाया त्यों ही देखता हूँ कि सब खतम हो गया, सब चला गया। उसका सिर नीचे लुढ़क गया। हाय मैं लुट गया, बर्बाद हो गया।”

मुझे ढाँढस बँधाना नहीं आता है। और वह लगातार रो रहा था। किसी तरह मैंने उससे कहा– “धीरज रखो, जो होना ही था उसमें क्या किया जा सकता है।”

उसने रूमाल से अपने आँसू पोंछता हुआ बोला –” फिर भी मैं उसे गोदी में ही लिए कार निकाल कर अस्पताल गया। डा̆क्टर ने कहा– “अब कुछ भी नहीं किया जा सकता।” श्मशान अस्पताल के नज़दीक ही था। अस्पताल के कर्मचारियों ने कहा वहीं गड्ढा खोद कर हम उसकी कब्र बना देंगे, लेकिन मैंने उनकी बातें नहीं सुनीं। मैं उसे वैसे ही घर ले आया। अपने घर के बग़ीचे में ही मैंने खुद उसके लिए गड्ढा खोदा और स्वयं उसे वहाँ सुला दिया…। ”

यह सुन कर मैं अचरज से भर गया और सोचा अरे पागल हो गया था क्या कि इसने उसकी की क़ब्र अपने बग़ीचे में ही बना दी। फिर भी रघुवीर के ग़मगीन चेहरे को देखते हुए मैं धीरे से बोला–” रघुवीर यह क्या किया तुमने, श्मशान ले जाकर उसका दाह संस्कार क्यों नहीं किया तुमने। यह जो कुछ तुमने किया वह तो तुम्हारे धर्म के ख़िलाफ़ था।

रघुवीर ने कहा–” रहमान भाई, क्या बोलते हो आप? इसमें धर्म अधर्म का क्या विचार करना? निम्मी का क्या धर्म हो सकता था। वह तो इस तरह के धर्म अधर्म के विचार से ऊपर थी। महान आत्मा थी वह।”

“सही– सही” यह पूरा ही पागल हो गया है, यह सोचते हुए मैंने कहा।

– “बग़ीचे मैंने उसकी समाधि बना दी। वहाँ रोज़ सुबह शाम फूल चढ़ाता हूँ। … जहाँ कहीं भी वह हो … आराम से रहे…उसकी यादें हैं मेरे पास”…यह कहते हुए उसने मेज़ पर रखा एलबम लेकर मुझे देते हुए कहा– “तुम भी उसके फ़ोटो देखो.. ”

मैंने एलबम खोला। चित्रों को देखते हुए जैसे मैं आसमान से ज़मीन पर गिर पड़ा।

तो वह इंसान नहीं थी– मेरे मुँह से निकल पड़ा

सही कहा तुमने, वह तो देवी थी। निम्मी इंसान नहीं थी। –रघुवीर बोला

एलबम में पामेरियन जाति की किसी कुतिया के चित्र थे। मैंने रघुवीर का चेहरा देखा। हल्की सी मुस्कान की लकीर कहीं पर थी वहाँ। कालेज के दिनों में भी जब वह इस तरह की कुछ करुण बात कहता तो बाद में ऐसी ही मुसकान की लकीर उसके चेहरे पर साफ़ दिखाई पड़ने लगती।

 

The poem अम्बिकाशिशुः appeared in Sanskrit ShreeH, April 2018!

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 Original text of the poem is being given bellow-

धूलिखेलनरतस्य बालक–
–स्यापि चित्तमभिमातृ संस्थितम्।
‘एहि-याम’ जननीध्वनीनतः
संनिशम्य विजहद् द्रवत्यरम्॥

एवमेव जगतीगतिष्वहं
दुर्गतोऽस्मि, मम मानसं परम्।
मातरेतदिह ते प्रतीक्षते
बद्धमध्यमनिशं निमन्त्रणम्॥

भावनास्नुतरसेन पिच्छिले
मातुरङ्कसरसि प्रमग्नवान् ।
पोत एककुचमापिबन् मुदा
साधिकारमपरं मृशत्यलम्॥

एवमेकजगदम्बिकास्तनं
त्वैहलौकिकफलं समश्नतः।
पारलौकिकफलेऽपरेऽपि मे
तत्कुचे न परिहीयतेऽर्हता॥

स्वोपकण्ठमनवाप्य मातरं
सोत्कतां व्रजति तीव्रमर्भकः।
सान्त्वनाय न भवन्ति तर्ह्यलं
क्रीडनानि निखिलानि किञ्चन॥

एवमेव जगदम्बिकास्मृते–
–रेकमप्यथ पलं ममाल्प्यताम्।
व्याकुलस्य मम सन्तु मानसे–
–प्याविधातृविषयाः विषप्रभाः॥

चीत्करोति पतितोऽवनौ शिशुश्
चेत् करोति जननी किमीक्षसे?।
नो पतिर्न च रतिः परे क्वचित्
संरुणद्धकि तदुत्कतां द्रुतौ॥

संनिरीक्ष्य जगदम्बिकापि मां
दुर्गतं विषयपल्वलेऽबलम्।
सा सहस्रदलपुष्करोदराद्
एति हीनविहरत्पतिर्द्रुतम्॥

अङ्कसंश्रयविलुब्धमानसं
चाटुचूङ्कृतिकृतातिसम्मदम्।
उद्भुजं झटिति बालमुन्मुखं
स्कन्धमुद्धरतकि प्रसूर्भुजैः॥

तद्वदेव बहुदेववन्दिता
सा समस्तजनताप्रसूर्मता।
मत्प्रपत्तिवचनावलीपरं
क्रन्दितं किमु निशम्य शाम्यति?॥

नो युवातितरशक्तिबृंहितो
नो जरन् समुपजातचेतनः।
सर्वथैव तदधीनवृत्तिकः
सम्भवेयमहमम्बिकाशिशुः॥

 

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एकस्य तिष्ठति कवेर्गृह एव काव्यम् अन्यस्य गच्छति सुहृद्भवनानि यावत्।
न्यस्याविदग्धवदनेषु पदानि शश्वत् कस्यापि सञ्चरति विश्वकुतूहलीव॥

(किसी कवि की कविता उसके घर तक ही रह जाती है जबकि किसी
की कविता मित्रों के घरों तक चली जाती है। लेकिन किसी किसी की कविता अरसिकों के मुखों पर पैर रखकर ऐसे निकल पड़ती है मानों उसे पूरे विश्व का भ्रमण करने की इच्छा हो। )

अपने विभिन्न भारतीय संस्करणों के अलावा पञ्चतन्त्र का पूरी दुनिया में भ्रमण भारतविद्या के शोधकर्ताओं के बीच एक चर्चित विषय रहा है। प्रस्तुत शोधपत्र में पञ्चतन्त्र के कुछ प्रमुख वैश्विक संस्करणों तथा उनकी विशेषताओं पर संक्षिप्त चर्चा की गयी है।

सम्पूर्ण पत्र की उपलब्धि निम्नलिखित लिंक से हो सकती है–

https://www.academia.edu/36371161/पञ_चतन_त_र_की_विश_वयात_रा_के_प_रमुख_पड_ाव_Panchatantras_journey_in_the_world._

 

Philosophical uses of grammar by Utpala and Abhinava

This lecture was delivered in a workshop held in Lucknow on Pratyabhijnavimarshini of Abhinavagupta. Subject of my presentation was “Philosophical uses of grammar by Utpal and Abhinava”. The presentation was done on 22.02.2018. Verses taken for discussion were-


  1. ज्ञानाधिकार, पञ्चमाह्निक, १२–

आत्मात एव चैतन्यं चित्क्रियाचितिकर्तृता–।

तात्पर्येणोदितस्तेन जडात् स हि विलक्षणः॥


  1. ज्ञानाधिकार, पञ्चमाह्निक, १७–

नाहन्तादिपरामर्शभेदादस्यान्यतात्मनः।

अहंमृश्यतयैवास्य सृष्टेस्तिङ्वाच्यकर्मवत्॥


  1. ज्ञानाधिकार, पञ्चमाह्निक, १९–

साक्षात्कारक्षणेऽप्यस्ति विमर्शः कथमन्यथा।

धावनाद्युपपद्येत प्रतिसन्धानवर्जितम्॥


  1. ज्ञानाधिकार, अन्तिम कारिका (८.११)

स एव विमृशत्त्वेन नियतेन महेश्वरः।

विमर्श एव देवस्य शुद्धे ज्ञानक्रिये यतः॥


  1. 1.7.1-

या चैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूषिता।

अक्रमानन्तचिद्रूपप्रमाता स महेश्वरः॥

Here is the link to listen to this –

https://archive.org/details/GrammarInKashmirShaivism

https://archive.org/details/GrammarInKashmirShaivism

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“KavitAputrikAjAtiH” (कवितापुत्रिकाजातिः) has been blessed by Shatavadhani Ganesh Kavi‘s magnificent introduction- “Asti Kashcid VAgarthaH (अस्ति कश्चिद् वागर्थः)”. My sincere thanks to Shatavadhani. He has always been an inspiration to me. This introduction itself is an exquisite model of Sanskrit prose writing.

 

                                        अस्ति कश्चिद् वागर्थः

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सम्प्रति संस्कृतवाचि काव्यकरणं नाम प्रभूतप्रतिभावतामपि किञ्चिदिव भयावहमिति मे प्रतिभाति। यतस्तत्र सन्ति नैके साहित्यनिर्माणकर्मीणताजिहीर्षायै बद्धपरिकराः प्रतिरोधबिन्दवः। नवकाव्यप्रकाशन-पुस्तकविक्रय-जीविकादीनां साक्षात्साहित्यनिर्मितिबाह्यानां वास्तवानां सङ्गतिं विहाय केवलं काव्यरचनाप्रक्रियामेव पश्यामश्चेदस्मदियं जिज्ञासा संक्षिप्ता सूच्यग्रा च भवतीति हेतुना तावन्मात्रं विवक्षुरस्मि। तदर्हन्ति सन्तः श्रवणानुग्रहेण सभाजयितुमिमं जनम्।

संस्कृतवाण्यां प्रायेण जागर्ति किल न्यूनातिन्यूनं पञ्चसहस्राधिकसंवत्सराणां काव्यनिर्माणपरम्परा। अपि च नूनमियमविच्छिन्ना, अनर्गला, अपारा, आढ्या च। विशिष्य प्रतिभा-व्युत्पत्ति-परिश्रमपरिप्लुतानां महाभिजात्यजेगीयमानानां पूर्वसूरीणां पुरः केनापि साम्प्रतिकेन कविना स्वात्मानं निभालयितुमतिमात्रं कष्टमिति स्वानुभवोsपि भणति सोङ्कारम्। प्रायशः शब्दार्थरूपणे यत्किमपि वक्तुं शक्यं तत्सर्वमिह तैरपूर्वरीत्या सुरुचिरं सुनिपुणं च गदितमिति मन्यते यः कश्चिदपि विपश्चित्। अतो हि वार्तमानिकसंस्कृतसाहित्यलोके सप्रयत्नं प्रतिभाशोभितेन प्रेक्षावता यदुत्तममपि निर्मीयते तन्मध्यममेवेति विमर्शकैस्सदैव निगद्यते। हन्त! कदाचिद्दैवदुर्विपाकवशादिव तदधममित्यपि विमर्शकजगति विपद्येत!
अन्यदपि खलु वर्तते वैधुर्यं यत्पूर्वसूरिसहस्रव्याहारवरूथयातायातक्षुण्णवर्त्मतया संस्कृतसाहित्यक्षेत्रे निर्बीजमपि वप्तुं शक्यं येन सुमहत्तरप्रशस्तिप्रख्यातिसम्पत्तिसाधनभूतं काव्यसस्यसंवर्धनं सुकरतरमिति। पूर्वाभिप्रायस्तु सामान्यतया संस्कृतज्ञानां भवति, परः प्रायेण संस्कृतेतरविदुषामिव गच्छति। किञ्च प्रामाणिकः संस्कृतकविरुभयथा विनश्यत्येव।
एवं सत्यां परिस्थित्यां साम्प्रतिकसंस्कृतकाव्यरिरचिषवः पूर्वोक्तप्रकारनैर्घृण्यद्वैविध्यं परिहर्तुमिव सदैव समाश्रयन्ते किल नावीन्याभासभूतानि कानि कान्यपि दुश्चेष्टितानि येन पूर्वसूरियोगदानमपि ह्रसति, अविमृश्यकारितापि च हसति। सङ्ख्यया केवलमल्पीयांस एव सुकवयः प्रमादैरेतैरस्पृष्टा इव, अजिता इव, अनभिभूता इव, अनाक्रान्ता इव च सारस्वतसिद्धिमुपयान्ति। तादृशेषु खल्वन्यतमस्तत्रभवान् मम कविमित्रं कविकुलमित्रं काव्यकञ्जातमित्रोsपि च श्रीबलरामशुक्लमहोदयः।

Shubhashansa-1

अस्मदालङ्कारिकैः काव्यनिर्मितौ यानि यानि तत्त्वान्यपेक्षितानीति समुदाहारन्ति तानि बहून्यपि समाविष्टान्यस्मिन् सुकवाविति निश्चप्रचम्। यदाह तत्रभवान् यायावरीयः काव्यमीमांसायां बलरामः सहजकविः, निसर्गत एव कविः। यद्यपि तस्य व्युत्पत्त्यभ्यासौ सुतरां श्लाघ्यावप्यानुषङ्गिणावेति मे प्रतिभाति। स्वभावेन च हृद्योsसौ कविवर्यो व्यासदासीयस्य कविकण्ठाभरणस्य मार्गमनेकत्रानुधावतीति प्रमोदस्थानमस्माकम्। वयसा नवयौवनमूर्तिरसावात्मनः प्रारम्भिकेष्वेव प्रयत्नेषु वागर्थदृशा कमपि कम्रं प्रौढिमानं प्रथयतीति च रसिकप्रत्ययकारिणी कुशलवार्ता।
सम्प्रति शुक्लाभिजनो बलरामः कविः स्वीयकवितासङ्ग्रहेऽस्मिन् बहुविधवाग्विलसितानां सौन्दर्यदर्शकश्चकास्ति। एते विच्छित्तिविशेषाः काव्यस्यास्य रूप-स्वरूपस्तरयोः स्वारस्यं बहुधा वर्धयन्तीति नास्ति संशीतिलेशः। स्वरूपस्तरे बलरामः कवितारेवतीकटाक्षपेशलं शृङ्गारं, स्ववासोविशदं भक्तिभावं तथा निजाभिमतनावीन्यमदिराकोकनदं पारसीकविद्यावरिवस्यां च समाद्रियते। रूपस्तरे तु मुनित्रयानुमतपदशुद्धिः, उपमा-रूपक-विरोध-व्याज-प्रास-यमकाद्यलङ्कारसम्बुद्धिः, सरल-विकट-प्रसिद्ध-व्युत्पाद्यवृत्तानां गतिसिद्धिश्चेति नैके गुणाः कवितास्वत्र त्वहमहमिकया परापतन्ति। एतेषां पल्लवग्राहिकपरामर्शोऽपि नात्र किलावकाशकार्पण्यतया शक्य इति वास्तवम्। क्व वा कृत्स्नस्यापि काव्यस्यास्य परिचयं कारयामीति दूराधिरोहिणी मम धिषणाकाङ्क्षा? तथापि चेतश्चमत्कारविधायिनीनां कतिपयकवितानां संस्मृत्या समाप्तप्रायभूरिभोजनः कश्चनान्नरसिकस्तु यथा निजकरलेहनेन परमामपि तुष्टिमनुभवति तथा कामपि रोमन्थरामणीयतां कलयामि।
सकृद्दर्शनेनैव बलरामकवितासु वृत्तवैविद्ध्यं मनो हरतितराम्। श्लोक-उपजाति-रथोद्धता-स्वागत-स्रग्विणी-वंशस्थ-द्रुतविलम्बित-मञ्जुभाषिणी-प्रहर्षिणी-वसन्ततिलक-मालिनी-हरिणी-शिखरिणी-मन्दाक्रान्ता-पृथ्वी-शार्दूलविक्रीडित-वियोगिनी-औपच्छन्दसिक-पुष्पिताग्र-आर्यादीनां सुप्रसिद्धसम-अर्धसम-वर्णवृत्त-मात्राजातीनां विनियोगे यथा हि लीलायते बलरामभारती तथैव विद्युन्माला-प्रमिताक्षर-कोकिलक(नर्कुटक)-हरनर्तन(मल्लिकामाला)-वनमञ्जरीत्यादीनां श्रुतिसुभगानामप्यनतिप्रसिद्धानां वृत्तानामतिवेलमनोहरनिर्वाहे धूर्वहा दुर्ललितविस्रम्भा विभातीति नात्र संशीतिलेशः। केवलं द्वित्रिवारमनाङ्मात्रस्खालित्यलेशं विहाय समग्रे काव्यसङ्कलनेऽस्मिन्न क्वाप्यनेन घनविदुषा वृत्तविलासलक्ष्मीमुषा सत्काव्यसौन्दर्यपुषा छन्दस्स्यन्दनचालने क्लेशः कल्पितः। न क्वापि व्यर्थपदानां पादपूरणमात्रसार्थकनिपातानां कृतकपदवयनप्रयासानां चुञ्चूप्रवेशः कविनानेन कारितः। यतो हि सरसकाव्येषु व्याकरणविरुद्धप्रयोगापेक्षया व्यर्थाधिकपदानामेव प्राचुर्यं सहृदयहृदयोद्वेजकमिति तत्रभवन्तः सङ्गीत-साहित्यसव्यसाचित्वेन विश्रुता राळ्लपल्लि अनन्तकृष्णशर्मसदृक्षा कविकर्मदक्षा आहुः। एतादृशदोषाः प्रायेण पिङ्गलागमकदर्थितानां वृत्तनिर्वाहप्रयासे परिपतन्तीति पद्यशिल्पवेदिनः सर्वे जानीयुः। परमयमसौ बलरामः सदैव सुन्दरच्छन्दोगतिगोविन्दसङ्गमङ्गलः काव्यकेदारेषु निजलेखनीलाङ्गलं ललितललितमेव कलयतीति शासितप्रायमेव। ईदृगधिकारस्तु बहुषु साम्प्रतिकलेखकेषु न दृश्यत इति वाग्वधूटीग्लानिकरी वार्ता।
बलरामवर्यस्य काव्यं सहजालङ्कारनिर्भरम्। प्रायेण प्रतिपद्यमपि केनापि स्फुटेन वास्फुटेन शब्दार्थालङ्कारेण सनाथीकृतमित्यत्र नातिशयोक्तिः। केवलं शृङ्गग्राहिकया रीत्या कथयामश्चेत्तत्र तत्र, यथा सहोक्तिच्छाया (प्रायेण “न केवलं कृष्ण” इति कविताया आद्यन्तं), परिकरालङ्कारस्पर्शपैशल्यं (“अनन्वयः”), मुद्रालङ्कारमेदुरता (“संस्कृतविता”), रूपकरामणीयता (प्रायेण “अधिकाव्यम्”,”विभिन्नम्”, “शृङ्गारसारः” इत्यादिषु बहुत्र), श्लेषशालीनता (“सुश्लोकसङ्ग्रहः”) अहंपूर्विकया मनःपथमवतरन्ति। एवमेव “गण्डवेषस्तु पौगण्डवेषे तव” (कामाश्रवः), “चीत्करोति पतितोsवनौ शिशुश्चेत् करोति जननी किम्” (अम्बिकाशिशुः), “मधुरिमधुरि तिष्ठत्”, “शर्करां कर्कशाभिः” (मधुरमधुरयुग्मम्), “भणितिमणीनणीयसि” (नवकवित्वमयी वसतिः), “तव केशवेशवशतो विशदे जनिता निशा मम निशाततरा” (अरविन्दकाननसुगन्धि), “शुद्धान्तरङ्गनिरतः….. शुद्धान्तरङ्गविरतो….” (सुश्लोकसङ्ग्रहः) इत्यादिषु बहुस्थलेषु प्रासानुप्रासयमकादीनां नूनमक्लिष्टयोजनं दरीदृश्यते। किमधिकम्? दिवसेष्वेतेषु रच्यमान-प्रकाश्यमानबहुकवितानां निरलङ्कारत्वफालन्तपतपनतापेन तप्तानां मादृशां मन्दभाग्यानां शिशिरीकरणाय किमयं कविकुमुदबन्धुरुदियायेति मे प्रतिभाति।
बलरामकवेर्वाचि पणिनापत्यपौरोहित्यसंस्कृता संस्कृतवाणी कामपि सुषमां तत्र तत्र लौकिकन्याय-प्रौढप्रयोग-वाचोयुक्तीत्यादिरूपेण हृदयहारिणीं दिव्यदोहदलीलां वितनोति येन विद्वद्रसिकहृदयारामद्रुमाः सद्यः प्रफुल्लन्ति। “अक्के चेन्मधु लभते”, “प्रत्येतुमीष्टे”, “चुचुम्बिषामि”, मिमृक्षामि”, “वैरहम्”, “कौक्कुरी”, “तीर्थध्वांक्षः” इत्यादयो नैकसङ्ख्याकाः। चुलुकीकृतपातञ्जलोपज्ञोऽप्ययं कविर्न कदापि सरसकाव्यकर्मापेक्षया विद्वदौषधनिर्माणव्यसनितां प्रकटयतीति रसिकलोकसौभाग्यम्। केवलं तस्य वाररुचपाण्डित्यं रसवत्कवितासीतासौविदल्लत्वमेव समालम्बते न तु तत्केशग्रहलम्पटपङ्क्तिकण्ठत्वम्। अत एव तेन “यणादिरिव योऽन्तस्थः स्वरादिरिव चाव्ययः”, “यं न पश्यति पश्यन्ती मध्यमा वापि मध्यमा। तत्परापि परं वक्तुं वैखरीं…..”, तिलं प्रवेशो न तिलोत्तमायाः रम्भा न जृम्भामपि सङ्गतासीत् धृता घृताच्यां न धृतिश्च किञ्चित् चित्ते ममास्मिंस्त्वयि गाहमाने”, “शौरिसूर्य मुखेन्दुस्ते…” इत्यादीनि पद्यरत्नान्येव निष्पादितानि न तूपलशकलानि। एवमेव पैङ्गलमङ्गलोऽयं कविरनर्घमर्घमेव कल्पयति भारतीवरिवस्यार्थं निजदुहितृदुर्लालित्यव्याजेन यथा : “मो मो गो गोऽस्पष्टां वाचं वारं वारं सोत्का सोक्त्वा मातुः क्रोडे दन्तैर्हीनैर्हासैरुक्ता विद्युन्माला”। इदं तु नूनं प्रतिभापाण्डित्ययोरनायिदाम्पत्यपथ्यफलमपत्यमिति मे प्रतिभाति। तदिदं स्वर्गीयकविपरिवृढस्य भास्कराचार्यत्रिपाठिनो मृत्कूटे वार्धकवर्णनावसरे विनियुक्तानां वातोर्मि-मन्दाक्रान्तादीनां वृत्तमुद्राणां पथि प्रस्थितमितोsपि कमनीयं कल्पनं, शैशवशशिरेखालेखनखटिकायितशिल्पनमिति निरल्पं ब्रूमः। अत्र न केवलं विद्युन्मालावृत्तं सलक्षणं लक्षितं किन्तु प्रातिभी या कापि विद्युन्मालैव रक्षिता, उत्प्रेक्षिता च।

Shubhashansa-2

सुकविरसावप्यहमिव श्रीकृष्णचरणचारणचञ्चरीक इति मोमुदीति मच्चेतः। अत एवात्र नैकाः कवितास्तु बलरामानुजवाल्लभ्यमनुधावन्ति। मधुरभक्तिभास्वराणि नैकानि पद्यप्रसूनानि सन्तीह वर्णविन्यास-रचनारास-रसविलासादिगुणगण्यानि। “न केवलं कृष्ण”, “जागर्तु कृष्ण”, “मत्तमयूरम्” चेत्यादीनि काव्यानि साक्षित्वेनास्य खलु विलसन्ति।
“प्रेमार्के तपति निरन्तरं ममोर्ध्वं का सन्ध्या दिननिशयोर्यदा न भेदः” इति व्याहरता कविनानेन मृता मोहमयी माता जातो बोधमयः सुतः। सूतकद्वयसम्प्राप्तौ कथं सन्ध्यामुपास्मह इति निगदन्ती मैत्रेय्युपनिषदेव स्मारिता। ” योsक्षीणि शिक्षयति वृष्टिनिरन्तरत्वं रागं च योsप्यधरयोरधरीकरोति। जागर्तु कृष्ण मयि ते स वियोगवह्निः”, “तव रागपरागरूषिता मम केशा विलसन्तु केशव। अथवा विधवाजटाजडा रजसा ते मलिना दरिद्रतु॥” इत्यादिषु पङ्क्तिषु नूनमेकादशभक्तिसोपानेष्वन्यतमा ह्यत्यन्तविरहासक्तिरेव जागर्तीति मन्मतिः। न केवलं कविरसौ कल्पितद्वैतभावनया स्तौति कैतवयादवं, निश्चिताद्वैतानुभूत्यापि नौति परमार्थपरमात्मानम्। यथा :
“आत्मभिन्नधिया कृष्ण यास्तुभ्यं नतयः कृताः ता ह्रेपयन्ति मां ताभ्योऽहमात्मानं क्षमापये”
एतदेतदतिवेलमुज्ज्वलं सत्कवित्वकलोपनिषत्कल्पमिति सूचयित्वा वयमग्रे यामः।

यथा देवे देवदेवे तथा मातरि जगन्मातरि च बलरामस्य भक्तिरुत्कटा, प्रस्फुटा च। तामिमां भावनामेव पुरस्कृत्य कथमसौ विनूतनविच्छित्तिं साधयति नवजीवनवर्मणो नितरामुच्चावचानि, नतोन्नतानि, विसंष्ठुलानि मानुषचापलवर्तनानीति द्योतयितुं तावदिदं पश्यन्तु पद्यम् :

वयं तदिह बालका यदपि मातुरङ्के स्थिताः
समुच्चकुचनिर्गलत्सरसदुग्धसारप्लुते।
तथापि कृमिकच्चरे घृणितपूतिकीलालके
मनो हरति सन्ततं क्वचन कर्दमे क्रीडितुम्॥ (“कदाचिदपि”)
कविरसौ नितरां भक्तिरक्तिमयो हृदि। यथा देवे, देशे, वाचि, विद्यायां भक्तिस्तथा रक्तिरप्यस्य क्वचित्कवितायां क्वचित्कामिन्यां क्वचिज्जगत्यां च विविधरसपारिवेषगूहिता गाहिता च निजाभिव्यक्तिं प्रकटयति। सत्यमेव तीव्रैरपि कोमलैरिव भावैर्विना कश्चिदपि न कविर्भवति। काम-मन्युभ्यां (जीवन-मृत्युभ्यामिति तात्पर्यं) खलु जगदिदं शासितमित्यार्षेयं दर्शनम्। एतयोरामूलचूलशोधनेन विना न किञ्चिदपि गुण-गात्रगण्यं तत्त्वं जगति सिद्ध्यति। अस्य तत्त्वस्य नैजानुभूतिं निस्सामान्यवक्रोक्तिपथे निदर्शयन्नेव सारस्वतसार्थवाहः कोऽपि कवितल्लजतामुपैति। पाश्चात्त्या अप्येतदामनन्ति। इदमेव बलरामवर्येsपि जीवातुभूतमिव चकास्ति। नो चेत्कथमिव तस्मिन्नीदृशी भावनिर्भरता? ईदृशी जीवनोन्मुखिता? अत एव कविनानेन जाज्वल्यमानानि नैकानि वाक्यानि नैकानि पद्यानि च शिशिराग्निशिखातलिकाभिरिव लिखितानि सहृदयहृदयचीनांशुकेषु। यथा :
“प्रेमाग्निं फलितमतः सहस्रकीलैः संहर्तुं नयनजलैर्न पारयामः” (काम आततायी)

“कौमुदीकलितयामिनीषु किं लब्धमस्ति वद दीर्घजागरैः
क्वार्जुनं वपुरपूर्वसौभगं मन्दचन्दिरगतं क्व पाण्डवम्” (अनन्वयः)
“त्वयोह्यमानो विपथे विसंष्ठुले स्वनायकानामिव दन्तुरान्तरे
विचारयेऽहं तव दुःखदुःखितं त्वमास्व यानेsथ वहाम्यतःपरम्” (त्रिचक्रिकाचालकः)
कवेर्मातृभाषा तु हिन्दीति सुविदितम्। तत्साहित्ये रीतिवाद-च्छायावादाख्यौ काव्यमार्गौ विश्रुतावेव। बलरामवर्यस्य काव्यकौशलयात्रा तु मार्गद्वयमिदमपि गाहते, समुचितसिद्धिमधिशेते च। तथापि तादृशः प्रौढकविः शिशुगीतसरलं निसर्गसहजं च ललितललितं किमपि कवयति यत्तु व्यक्तवर्णरमणीयमपि, सनिमित्तहासहैतुकमपि विदुषां श्रवणेन्द्रियधन्यतां प्रापयति यथा :
“वर्णे वर्णे गौरी गौरी केशे केशे श्यामा श्यामा । कोपे कोपे मिथ्या मिथ्या हासे हासे विद्युन्माला”
अत्र पदं नैकमपि वर्णद्वयमतिक्रामति, नैकोsपि शब्दो नैघण्टुकश्च। न वात्र विद्यते कश्चनान्वयक्लेशः। तथापि प्रेक्षावतामक्लिष्टश्लिष्टार्थद्योतकमिदं पद्यं द्राक्षापाकसङ्काशं सर्वेषामपि समास्वाद्यम्। एतदेकं हि काव्ययोगिनोऽस्य साहितीसुषुम्नाजागरणनिदर्शनमुदाहरणमित्यलम्।
अस्मिन् कवितासङ्ग्रहे पारसीकमूलानां काव्यखण्डानां संस्कृतच्छायारूपेण कतिपयपद्यानि विलसन्ति। कविताष्टकमिदं प्रायेण विवेच्यमुभयभाषाधुरीणैः। नास्माभिरुपमातुमलमस्य माहात्म्यं यतो हि रस-भावध्वनीनां निगीर्णमर्यादा या काचिदत्र गूढगूढा वर्तते तत्र तत्तसमयिन एवाधिकारिण आस्वादने विमर्शने च। तथापीदं वच्मो वयमस्मिन् काचिरोचिष्मती(Rose इत्याङ्लवाचि)रोचिरास्ते यद्विज्ञानकाठिन्यकण्टकानां परिहरणे न वयं वराकाः समर्थाः।
बलरामशुक्लमहाभागं सुकविलोके प्रतिष्ठापयितुमलमेका हि कविता “वयं केsपि कवयः”। अत्र वागर्थ–विद्यानवद्या प्राप्तसाहित्यसाम्राज्यसिंहासनमहाभिषेका, सुकुमारसुन्दराभिजातकाव्यशैलीशुक्लातपत्रतले निषण्णा निर्विषण्णा, शब्दार्थालङ्कारचामरद्वयवीजिता, अजिता हिता च रसिकलोकस्य जेगीयत एव। केवलमस्य काव्यखण्डस्य परिष्कारपारम्यं सूचयितुमत्र विहिता शिखरिणी कथमिव निर्वाहदुर्वहा खण्डितेव प्रगल्भनायिका कविनायकं दक्षिणं धिक्कुरुत इति स्मारयित्वा तिरोहितस्स्याम्। आचार्यश्रीशङ्करभगवत्पादस्य, पण्डितराजश्रीजगन्नाथस्य, मूककवेश्च पद्यविद्यापैशल्यमत्र प्रतिपादं प्रतिपदं प्रत्यक्षरं च विद्योतते। समग्रा कवितेयमत्र व्याख्यातुमर्हत्युद्धरणम्। किञ्च ग्रन्थगौरवभिया न तदाद्रियते। किमधिकम्? मृगमदामोदमेदुरं पारिजातप्रसूनमसृणं काव्यमिदं विवरीतुमन्यदेव प्रबन्धनमवश्यमित्युक्त्वा विरमामि।
क्वचिदस्माकं कविरयं क्षेमेन्द्र इव समाजवैपरीत्यचिकित्सकश्चकास्ति यथा :
इन्द्रियदूषणकर्मणि विरमति रसना न शिष्यवर्गेऽस्य।
संयममाचार्यस्य तु सा गृहदासी विजानाति॥ (विभिन्नम्)
अत्र गाहासत्तसईकारोsपि स्मृतिपथमवतरति। किञ्च स्वयं छात्रवत्सलाचार्यत्वेन विश्रुतः कविरेव पठत्यार्यामिमामिति समुत्तेजितस्वारस्यभूमिरस्याः।
क्वचिद्भर्तृहरिरिव पुष्पबाणविलासकार इव च वा किमपि शार्दूलविक्रीडितं निबध्नाति यथा “केनापूरि तवाधरेsमृतरसः…….” इत्यादि। किन्त्वत्रापि सुकविर्नानुकुरुते बिम्बप्रतिबिम्बवत्।
पूर्वसूरिपद्येषु शृङ्गारस्य प्राचुर्यं; परमपूर्वकवेरस्य कवित्वे भक्तिभावप्राबल्यम्। तस्मादिदं स्वीकृतिर्न तु हरणम्। नेदं केवलं स्वीकरणं वा ह्रस्वीकरणं; परं रसीकरणं स्वरसीकरणमिति च मन्मतिः।

Shubhashansa-3

यद्यपि काव्यमिदं आन्तं मधुरमधुरं तथापि चरमभागे निबद्धानि पद्यानि सर्वाण्यानुष्टुभानि मधुरतराणि, न हि न हि, मधुरतमानि वासुदेवबलरामस्य हलादि-मुसलान्तकृषिकर्मण इव शुक्लाभिजनस्य बलरामस्य काव्यकृषेः परमफलभूतानि सन्ति, हसन्ति, विकसन्ति, विलसन्तीति नास्ति मे कापि विचिकित्सा। अत्र कवेरस्य चाटूक्तिचातुरी, लोकशीलनशेमुषी, निबिडबन्धबन्धुरता, सूच्यार्थसमीचीनता, वक्रताव्यापारपारम्यं, ध्वनिधौरन्धर्यं चेति नानाप्रकाराः सत्कविमात्रगोचराः सुगुणा गौरीशङ्करशिखरायन्ते। व्याख्यानिरपेक्षमेव सुबोद्ध्यानि स्वच्छगोस्तनीगुच्छसनाभीनि पद्यान्येतानि सर्वाण्यपि समुल्लेखार्हाण्यपि स्थलाभावदूषितोऽहं कानिचन मात्रमत्र निवेद्य नमस्सुमाञ्जलिपुरस्सरमिमं पूर्वरङ्गप्रख्यप्रस्तावं समापयामि।
कवयः प्रायेण स्वकाव्यमधिकृत्य, विशिष्य स्वकाव्यस्फूर्तिसुन्दरीं चाधिकृत्य वक्तुं स्वयमिव शेषायन्ते। परन्तु वरकवय एव तदुभयसुषमासौभाग्यं व्यञ्जयत्काव्यं वितन्वते। तदत्र भूयसा द्रष्टुमलम्। पश्यत पश्यतास्मिन् दृष्टान्तनावीन्यमौचित्यञ्च। कथमिव प्रथमरसस्य सिद्धिरुत्प्रेक्षिता वक्रवाग्वर्त्मनेति सङ्ख्यावतामपरोक्षमेव। तथा चात्र भाषासारल्यसौन्दर्ययोः स्पर्धावर्धितस्वारस्यमपि प्रेक्षणीयमविस्मार्यम्।

कविता क्रियते नैव जातु सा तु प्रतीक्ष्यते।
नियोज्या जायते नैव प्रतिपाल्या प्रिया गतिः॥
मदीयकाव्यरत्नानां उद्भासप्रतिभूरियम्।
शाणपाषाणयुगली त्वत्कपोलस्य भासताम्॥ (अधिकाव्यम्)
विनोदे च प्रबोधे च सुभाषितमयी वाणी बलरामस्य भासते। अत्र क्वचित्पदचमत्कृतिः, क्वचिदौपम्यचमत्कृतिः, क्वचिल्लोकपरिज्ञानगाम्भीर्यं, क्वचिद्दार्शनिकदीप्तिमत्त्वं, क्वचित्समार्द्रविश्वमैत्रीमौखर्यं, क्वचिदमोघमार्मिकता, क्वचिदुद्दामधीमाहात्म्यं चेति नैकस्तवनीयांशा विराजन्ते। हन्त! कस्मादिव खलु विद्याकरेण, वल्लभदेवेन, श्रीधरदासेन, सायणार्येण, जल्हणेन वा नालोकि स्वस्वसुभाषितसङ्कलनकर्मसु प्रतिनवसूक्तिमुक्ताफलानामसौ शुक्तिसम्पुटीति चेखिद्यते चेतः,रोरुद्यते हृदयम्। विदांकुर्वन्तु कृपया काश्चन सूक्तिकाञ्चनकिङ्किणीः, याः किल प्रेम्णा पादयोः करोति पङ्कजासनदयिता।

Shubhashansa-4

अहं च मम पुत्री च ग्रन्थानां रसिकावुभौ।
यथा मे पठने प्रीतिस्तथास्याः पाटने रुचिः॥
कार्तिके सप्तपर्णानां सुगन्धैः सायमूह्यते।
गजेन्द्रशालाsनङ्गस्य विशृंखलिततां गता॥
संस्कृतं पारसीकं च वाग्देव्या नयनद्वयम्।
धन्योsहमुभयेनापि सानुकम्पं कटाक्षितः॥

उपमा कालिदासस्य त्रिलोक्यां नैव विद्यते।
अस्मिन्नाभाणके कुत्र वदतास्त्यर्थगौरवम्॥
स्पर्शमात्रफला ग्रन्थाः समयाभावतोऽधुना।
पुत्रवन्नेत्रहीनस्य सन्तीत्येव सुखं मम॥
सुतेनाचिरसूतेन क्षेत्रे ग्रामवधूरसौ।
राज्ञीव राजप्रासादे युवराजेन राजति॥
व्युत्पत्ताविष्यते यत्नः कामं शक्तिर्निसर्गजा।
यथा प्रेम्णि प्रकृतिजे यतनं रतिकर्मणि॥
सस्पृहं वीक्षितौ सर्वैरलब्धमधुराकृती।
शब्दार्थौ सत्कवेरुच्चैः कुलस्त्रीणां कुचाविव॥
यदा स्फुरति सा रात्रिर्मद्यौवनसखी सखी।
निजस्त्रीगमनं तर्हि परस्त्रीगमनायते॥
स्मितेषु सूत्रतुल्येषु सारवत्स्वल्पकेषु ते।
भष्यायन्ते विकल्पा मे चिरोहापोहपूरिताः॥

कथमिव परश्शतानां पद्यपद्मानां खल्वीदृशानां स्वमनस्तृप्तिपर्यन्तं व्याख्यातुं प्रभवेम? यदि शक्यं, तथापि नैतेषां सौरभं, सौकुमार्यं वर्णवैभवं, मरन्दमाधुर्यं तत्परिवेषभूतेन जीवनापराभिधानेनापि जलेन (जडेन) निपुणं निरूपयितुं शक्यम्। केवलं सहृदयश्रीहरिरेव पद्मानुरागं पद्यपद्मानुरागं च विजानाति। स जानाति च निजकरसात्कर्तुम्। अतोsहं सर्वैरपि विद्वद्रसिकैः काव्यमिदं बलरामोपज्ञं श्राव्यं सेव्यमिति निवेद्य प्रस्तावनामिमां कथञ्चित्समाप्य सामाजिको भवामि। जीयाद्बलरामभारती।

– शतावधानी आर॰ गणेशः

 Shubhashansa-5

Sanskrit Grammatical Tradition of the Jainas

A paper dealing with 1500 years long tradition of formulating grammatical rules by the Jain scholars, titled “जैन संस्कृत व्याकरण परम्परा” has been published in Sambodhi (Indological Research Journal of LDII) XL volume. Almost all the Jain grammarians with their special features with an account of general characteristics of Jain Sanskrit Grammar,have been discussed here. The paper in PDF can be seen or downloaded from the following link-
https://www.academia.edu/…/Sanskrit_Grammatical_Tradition_o…

The text of the paper is given bellow-

 

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कुछ पाश्चात्त्य शोधकर्ताओं ने संस्कृत के प्रति जैन विद्वानों के दो प्रकार के दृष्टिकोणों को रेखांकित किया है। उनके अनुसार जैन विद्वानों के दृष्टिकोण की यह विभिन्नता संस्कृत के दो प्रकार के उपयोगों पर आधारित है। संस्कृत के जिस स्वरूप के द्वारा प्राचीन व्यवस्था में जैनों के लिये अस्वीकार्य हिंसा आदि दूषित कृत्यों का तथाकथित उपोद्बलन किया जाता था, संस्कृत के उस कर्मकाण्डीय स्वरूप के प्रति जैनों की स्वाभाविक अरुचि दिखायी पड़ती है। इसलिये स्पष्ट दिखायी पड़ता है कि धार्मिक कर्मकाण्डों के लिये जैन मत में प्राकृत भाषा को ही प्राथमिकता दी जाती रही। इसके विपरीत संस्कृत के अन्य (पन्थनिरपेक्ष) स्वरूप को जैन विद्वानों ने अत्यन्त उत्साहपूर्वक स्वीकार किया। संस्कृत का यह स्वरूप प्राचीन भारत में शास्त्रों तथा साहित्यिक विधाओं के लिए सर्वप्रयुक्त उपकरण बन गया था। संस्कृत भाषा को ग्रहण किया जाना अपने सिद्धान्तों को विद्वद्वर्ग में स्थापित करने तथा अधिकाधिक पाठकों तक अपनी साहित्यिक कृतियों के प्रसार के लिये अनिवार्य सा हो गया था। इन कारणों से जैन विद्वानों ने संस्कृत के अध्ययन तथा उसके लिए विविध प्रविधियों के अन्वेषण की ओर रुचि प्रदर्शित की। यद्यपि कई उदाहरण ऐसे भी मिलते हैं जिनसे प्रतीत होता है कि जैनों ने संस्कृत शास्त्रों की रचना वैदिक विद्वानों से प्रतिस्पर्धावश की लेकिन यह प्रयोजन निश्चित रूप से बहुत ही गौण रहा। संस्कृत भाषा के साहित्यिक एवं शास्त्रीय स्वरूप के परिग्रह तथा उपयोग से जैनों को अपनी साम्प्रदायिक मान्यताओं की क्षति की आशङ्का नहीं थी। इस उपयोग से जैन विद्वानों ने संस्कृत के धार्मिकेतर साहित्य को पर्याप्त समृद्ध किया तथा स्वयं भी संस्कृत की सहायता से अपने सिद्धान्तों तथा अन्यान्य रचनाओं को सुदृढ भूमि प्रदान की, जिसके कारण इन्हें व्यापक प्रचार मिल सका। इस पारस्परिक उपकार्य–उपकारक भाव ने भारतीय वाङ्मय को सुसमृद्ध किया। जैनों द्वारा परिवर्धित विशाल संस्कृत वाङ्मय में उनका व्याकरण शास्त्रीय लेखन भी अन्यतम है।

जैन संस्कृत वैयाकरणों पर विचार करते हुए सर्वप्रथम प्रश्न यह उठता है कि जैन विद्वानों का संस्कृत व्याकरणों के प्रणयन के पीछे क्या उद्देश्य था। पश्चिमी विद्वानों ने अपनी विभाजक दृष्टि का उपयोग करते हुए यह निर्णय दिया है कि पाणिनीय व्याकरण तथा उसकी व्याख्याएँ ब्राह्मणवाद से अतिप्रभावित होकर उसकी समर्थक हो गयी थीं। उनसे स्वाभाविक रूप से ब्राह्मणवाद का पोषण हो रहा था। जैन विद्वानों ने इसे अपनी साम्प्रदायिक भावना के लिये असुरक्षित पाते हुए नवीन व्याकरणों का प्रणयन प्रारम्भ किया(देखें–Dundas 1996)

“….The normative grammar of the Sanskrit by Pāņini and in particular its immensely authoritative commentary by Patanjali had become so closely associated with Jainism’s ideological opponents, the Brāhmaņa ritualists, to be readily accepted as a source of correct linguistic usage. As a result, various types of Sanskrit Grammatical analysis were introduced and by Jain monastic scholars as substitute for or equivalent to the Pāņiniyan System….”

उपर्युक्त प्रकार का निर्णय ले लेना बहुत सुविधाजनक तथा तार्किक लग सकता है। परन्तु इसमें एक बड़ा दोष यह है कि यह मत भाषा के स्वाभाविक प्रवाह की अनदेखी करता है। लोक में भाषा अथवा भाषिक समाज में परिवर्तन होने के साथ ही नयी–नयी शिक्षण पद्धतियों के अनुसार नवीन व्याकरणों की आवश्यकता स्वाभावतः अनुभूत होती है। उस परिवर्तित काल विशेष के वैयाकरण अथवा भाषाविद् इस आवश्यकता के प्रति जागरूक रहते हैं। वे समकालीन जनता की बुद्धि तथा उसकी धारणा शक्ति के अनुरूप नवीन व्याकरणों का प्रणयन करते हैं। जैन व्याकरणों के सूक्ष्म अध्ययन से यह बात प्रकट होकर सामने आती है कि जैन व्याकरण वाङ्मय केवल ईर्ष्या अथवा प्रतिस्पर्धा मात्र के प्रतिफल नहीं हैं। नकारात्मक भावना से उत्पन्न कार्य इतने महनीय तथा उदात्त रूप में प्रकट नहीं हो सकते। वस्तुतः जैन व्याकरण अन्यान्य पाणिनीयेतर व्याकरणों की भाँति ही संस्कृत सीखने की युगानुकूल आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये रचे गये थे।

अष्टाध्यायी पद्धति सैकड़ों वर्षों के ऊहापोह पूर्ण अध्ययनों से समृद्ध होने के साथ–साथ बहुत पेचीदा भी हो गयी थी। पाणिनीय तन्त्र का तात्पर्य केवल अष्टाध्यायी के अध्ययन मात्र से गृहीत नहीं हो सकता था। सूत्र के साथ तत्सम्बद्ध वार्तिकों, इष्टियों तथा विभिन्न व्याख्याओं के बिना सूत्र का वास्तविक तात्पर्य जानना कठिन हो गया था। पाणिनि तथा पतञ्जलि के मध्यगत कालखण्ड में भाषा में जो भी विकास हुआ उसका अन्वाख्यान भी पाणिनीय परम्परा को ही करना था ताकि पाणिनीय तन्त्र अद्यतन बना रहे। पाणिनीय व्याकरण इस इतना संक्षिप्त, सुगठित, संश्लिष्ट तथा उपयोगी बन पड़ा था[1] कि शब्दान्वाख्यान के लिए किसी अन्य तन्त्र की कल्पना ही व्याख्याकारों को असह्य लगती थी[2]। वे शब्दान्वाख्यान में परम प्रमाण पाणिनि को ही मनते थे। इसी कारण वैयाकरण निकाय में एक प्रवाद चल पड़ा– सूत्रेष्वेव हि तत्सर्वं यद्वृत्तौ यच्च वार्तिके (अर्थात् व्याख्याओं अथवा वार्तिकों के द्वारा जो कुछ भी जोड़ा गया है, वह सब कुछ पहले से ही सूत्रों में विद्यमान है)। इस मान्यता के पीछे आचार्य पाणिनि के प्रति श्रद्धातिरेक भी एक महत्त्वपूर्ण कारण रहा। सूत्रों के द्वारा ही सभी शब्दों की व्याख्या किये जाने की शर्त के कारण व्याख्याकारों को सूत्रों के दायरे को अनिवार्यतः बढ़ाना पड़ा था। इसके लिए उन्होंने पाणिनीय शास्त्र में अनेकानेक प्रविधियाँ जोड़ीं। कहीं उन्होंने योगविभाग किया, जो सूत्रों को दो भागों में तोड़ने को कहते हैं। कहीं वे ज्ञापक का उपयोग करते हैं, जो पाणिनि के सूत्रों से अप्रत्यक्ष रीति से अन्य तात्पर्यों के ग्रहण को कहते हैं। इसके अतिरिक्त तन्त्र, अनुवृत्ति, अपकृष्टि की विचित्रताएँ इत्यादि अनेक प्रविधियाँ सूत्र के दायरे को बढ़ाने के लिए स्वीकृत हैं। इन प्रविधियों को समझने के लिए पाणिनीय शास्त्र में व्याख्या की पर्याप्त अपेक्षा है। व्याख्यासापेक्षता की इसी विवशता को पाणिनीय तन्त्र में सबसे पहली परिभाषा द्वारा इस प्रकार स्पष्ट किया गया है–व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिर्न हि सन्देहादलक्षणम्[3] (अर्थात्, सूत्रों का विशेष तात्पर्य व्याख्यान से प्रकट होता है। सन्देहमात्र से सूत्र को शब्दान्वाख्यान में असमर्थ नहीं मान लेना चाहिए)। रोचक बात यह है कि सर्वोत्तम जैन वैयाकरण आचार्य हेमचन्द्र के न्यायसंग्रह में इस परिभाषा का कोई स्थान नहीं है। केवल हैम परिभाषाओं के संग्राहक, परिवर्धक तथा व्याख्याकार हेमहंसगणि ने व्याख्यानतो विशेषार्थप्रतिपत्तिः (परिभाषा–१२१) इस रूप में इसे स्थान दिया है। इस तथ्य से जैन व्याकरणों का स्वाभाविक गुण–उनकी स्पष्टता प्रकट होती है। पाणिनीय विद्वानों ने शास्त्र की इस व्याख्यागम्यता को पाणिनीय तन्त्र की विचित्रता कहकर समर्थित किया है – विचित्रा हि सूत्रस्य कृतिः पाणिनेः (काशिका १.२.३५)। पाणिनीय व्याकरण के विकास में अनेक युग लग गये हैं। कई भाषिक प्रयोग ऐसे हैं जिनका मर्म समझने के लिये हमें तीन मुनियों की शरण लेनी पड़ती है– यथोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम्।  अष्टाध्यायी की वृत्तियों में पाणिनि से पूर्व तथा पाणिनि के पश्चात् हुए अनेकानेक आचार्यों के मत लिखित अथवा अलिखित रूप में चले आ रहे थे। इन सबका सरलतया एकीकरण तथा परिपूर्ण प्रस्तुति प्रत्येक युग की आवश्यकता रही है। इसी आवश्यकता की पूर्ति हेतु जिस प्रकार कातन्त्र आदि अजैन व्याकरण भाषा की व्याकृति में प्रवृत्त हुए उसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए जैन वैयाकरणों ने भी अपने व्याकरण रचे। ये व्याकरण अपने समय में (तथा उसके बाद भी) बहुत उपयोगी तथा लोकप्रिय हुए साथ ही उन्होंने भारतीय व्याकरण वाङ्मय की धारा को नये आयाम भी दिये।

भारत की भाषिक परम्परा तथा उसके वैज्ञानिक विश्लेषण की धारा कभी जड नहीं हुई। संस्कृत भाषा का स्वरूप स्थिर हो जाने तथा उसके लोकभाषा नहीं रहने के बावजूद उसके शिक्षण की प्रविधियों में नवीनताएँ देखी जाती रहीं। पाणिन्युत्तर व्याकरण इसी प्रवृत्ति के परिणाम हैं। यदि इन व्याकरणों के प्रणयन का कारण भाषा शिक्षण न होकर साम्प्रदायिक विद्वेष अथवा प्रतिस्पर्धा मात्र होता तो विभिन्न युगों में इतनी बड़ी संख्या में जैन व्याकरण न लिखे गये होते। जैनेन्द्र, शाकटायन के बाद हेमचन्द्र जैसे परिपूर्ण व्याकरण के होने के बावजूद जैन वैयाकरणों द्वारा निरन्तर व्याकरण प्रणयन की प्रवृत्ति बताती है कि इन व्याकरणों की रचना के प्रयोजक भाषा शिक्षण की सरलतम विधियों का अन्वेषण तथा जैन विद्वानों की निरन्तर शास्त्र–व्यसनिता है।

जैन समाज में अध्ययन तथा अध्यापन के लिए केवल जैन विद्वानों द्वारा लिखे गये व्याकरण ही ग्राह्य नहीं रहे  बल्कि पाणिनीय व्याकरण सहित अन्यान्य व्याकरण भी पर्याप्त प्रचलित रहे हैं। अगर जैन मानस में शिक्षण पद्धति को लेकर वस्तुतः साम्प्रदायिक द्वेष होता तो जैनों की शिक्षण पद्धति में कातन्त्र अथवा सारस्वत व्याकरण इतने महत्त्वपूर्ण नहीं रहे होते। ध्यातव्य है कि उपर्युक्त व्याकरण पाणिनीयेतर तो हैं लेकिन इनके रचयिता जैन विद्वान् नहीं हैं।

हेमचन्द्र इत्यादि अनेक जैन वैयाकरणों ने पाणिनि तथा पतञ्जलि का नाम बहुत ही श्रद्धा से लिया है[4]। पारस्परिक सहयोग तथा सम्मान के कई उदाहरण प्रस्तुत कर इसका खण्डन बहुत सरलता से किया जा सकता है कि जैनाचार्यों के व्याकरण लेखन के प्रयोजक साम्प्रदायिक द्वेष अथवा प्रतियोगिता मात्र थे। जैन व्याकरणों के अध्ययन से पदे–पदे यह द्योतित होता है कि ये चिरन्तन भारतीय व्याकरण वाङ्मय के विकास के अगले पड़ाव हैं, उनसे विरुद्ध या भिन्न नहीं।

पाणिनि की तुलना में शाकटायन आदि जैन वैयाकरणों के समय तथा समाज में भाषिक परिस्थितियाँ पर्याप्त भिन्न हो गयी थीं। पर्याप्त अवधि तक जनसामान्य की भाषा रहने के सहस्राब्दियों बाद तक भी संस्कृत भाषा चिन्तन,मनन तथा शास्त्रार्थ की भाषा बनी रही। ऐसी स्थिति में संस्कृत के शुद्धतम ज्ञान का सरलतम साधन पाणिनि की अष्टाध्यायी रही। सहस्राब्दियों तक अष्टाध्यायी की भूमिकाएँ बदलती रहीं। समय बदलने के साथ साथ अष्टाध्यायी का महत्त्व बढ़ता ही गया। पाणिनि ने अष्टाध्यायी की रचना वैदिक संस्कृत की सुरक्षा[5] तथा लौकिक संस्कृत के विश्लेषण के लिए की थी। उनके सूत्रों की संरचना शिष्टजनों के द्वारा प्रयुक्त भाषा के आधार पर की गयी थी[6]। महाभाष्य के काल तक सम्भवतः शिष्टजनों (संस्कृत भाषा के जन्मजात प्रयोक्ताओं) की अल्पता होने तथा भाषा में अपभ्रंश प्रयोगों के बढ़ जाने के कारण अष्टाध्यायी का उपयोग शिष्ट जनों (तथा उनके द्वारा प्रयुक्त मानक भाषा) की पहचान के लिए किया जाने लगा था[7]। पतञ्जलि के बाद जब संस्कृत के जन्मजात  वक्ताओं की संख्या समाप्त होने लगी तब अष्टाध्यायी का उपयोग संस्कृत भाषा को सीखने के लिए व्यापक रूप से किया जाने लगा। विदेशी यात्री इत्सिंग(६३५–७१३ई॰) के विवरणों से पता चलता है कि उस समय प्राचीन भारत में जनसाधारण में पाणिनि का प्रवेश अतीव सघन था[8]। पाणिनि कालीन समाज में अधिकांश लोगों की भाषा संस्कृत थी तथा बहुत सारे लोग संस्कृत को समाज से सीख पाते थे। पाणिनि ने वैदिक तथा लौकिक दोनों स्वरूपों को स्वतन्त्र भाषिक प्रवृत्तियाँ मानते हुए भी दोनों के विवेचन को इस तरह परस्पर सम्पृक्त रूप प्रस्तुत किया कि अष्टाध्यायी के क्रमपूर्वक अध्ययन करने पर ये दोनों भाषाएँ सहज रूप से अधिगत हो जाती हैं। जैन व्याकरणों की रचना पाणिनि के लगभग एक हज़ार वर्ष बाद प्रारम्भ हुई। उस समय तक भाषिक परिस्थितियाँ काफ़ी भिन्न हो चुकी थीं। संस्कृत अब मातृभाषा नहीं रही। अब इसे द्वितीय भाषा के तौर पर सीखा जाना था[9]। द्वितीय भाषा ग्रहण (Second language acquisition) की प्रविधियाँ भी स्वभावतः भिन्न होती हैं। पाणिनि ने संस्कृत के लिए जिन प्रविधियों का प्रयोग किया था अब उनके परिवर्तन की आवश्यकता अनुभूत होने लगी थी। इसी कारण पाणिन्युत्तर वैयाकरणों ने शिक्षण की नवीन वैज्ञानिक प्रविधियों का अन्वेषण करके नये व्याकरणों का प्रणयन किया। उपर्युक्त तथ्य के आलोक में पाणिनीयेतर व्याकरणों का अध्ययन किये जाने पर ये शिक्षणपरक सूक्ष्म तकनीकें स्पष्ट हो जाती हैं। हम देखते हैं कि परिवर्तित युग में प्रासङ्गिक बने रहने के लिये पाणिनीय तन्त्र को भी बाद में प्रक्रिया प्रविधि का आश्रय लेकर अपने आप को युगानुकूल बनाना ही पड़ा।

जैन तथा वैदिक विद्वानों के मध्य प्रतिस्पर्धा की बात करें तो यह एक स्वाभाविक परिघटना थी जिसे झुठलाया नहीं जा सकता है। प्रभावकचरित (२२–८३) से पता चलता है कि ब्राह्मण लोग पाणिनीय व्याकरण को वेद का अङ्ग बताते थे और अवैदिक जैनों के द्वारा उसके अध्ययन किये जाने पर अहंकारवश ईर्ष्यापूर्ण आक्षेप करते थे। उनके लिये यह उपहास का विषय था कि “आप वेद को तो मानते नहीं लेकिन वेदाङ्गों के बिना आपका काम नहीं चल सकता”–

पाणि(नि)नेर्लक्षणं वेदस्याङ्गमित्यत्र, च द्विजाः।

अवलेपादसूयन्ति कोऽर्थस्तैरुन्मनायितैः॥

जिनेश्वर के अनुसार ब्राह्मण जैनों में शब्दलक्ष्म तथा प्रमालक्ष्म का अभाव बताते हुए उन्हें परलक्ष्मोपजीवी तथा परग्रन्थोपजीवी कहा करते थे। इस आक्षेप के उत्तर में बुद्धिसागर सूरि ने पञ्चग्रन्थी नामक व्याकरण की रचना की[10]

शब्दलक्ष्म प्रमालक्ष्म यदेतेषां न विद्यते।

नादिमन्तस्ततो ह्येते  परलक्ष्मोपजीविनः॥ (प्रमालक्ष्म पृ॰८९)

उपर्युक्त आक्षेप का मुक़ाबला करने के लिये भी जैन वैयाकरण स्वतन्त्र व्याकरणों के प्रणयन में प्रवृत्त हुए होंगे, ऐसी सम्भावना की जा सकती है। इसके अतिरिक्त पाणिनि तथा अन्यान्य वैयाकरणों के सर्वलोकातिशायी यश से लुब्ध होना भी इन व्याकरणों के प्रणयन में एक कारण प्रतीत होता है[11]। हेमचन्द्र इत्यादि कई वैयाकरणों ने अपने आश्रयदाताओं अथवा गुरुओं के आदेश पर भी व्याकरण लिखे।

आगे के जैन वैयाकरणों के व्याकरण वाङ्मय की सामान्य प्रवृत्तियों को पहचानने का प्रयत्न किया जा रहा है। इससे इन वैयाकरणों का संस्कृत भाषा तथा व्याकरण पद्धति के प्रति दृष्टिकोण और अधिक स्पष्ट होकर सामने आ पायेगा–

  • सरलता की प्रवृत्ति–

जैन वैयाकरणों के काल तक जनता पाणिनीय व्याकरण की क्लिष्टता से स्वभावतः त्रस्त हो चुकी होगी। सामान्यतः भी व्याकरण शास्त्र पर कठिनता का आक्षेप बद्धमूल हो चुका था। समाज में प्रचलित कष्टं व्याकरणं शास्त्रम्[12], मरणान्तो व्याधिः व्याकरणम्[13] आदि कहावतें व्याकरण के प्रति सामान्य अरुचि को प्रदर्शित करती हैं। इस कारण पाणिनि की अपेक्षा जैन वैयाकरणों को विशिष्टता प्राप्त करने के लिए अपनी पद्धति को सरल तथा संक्षेप करना ही था। प्रशिक्षु जनता व्याकरण को सरलता पूर्वक सीखना चाहती थी। जैन वैयाकरणों ने व्याकरण-शिक्षण को अपेक्षाकृत सरल बनाने का प्रयत्न करके अपने को अनन्यथासिद्ध किया है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये उन्होंने कई तकनीकें अपनायीं। उदाहरण के लिए उन्होंने अनेक जगह कठिन सूत्रों को स्पष्ट किया। कई स्थान पर बहुत तरह के सूत्रों को छोड़ दिया। अनेक बड़ी संज्ञाओं को छोटा बनाया तथा गणसूत्रों में अनेकानेक प्रकार के परिवर्तन किये। जैनेन्द्र महावृत्तिकार अभयनन्दी ने बड़े ही कटु शब्दों में पाणिनि की अपेक्षा देवनन्दी के व्याकरण की विशेषताएँ निम्नलिखित शब्दों में बतायी हैं–

पाणिनिना यदयुक्तं लपितं कृत्वाष्टकं मोहात्।

तदिह निरस्तं निखिलं श्रीगुरुभिः पूज्यपादाख्यैः[14]

(पाणिनि ने अष्टाध्यायी में भ्रमवश जितनी भी अनुचित बातें की थीं सबको हमारे गुरु

पूज्यपाद देवनन्दी ने निरस्त कर दिया।)

  • विशदता–

पाणिन्युत्तर वैयाकरणों की सामान्य प्रवृत्ति यह रही कि वे कार्य जो पाणिनीय शास्त्र में ज्ञापकों या संकेतों के माध्यम से हो रहे थे उन सबको उन्होंने शब्दतः कहकर सूत्र में सम्मिलित कर दिया। उदाहरण के लिये वाक्य की प्रातिपदिक संज्ञा का निषेध पाणिनीय तन्त्र में ज्ञापक से होता है। कृत्तद्धितसमासाश्च (पा॰१.२.४६) सूत्र में समास का ग्रहण इस नियम को बताता है कि जहाँ अनेक समुदाय सार्थक हों वहाँ समास की ही प्रातिपदिक संज्ञा हो अन्य की नहीं[15]। हेमचन्द्र ने सूत्र में वाक्य के प्रातिपदिक (हेमचन्द्र के अनुसार नाम) संज्ञा का निषेध शब्दतः ही कर दिया– अधातुविभक्तिवाक्यमर्थवन्नाम (है॰ १.१.२७)। स्पष्टता की प्रवृत्ति के कारण ही हेमचन्द्र ने अपने व्याकरण में प्रत्याहारों का उपयोग न करके लोक प्रसिद्ध संज्ञाओं का उपयोग किया है। उदाहरण के लिए अच् के स्थान पर स्वर, हल् के स्थान पर व्यञ्जन आदि[16]। अध्येताओं का स्वाभाविक अनुभव है कि पाणिनि की ये संज्ञाएँ कृत्रिम हैं जिनके कारण शास्त्र की कठिनता बढ़ जाती है।

  • संग्रह वृत्ति–

जैन वैयाकरणों ने अपने ग्रन्थों के माध्यम से सहस्राधिक वर्षों की पाणिनीय तथा अपाणिनीय व्याकरण परम्परा का संग्रह तथा उसकी सुरक्षा की। भाषा ज्ञान के लिये सारी आवश्यक उपयोगी बातें एक जगह संगृहीत हो जायें ताकि अध्येता को श्रम न करना पड़े इसके लिये उन्होंने यथोपलब्ध सिद्धान्तों का संग्रह किया। इससे लाभ यह हुआ कि पाणिनीय तन्त्र में जो कार्य अनेकानेक व्याख्याग्रन्थों की सहायता से हो पाता था वह इन व्याकरणों में प्रत्यक्ष सूत्रों द्वारा एक स्थान पर ही प्राप्त हो जाता है। शाकटायन के टीकाकार यक्षवर्मा ने इसी तथ्य को निम्नोक्त शब्दों में प्रकट किया है–

इष्टिर्नेष्टा न वक्तव्यं वक्तव्यं सूत्रतः पृथक्।

संख्यानं नोपसंख्यानं यस्य शब्दानुशासने॥

इन्द्रचन्द्रादिभिः शाब्दैर्यदुक्तं शब्दलक्षणम्।

तदिहास्ति समस्तं च, यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्॥

(शाकटायन के व्याकरण में इष्टियों की आवश्यकता नहीं पड़ती, वक्तव्यवार्तिकों को अलग से नहीं कहना पड़ता, उपसंख्यानवार्तिकों को गिनना नहीं पड़ता। इन्द्र, चन्द्र आदि वैयाकरणों के द्वारा जो भी शब्द लक्षण बनाये गये हैं, वे सब यहाँ हैं। जो इस व्याकरण में नहीं है वह कहीं भी नहीं है।)

  • लाघव की प्रवृत्ति–

जैन वैयाकरणों ने अनेक स्थलों पर सूत्र रचना में पाणिनि से भी अधिक लाघव प्रदर्शन का प्रयत्न किया। जैनेन्द्र की एकाक्षरी सञ्ज्ञाओं का विवरण आगे दिया जायेगा। अनेक जगह जैन वैयाकरणों ने सूत्रों का न्यास इस तरह से किया है कि वे पाणिनीय सूत्र की अपेक्षा छोटे हो गये हैं। उदाहरण के लिये पाणिनि के यस्य चायामः (अष्टा॰ २.१.६) की अपेक्षा देवनन्दी ने आयामिना (जै॰ १.३.१३) सूत्र बनाया है। इस प्रकार ऐसे उदाहरणों में सरलता और लाघव दोनों प्रयोजन पूरे हो सके हैं। कई बार लाघव की अति ने जैनेन्द्र व्याकरण को दुर्बोध बनाकर उसकी हानि ही की है। कई जगह सूत्रों के न्यास मात्र को इधर उधर परिवर्तित करके एक अथवा कई मात्राओं का लाघव प्राप्त कर लिया गया है। उदाहरण के लिए पाणिनि के लक्षणेनाभिप्रती आभिमुख्ये (अष्टा॰ २.१.१४) को लक्षणेनाभिमुख्येऽभिप्रती (जै॰१.३.११) पढ़कर देवनन्दी ने एक अक्षर का लाघव प्राप्त कर लिया। इसी तरह अनुर्यत्समया (अष्टा॰ २.१.१५) को यत्समयानुः (जै॰ १.३.१२) के रूप में उपन्यस्त करके जैनेन्द्र द्वारा एक अक्षर का लाभ ले लिया गया है। यह प्रवृत्ति इतनी अधिक दिखायी पड़ती है कि पाणिनि व्याकरण के अध्येता को ऐसा लगता है कि जैन वैयाकरणों ने केवल पाणिनि से अलग दिखने की होड़ में सूत्रों के क्रम को बदल कर रख दिया है[17]

  • वैदिक भाषा की उपेक्षा–

पाणिनि का व्याकरण संस्कृत के वैदिक तथा लौकिक दोनों रूपों का विश्लेषण करता है[18]। यही पाणिनीय व्याकरण की पूर्णता है। वस्तुतः पाणिनि व्याकरण संस्कृत के वैदिक तथा लौकिक दोनों रूपों को अलग अलग नहीं मानता[19]। यही कारण है कि अष्टाध्यायी में दोनों भाषाओं की व्याकृति युगपत् की गयी है। अष्टाध्यायी क्रम से अध्ययन करता हुआ विद्यार्थी लौकिक तथा वैदिक दोनों भाषाओं में एक साथ प्रवीणता प्राप्त करता है। जैन व्याकरणों की सामान्य विशेषता है वैदिक भाषा सम्बन्धी सूत्रों का न होना। जैन वैयाकरणों का प्रमुख उद्देश्य अध्येताओं को लौकिक भाषा का सरल व्याकरण प्रदान करना था। वैदिक भाषा के जन सामान्य से बहुत दूर होने के कारण उसके अन्वाख्यान को मिश्रित करना लौकिक व्याकरण के अध्ययन में अनावश्यक कठिनाई उत्पन्न करता था इस कारण उन्होंने इसे अपने ग्रन्थों में सम्मिलित नहीं किया। स्वर प्रक्रिया वैदिक व्याकरण का प्रमुख अभिलक्षण है। वैदिक व्याकरण का सन्निवेश न करने के कारण जैन वैयाकरणों को पर्याप्त लाघव भी हुआ, क्योंकि पाणिनि ने बहुत सारे समान आकृति वाले प्रत्ययों को केवल इसलिये भिन्न किया है ताकि वे वैदिक वाङ्मयगत स्वरों की विचित्रता की व्याख्या कर पाएँ। उदाहरण के लिये शानच्–शानन्, तृन्–तृच्, ङीन्–ङीप् आदि जोड़ों में से जैन वैयाकरण केवल एक का ग्रहण करके कृतकृत्य हो जाते हैं।

इस प्रवृत्ति का दूसरा कारण यह भी लग सकता है कि वैदिक संहिताएँ जैनों के सम्प्रदाय के अनुकूल नहीं थीं, अथवा उनको वैदिक सिद्धान्तों से द्वेष था इस नाते उन्होंने वैदिक भाषा को अपने व्याकरणों में सम्मिलित नहीं किया। यह मत रोचक होने के बावजूद सारवान् नहीं है। हमें यह तथ्य ध्यान रखना चाहिये कि पाणिन्युत्तर काल में केवल भोज के सरस्वतीकण्ठाभरण के अतिरिक्त किसी भी अन्य व्याकरण में, चाहे वह जैन हो या अजैन, वैदिक नियमों को सम्मिलित नहीं किया गया[20]। इस उपेक्षा का कारण द्वेष नहीं अपितु व्याकृति की पद्धति में सरलता का यत्न था, जिसके लिये पाणिनीयेतर व्याकरण सामान्यतया प्रवृत्त हुए थे। बाद में पाणिनीय व्याकरण की भी सूत्र अथवा प्रक्रिया दोनों परम्पराओं में वैदिक सूत्रों की उपेक्षा हुई। बंगाल के वैयाकरण पुरुषोत्तमदेव ने पाणिनीय सूत्रों का संस्करण भाषावृत्ति के नाम से तैयार किया। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है इस पुस्तक में केवल भाषा अर्थात् लौकिक संस्कृत से सम्बन्धित सूत्र ही ग्रहण किये गए हैं। पाणिनीय प्रक्रिया ग्रन्थों ने वैदिक सूत्रों को ग्रन्थ से निकाला तो नहीं लेकिन उनको अन्त में अलग प्रकरण में व्यवस्थित कर दिया। इससे भी वस्तुतः वैदिक व्याकरण की उपेक्षा ही हुई[21]। वे सूत्र लौकिक व्याकरण से भिन्न दिखायी देने लगे तथा लोगों की प्रवृत्ति सामान्यतया उसमें कम होने लगी।

इसके अतिरिक्त यह बात भी ध्यातव्य है कि जैन व्याकरणों में वैदिक भाषा के प्रयोगों की नितान्त उपेक्षा हुई है यह पूर्ण सत्य नहीं है। उदाहरण के लिये देवनन्दी ने अपने जैनेन्द्र व्याकरण में अनेकानेक वैदिक शब्दों की सिद्धि के लिये सूत्र बनाये हैं। उदाहरण के लिए–आनाय्य, धाय्या, सानाय्य, कुण्डपाय्य, परिचाय्य, उपचाय्य (जै॰ २.१.१०४–०५)। इसके साथ साऽस्य (जै॰ ३.२.२१–२८) देवता के प्रकरण में प्राप्त विभिन्न वैदिक देवताओं को बिल्कुल पाणिनि की तरह ही व्युत्पादित किया है (Saini:91-92)। इनमें से कुछ के नाम हैं– शुक्र, अपोनप्तृ, महेन्द्र, सोम, द्यावापृथिवी, शुनासीर, मरुत्वत्, अग्नीषोम, वास्तोष्पति तथा गृहमेध।

  • जैन वातावरण की सृष्टि–

जैन व्याकरणों की रचना का मूल उद्देश्य था नये भाषिक समाज में संस्कृत को सरलता से सिखाना। चूँकि अधिकतर जैन वैयाकरण मुनि तथा धर्मोपदेष्टा थे इसलिये उनके व्याकरणों में जैन सिद्धान्तों से सम्बन्धित उदाहरणों का आना स्वाभाविक ही था। कई बार यह कार्य जानबूझ कर किया गया लेकिन अधिकतर यह कार्य स्वभावतः ही हो गया होगा। जैसे ही हम किसी जैन व्याकरण को पढ़ना प्रारम्भ करते हैं तो उसके सूत्रों की शृंखला प्रायः सिद्धिरनेकान्तात्, सिद्धिः स्याद्वादात् जैसे सूत्रों से शुरू होती है। वस्तुतः सभी शास्त्रों का समान उपकारक होने के कारण व्याकरणशास्त्र का स्वभाव ही अनेकान्तात्मक है। स्वयं महाभाष्यकार दार्शनिक चर्चाओं के मध्य किसी एक मत पर अड़ने के प्रति उदासीन दीखते हैं[22]। जैन वैयाकरणों ने व्याकरण शास्त्र की इस प्रकृति का जैन दर्शन के साथ अपूर्व सामञ्जस्य देखा है[23]। हेमचन्द्र के अनुसार शब्दों की व्युत्पत्ति तथा उनका ज्ञान दोनों अनेकान्तवाद पर आधारित हैं[24]। जैनेन्द्रव्याकरण में उच्चनीचावुदात्तानुदात्तौ (१.१.१३) सूत्र पर अभयनन्दी ने अपनी महावृत्ति में इस बात को स्पष्ट किया है कि यदि शब्द को एकान्ततया नित्य अथवा क्षणिक मान लिया जाएगा तो वर्णों में उदात्तादि धर्म संगत नहीं हो पाएंगे इसलिए इसकी सिद्धि अनेकान्तता को मानने पर ही हो पाएगी–

“नित्याः शब्दार्थसम्बन्धा इति यैरिष्यते तेषां निरवयवस्य नित्यस्य शब्दस्य

अवयवोपचयापचयाभावात् उदात्तादिव्यपदेशो न घटते, सावयवत्वे च तेषाम्

अनित्यत्वं प्राप्नोति। न च नित्यस्य स्थानकरणव्यापारविशेषाद् विशेषः प्रसज्यते।

क्षणिकपक्षेऽपि नैका नित्या स्वरजातिरस्ति यामपेक्ष्यायमत्रोच्चैरयं नीचैरिति व्यवहारो भवेत्।

तस्मादुक्तमनेकान्तमाश्रित्योदात्तादयः समर्थनीयाः।“ (पृ॰ ५)

जैन वैयाकरणों को निश्चित रूप से इस तथ्य का भान रहा होगा कि उनके पाठक जैन समाज से सम्बद्ध होंगे। इस कारण से उन्होंने जान बूझ कर जैन वातावरण की सृष्टि की ताकि अध्येताओं को व्याकरण के साथ साथ जैन सिद्धान्तों का भी ज्ञान हो जाये। साथ ही उन्होंने शब्दों के साथ अर्थों की उन छायाओं को हटाने का भी प्रयत्न किया जो शुद्ध रूप से वैदिक सिद्धान्तों के साथ सम्बद्ध थे। उदाहरण के लिये पत्नी शब्द की सिद्धि के लिये पाणिनि ने पत्युर्नो यज्ञसंयोगे(अष्टा॰ ४–१–१३३) सूत्र बनाया है। जिसका तात्पर्य है पति के साथ यज्ञ कर्म में जिसका संयोग हो उसका बोध कराने के लिये पति शब्द को नकारान्तादेश होता है। यज्ञ की शर्त की अनिवार्यता को अपने सम्प्रदाय के लिये अनुपयोगी मानते हुए देवनन्दी ने सूत्र का इस तरह न्यास नहीं किया है[25]

जैन वैयाकरणों का दृष्टिकोण अनेक स्थलों पर साम्प्रदायिक भी हो गया है। उदाहरण के लिये देवनन्दी ने अपने पूर्ववर्ती छः वैयाकरणों की नामग्राह चर्चा की है जिसमें सारे के सारे जैन हैं। पाणिनीय परम्परा के किसी भी आचार्य के मत का उल्लेख न करना उनके घोर साम्प्रदायिक दृष्टिकोण को प्रदर्शित करता है (Saini:84)। इसी प्रकार शाकटायन, जिन्होंने अपने शास्त्र का आधार अष्टाध्यायी को बनाया, ने कहीं भी पाणिनि या अन्य आचार्यों का नाम तक नहीं लिया[26]। उनके द्वारा लिये गये ३ आचार्यों के नाम हैं– इन्द्र, सिद्धनन्दी तथा आर्यवज्र (Saini:109)।

 

  • कतिपय नवीन शब्दों का अन्वाख्यान–

यद्यपि जैन वैयाकरणों के समय तक संस्कृत भाषा प्रचलन में नहीं थी तथापि उन्होंने ऐसे अनेक प्राचीन शब्दों का अन्वाख्यान अपने व्याकरण के माध्यम से किया है जिनके लिए पुराने वैयाकरणों ने सूत्रों की रचना नहीं की। उदाहरण के लिए शाकटायन ने पाणिनि के द्वारा अव्युत्पादित उत्पदिष्णु, प्रतिष्णान तथा खल इत्यादि शब्दों की सिद्धि के लिए सूत्र रचे हैं। शाकटायन ने पूर्व वैयाकरणों के द्वारा अव्युत्पादित जिन तद्धित शब्दों का अन्वाख्यान किया है वे हैं– ऐषकम्, अन्तःपुरिका, अर्धपलिक, अर्धकर्षिक, कौलीन (जल्पार्थक), सर्वशरावीण, यथाकामीन, अद्यप्रातीन, कृपालु, भाण्डीर, शमीरु आदि[27]

  • प्रविधियों की भिन्नता–

पाणिनि की अपेक्षा भाषा शिक्षण के उद्देश्य में भिन्नता होने के कारण जैन व्याकरणों में प्रयुक्त अन्वाख्यान की तकनीकें भी भिन्न दिखायी पड़ती हैं। इसका एक उदाहरण है अनुबन्धों का प्रयोग। ज्ञात ही है कि आचार्य पाणिनि वैदिक स्वरों के निश्चय के लिए अनेक अनुबन्धों की योजना करते हैं। पाणिनि के द्वारा प्रयुक्त अनुबन्ध जैन व्याकरणों में वही तात्पर्य प्रकट नहीं करते जो पाणिनि में करते हैं। उदाहरण के लिए पाणिनि के पित् प्रत्यय अन्त–अनुदात्त स्वर को सूचित करते हैं[28] जबकि शाकटायन के पित् तद्धित प्रत्यय परे रहने पर प्रकृति का पुंवद् भाव होता है[29]। पाणिनि के समय भाषा में उदात्तादि स्वरों में अर्थ भेदकता थी परन्तु समय के साथ यह प्रवृत्ति समाप्त हो गयी। इस कारण से जब जैन वैयाकरण उदात्त इत्यादि स्वरों को व्याकरणिक प्रविधि के रूप में प्रयोग करते हैं तो उनका तात्पर्य लौकिक उच्चारणात्मक स्वरों से न होकर केवल शास्त्रीय स्वरों से होता है[30]

आगे के पृष्ठों में व्याकरण निर्माण के प्रसङ्ग में जैन वैयाकरणों के द्वारा अपनायी गयी प्रविधियों एवं उसके द्वारा प्राप्त उपलब्धियों का दिङ्मात्र क्रमिक निदर्शन किया जा रहा है–

जैनेन्द्रपूर्व जैन व्याकरण

जैन व्याकरण के कुछ ग्रन्थों में तथा मैत्रेयरक्षित विरचित धातुपाठ के व्याख्यान तन्त्रप्रदीप में कुछ ऐसे उद्धरण प्राप्त होते हैं जिसके आधार पर ज्ञात होता है कि क्षपणक नामक विद्वान् ने भी किसी व्याकरण की रचना की थी। ये महाराज विक्रम के समकालीन थे[31]। सम्भव है कि ये जैन विद्वान् सिद्धसेन दिवाकर से भिन्न हों। देवनन्दी ने अपने व्याकरण में ६ वैयाकरणों के नाम से मत उद्धृत किये हैं जो स्पष्ट रूप से जैन प्रतीत होते हैं। वे हैं– भूतबलि, श्रीदत्त, यशोभद्र, प्रभाचन्द्र, सिद्धसेन और समन्तभद्र। पाल्यकीर्ति शाकटायन ने इन्द्र, सिद्धनन्दी और आर्यवज्र के मतों का उल्लेख भी किया हैं। नाथूराम प्रेमी के विपरीत युधिष्ठिर मीमांसक मानते हैं कि इन आचार्यों ने अपने अपने व्याकरणों का प्रवचन अवश्य किया होगा (मीमांसक १९९६:६२९)।

पूज्यपाद देवनन्दी (५वीं सदी ई॰)

जैन व्याकरणों में सर्वप्रथम उपलब्ध व्याकरण दिगम्बर सम्प्रदाय से सम्बद्ध पूज्यपाद देवनन्दी कृत जैनेन्द्र व्याकरण है। इनका समय पाँचवीं शताब्दी ईस्वी निश्चित किया गया है। अष्टौ व्याकरणानि[32]के अन्तर्गत गिने जाने के कारण वैदिक तथा अवैदिक समस्त व्याकरणों में जैनेन्द्र की प्रसिद्धि स्पष्ट होती है। जैन शास्त्रीय वाङ्मय में तो इसे शास्त्रीय त्रिरत्नों में से एक कहा गया है[33]। बाद में इस व्याकरण को दिव्यता प्रदान करने के कई प्रयत्न भी हुए। इनसे भ्रमित होकर कीलहा̆र्न आदि अनेक विद्वानों ने यह सम्भावना व्यक्त की है कि इस व्याकरण के प्रवाचक महावीर जिन हैं। अत्यन्त अर्वाचीन ग्रन्थ भगवद्वाग्वादिनी में यह कथा दी गयी है कि भगवान् महावीर ने अपने किशोर वय में इन्द्र के प्रति इसका उपदेश किया था[34]।यह कथा जैनेन्द्र शब्द की व्युत्पत्ति के लिये प्रस्तुत अर्थवाद की तरह लगती है[35]। उपर्युक्त भ्रान्तियाँ जैनेन्द्र शब्द के एकदेश इन्द्र शब्द के कारण आ गयी हैं। पर्याप्त आन्तरिक प्रमाण सिद्ध करते हैं कि प्रकृत व्याकरण के कर्ता महावीर न होकर देवनन्दी ही हैं।

जैनेन्द्र व्याकरण के औदीच्य तथा दाक्षिणात्य दो संस्करण प्राप्त होते हैं। दोनों में से मूल औदीच्य संस्करण ही है। इसमें एकशेष प्रकरण नहीं है[36] तथा अभयनन्दी की महावृत्ति इसी पाठ पर है।

जैनेन्द्र व्याकरण पाँच अध्यायों में विभक्त है तथा प्रत्येक अध्याय में चार–चार पाद हैं। अष्टाध्यायी के ८ अध्यायों की अपेक्षा देवनन्दी के ५ अध्याय सुनने में लाघवपूर्ण लग सकते हैं परन्तु वस्तुतः दोनों व्याकरणों में केवल ३०० सूत्रों का अन्तर का है। जैनेन्द्रव्याकरण में एकशेष का प्रकरण न होना इसका अभिलक्षण बताया जाता है। लेकिन एकशेषविहीनता वस्तुतः जैनेन्द्र व्याकरण की अपनी मौलिक सोच नहीं है। महाभाष्यकार ने ही एकशेष प्रकरण की प्रयोजनहीनता जान ली थी। चान्द्र व्याकरण में भी इस प्रकरण को सम्मिलित नहीं किया गया है। फिर भी देवनन्दी की विशेषता यह है कि उन्होंने पहली बार सूत्र बना कर इसे स्पष्ट किया, ऐसे ही जैसे पाणिनि ने लिङ्ग आदि की अशिष्यता सूत्र बनाकर द्योतित की थी[37]

जैनेन्द्र व्याकरण में लाघव के लिये पाणिनि की महती संज्ञाओं के स्थान पर अधिकतर एकाक्षरी (mono-syllabic) संज्ञाओं का विधान किया गया है[38]। पाणिनि ने भी घ, टि, भ आदि एकाक्षर संज्ञाओं का प्रयोग किया था। लेकिन पाणिनि ने यह कार्य वहीं किया था जहाँ उनको परम्परा से अन्वर्थ संज्ञाएँ उपलब्ध नहीं हुई थीं। अन्यथा उन्होंने सर्वनाम अथवा सर्वनामस्थान जैसी बड़ी संज्ञाएँ भी प्रयुक्त कीं। बड़ी संज्ञाओं का प्रयोग पाणिनि ने  प्रायः अन्वर्थता के लिये किया है[39]। संज्ञाओं में अन्वर्थता नहीं रहने से अर्थकृत लाघव समाप्त हो जाता है। अर्थकृत लाघव शब्दकृत लाघव की अपेक्षा अधिक स्पृहणीय है। सम्बुद्धि के लिये देवनन्दी ने कि संज्ञा बनायी है जो अन्वर्थ न होने के कारण सम्बुद्धि की अपेक्षा स्पष्टतः क्लिष्ट है। देवनन्दी ने इस प्रकार की संज्ञाओं के लिये शान्तनव इत्यादि पाणिनि पूर्ववर्ती आचार्यों से प्रेरणा प्राप्त की होगी। शान्तनव ने भी फिट् तथा नप् आदि एकाक्षरी संज्ञाओं का उपयोग किया है[40]। अनेकत्र इन संज्ञाओं के प्रयोग में पूज्यपाद का वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी दिखायी पड़ता है। उदाहरण के लिये– प्रथम पुरुष को अन्य पुरुष कहना, उत्तम पुरुष को अस्मद् कहना उन्हें पहले की अपेक्षा सरलतर बनाता है। उपसर्जन जैसे बड़े शब्द को छोड़कर उन्होंने न्यक् शब्द का ग्रहण किया। यह शब्द भी लगभग उपसर्जन के अर्थ को ही देता है। केवल इन्हीं कुछ वैज्ञानिक संज्ञाओं– नप् तथा न्यक् आदि को देवनन्दी के परवर्ती पाल्यकीर्ति शाकटायन ने भी यथावत् ग्रहण किया है। विभक्ति शब्द को व, इ, भ, अ, क, त तथा इ, इनमें तोड़कर देवनन्दी ने प्रथमा से सप्तमी के लिये निम्नोक्त नाम गढ़े– वा, भा, इप्, अप्, का, ता, तथा ईप्। इसके अतिरिक्त उन्होंने ऐसी अनेक व्याकरणिक कोटियों के लिये संज्ञाएँ भी बनायीं जिनका प्रयोग पाणिनि ने बिना संज्ञाओं के ही कर दिया था।  जैसे– उत्तरपद के लिए द्यु तथा अकर्मक के लिए धि संज्ञा। इन बीजगणितीय एकाक्षरी संज्ञाओं के प्रयोग से जैनेन्द्र व्याकरण में शाब्दिक लाघव ज़रूर आया–उदाहरण के लिये हलोऽनन्तराः संयोगः(पा॰१.१.७) की जगह सूत्र का स्वरूप हो गया हलोऽनन्तराः स्फः (जै॰ १.१.३), परन्तु अत्यन्त क्लिष्ट तथा कल्पनामात्रगम्य हो जाने के कारण इस प्रवृत्ति ने व्याकरण को कठिन बना दिया। सरल बनाने की जुगत में स्वीकृत संज्ञाओं की इस प्रवृत्ति ने जैनेन्द्र व्याकरण को लोकप्रिय नहीं होने दिया। परवर्ती वैयाकरणों में बोपदेव को छोड़कर किसी ने भी इन एकाक्षरी संज्ञाओं का उपयोग नहीं किया।

प्रत्याहारों के विषय में प्रतीत होता है कि पूज्यपाद ने केवल १३ प्रत्याहार सूत्र माने थे। लृकार को वर्णसमाम्नाय में स्थान नहीं दिया गया है। हम जानते हैं कि लृकार के प्रत्याख्यान के बीज वार्तिककार तथा महाभाष्यकार में भी मिलते हैं। हयवरट् तथा लण् को एक सूत्र हयवरण् में समाहित कर लिया गया है। अन्तिम सूत्र में विसर्ग, अनुस्वार, अनुनासिक को भी सम्मिलित कर लिया गया है। कम से कम दो स्थलों पर जैनेन्द्र व्याकरण में नयी तकनीक देखने को मिलती है। इसे उन्होंने अपनी दो परिभाषाओं से व्यक्त किया है। पहला है– नब्बाध्यमासम् (१.२.९१) तथा दूसरा है– सूत्रेऽस्मिन् सुब्विधिरिष्टः(५–२–११४)। नब्बाध्यमासम् सूत्र के अनुसार नपुंसक लिंग के द्वारा निर्देशित विधियाँ पुंलिङ्ग के द्वारा बाधित हो जाती हैं[41]। उदाहरण के लिए जैनेन्द्र व्याकरण में कर्म संज्ञा का पाठ नपुंसक लिंग तथा करण संज्ञा का पाठ पुंल्लिङ्ग में किया गया है। इसी कारण “अक्षैर्दीव्यति” के साथ “अक्षान् दीव्यति” प्रयोग भी साधु हो जाता है। एक और उदाहरण पर ध्यान देना रुचिकर होगा। हम जानते हैं कि पाणिनि ने पद संज्ञा (सुप्तिङन्तं पदम्–अष्टा॰ १.४.१४) के अपवाद रूप में भसंज्ञा (यचि भम्–अष्टा॰ १.४.१८) की व्यवस्था की है। भसंज्ञा के प्रसंगों को पद संज्ञा बाधित नहीं कर पाता क्योंकि पद संज्ञा सामान्य है तथा भ संज्ञा विशेष है। यह जानने के लिए हमें दोनों संज्ञाओं में उत्सर्गापवाद–भाव का निर्णय करना होता है। इसके बिना दोनों में बाध्य–बाधक भाव का निर्णय नहीं हो पाता। देवनन्दी ने इन दोनों संज्ञाओं के बाध्य बाधक भाव को उपर्युक्त तकनीक से अत्यन्त स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने दोनों सूत्रों को सुम्मिङन्तं पदम् (१.२.१०३ ) तथा यचि भः (१.२.१०७) के रूप में पढ़ा है। पद को नपुंसक लिंग में पढ़ने से पुंलिङ्ग भ के द्वारा उसकी बाधनीयता का ज्ञान अतीव सरलता से हो जाता है। जहाँ दो संज्ञाओं का समावेश करना होता है वहाँ देवनन्दी “च” का ग्रहण कर देते हैं[42]

पाणिनि के सूत्रों में अनेक बार लिङ्ग, वचन अथवा विभक्तियों का व्यत्यय दिखाई पड़ता है। इन प्रसंगों में व्याख्याकार विभक्ति अथवा वचनों के विपरिणाम की तकनीक का सहारा लेते हैं तथा इस प्रकार के व्यत्ययों का समर्थन वे “छन्दोवत् सूत्राणि भवन्ति[43]” के न्याय से करते हैं। स्वयं पाणिनि ने इस विषय में कुछ नहीं कहा है लेकिन पूज्यपाद देवनन्दी ने सूत्रों में विद्यमान इस व्यत्यय की प्रवृत्ति की ओर संकेत करते हुए सूत्रेऽस्मिन् सुब्विधिरिष्टः (५.२.११४) सूत्र की रचना की है। इसका तात्पर्य यह है कि सूत्रों में सुबन्त सम्बन्धी उपर्युक्त प्रकार के व्यत्यय स्वाभाविक होते हैं[44]

जैनेन्द्र व्याकरण में त्रिमुनि व्याकरण की परम्परा का विकास किस प्रकार लक्षित होता है, इसे जानने के लिए एक उदाहरण पर्याप्त होगा। पाणिनि ने अष्टाध्यायी १.४.२४ से १.४.३१ तक ८ सूत्रों द्वारा अपादान संज्ञा का विधान किया है। महाभाष्यकार पतञ्जलि ने ध्रुवमपायेऽपादनम् (१.४.२४) के अतिरिक्त अन्य सभी सूत्रों का खण्डन कर दिया है। उनके अनुसार अन्य सभी सूत्रों के प्रयोजन पहले ही सूत्र से गतार्थ हो जायेंगे। कारण यह है कि बाक़ी सारे सूत्रों द्वारा उपस्थापित प्रसंगों में भी किसी न किसी तरह का विश्लेष व्यक्त हो ही रहा है, चाहे वह कायिक हो अथवा बौद्धिक भी। फलतः उन सूत्रों को अलग से पढ़ने की आवश्यकता नहीं हैं[45]। देवनन्दी ने महाभाष्यकार को परम प्रमाण मानते हुए अपादान प्रकरण में केवल एक ही सूत्र बनाया है तथा उसमें बुद्धि के अंश का स्पष्टतः निर्देश कर दिया है– ध्यपाये ध्रुवमपादानम् (जै॰ १.२.११०)। इस सूत्र का तात्पर्य है बुद्धि से किसी वस्तु को प्राप्त करके यदि विभाग विवक्षित हो तो ध्रुव की अपादान संज्ञा होती है। इस प्रकार शेष ७ सूत्रों की आवश्यकता नहीं पड़ती है[46]– धीग्रहणे ह्यसति कायप्राप्तिपूर्वक एवापायः प्रतीयेत धीग्रहणेन सर्वः प्रतीयते। (महावृत्ति, पृ॰ ३७)। बाद के सभी जैन वैयाकरणों ने इस प्रवृत्ति को स्वीकार किया है।

जैनेन्द्र व्याकरण पर स्वयं देवनन्दी की वृत्ति का पता चलता है जो अब अनुपलब्ध है। अभयनन्दी (९७४–१०३५ वि॰) ने इस पर महावृत्ति की रचना की थी। यह कई दृष्टियों से बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण है। जैन वातावरण की सृष्टि के लिये नवीन उदाहरणों की उद्भावना, ऐतिहासिक तथा समाजशास्त्रीय महत्त्व के अनेक उदाहरणों का प्राप्त होना इसकी अन्यतम विशेषताएँ हैं। इन्होंने अपनी विशद टीका में पाणिनीय परम्परा की बहुत सी सामग्री का संरक्षण किया है। थोड़े–थोड़े परिवर्तन करके देवनन्दी ने अनेकत्र प्राचीन व्याकरणिक वचनों को जैनेन्द्र व्याकरण के अनुकूल कर दिया है[47]

  प्रभाचन्द्र(११वीं शती विक्रमी) ने इस पर शब्दाम्भोजभास्करन्यास नामक टीका लिखी है जो पूर्णतया उपलब्ध नहीं है। मीमांसक (१९९६:६८५) के अनुसार यह प्रभाचन्द्र प्रमेयकमलमार्तण्डकार से अभिन्न हैं। अभयनन्दी की वृत्ति का आधार लेकर १२वीं सदी में पण्डित महाचन्द्र ने लघुजैनेन्द्र नाम की एक वृत्ति लिखी है।जैनेन्द्र व्याकरण भी पाणिनि व्याकरण की तरह प्रक्रियाक्रम से व्यवस्थित नहीं है। श्रुतकीर्ति (१२२५ वि॰) ने इस व्याकरण पर पञ्चवस्तु नामक प्रक्रिया ग्रन्थ लिखा है। बीसवीं सदी के पण्डित वंशीधर ने भी इस पर जैनेन्द्रप्रक्रिया नामक प्रक्रियाग्रन्थ लिखा है।

जैनेन्द्र व्याकरण के दाक्षिणात्य संस्करण का नाम शब्दार्णव है तथा इसके संस्कर्ता गुणनन्दी (९१०–९६० वि॰) हैं। इस ग्रन्थ पर चन्द्रिका नाम की व्याख्या सोमदेवसूरि (सं॰११६२ वि॰) ने लिखी।मेघविजय कृत जैनेन्द्रव्याकरण वृत्ति  तथा विजयविमलकीर्ति कृत अनिट्कारिकावचूरि ग्रन्थ भी जैनेन्द्र व्याकरण से सम्बद्ध हैं।

जैनेन्द्र व्याकरण पाणिनीय व्याकरण के बहुत निकट है। यह निकटता इतनी अधिक है कि कई विद्वानों को भ्रम हो गया कि बाद के जैन विद्वानों ने पाणिनीय सूत्रों को अस्त व्यस्त कर यह कृत्रिम व्याकरण देवनन्दी के नाम पर चढ़ा दिया है[48]। “देवनन्दी ने अपनी पञ्चाध्यायी पाणिनि की अष्टाध्यायी के सूत्रक्रम में कम से कम फेरफार करके उसे जैसे का तैसा रहने दिया है। केवल सूत्रों के शब्दों में जहाँ–तहाँ परिवर्तन कर के सन्तोष कर लिया है”[49]। परन्तु यह कथन अतिशयोक्ति पूर्ण है। जैनेन्द्र व्याकरण में यत्र–तत्र मौलिकताओं के दर्शन भी होते हैं। देवनन्दी द्वारा किये गए पाणिनि के अनुकरण ने वस्तुतः पाणिनीय व्याकरण परम्परा की (विशेषकर गणपाठ की) अभूतपूर्व सुरक्षा की है।

वामन        

शाकटायन से पूर्व तथा जैनेन्द्र के बाद वामन नामक विद्वान् द्वारा रचित विश्रान्तिविद्याधर नाम के किसी व्याकरण का पता चलता है। मीमांसक (पृ॰६९०) के अनुसार इनका समय ६०० वि॰ है। वामन ने इस पर दो वृत्तियाँ भी लिखी थीं जो मूल सूत्रों की तरह ही इस समय उपलब्ध नहीं होता। इस पर मल्लवादी ने न्यास की रचना की थी जिसका अनेकशः उल्लेख हैम व्याकरण में मिलता है।

  शाकटायन

जैन मत के अन्तर्गत दिगम्बरों तथा श्वेताम्बरों के मध्यवर्ती यापनीय सम्प्रदाय से सम्बद्ध पाल्यकीर्ति नामक विद्वान् राजा अमोघवर्ष प्रथम के काल में वर्तमान थे। अमोघवर्ष के स्थितिकाल के आधार पर उनका समय ८७१ से ९२४ विक्रमी निश्चित होता है। “शाकटायन” इस गोत्र नाम से स्पष्ट है कि वे तैत्तिरीयशाखाध्यायी ब्राह्मणों के वंश में उत्पन्न हुए होंगे। गुस्ताव ओपर्ट ने १८९३ ईस्वी में शाकटायन शब्दानुशासन को प्रकाशित किया था। इसमें उन्होंने भ्रमवश जैन शाकटायन को पाणिनि पूर्ववर्ती शाकटायन से अभिन्न मान लिया था[50]। परन्तु वस्तुतः पाल्यकीर्ति शाकटायन का समय प्राचीन  शाकटायन से एक हज़ार से भी अधिक वर्षों के बाद का है।

शाकटायन व्याकरण में कुल चार अध्याय हैं जो चार–चार पादों में विभाजित हैं। इसमें कुल मिलाकर ३२३६ सूत्र हैं। शाकटायन के व्याकरण का प्रमुख आधार पाणिनि की अष्टाध्यायी है, जिसकी कमियों को उन्होंने अपने अन्य पूर्ववर्तियों जैसे चान्द्र, कातन्त्र तथा शाकटायन की सहायता से दूर करने का प्रयत्न किया है। साथ ही शाकटायन ने पूर्ववर्ती वैयाकरणों के दोषों को अपने व्याकरण में स्थान नहीं दिया है। उदाहरण के लिये उन्होंने देवनन्दी के द्वारा उपयुक्त एकाक्षरी संज्ञाओं को स्वीकार न करके अधिकांश संज्ञाएँ पाणिनि की अष्टाध्यायी से ही ग्रहण की हैं ।

शाकटायन का ग्रन्थ सम्पूर्ण व्याकरण वाङ्मय में प्रक्रियानुसारी प्रविधि का बीज–वपन करने वाला ग्रन्थ है। इसके पहले तक के व्याकरणों में सूत्रों को प्रक्रियानुसार व्यवस्थित नहीं किया गया था। एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। अष्टाध्यायी में यदि समास सम्बन्धित कार्यों को देखें तो पता चलता है कि उससे सम्बन्धित सूत्र भिन्न–भिन्न अध्यायों में यत्र–तत्र बिखरे हुए हैं। जैसे, समास सम्बन्धी संज्ञाएँ पहले अध्याय में हैं, तो उसके विधायक सूत्र दूसरे अध्याय में तथा समासान्त प्रत्यय पाँचवें अध्याय के अन्त में हैं। समास सम्बन्धी स्वरों का विधान छठें अध्याय के दूसरे पाद में किया गया है। इस कारण अष्टाध्यायी पद्धति से पढ़ने वाले अध्येता को एक समास प्रकरण तब तक स्पष्ट नहीं हो सकता जब तक वह पूरी तरह से अष्टाध्यायी को आद्योपान्त पढ़ न ले। इस समस्या से मुक्ति के लिए शाकटायन ने समास सम्बन्धी सभी सूत्रों का पाठ एक ही प्रकरण में कर दिया है। दूसरे अध्याय के पहले पाद में समासविधान तथा एकवद्भाव आदि के नियमों को बताने के तुरन्त बाद समासान्त प्रत्ययों का विधान कर दिया गया है। दूसरे अध्याय के दूसरे पाद में समास के पूर्वपद की विभक्ति का अलुक् विधान वर्णित है।  मीमांसक (१९९४:६९८) के अनुसार पाणिनीय तन्त्र में प्रक्रिया की परम्परा को प्रोत्साहित करने वाला ग्रन्थ यही है–“उत्तरकाल में इसने परिवृद्ध होकर पाणिनीय व्याकरण पर भी ऐसा आघात किया कि समस्त पाणिनीय व्याकरण ग्रन्थकर्तृक्रम की उपेक्षा करके प्रक्रियानुसारी बना दिया गया। उससे पाणिनीय व्याकरण अत्यन्त दुरूह हो गया।

अन्यान्य प्रकरणों में भी शाकटायन ने अपनी प्रक्रिया सम्बन्धी दृष्टि का उपयोग किया है। उदाहरण के लिए पाणिनीय व्याकरण में कारक प्रकरण १.४ में है जबकि विभक्ति प्रकरण २.३ में है[51]। शाकटायन ने इन दोनों प्रकरणों को मिलाकर एक जगह (१.३.९७ से १.३.१९५ तक) रख दिया है। इससे अध्येताओं को पर्याप्त सुविधा हो गयी है।

अपने से पूर्व तमाम व्याकरणों के उपयोगी वचनों को सूत्रपाठ में संगृहीत कर लेना शाकटायन व्याकरण की बड़ी विशेषता है[52]। वार्तिकों के अतिरिक्त उन्होंने महाभाष्य की सभी इष्टियों तथा उसके लगभग ३५ अन्य वचनों को सूत्र रूप में  समाहित कर लिया है। पाल्यकीर्ति काशिकाकार वामन जयादित्य के बाद उत्पन्न हुए थे। काशिका की रचना पाणिनीय व्याकरण परम्परा के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना है। काशिकार ने अपने समय के अनेक ऐसे विचारों को भी ग्रन्थ में स्थान दिया था जो वस्तुतः त्रिमुनि में भी नहीं मिलते। इन वचनों को महत्त्वपूर्ण मानते हुए पाल्यकीर्ति ने काशिकावृत्ति के प्रायः ४०वचनों को सूत्र रूप में उपन्यस्त किया है।

इष्टि, वक्तव्य आदि अनेक प्रकारों में विकसित पाणिनीय शास्त्र की व्याख्याओं को पाल्यकीर्ति ने अपने सूत्रों में ही समाहित कर लिया है। लेकिन उन्होंने केवल सिद्धान्तों का संग्रह मात्र नहीं किया है बल्कि उनके व्याकरण में पर्याप्त मौलिकताएँ भी हैं। गणपाठ के व्याख्यान में भी उन्होंने पर्याप्त नवीनता दिखायी है (देखिये मीमांसक २००० : १८४–१८६)। उदाहरण के लिए उन्होंने छोटे गणों को सूत्रों में ही पढ़ दिया है। गणों के नाम छोटे कर दिये हैं। अनेक गणों का एकीकरण कर दिया है तथा गणसूत्रों को सूत्रपाठ में स्थान दे दिया है। इस दृष्टि से शाकटायन भोजराज के मार्ग दर्शक हैं। ज्ञातव्य है कि भोजदेव ने सम्पूर्ण गणपाठ तथा उणादिसूत्रों को सूत्रपाठ में पढ़ दिया है। प्रत्याहार सूत्रों में लृकार का पाठ नहीं है। हयवरट् तथा लण् को एक सूत्र में पढ़कर १३ सूत्रों में ही काम चला लिया गया है। श,ष, स के बाद विसर्ग, जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय का पाठ भी १२वें सूत्र में कर दिया गया है। पाणिनि के अनुसार अनेक संज्ञाओं का प्रयोग करते हुए भी इन्होंने अनेकत्र मौलिकता दिखायी है। उदाहरण के लिये इन्होंने अङ्ग के लिये प्रकृति शब्द का प्रयोग किया है। इन प्रयोगों से व्याकरण के अवगमन में सरलता हो गयी है।

पञ्चाङ्ग व्याकरण के अतिरिक्त पाल्यकीर्ति ने उपसर्गार्थ तथा तद्धितसंग्रह भी लिखा था। सर्वाङ्गपूर्ण व्याकरण की रचना के साथ उन्होंने अपने व्याकरण पर अमोघा नामक वृत्ति की रचना भी की है। यह नाम उन्होंने अपने आश्रयदाता अमोघवर्ष के नाम पर रखा है। यह काशिकावृत्ति की शैली में लिखा गया ग्रन्थ है। इस वृत्ति पर प्रभाचन्द्र ने एक न्यास लिखा था जिसके केवल दो ही अध्याय उपलब्ध होते हैं। यक्षवर्मा ने अमोघा वृत्ति का संक्षेपण चिन्तामणि नाम से किया है। इस संस्करण पर उपलब्ध व्याख्याओं से पता चलता है कि यह निश्चित रूप से बहुत प्रसिद्ध हुआ होगा। इस पर अजितसेनाचार्य की चिन्तामणिप्रकाशिका, मंगारस की चिन्तामणिप्रतिपद तथा समन्तभद्र की चिन्तामणिविषमपद नाम की व्याख्या प्रसिद्ध है। इन सभी विद्वानों के देश और काल अज्ञात हैं।

१४वीं सदी के पूर्वार्ध में विद्यमान अभयचन्द्राचार्य ने शाकटायन के कुछ सूत्रों को लेकर प्रक्रियासंग्रह नामक ग्रन्थ की रचना की। भावसेन त्रैविद्य ने प्रक्रियानुसारी शाकटायन टीका की रचना की। दयालपाल मुनि (१०८२ वि॰) ने रूपसिद्धि नामक शाकटायन प्रक्रिया ग्रन्थ का निर्माण किया।

बुद्धिसागर सूरि–

श्वेताम्बर जैन बुद्धिसागर सूरि ने जिस व्याकरण की रचना की थी उसका नाम भी बुद्धिसागर अथवा पञ्चग्रन्थी व्याकरण है। बुद्धिसागर का समय १०८० विक्रमी संवत् है। इसकी रचना उन्होंने ब्राह्मणों के आक्षेप से क्षुब्ध होकर की थी। यह व्याकरण पूर्णतः पद्यमय है जिसमें काव्यप्रकाश इत्यादि की भाँति सूत्रों में तोड़कर व्याख्या की गयी है। पद्यमयता की दृष्टि से यह पहला व्याकरण ग्रन्थ है। इसमें न केवल सूत्र अपितु खिलपाठ भी पद्य में निबद्ध हैं। ग्रन्थ में २०७ पद्य तथा १९२२ सूत्र हैं जो चार अध्यायों तथा १२ पादों में निबद्ध है। पद्यमय व्याकरण बनाने का प्रयोजन, ग्रन्थकार के अनुसार, लोगों को रुचि पूर्वक इसकी ओर प्रवृत्त करना है–

श्रोतृजनप्रवृत्त्यर्थं सश्लोकं प्रोक्तवानहम्।१.१.२॥[53]

इसके साथ इसमें ग्रन्थकार ने स्वोपज्ञ व्याख्या भी जोड़ी है। खिलपाठ भी ग्रन्थ के अन्तर्गत ही हैं। पद्यात्मक होने के कारण प्रत्याहारादि कई अन्य सामग्री को सूत्र में न रखकर सूत्रों की व्याख्या के अन्तर्गत ही डाल दी गयी हैं ताकि उन्हें समझने में भ्रम न हो। वे स्वयं कहते हैं–

अचालिताः प्रतीतार्थाः प्रत्याहाराश्चिरन्तनाः।

कृताः पद्या न चामीषामसन्देहार्थं तथा च ते॥१.१.३॥[54]

बुद्धिसागर सूरि ने पाणिनि, जैनेन्द्र तथा शाकटायन के द्वारा उपयुक्त संज्ञाओं के साथ व्यवहार किया गया है तथापि कई स्थान पर इनमें मौलिकता के दर्शन भी होते हैं।

 

भद्रेश्वर सूरि –

भद्रेश्वर सूरि का समय १२०० विक्रम से पूर्व है। इन्होंने दीपक नामक व्याकरण की रचना की थी। ११९७ वि॰ में विद्यमान वर्धमान ने अपने गणरत्न महोदधि में इनका दो बार उल्लेख किया है। परन्तु यह ग्रन्थ अब उपलब्ध नहीं होता।

हेमचन्द्रसूरि (१०८८ई॰–११७३ ई॰)

कलिकालसर्वज्ञ हेमचन्द्रसूरि निश्चित रूप से जैन वैयाकरणों में शीर्ष पर हैं। उनका व्याकरण परिपूर्ण तथा बृहत्तम है। हेमचन्द्र का जन्म वर्ष १०८८ ई॰ निश्चित किया गया है। इनका जन्म वैश्य परिवार में हुआ था। बचपन में ही चन्द्रेश्वर सूरि नामक जैन संन्यासी उन्हें अपने साथ ले गये। १२ वर्ष की अवस्था में ही हेमचन्द्र सभी विद्याओं में पारंगत हो गये तथा उन्हें सूरि की पदवी प्राप्त हुई। अण्हिलपाटन के राजा सिद्धराज जयसिंह तथा उसके पुत्र राजा कुमारपाल के आश्रय में रहकर हेमचन्द्र ने विविध ग्रन्थों की रचना की।

प्रभावक चरित में कथा आयी है कि एक बार अवन्ति देश से प्राप्त पुस्तकों को देखते हुए सिद्धराज जयसिंह ने  भोजराज रचित सरस्वतीकण्ठाभरण नामक व्याकरण ग्रन्थ भी देखा। इससे प्रभावित होकर राजा ने हेमचन्द्र से एक सरल तथा परिपूर्ण व्याकरण की रचना करने की प्रार्थना की जिसमें संस्कृत के अतिरिक्त प्राकृतादि लोकभाषाओं का भी अनुशासन हो। हेमचन्द्र ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इसके लिए कश्मीर से आठों व्याकरणों के ग्रन्थ गुजरात लाये गए। इन ग्रन्थों का अवलोकन करके हेमचन्द्र ने सर्वाङ्गपूर्ण व्याकरण की रचना की। सिद्धराज ने भी उसकी प्रतियाँ कराकर देश देशान्तर में उसका प्रसार कराया[55]

हेमचन्द्र के समय तक पाणिनीय व्याकरण अपनी सारी जटिलताओं के साथ पूर्णतः विकसित होकर एक शास्त्रीय पद्धति का रूप धारण कर चुका था। अब यह संस्कृत सीखने का एक साधन मात्र नहीं था बल्कि इसका अध्ययन भी अपने आप में साध्य बनता जा रहा था (Sharma–1990)। ऐसी स्थिति में हेमचन्द्र ने एक सरल तथा सुस्पष्ट एवं परिपूर्ण व्याकरण की आवश्यकता का अनुभव किया तथा सिद्धहेमशब्दानुशासन का प्रणयन किया। हेमचन्द्र ने प्राकृतव्याकरण को संस्कृतव्याकरण के साथ सम्मिलित करके भारत की भाषिक परम्परा की एकता तथा अविच्छिन्नता को उसी प्रकार निदर्शित किया जैसे पाणिनि ने कभी संस्कृत के वैदिक तथा लौकिक दोनों रूपों को एक साथ रखकर किया था। यद्यपि दोनों विद्वानों की विवेचन शैली में पर्याप्त पार्थक्य दिखायी देता है।

हेमचन्द्र ने व्याकरण पर विपुल साहित्य की रचना की तथा उसमें किसी भी तरह की न्यूनता का अवकाश नहीं रखा। जो कार्य पाणिनि, भट्टिस्वामी तथा भट्टोजि दीक्षित ने मिलकर किया वह अकेले हेमचन्द्र ने कर दिखाया। उन्होंने व्याकरण के अन्तर्गत सूत्र प्रणयन, व्याख्यान तथा शास्त्र काव्य का निर्माण भी किया। अपने अनेकविध ग्रन्थों की रचना करके उन्होंने अपनी प्रणाली को अत्यन्त सुदृढ बना दिया। अपने अन्यान्य शास्त्रीय ग्रन्थों की वृत्तियों में सर्वत्र उन्होंने अपने व्याकरण के सूत्रों के ही सन्दर्भ दिये हैं।

हैमव्याकरण में कुल ८ अध्याय ३२ पाद तथा ५५०२ सूत्र हैं। इसके प्रारम्भिक सात अध्यायों में संस्कृत का व्याकरण है जबकि आठवें में प्राकृत तथा अपभ्रंश भाषाओं को अनुशासित किया गया है। ग्रन्थ में संस्कृत से संबद्ध सूत्रों की संख्या ३५६६ है।

हैम व्याकरण में प्रत्याहारों का उपयोग नहीं किया गया है। हेमचन्द्र यह कार्य आश्चर्यजनक रूप से अपनी अन्वर्थ संज्ञाओं के द्वारा कर लेते हैं। इस दृष्टि से उनकी शैली पाणिनि की अपेक्षा लघु तथा सरल हो गयी है। उदाहरण के लिये उन्होंने अच् प्रत्याहार की जगह स्वर तथा एच् की जगह सन्ध्यक्षर शब्दों का प्रयोग किया है। ये प्रयोग झटिति अर्थ प्रदान कर देते हैं क्योंकि लोक में भी उनका इसी तरह प्रयोग होता है। इसी प्रकार उन्होंने लट्, लृट्, लुट् आदि संकेतात्मक आख्यात संज्ञाओं की अपेक्षा अधिक सरल तथा स्वतःव्याख्यात शब्दों, जैसे अद्यतनी, ह्यस्तनी, श्वस्तनी, भविष्यन्ती आदि का प्रयोग किया है। यह प्रवृत्ति उन्होंने कातन्त्र व्याकरण से ली है। अन्यत्र भी वे पाणिनीय व्याकरण की जटिल संज्ञाओं को यथासम्भव भिन्न तथा सरलतर शब्दों के साथ बदल देते हैं। उदाहरण के लिये प्रकृतिभाव के लिये उन्होंने असन्धि शब्द का प्रयोग किया है। कहीं–कहीं हेमचन्द्र ने संज्ञा का प्रयोग किये बिना सीधे संज्ञियों के उपयोग से काम कर लिया है, जैसे– वृद्धि सन्धि में वृद्धि आदि शब्दों के प्रयोग के बिना ही कार्य चला लिया गया है। इस विधि के लिये उन्होंने सूत्र बनाया है– ऐदौत् सन्ध्यक्षरैः (हेम॰ १.२.११)। इन तकनीकों के उपयोग से हेमचन्द्र पाणिनि व्याकरण की ढेर सारी पेंचीदगियों से बच पाये हैं।

हेमचन्द्र ने शाकटायन के द्वारा प्रारब्ध प्रकरणानुसारी शैली को और आगे बढ़ाया है। इनके व्याकरण में प्रकरणबद्धता और अधिक स्पष्ट हो गयी है।  इस व्याकरण में स्थित प्रकरणों के नाम हैं–संज्ञा, सन्धि, नाम, कारक, षत्व, स्त्रीप्रत्यय, समास, आख्यात, कृदन्त और तद्धित। भट्टोजिदीक्षित तथा उनके पूर्ववर्ती पाणिनीय प्रक्रियाकारों को अपने प्रकरणों के व्यवस्थापन की प्रेरणा सम्भवतः यहीं से मिली होगी (Sharma-24)। कारक, वाक्य आदि की परिभाषायें देकर हेमचन्द्र ने पाणिनीय तन्त्र की कमी दूर करने का प्रयत्न किया है। हेमचन्द्र शाकटायन के शब्दानुशासन तथा उनकी अमोघा वृत्ति से बहुत ही प्रभावित हैं। शाकटायन के प्रति उनकी श्रद्धा का द्योतक उनके द्वारा दिया गया उदाहरण– आकुमारं यशः शाकटायनस्य (शाकटायन का यश बच्चे बच्चे तक व्याप्त है) है। बेल्वल्कर ने हेमचन्द्र पर शाकटायन के अन्धानुकरण का आरोप लगाया है[56] जिसका प्रत्युत्तर मीमांसक (२०००: १९०) ने हेमचन्द्र के शास्त्र में विद्यमान मौलिकताओं की ओर संकेत करके दे दिया है।

हैम व्याकरण सर्वाङ्गपूर्ण है। इनके धातुपाठ में जुहोत्यादि का पृथक् पाठ न होने के कारण इसमें काशकृत्स्न धातुपाठ की तरह केवल ९ ही गण हैं। इस पर स्वयं हेमचन्द्र ने धातुपारायण नामक विस्तृत व्याख्या तथा धातुपारायण संक्षेप नामक लघु व्याख्या भी लिखी है। सं॰ १४६६ में वर्तमान आचार्य गुणरत्न सूरि ने हैमधातुपाठ पर क्रियारत्नसमुच्चय नाम की व्याख्या लिखी है। इस ग्रन्थ में क्रियारूपों से सम्बन्धित अनेक अदृष्टपूर्व मतों का उल्लेख मिलता है जिसके कारण इस ग्रन्थ का महत्त्व बहुत ही बढ़ जाता है। हैम धातुपाठ पर जयवीर गणि नामक विद्वान् ने अवचूरि नामक व्याख्या लिखी है। इनका काल १५०१ वि॰ है। १६वीं शताब्दी वि॰ में विद्यमान हर्षकुलगणि ने हैम धातुपाठ को पद्यबद्ध किया है जिसका नाम कविकल्पद्रुम है। इसपर उन्होंने धातुचिन्तामणि नाम की स्वोपज्ञ टीका भी लिखी है।

गणपाठ के प्रसङ्ग में हेमचन्द्र ने पाल्यकीर्ति का अनुकरण करते हुए भी अनेक मौलिक प्रविधियाँ अपनायीं हैं। इनमें नये गणों का निर्माण, गणों के नामों में परिवर्तन तथा गणों के नये विभाग सम्मिलित हैं। गणों में पाठान्तरों को सम्मिलित करना उनकी रचना शैली के वैज्ञानिक उपागम का द्योतक है।

हेमचन्द्र का उणादिपाठ उपलब्ध सभी उणादि पाठों में सबसे अधिक विस्तृत है। इसमें १००६ सूत्र हैं तथा साथ में इसकी स्वोपज्ञ विवृति भी है। इनका लिङ्गानुशासन भी सबसे विस्तृत है। इसमें १३८ अत्यन्त ललित पद्य हैं जिन पर स्वयं ग्रन्थकार का विवरण (या वृत्ति) प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त इस पर १३वीं शती के कनकप्रभ ने अवचूरि, केसरविजय ने वृत्ति, तथा वल्लभगणि ने दुर्गपदप्रबोधा नामक व्याख्यायें लिखीं हैं।

हेमचन्द्राचार्य की परिभाषावृत्ति अत्यन्त संक्षिप्त है जिसमें केवल ५७ परिभाषायें ही प्राप्त हैं। इसके व्याख्याकार हेमहंसगणि ने  मूल परिभाषाओं की व्याख्या के बाद ८४ अन्य परिभाषाओं तथा वचनों का संग्रह करके इसे पूर्णता प्रदान की है। इसका नाम उन्होंने न्यायसंग्रह रखा है। इस पर इनकी न्यायमञ्जूषा व्याख्या नामक बृहद्वृत्ति तथा वृत्ति पर स्वोपज्ञ न्यास भी उपलब्ध है। परिभाषा सम्बन्धी वाङ्मय में सीरदेव के ग्रन्थ बृहत्परिभाषावृत्ति के बाद सबसे विशद तथा पाण्डित्यपूर्ण ग्रन्थ न्यायसंग्रह ही है।  इनका समय १५१५ वि॰ वर्ष है। न्यायसंग्रह पर विजयलावण्य मुनि ने न्यायार्थसिन्धु नामक व्याख्या तथा पुनः उसपर तरङ्ग नामक टीका लिखी है। इसका लेखन काल २०१० वि॰ वर्ष है।

हैमव्याकरण पर १७१० वि॰ में विनयविजयगणि ने हैमलघुप्रक्रिया नाम से प्रक्रिया ग्रन्थ का निर्माण किया है। बीसवीं सदी के विद्वान् मायाशंकर गिरिजाशंकर ने लघुप्रक्रिया के क्रम को ध्यान में रखकर बृहत्प्रक्रिया का निर्माण किया है। १७९७ में लघुप्रक्रिया पर बृहन्न्यास की रचना की जिसे हैमप्रकाश भी कहा जाता है। उपाध्याय मेघविजय ने १७५७ वि॰ में सिद्धान्तकौमुदी के क्रम से हेमचन्द्र के सूत्रों को सजाकर चन्द्रप्रभा अथवा हेमकौमुदी की रचना की। तेरापन्थ के मुनि सोहनलाल जी ने इसपर तुलसीप्रभा नामक प्रक्रिया का निर्माण किया। इसका निर्माण काल १९९६ से १९९९ वि॰सं॰ है। इसके अध्ययन से विद्यार्थी को जैन इतिहास, आगम, जैन तत्त्व तथा तेरापन्थ की परम्परा का भी बोध हो जाता है। इन ग्रन्थों के अतिरिक्त भी हैमव्याकरण पर आधारित प्रक्रियात्मक ग्रन्थों की सूची पर्याप्त समृद्ध है (दे॰ शाह १९६९ :४२–४९)।

वर्धमान (११५०–१२२५ वि॰)

गणपाठ की व्याख्या से सम्बन्धित वर्धमान रचित गणरत्नमहोदधि नामक ग्रन्थ व्याकरण निकाय में बहुत प्रसिद्ध है। संक्षिप्तसारव्याकरण की गोयीचन्द्र की टीका में वर्धमान के एक सूत्र का उल्लेख है जिससे पता चलता है कि इनका स्वतन्त्र सूत्रात्मक व्याकरण ग्रन्थ भी रहा होगा जो अब उपलब्ध नहीं होता। गणकार के रूप में वर्धमान की महत्ता सर्वाधिक है। इनका ग्रन्थ गणरत्नमहोदधि पद्यात्मक है जिसपर इन्होंने स्वयं विस्तृत व्याख्या लिखी है। अपने पूर्ववर्ती १६ वैयाकरणों का नामशः उल्लेख करके उन्होंने व्याकरण शास्त्र के इतिहास में बड़ा योगदान दिया है। अपने पूर्व के सभी वैयाकरणों के गणों को उन्होंने अपने ग्रन्थ में स्थान दिया है। पाणिनीय गण पाठ के अध्ययन तथा शब्दों के पाठभेद और प्रयोग ज्ञान के लिये भी एकमात्र साधन वर्धमान का गणरत्नमहोदधि ही है।

मलयगिरि (११८८–१२५० वि॰)–

मलयगिरि के ग्रन्थ का नाम शब्दानुशासन है। इस व्याकरण की बृहत् कल्पवृत्ति को पूर्ण करने वाले व्याख्याकार क्षेमकीर्ति ने इस व्याकरण को मुष्टिव्याकरण[57] भी कहा है। मलयगिरि वैदिक संन्यासी थे तथा प्रव्रज्या के ७ वर्षों के बाद ये जैन साधु बन गये थे। यह तथ्य उनके नाम के अन्त में प्राप्त गिरि शब्द से पता चलता है। श्री दोशी (१९६७: Intro.p.5) ने दिखाया है कि मलयगिरि ने जिन गुजराती शब्दों के संस्कृत रूप प्रस्तुत किये हैं वे केवल सौराष्ट्र प्रान्त में ही बोले जाते हैं। इस आन्तरिक साक्ष्य के आधार पर उन्होंने अनुमान किया है कि वे सौराष्ट्र प्रान्त के निवासी थे।  कुमारपाल तथा हेमचन्द्र[58] के समय में विद्यमान होने के कारण इनका काल निश्चित ही है। इनके व्याकरण में शाकटायन तथा हेमचन्द्र के व्याकरणों से काफ़ी साम्य है तथापि कहीं कहीं वे हेमचन्द्र से मतभेद भी रखते हैं। अन्तःसाक्ष्य बताते हैं कि उन्होंने हैमशब्दानुशासन देख रखा था[59]। उन्होंने शाकटायन का अपने व्याकरण में २ बार तथा अपनी वृत्ति में ५ बार उल्लेख किया है। अपनी प्रज्ञापना वृत्ति में उन्होंने आचार्य चन्द्रगोमी के चान्द्रव्याकरण का उल्लेख भी किया है (दोशी १९६७: Intro.p.९)।

मलयगिरि का शब्दानुशासन प्रक्रियानुसारी है। यह व्याकरण अन्यान्य व्याकरणों की तरह अध्यायों में विभाजित न होकर पादों में विभक्त है, जिनकी कुल संख्या ३६ है[60]। इसमें कुल २२१० सूत्र हैं। इस  व्याकरण में सन्धि, नाम, आख्यात, कृदन्त तथा तद्धित पाँच प्रकरण हैं। इनके सूत्र पूर्णतः उपलब्ध नहीं होते। सूत्रकार ने स्वयं इस पर वृत्ति लिखी थी जो ग्रन्थ के साथ ही प्रकाशित है। उन्होंने धातुपारायण, गणपाठ तथा तथा लिङ्गानुशासन की रचना भी की थी जो अब उपलब्ध नहीं होते। विद्वानों का मत है कि अपने व्याख्या ग्रन्थों में अपने ही व्याकरण से सूत्रों को उद्धृत करने के आग्रह के कारण मलयगिरि ने शब्दानुशासन की रचना की। ध्यातव्य है कि मलयगिरि जैनमत के ९ आगमों पर व्याख्याएँ (वृत्तियों) के प्रणयन के कारण भी बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं। इसके अतिरिक्ति इन्होंने हरिभद्र सूरि आदि विद्वानों के ग्रन्थों पर भी व्याख्याएँ प्रणीत कीं।

मलयगिरि ने प्रत्याहारों के सम्बन्ध में पाणिनि तथा हेमचन्द्र दोनों आचार्यों की प्रविधियों को मिश्रित कर दिया है। वे हेमचन्द्र की भाँति स्वर तथा व्यञ्जन इत्यादि संज्ञाओं तथा पाणिनि की भाँति एच्, इक् आदि प्रत्याहारों, दोनों का उपयोग करते हैं। हेमचन्द्र की तरह इन्होंने भी प्रत्याहारसूत्रों का पाठ न करके वर्ण ज्ञान के लिए लोक को प्रमाण माना है[61] तथा लोक प्रसिद्ध मातृका का ही पाठ कर दिया है। लेकिन उन्होंने प्रत्याहार सूत्रों के पाठ के बिना भी इक् आदि संज्ञाओं का उपयोग कर लिया है। उनकी यह प्रविधि आश्चर्यजनक है। उदाहरण के लिए मलयगिरि ने सूत्र बनाया है– इक् एतः (१.६), अर्थात् ए से पहले के स्वरों को इक् कहते हैं। इस सूत्र में पिछले अनवर्णा नामी (१.५) सूत्र से अनवर्णाः पद की अनुवृत्ति आती है। अतः सूत्रार्थ निष्पन्न होता है– ‘अवर्ण से रहित ए से पहले तक के स्वरों= इ,उ,ऋ, ॠ, लृ, ॡ को इक् कहते हैं’। ध्यातव्य है कि हेमचन्द्र ने इक् जैसी कोई संज्ञा नहीं बनायी है। जहाँ–जहाँ पाणिनि व्याकरण में इक् का प्रयोग आता है वहाँ–वहाँ वे दो प्रकारों से कार्य करते हैं। पहला प्रकार तो यह है कि वे इक् में गृहीत वर्णों को प्रत्यक्षतः पढ़ देते हैं–जैसे इ,उ,ऋ=य्वृ। उदाहरण के लिए पाणिनि के इगन्ताच्च लघुपूर्वात् (अष्टा॰ ५.१.१३०) की जगह वे य्वृवर्णाल्लघ्वादेः (सिद्धहैम॰ ७.१.६९) पढ़ देते हैं। दूसरा प्रकार यह है कि इक् के स्थलों पर वे नामी संज्ञा का प्रयोग करते हैं। हेमचन्द्र अ को छोड़कर सभी स्वरों को नामी कहते हैं। लेकिन इसमें ए–ऐ तथा ओ–औ ये चार अवाञ्छित वर्ण भी आ जाते हैं जो इक् में नहीं होने चाहिए। इसलिए इक् के लिए नामी संज्ञा का प्रयोग हेमचन्द्र वहीं करते हैं जहाँ–जहाँ इन चार वर्णों की प्रसक्ति असम्भव हो। लेकिन इस प्रविधि को स्वीकार करने से पर्याप्त प्रक्रिया गौरव होता है।  मलयगिरि ने इसका असुविधा अनुभव किया होगा। इसलिए उन्होंने हेमचन्द्र की प्रविधि का आंशिक समर्थन करते हुए, प्रत्याहार पाठ के बिना भी यथावसर पाणिनीय प्रत्याहारसूत्रों से निष्पन्न संज्ञा का उपयोग किया। इसी प्रकार मलयगिरि अण् के लिए ऋतः अण् (१.८), एच् के लिए एदादिः एच् (१.९) तथा एङ् के लिए ए–ओ एङ् (१.१०) सूत्रों का पाठ करते हैं। हेमचन्द्र इन सारे स्थलों पर प्रायः प्रत्यक्ष वर्णों का पाठ करके कार्य का निष्पादन करते हैं[62]

सारे प्रसिद्ध जैन वैयाकरणों के मध्य आचार्य मलयगिरि की विशिष्टता एक ख़ास तरह के प्रक्रिया सौकर्य के कारण भी है। उन्होंने युष्मद् तथा अस्मद् के रूपों की सिद्धि का प्रयास न करके उसे प्रत्यक्षतः निपातित कर दिया है। इसके लिए उन्होंने ४.३३ से लेकर ४.५५ तक के सूत्रों का पाठ किया है। ध्यातव्य है कि उनके पहले जैनेन्द्र (५.१.२३ से ५.१.२९) शाकटायन (१.२.१७७ से १.२.२०२) तथा हेमचन्द्र (२.१.६ से २.१.३२) सभी जैन वैयाकरणों ने पाणिनि की भाँति युष्मद–अस्मद् शब्दों की प्रक्रिया देने का यत्न किया है[63]। व्याकरण के अध्येताओं को इन विचित्र शब्दों के व्युत्पादन की श्रमसाध्यता स्पष्ट ही है। इसके लिए मलयगिरि के द्वारा स्वीकृत सरल मार्ग निश्चित रूप से अभिनन्दनीय है।

विनयसागर उपाध्याय (१६५०–१७०० वि॰)

विनयसागर ने अपने आश्रयदाता भुजनगर के राजा भोज को प्रसन्न करने के लिये भोजव्याकरण नामक  ग्रन्थ लिखा था।

सकलसमीहिततरणं हरणं दुःखस्य कोविदाभरणम्।

श्रीभोजव्याकरणं पठन्तु तस्मात् प्रयत्नेन ॥

सहजकीर्तिगणि (१६८० वि॰)

रत्नसारके शिष्य सहजकीर्तिगणि ने शब्दार्णव नामक व्याकरण की रचना की है जो अत्यन्त ही सरल शैली में है। इसमें कुल १० अधिकार हैं– संज्ञा, श्लेष, शब्द, षत्व–णत्व, कारकसंग्रह, समास, स्त्री प्रत्यय, तद्धित, कृत् तथा धातु। स्वयं सूत्रकार ने इसपर मनोरमा नामक वृत्ति की रचना की है।

 

मुनिश्री चौथमल एवं पण्डित रघुनन्दन शर्मा  (२०वीं शताब्दी)

तेरापन्थ धर्मसंघ के अष्टमाचार्य कालूगणि के शिष्य चौथमल ने अपने गुरु की इच्छा की पूर्ति के लिये सभी पूर्ववर्ती व्याकरणों का गहन अध्ययन करके १९८० से १९८८ विक्रमसंवत् के मध्य एक नवीन व्याकरण की व्यवस्था की। यह वस्तुतः “विशालशब्दानुशासन” नामक किसी पूर्ववर्ती व्याकरण ग्रन्थ का परिशोधित एवं परिवर्धित रूप है। तेरापन्थ में संस्कृत के महान् उन्नायक आचार्य कालूगणि ने अपने अध्यापन के क्रम में सारस्वत, चन्द्रिका, आदि व्याकरणों की अपूर्णता का अनुभव किया। इस अपूर्ण ग्रन्थ को उन्होंने सारकौमुदी के अनुसार पूरा करने का भरसक प्रयास किया पर उन्हें पूरी सफलता नहीं मिली। इसके बाद उन्हें विशालकीर्ति गणि द्वारा निर्मित “विशालशब्दानुशासनम्” उपलब्ध हुआ[64]। इस शब्दानुशासन को मुनि चम्पालाल मीठिया ने भाद्रा से आचार्यचरण को उपलब्ध कराया था[65]। ८ अध्यायों में परिसमाप्त इस व्याकरण में केवल सूत्र ही थे। आचार्य कालूगणि के निर्देशानुसार इस व्याकरण के सूत्रों पर बृहद् वृत्ति की रचना अलीगढ़ निवासी पं॰ रघुनन्दन शर्मा ने की। यह कार्य उन्होंने अष्टाध्यायी, सिद्धान्तकौमुदी, सारकौमुदी, सारस्वत, सिद्धान्तचन्द्रिका, हेमशब्दानुशासन आदि अनेक ग्रन्थों के गहन अध्ययन से परिपूर्ण किया। यह वृत्ति अत्यन्त विशद होने के साथ साथ उदाहरणों की दृष्टि से प्रायः असाम्प्रदायिक है। इस कार्य में मुनि चौथमल ने उनका सहयोग किया। इन पर्याप्त परिवर्तनों तथा संशोधनों से विशालशब्दानुशासन का मूल रूप बहुत परिवर्तित हो गया। अब इसका नाम तेरापन्थ के आदि प्रवर्तक आचार्यश्री भिक्षुस्वामी के नाम पर “श्रीभिक्षुशब्दानुशासन” रख दिया गया। ८ अध्यायों में विभक्त इस व्याकरण में कुल ३७४६ सूत्र हैं। अध्यायों के चतुर्थ भागों को पाद न कह कर चरण कहा गया है। यह व्याकरण अपने आप में पूर्ण है। सूत्रों के अतिरिक्त यह व्याकरण लघु तथा बृहद् वृत्ति एवं खिलपाठ तथा कारिकासंग्रह आदि से संवलित है।

इस व्याकरण पर लघु वृत्ति की रचना का प्रारम्भ मुनि तुलसीराम ने किया था जिसे बाद में मुनि युगल धनराजजी तथा चन्दनमलजी ने पूरा किया। इसका रचनाकाल वि॰ सं॰ १९९५ है। इस लघुवृत्ति की रचना उपर्युक्त बृहद्वृत्ति के संक्षिप्त संस्करण के रूप में सामान्य जन के उपयोग हेतु की गयी थी। जैसा कि ग्रन्थकार का कथन है–

बृहद्वृत्ति समालोक्य भैक्षुशब्दानुशासनीम्।

शीघ्रोपकारिणी श्रेष्ठा लघ्वी वृत्तिर्विरच्यते॥

इस व्याकरण के लिए उपयोगी परिभाषाओं से सम्बन्धित एक “भिक्षुन्यायदर्पण” नाम का ग्रन्थ भी तैयार कराया गया है। इसकी बृहद्वृत्ति स्वयं सूत्रकार ने लिखी है। इसमें १३५ सूत्र हैं। इस व्याकरण का अपना स्वतन्त्र लिङ्गानुशासन भी है जिसका नाम “भिक्षुलिंगानुशासन” है। १५७ छन्दों का प्रयोग करते हुए रघुनन्दन शर्मा जी ने इसे परिपूर्ण किया है। इस पर मुनि चन्दनमल ने वृत्ति की रचना कर के इसे सुबोध बना दिया है। मुनि चौथमल ने इस व्याकरण की प्रक्रिया से सम्बन्धित “कालूकौमुदी” नामक ग्रन्थ का प्रणयन किया जिसमें कुल मिला कर १४२७ सूत्र हैं। इस व्याकरण का स्वतन्त्र उणादि पाठ भी है जिसका नाम “भिक्षूणादिवृत्ति” है। इस व्याकरण का क्रम सारस्वत आदि व्याकरणों की तरह सरल तथा स्वरूप पाणिनीय व्याकरण की तरह व्यवस्थित है। विद्वानों के अनुसार अब तक प्रणीत व्याकरणों के मध्य भिक्षुशब्दानुशासन सरलतम पद्धति का प्रकाश करने वाला ग्रन्थ है[66]। ग्रन्थान्त में प्रस्तुत प्रशस्ति श्लोक के अनुसार इसकी विशिष्टताएँ निम्नवत् हैं–

सरससरलसूत्रं निर्विवादं वरेण्यं सदयहृदयसेव्यं स्वल्पकालाभिलभ्यम्।

निजविषयविशेषं भैक्षवं शब्दशास्त्रं जयतु जगति नित्यं साधुसाध्यं तदेतत्॥ (पृ॰ ६४९)

श्रीभिक्षुशब्दानुशासन पर सूत्रों की आनुपूर्वी से सम्बन्धित सर्वाधिक प्रभाव हेमचन्द्र के सिद्धहैमशब्दानुशासन का है। इस व्याकरण में प्रत्याहारों के निर्माण के लिए अनुबन्ध से रहित केवल एक सूत्र का प्रणयन किया गया है[67], पाणिनि की भाँति १४ सूत्रों का नहीं। भिक्षुशब्दानुशासन में गणों के ज्ञान के लिये धातुओं में अनुबन्ध लगाये गये हैं। सेट् अनिट् का ज्ञान बहुत ही सरलता से अनुबन्धों के माध्यम से कराया गया है। सरलता की दृष्टि से कई पारम्परिक संज्ञाओं के नये स्पष्ट नामान्तर भी प्रस्तुत किये गये हैं। उदाहरण के लिए करण कारक को साधन[68] तथा सम्प्रदान को दानपात्र[69] कहा गया है। अधिकरण कारक के प्रसंग में पाणिनि द्वारा प्रस्तुत संज्ञा तथा संज्ञी की व्यवस्था को यहाँ पलट दिया गया है। इनके अनुसार क्रियाश्रय के अधिकरण को आधार कहते हैं– क्रियाश्रयस्याधिकरणमाधारः (२.४.४३)।

भिक्षुशब्दानुशासन के सूत्रों की संरचना पर जैन वैयाकरणों का प्रभाव अवश्य है लेकिन प्रकरणों की संरचना में यह व्याकरण पाणिनि का अनुगमन करता है। यह इस व्याकरण की बहुत ही महत्त्वपूर्ण विशेषता है। हम देखते हैं कि शाकटायन के बाद से ही सभी जैन वैयाकरणों ने समासविधायक सूत्रों तथा समासान्त सूत्रों को एक साथ रख दिया है। बताया जाता है कि इसी प्रवृत्ति से व्याकरण में प्रक्रिया क्रम का प्रादुर्भाव होता है। परन्तु श्रीभिक्षुशब्दानुशासन में हम आश्चर्यजनक रीति से इस प्रवृत्ति का अनुगमन नहीं देखते हैं। इसमें समास विधायक सूत्रों का पाठ ३.१.१९ से लेकर ३.१.१३३ तक किया गया है, जबकि समासान्त प्रत्यय ८.३.१ से ८.३.११७ तक पूरे पाद में व्याप्त हैं। इस महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण को जैन व्याकरणों के इतिहास में एक वृत्त सम्पूर्ति की तरह देखा जा सकता है।

 

                                           औपसंहारिक

उपलब्ध जैन व्याकरण पाणिन्युत्तर काल से सम्बन्ध रखते हैं अतः उनमें पाणिनीय तन्त्र के अन्तर्गत सहस्र वर्षों में विकसित सिद्धान्तों की समृद्धि दिखायी पड़ती है। इन व्याकरणों में पाणिनि की प्रतिभा, कात्यायन के परिवर्धन और महाभाष्य की व्याख्यायें एक साथ विराजमान हैं। इतना ही नहीं, काशिका आदि वृत्तियों में प्राप्त स्पष्टीकरण भी इनके अन्तर्गत सम्मिलित कर दिये गये हैं। साथ ही इन व्याकरणों में पाणिनीय तन्त्र की अपेक्षा लाघव तथा सरलता लाने का भी प्रयास सर्वत्र किया गया है। इनका अन्य महत्त्व भाषा की निरन्तर परिवर्तित होती हुई रूप रचना का सूक्ष्म अवलोकन भी है। जैन वैयाकरणों ने भाषा के पाणिन्युत्तर काल में बदले रूप को, जिनका अनुभव पाणिनि के व्याख्याकार भी कर रहे थे, सूत्रों में बाँधकर प्रामाणिकता प्रदान की। इस प्रकार भाषा–व्याकृति की युगों से अविच्छिन्न भारतीय परम्परा में निरन्तरता को बनाये रखने का श्रेय जैन वैयाकरणों को है। इससे संस्कृत भाषा की बदलती विभिन्न अवस्थाओं के लिये भाषावैज्ञानिक सामग्री उपलब्ध होती है। उनका यह योगदान केवल व्याकरण के लिये ही नहीं अपितु आधुनिक भाषाविज्ञान आदि अनुशासनों के लिये भी महत्त्व रखता है। ध्यातव्य है कि संस्कृत इन युगों में बोलचाल की भाषा तो नहीं रह गयी थी लेकिन उसका शास्त्रीय रूप निरन्तर प्रचलित तथा प्रवाहमान् रहा।

जैन वैयाकरणों पर भारतीय व्याकरण वाङ्मय की धारा को साम्प्रदायिकता की ओर प्रवण करने का आरोप भी लगाया गया है। जैन व्याकरणों के बाद यह प्रवृत्ति भट्टोजि दीक्षित से होते हुए  हरिनामामृत प्रभृति व्याकरणों में उत्थान पर देखी जाती है जो आदि से अन्त तक साम्प्रदायिक रंग में रँगा हुआ है (मीमांसक २००० : ११५)। लेकिन इस प्रवृत्ति को देखने का एक और दृष्टिकोण हो सकता है। प्रत्येक वैयाकरण किसी न किसी भाषिक, सांस्कृतिक अथवा धार्मिक समुदाय से सम्बद्ध होता ही है। उस समुदाय से सम्बद्ध तत्त्व उसके शास्त्रीय प्रतिपादन में स्वभावतः प्राथमिकता पाते हैं। जैन व्याकरण वाङ्मय में भी जैन संस्कृति के अनेक आयामों का दिग्दर्शन कराने वाली पारिभाषिक शब्दराशि सुरक्षित हो सकी है जो अन्यथा असम्भव थी। इस प्रकार भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा के एक महत्त्वपूर्ण भाग–जैन संस्कृति को सुरक्षित रखने के कारण भी इनका महत्त्व अत्यधिक है। इसके साथ ही अपनी इस विशेषता के कारण ये ग्रन्थ तत्कालीन सामाजिक प्रवृत्तियों को जानने के लिये भी महत्त्वपूर्ण स्रोत की तरह उपयुक्त किये जा सकते हैं।

जैन वैयाकरणों ने सरलता की दृष्टि से पाणिनि व्याकरण के समक्ष चुनौती प्रस्तुत कर दी थी। द्वादशभिर्वर्षैर्व्याकरणं श्रूयते तथा कष्टं व्याकरणम् की तुलना में समस्तं वाङ्मयं वेत्ति वर्षेणैकेन निश्चयात्[70] के लुभावने वायदों ने निश्चित रूप से पाणिनीय परम्परा की धारा को दूसरी दिशा दी और प्रक्रिया क्रम के उदय के द्वारा सूत्र क्रम के सरलीकरण हेतु प्रयास होने लगे। बताया जा चुका है कि शाकटायन द्वारा समास प्रकरण में किया गया प्रयोग प्रक्रिया पद्धति का बीज बना जो हेमचन्द्र के व्याकरण में पल्लवित हुआ। स्पष्ट है कि जैन वैयाकरणों ने पारम्परिक व्याकरण को चुनौती देने के साथ ही उससे निबटने के मार्ग भी प्रस्तुत किये।

जैन व्याकरणों का अध्ययन करते हुए एक वस्तु हमेशा मस्तिष्क में रहनी चाहिये कि ये व्याकरण उस काल में  लिखे गये जब संस्कृत लोकप्रचलन से बाहर हो चुकी थी तथा उसमें लोक की ओर से नवीन परिवर्तन आने बन्द हो गये थे। पाणिनि के बाद कात्यायन तथा पतञ्जलि के मतों में तो फिर भी नवीनतायें ढूँढी जा सकती हैं क्योंकि संस्कृत तब भी लोक में प्रचलित थी। लेकिन जैन व्याकरणों में नितान्त नवीनता खोजना अन्याय्य होगा। इन व्याकरणों में विषयगत मौलिकता की अपेक्षा पद्धतिगत स्पष्टता एवं सरलता की खोज अधिक न्यायसंगत है। और यह अपने आप में बहुत उल्लेखनीय उपलब्धि है जो हमें इन वैयाकरणों में प्रतिपद अनुभूत होती है। वस्तुतः यह जैन विद्वानों का संस्कृत विद्या के प्रति प्रेम और बहुमान ही है जिसके कारण प्राचीन काल से लेकर अर्वाचीन काल तक इस प्रकार के नवीन तथा सर्वाङ्गपूर्ण व्याकरण की रचना हुई तथा अब भी हो पा रही है।

 

 

 

चयनित सन्दर्भ

मूल जैनव्याकरण ग्रन्थ

(सं॰) विन्ध्येश्वरी प्रसाद (१९१०) जैनेन्द्रव्याकरणम् महावृत्तिसहितम्. मास्टरखेलाड़ीलालसंकटाप्रसाद संस्कृतपुस्तकालय, वाराणसी.

(सं॰) शम्भुनाथ त्रिपाठी (तृ॰ सं॰ २०१६) ) जैनेन्द्रव्याकरणम् महावृत्तिसहितम्. भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली.

(सं॰) दोशी, बेचरदास जीवराज(१९६७) आचार्यमलयगिरिविरचितं शब्दानुशासनम् स्वोपज्ञवृत्तियुतम्. लालभाई दलपतभाई भारतीयसंस्कृति विद्यामन्दिर, अहमदावाद९।

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(सं॰)जम्बूविजय,मुनि (१९९४) श्रीसिद्धहेमचन्द्रशब्दानुशासनम्. श्रीहेमचन्द्राचार्य जैनज्ञानमन्दिर, पाटण, उत्तर गुजरात।

(अनु॰,व्या॰) नन्दिघोषविजय (१९९६).हेमहंसगणिसंगृहीत न्यायसंग्रह. कलिकालसर्वज्ञ श्रीहेमचन्द्राचार्य नवम जन्म शताब्दी स्मृति संस्कार शिक्षण निधि, अहमदाबाद।

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(सं॰) कंसार, डा̆॰ न॰ म॰(२००५).श्रीबुद्धिसागरसूरिप्रोक्तं पञ्चग्रन्थी व्याकरणम् (स्वोपज्ञवृत्तिसमेतम्). भोगीलाल लहेरचन्द भारतीय संस्कृति संस्थान, दिल्ली।

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(सं॰) जिनविजय मुनि (१९४०ई॰).  श्रीप्रभाचन्द्राचार्यविरचित प्रभावकचरित. संचालक, सिंघी जैन ग्रन्थमाला, अहमदाबाद–कलकत्ता।

(सं॰) द्विवेदी एवं मोकाटे (१९९१) भट्टोजीदीक्षितप्रणीतः शब्दकौस्तुभः द्वितीयो भागः. चौखम्बा संस्कृत सिरीज़, वाराणसी

अध्ययन–

शास्त्री, नेमिचन्द्र (१९६३). आचार्य हेमचन्द्र और उनका शब्दानुशासन–एक अध्ययन. चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी–१

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मीमांसक, युधिष्ठिर. (पुन॰–२००० ई॰). संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास भाग–२ एवं ३. रामलाल कपूर ट्रस्ट, बहालगढ़, सोनीपत, हरयाणा।

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Saini, R.S. (1999).Post Paniniyan Systems of Sanskrit Grammar. Parimal Publications, Delhi.

 

[1] पाणिनीयं महत् सुविहितम् (महाभाष्य–४.३.६६)।

[2] देखें महाभाष्य का आवर्ती वचन–“सिध्यत्येवं अपाणिनीयं तु भवति”।

[3] परिभाषा संख्या–१

[4]शेषं निःशेषकर्तारम् (हेमचन्द्राचार्य)

[5] रक्षार्थं वेदानामध्येयं व्याकरणम्। (पस्पशाह्निक)

[6] पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्। ७.३.१०९

  1. 7. शिष्टार्थपरिज्ञानाय अष्टाध्यायी। पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम् (अष्टा॰ ७.३.१०९ ) पर महाभाष्य।

[8] १. “इस (अष्टाध्यायी) में १००० श्लोक हैं। यह पाणिनि की रचना है जो प्राचीन काल में बड़ा भारी विद्वान् था……आज कल के भारतवासियों

का प्रायः इसमें विश्वास है। बच्चे ८ वर्ष की आयु में इस (पाणिनि) सूत्रपाठ को सीखना प्रारम्भ करते हैं और ८ मास में इसे कण्ठस्थ करते हैं ”

(इत्सिंग की भारत यात्रा पृ॰ २६४, उद्धृत– अष्टाध्यायी प्रथमावृत्ति पृ॰ २२)

२.देखें काशिका का उदाहरण – आकुमारं यशः पाणिनेः। (आङ्मर्यादाभिविध्योः २.१.१३)

[9]“Astadhyayi was written for people who largely spoke Sanskrit as the first language, the (Hemachandra’s) Shabdanushasana was aim of a readership that would acquire Sanskrit as a second language. (Sharma-24)”

[10] प्रभाकुमारी पृ॰ २९०

[11]यशो मम तव ख्यातिः पुण्यं च मुनिनायक। विश्वलोकोपकाराय कुरु व्याकरणं नवम्॥ (प्रभावकचरित २२–८४)

[12] व्याकरणशास्त्र अत्यन्त कठिन है।

[13] व्याकरण का रोग मृत्यु के साथ ही समाप्त होता है।

[14]प्रशस्ति श्लोक२, महावृत्ति पृ॰४१९

[15]देखें काशिका– समासग्रहणस्य नियमार्थत्वात् वाक्यस्य अर्थवतः संज्ञा न भवति। (तत्रैव)

[16] विशेष अध्ययन–“हैम व्याकरण में पाणिनीय प्रत्याहारों की अन्यथासिद्धि”– कु॰ ऋतिका (संस्कृत विभाग, दिल्ली वि.वि. में

प्रस्तुत लघुशोध प्रबन्ध)

[17]वासुदेव शरण अग्रवाल, जैनेन्द्रमहावृत्ति (प्रस्तावना, पृ॰ १२)

[18]देखिये– अथ शब्दानुशासनम् पर भाष्य– केषां शब्दानां? लौकिकानां वैदिकानाम् च। (पस्पशाह्निक, पृ॰ ९–१०)

[19]देखिये – “केषां शब्दानां? लौकिकानां वैदिकानां च” के भाष्य पर कैयट– वैदिकानामपि लौकिकत्वे प्राधान्यख्यापनाय पृथगुपादानम्। यथा ब्राह्मणा आयाता वसिष्ठोऽप्यायात इति वसिष्ठस्य। तेषां प्राधान्यं यत्नेनापभ्रंशपरिहारात्। (प्रदीप, पृ॰ १०)

[20]अनुमान किया जाता है कि चान्द्र व्याकरण में भी वैदिक सूत्र थे जो नष्ट हो गये। (देखिये मीमांसक – चान्द्र व्याकरण का प्रकरण)

[21] सिद्धान्तकौमुद्यां तत्रभवता दीक्षितमहाभागेन वेदसम्बन्धीनि २६३ सूत्राण्यष्टाध्यायीतः समुच्चित्य पृथक् कृतानि।… अत्र नास्ति

कश्चन क्रमः न च प्रक्रिया। इमानि वैदिकसूत्राणि वृक्षात् छिन्नाः शाखा इव मूलाद् विच्छेद्य पृष्ठभागे तथा विक्षिप्तानि यत्र

नास्ति शब्दानां सिद्धये किंचित् प्रक्रिया विज्ञानं, न चास्ति तत्राष्टाध्याय्या अनुवृत्तिविज्ञानम्॥(पुष्पा दीक्षित, वैदिकशब्दानाम्

सिद्ध्युपायः, पृ॰ २)

[22] अथवा किं न एतेन इदं नित्यमिदमनित्यमिति। यन्नित्यं तं पदार्थं मत्वैष विग्रहः क्रियते। (सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे वार्तिकभाष्य, पस्पशाह्निक)।

[23] भिक्षुशब्दानुशासन की बृहद्वृत्ति में तो व्याकरण में इस दृष्टिकोण के उपयोग से शब्दज्ञान के अतिरिक्त मोक्ष प्राप्ति को भी सम्भावित किया गया

है–  ततः अनेकान्तादेव विविक्तशब्दप्रयोगात् सिद्धि–सम्यग्ज्ञानं, तद्वारेण निश्रेयसं भवेदिति। (सिद्धिरनेकान्तात् १.१.२)

[24] सिद्धहैम॰ १.१.२, स्याद्वादात् अनेकान्तवादाद् प्रकृतानां शब्दानां सिद्धिर्निष्पत्तिर्ज्ञप्तिश्च वेदिव्या। (लघुवृत्ति, पृ॰१)

[25]पाणिनीय तन्त्र के व्याख्याओं ने भी इस शर्त को शिथिल करने के प्रयत्न किये हैं। देखिये इसी सूत्र (४.१.३३) पर महाभाष्य– यज्ञसंयोग इत्युच्यते, तत्रेदं न सिध्यति–इयमस्य पत्नी….एवमपि तुषजकस्य पत्नी न सिध्यति। उपमानात् सिद्धम्। (पृ॰५८)

[26]“…There can be hardly an ungrateful grammarian like Shakatayana in the whole Sanskrit Grammatical Literature.” (Saini:110)

[27] प्रभा कुमारी पृ॰ १८०–८१

[28] अनुदात्तौ सुप्पितौ (अष्टा॰–३.१.३)।

[29] ध्यातव्य है कि पाणिनि ने ऐसे प्रत्ययों को तसिलादिष्वाकृत्वसुचः (अष्टा॰६.३.३५) सूत्र द्वारा परिगणित कर दिया है।

[30] देखिए सूत्र १.१.१३ पर जैनेन्द्रमहावृत्ति, पृ॰५– न च लोकप्रतीतेषु शब्देषु विभागेनोदात्तादयः प्रतीयन्ते केवलं शास्त्रे व्यवहारार्थं संज्ञायन्ते।

[31] धन्वन्तरिक्षपणकामरसिंहशंकुवेतालभट्टघटखर्परकालिदासाः।

ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेः सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य॥, इस श्लोक के द्वारा यह बात संभावित की जाती है।

[32]इन्द्रश्चन्द्रः काशकृत्स्नापिशली शाकटायनः। पाणिन्यमरजैनेन्द्रा जयन्त्यष्टादिशाब्दिकाः॥ (बोपदेव), व्याकरणों का आठ की संख्या से परिगणन प्राचीन परम्परा है। बोपदेव से भी पहले १२ सदी में विद्यमान भास्कर की लीलावती का श्लोक दर्शनीय है–

अष्टौ व्याकरणानि षट् च भिषजां व्याचष्ट ताः संहिताः

षट् तर्कान् गणितानि पञ्च चतुरो वेदानधीते स्म यः।

रत्नानां त्रितयं द्वयं च बुबुधे मीमांसयोरन्तरं

सद्ब्रह्मैकमगाधबोधमहिमा सोऽस्याः कविर्भास्करः॥(लीलावती, पृ॰१२०,Thacker, Spink and Co.Calcutta, 1893)

नैषधकार श्रीहर्ष ने कहा है कि नैषध को वही समझ सकता है जिसने अष्टौ व्याकरणानि का अध्ययन किया हो– अष्टौ व्याकरणानि तर्कनिवहः इत्यादि।

हेमचन्द्र के व्याकरण की बृहद्वृत्त्यवचूर्णि में एक अन्य सूची इस प्रकार दी गयी है–

ब्राह्ममैशानमैन्द्रं च प्राजापत्यं बृहस्पतिम्।

त्वाष्टुमापिशलं चेति पाणिनीयमथाष्टमम्॥(पृ॰ ३)

वाल्मीकि रामायण में नव व्याकरणों की चर्चा प्राप्त होती है–

सर्वासु विद्यासु तपोविधाने प्रस्पर्धतेऽयं हि गुरुं सुराणाम्।

सोऽयं नवव्याकरणार्थवेत्ता ब्रह्मा भविष्यत्यपि ते प्रसादात् ॥ (उत्तरकाण्ड ३६–४७)

[33] प्रमाणमकलङ्कीयं पूज्यपादीयलक्षणम्।

धानञ्जयं च सत्काव्यं रत्नत्रयमुदाहृतम्॥ (जैनेन्द्रमहावृत्ति प्रशस्ति, पृ॰४१८)

[34]जैनेन्द्रव्याकरण के कर्तृत्व के सम्बन्ध में विस्तार से देखें (Saini:78-82)

[35] यदिन्द्राय जिनेन्द्रेण कौमारेऽपि निरूपितम्। ‍ऐन्द्रं जैनेन्द्रमिति तत्प्राहुः शब्दानुशासनम्॥ (उद्धृत जै॰ २०१६, प्रस्तावना पृ॰ १७)

[36]स्वाभाविकत्वादभिधानस्यैकशेषस्यानारम्भः १.१.९७ (मिश्र : ५२)

[37]अष्टाध्यायी १–१– तदशिष्यं संज्ञाप्रमाणत्वात्।

[38]सम्पूर्ण सूची के लिये देखें–Saini:85-88

[39]महाभाष्य १–४, कारकः इति महती सञ्ज्ञा क्रियते। सञ्ज्ञा च नाम यतो न लघीयः। कुत एतत्। लघ्वर्थं हि सञ्ज्ञाकरणम्। तत्र महत्याः सञ्ज्ञायाः करणे एतत् प्रयोजनम् अन्वर्थसञ्ज्ञा यथा विज्ञायेत।

[40]आचार्य शान्तनव पाणिनि से पूर्ववर्ती आचार्य हैं। इन्होंने प्रातिदपदिकस्वरों को समझाने के लिये फिट्सूत्रों का प्रणयन किया है। उन्होंने प्रातिपदिक के लिये फिट् तथा नपुंसक के लिये नप् संज्ञा का प्रयोग किया है। सूत्र क्रमशः हैं– फिषोऽन्त उदात्तः १.१, नब्विषयास्यानिसन्तस्य २.२६।

[41] नपा निर्देशः किमर्थः। वक्ष्यमाणाभिः संज्ञाभिर्बाधा यथा स्यात्। (जैनेन्द्रमहावृत्ति १.२.११०)

[42] यत्र नपः समावेश इष्यते तत्र चशब्दोपादानमस्ति। यथा यश्चैकाश्रये(१.३.४४)। (जैनेन्द्रमहावृत्ति, १.२.९१, पृ॰३४)

[43] सूत्र को छन्दस् अर्थात् वेद की तरह मान लेने से बहुलं छन्दसि (अष्टा॰२.४.३९) द्वारा सभी प्रकार के व्यत्यय स्वाभाविक मान लिए जाते हैं।

[44] सूत्रेऽस्मिन् जैनेन्द्रेषु यो विधिः सुपि च विधिः सुपि च विधिरिष्टो भवति। (जैनेन्द्रमहावृत्ति पृ॰ ३७५)

[45] देखिए महाभाष्य १.४.२५ से १.४.३१ तक।

[46] ध्यातव्य है कि पतंजल्युत्तर पाणिनीय वैयाकरणों ने पतंजलि के मत का अनुवाद करते हुए भी उस बहुत श्रद्धा नहीं की है।

देखिए शब्दकौस्तुभ(पृ॰ १२०)– अत्रेदं वक्तव्यं निवृत्तिनिःसरणादिधात्वन्तरार्थविशिष्टे स्वार्थे वृत्तिमाश्रित्य यथाकथंचिदुक्तप्रयोगाणां

समर्थनेऽपि मुख्यार्थपुरस्कारेण षष्ठीप्रयोगो दुर्वारः। नटस्य शृणोति इतिवत्। न ह्युपाध्यायनटयोः क्रियानुकूलव्यापारांशे विशेषो

वक्तुं शक्यः। अनभिधानब्रह्मास्त्रमाश्रित्य प्रत्याख्यानं तु नातीव मनोरमम्।

[47]१.  उदाहरण के लिए प्रस्तुत कारिका में प्रत्यय को त्य से परिवर्तित कर दिया है–

मत्वर्थाच्छैशिषाकाच्चापि मत्वर्थः शैषिकस्तथा।

सरूपस्त्यविधिर्नेष्टः सन्नन्तान्न सनिष्यते॥ (जै॰ ४.१.२३ पर महावृत्ति)

  • धातु की जगह धु–

वर्णागमो वर्णविपर्ययश्च द्वौ चापरौ वर्णविकारनाशौ।

धूनां तदर्थातिशयेन योगास्तदुच्यते वर्णविधौ निरुक्तम्॥ (जै॰ ३.३.१४ पर महावृत्ति)

  • यङ्लुक् की जगह यङ्ङुप्–

शपा तिपाऽनुबन्धेन निर्दिष्टं यद्गणेन च।

यत्रैकाज्ग्रहणं किञ्चित् पञ्चैतानि न यङ्ङुपि॥ (जै॰ ४.४.३७ पर महावृत्ति)

[48]डा̆॰ गोकुलचन्द जैन– संस्कृत के जैन वैयाकरण एक मूल्याङ्कन, पृ॰५५ (दूलहराज:१९९३) में सम्मिलित पत्र।

[49]वासुदेव शरण अग्रवाल, जैनेन्द्र महावृत्ति (भूमिका पृ॰१२)

[50] प्रभा कुमारी पृ॰ १०८

[51] पाणिनीय व्याकरण में इन दोनों प्रकरणों को अलग रखने का रहस्य यह है कि दोनों प्रकरणों की प्रकृति अलग अलग है। कारक प्रकरण संज्ञा प्रकरण है जबकि विभक्ति प्रकरण विधि प्रकरण।

[52] इष्टिर्नेष्टा न वक्तव्यं वक्तव्यं सूत्रतः पृथक्।संख्यानं नोपसंख्यानं यस्य शब्दानुशासने॥

इन्द्रचन्द्रादिभिः शाब्दैर्यदुक्तं शब्दलक्षणम्।तदिहास्ति समस्तं च यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्॥

 

[53]कन्सार–२००५

[54]कन्सार–२००५

[55](सं॰) जिनविजय : 73-109

[56]System of Sanskrit Grammar, P. 76

[57] बृहट्टिप्पणिका नामक प्राचीन पुस्तक सूची में भी इस व्याकरण को मुष्टव्याकरण कहा गया है। (दोशी १९६७: Intro.p.९)

[58] मलयगिरि ने हेमचन्द्र का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया है– तथा चाहुः गुरवः। (कृदन्तपाद १.२३)

[59]  दोशी १९६७: Intro.p.९

[60] कातन्त्र व्याकरण को भी पादों में विभाजित किया गया है।

[61] लोकाद् वर्णक्रमः (मलय॰ १.२)

[62] क्रमशः उदाहरण हैं–  रो रे लुग् दीर्घश्चादिदुतः (सिद्धहैम॰ १.३.४१), एदोतः पदान्तेऽस्य लुक् (सिद्धहैम॰१.२.२७)। एच् को हेमचन्द्र ने सन्ध्यक्षर

कहा है (सिद्धहैम॰ १.१.८)।

[63] पाणिनि तथा जैन वैयाकरणों की उपर्युक्त प्रक्रिया में बड़ा अन्तर यह है कि इन्होंने पाणिनि द्वारा अनेक प्रकरणों में रखे गये  युष्मद्–अस्मद् तथा

उसके आदेशों से सम्बन्धित सूत्रों को एक ही जगह रखकर सुकरता का आपादन किया है। पाणिनि द्वारा  अलग अलग प्रकरणों में रखे जाने का

कारण कार्यों की भिन्न भिन्न प्रकृति का होना है। उदाहरण के लिए वस् नस् इत्यादि आदेश आठवें अध्याय में पदस्य (८.१.१६) और पदात्

(८.१.१७) के अधिकार में इसलिए रखा गया है ताकि अनुदात्तं सर्वमपादादौ (८.१.१८) के अन्तर्गत आ जाने से इन आदेशों को सर्वानुदात्त हो

जाये। जैन वैयाकरणों को स्वरों का अनुशासन नहीं करना था, इसलिए उन्हें इस सूक्ष्मता में जाने की आवश्यकता नहीं थी।

[64] यह विवरण आचार्य तुलसी की शिष्या साध्वी कनकप्रभा के द्वारा लिखित विवरण (तेरापन्थी जैन व्याकरण साहित्य) के आधार पर है। इस

व्याकरण के आधारभूत ग्रन्थ विशालशब्दानुशासन के बारे में और विवरण अन्वेषणीय है।

[65] तदानीमेव मीठिया इत्यपराभिधेन मुनिचम्पालालेन भाद्रातः विशालकिर्तिगणिविरचितस्य अष्टाध्यायात्मकस्य शब्दानुशासनस्य हस्तादर्शः

उपलब्धः, आचार्यचरणेषु उपढौकितश्च। (श्रीभिक्षुशब्दानुशासनम्, प्रस्तुतिः–युवाचार्यः महाप्रज्ञः)।

[66] आचार्यतुलसी–आशीर्वचनम्।

[67] अइउऋलृ–एऐओऔ–हयवरल–ञमङणनम–झभघढध–जडदगब–खफछढथ–चटतकप–शषसः। (१.१.४)

[68] साधकतमं साधनम् (२.४.२७),

[69] कर्मक्रियाभिप्रेयो दानपात्रम् (२.४.३२)

[70]यक्षवर्मा