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प्रेमप्रकोपः

विषयेन्द्रियमर्यादा प्रेम्णि सर्वा प्रकुप्यति।
वार्ता नेत्रेण निर्वृत्ता हृदयेन निशाम्यते ।।

इन्द्रियों के साथ उनके विषयों की
सारी नियत व्यवस्था
प्रेम में गड्ड मड्ड हो जाती है
बातें आँखों से होने लगती हैं
और
उसे सुना हृदय से जाने लगता है

(चित्र भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला की गुलाब वाटिका का है!)

https://youtu.be/VCyM4aApM9k

मम मुखमरविन्दतुल्यफुल्लं तव वदतो विदितं तवापि नित्यम्।
उदयगिरिनितम्बमारुरुक्षोरपहरते वदनं रवेर्विलासान्?।।

अधरयुगमिदं मम प्रसूनं सुवदन वेत्सि वदन् मयि स्थितिं ते।
अकरुणतपशुष्कनिष्कुटेभ्यः सरसवसन्तसमागमानुकाराम्।।

मम चिकुरचयं विभावरीभिस्सुभग समानयतस्तवास्ति बोधः?
तव निटिलतलं विभाति विश्वक् निखिलकलाकलितो विभावरीशः।।

चलजलजपलाशसुन्दरं मे नयनयुगं यदि मन्यसे ममेदम्।
स्पृशति मम मनोपि मानसं ते निरतिशयापमिदं निरस्तगाधम्।।

हरिणमदमदभ्रसौरभं मे प्रकटयते सततं यदङ्गजातम्।
अभयद तदिदं त्वदभ्रपुष्टे सघनवने सुविहारकारणेन।।

भवति कुचयुगं ममाङ्कपाल्यां यदि घटमानरथाङ्गयुग्मभाग्यम्।
तव वदनविभाप्रभातवेलाविलसितमेतदितीव मान्यता मे।।

मम वचनततौ सुधासुधारां यदि लभसे त्वमिहापि हेतुभूतः।
यदधिहृदमथो परस्सहस्रं सपरिकरा अमरालया निलीनाः।

कथमपि दिवसे ममाङ्गके ते सुतनु पपात कटाक्षकोणलेशः।
सुखमिदमुपवर्णयन्नयामि स्वनयनयो रजनीमिमामशेषाम्।।

23.01.2021 तिथौ सम्पन्नस्य कविसमवायस्य कवीनां चित्रम्

               -1-

विरञ्चिना विरचिता सुन्दरि! त्वं न सुन्दरी।
तथा, यथा मनस्तूल्या मया त्वं सुन्दरीकृता॥

हे सुन्दरी,
ब्रह्मा ने भी तुम्हें उतना सुन्दर नहीं बनाया है
जितना कि मैंने अपने मन की कूँची से सँवारकर
तुम्हें दर्शनीय बना दिया है

                 -2-

त्वं मनोमुकुरे यावन्मयाकल्प्य विलोकिता।
न काचदर्पणे तावत् त्वयात्मापि निरीक्षितः॥

खूब सजा सँवार कर
हृदय के दर्पण में
जितना ध्यान से मैंने तुम्हें निहारा है
उतना तो काच की आरसी में
तुमने भी अपने आप को नहीं देखा होगा

               -3-

मया मनोरथैर्यावत् त्वत्प्रतोल्यः प्रतोलिताः।
त्वद्वीथीनामभिज्ञानं न तवापि तथा भवेत्॥

मन के रथ पर सवार होकर
(या, मनोरथों के वश)
तुम्हारी गलियों को
जितना मैंने नापा है
अपनी गलियों की उतनी पहचान तो तुम्हें भी नहीं होगी

            -4-

यावदाकारितं नाम मया तव यथा मिथः।
न तावन्न तथा सर्वैः सम्भूय स्वजनैस्तव॥

अकेले में
तुम्हारा नाम जितना मैंने पुकारा है
उतना तुम्हारे सारे सगे–सम्बन्धियों ने
मिलकर भी नहीं लिया होगा

            -5-

यत्सकृन्मितभाषिण्या भाषितं जातु न त्वया।
कर्णजीवातुभूतं ते तदप्याकर्णितं वचः॥

अल्पभाषिणी तुमने जो बातें एक बार भी नहीं कही
उन कर्णरसायन जैसी बातों को भी
मैंने सुन लिया है!

          -6-

द्वित्रकृत्रिमगद्यानि गदितानि सह त्वया।
पद्यत्वेन समापाद्य महाकाव्यं मया कृतम्॥

तुम्हारे साथ
जो २–३ कृत्रिम गद्य में बातें हो सकी
उन्हीं को भावपूर्ण पद्य में बदल कर
मैंने महाकाव्य लिख दिये हैं!

https://youtu.be/d3utlKR6Jac

Why I took resort to the Prakrit poetry?

😊

(A Gatha for my highly venerated Agraja Kaveendra Shri Shankar Rajaraman ji)

सव्वं सक्कयरज्जं तह गहिअं संकरेण विक्कमिउं।
अम्हारिसाण सिट्ठो पाउअविसयो णवरि सरणं।।

(सर्वं संस्कृतराज्यं तथा गृहीतं शंकरेण विक्रम्य।
अस्मादृशानां शिष्टः प्राकृतविषयः केवलं शरणम्।।)

संस्कृत कविता का सारा साम्राज्य शंकर कवीन्द्र (Shankar Rajaraman) ने पराक्रम पूर्वक कुछ इस तरह अपने अधीन कर लिया कि हम जैसे (अल्पसत्त्व) कवियों के लिए केवल प्राकृत कविता का प्रदेश ही आश्रय के तौर पर बाक़ी रह सका।


** This picture was taken last year at Doordarshana, when he was in Delhi to receive the President award. Perhaps taken by dear Sunil Joshi.

विद्ध ही समृद्ध

नूनं काञ्चनकाण्डोयं वज्रशल्यश्शरस्तव।
कटाक्षयोर्हि यद्विद्धस्समृद्धो जायते जनः।।

= निश्चित रूप से तुम्हारे कटाक्षों के बाण का मध्यभाग (काण्ड) सोने का और उसका अगला भाग (शल्य) हीरे का बना हुआ है। इसीलिए तो, जिसे भी यह बेंधता है वह व्यक्ति समृद्ध हो उठता है।

(किसी भी बाण के 3 हिस्से होते हैं – शल्य , काण्ड और पुच्छ। 1. शल्य-सबसे आगे की नुकीली धातु। 2.काण्ड- बीच की हल्की लकड़ी जो प्रायः सरकंडे की होती है इसी कारण उसे काण्ड कहते हैं। यह बाण का इतना ज़रूरी हिस्सा होता है कि सारे बाण को ही कई बार काण्ड कह देते हैं। संस्कृत में काण्ड बाण का पर्यायवाची भी होता है। 3.पुच्छ – पूँछ पर लगा किसी चिड़िया का पंख।)
After posting this verse a friend of mine asked me to unleash the secret of composing such a beautiful (acc to him*) Shloka. Say something about your beloved whose piercing glance makes you so affluent. I narrated the story how this verse could be produced. I was reciting the Ayodhya Kanda of Valmiki’s Ramayana (2.61.21). Suddenly I came across the phrase काञ्चनैर् बाणैः in praise of Ramachandra’s arrow. The matter of whole verse, then appeared to my mind.
Valmiki is the first and the last poet. He is the greatest of all the poets of all times. Whosoever wants to be a poet should read Valmiki repeatedly. All who read Valmiki can’t be a poet but whosoever feels poetry in her heart should read Valmiki for sure- मधुमयभणितीनां मार्गदर्शी महर्षिः। Read Ramayana! If you are the most fortunate you shall be a poet. If you are not, don’t worry! You shall be granted with Moksha.

   ।।अज्जे दिज्जउ विज्जा।।
      (आर्ये! दीयतां विद्या)

My Prakrita Poem composed during second last Navaratras eulogising Devi, has been published in a magazine “Pagada Bhasha” edited by Prof. Anekant Kumar Jain.
The first Gatha of this poem had been translated by Agrajavarya Shri Shankar Rajaraman.


अज्जे संसारण्णवतरणपयारं कहेहि दीणस्स।

तुअ चरणतरुणतरिणो भिण्णो माए स मा होउ॥१॥

(आर्ये, संसारार्णवतरणप्रकारं कथयस्व दीनाय।

तव चरणतरुणतरेः भिन्नो मातः स मा भवतु॥)

O Devi! Tell this miserable me the means to cross the ocean of SamsAra. But Mother, let that means be none other than the new raft that is your foot. ( Dr. Shankar Rajaraman’s translation)

राआसीविसरज्जूदढणिअडणणासिअप्पसंण्णं मं।

विज्जे णवरं रक्खउ तुअ लोयणगारुडीविज्जा॥२॥

(रागाशीविषरज्जूदृढनिगडननाशितात्मसंज्ञं माम्।

विद्ये केवलं रक्षतु तव लोचनगारुडीविद्या॥)

कोहजलणे जलंतं हयजीयं सिग्घमेव सिसिरेउ।

केण वि णे ̆व्व अवण्णे अपंगवरिसन्तरेण परं॥३॥

(क्रोधज्वले ज्वलन्तं हतजीवं शीघ्रमेव शिशिरयतु

केनापि नैव अपर्णे अपाङ्गवर्षान्तरेण परम्॥)

अइलोहलोहभल्लअसल्लेहिं अवरचालणीहूए।

अमियप्फंसेण हि ते हियये मम अच्छउ तिगिच्छा॥४॥

(अतिलोभलौहभल्लकशल्यैः अपरचालनीभूते।

अमृतस्पर्शेन हि ते हृदये मम अस्तु चिकित्सा॥ )

गयसव्वभीइणो वि हु सिक्खामो दक्खकण्णए भेउं।

सीसे चिट्ठदु जेणं तुअ अभएणंकिओ हत्थो॥५॥

(गतसर्वभीतयोऽपि खलु शिक्षामहे दक्षकन्यके भेतुम्।

शिरसि तिष्ठतु येन तव अभयेनाङ्कितो हस्तः॥)

अज्जे दिज्जउ विज्जा अज्ज जहा मज्झ चरणपडिआणं। ।

कल्लं कल्लाणमअं कियसुकियाणं सया होउ॥६॥

(आर्ये! दीयतां विद्या अद्य यथा अस्माकं चरणपतितानाम्।

कल्यं कल्याणमयं कृतसुकृतानां सदा भवतु॥)

صبحتان بخیر قزوه-

One of the most celebrated poets of Modern Persian Dr. Ali Reza Ghazve, my respected Ustaad of Persian Poetry, is coming to India next week. In this connection, we had a conversation in Persian Ghazal (as we often used to have when he was in Iran Culture House, Delhi). The ghazals are in fil-bedahi form, and about updating the general information. I tried to answer in the same coin (humbly, in fact), using the same metre with a slight change in Qafiah. I share the both Ghazals-

عصر بخیر((Ali Reza Qazv-

سلام حضرت بلرام شاه عصر بخیر
تو ای برادر خورشید و ماه عصر بخیر

منم عزیز دل تو علی رضا قزوه
که من رفیق توام گاه گاه عصر بخیر

چهارشنبه ی دیگر که می رسم دهلی
بیا به دیدن من صبحگاه عصر بخیر

شماره های خودت را برای من بنویس
نه سرسری که شود اشتباه عصر بخیر

بگو چه می کنی آنجا و دوستان خوبند؟
بزرگ تر شده فرزندت ؟ آه عصر بخیر…

سلام من برسان جانب نقی عباس
بگو که قزوه می آید ز راه عصر بخیر

Balram Shukla (صبح بخیر)

سلام قزوه ی عالی جناب! صبح بخیر
شتاب!! عمرشتاب است و خواب صبح بخیر

خبر نه داری ما بی بهار روی شما
شدیم خسته و خرد و خراب صبح بخیر

برهمنیم که از بهمن فراق رخت
بدون مهر نداریم تاب صبح بخیر

از این که هفته ی دیگر به هند می آیید
خوش است جان و دل ٔپیر و شاب صبح بخیر

دمیده دخترکم در کنار من خوب است
مثال پرتو ماهی در آب صبح بخیر

زنی گرفت ز خویشان خود نقی عباس
بدون هیچ سوال و جواب صبح بخیر

بیا بیا که مرا طاقت جدایی نیست
مذاق شعر تو قند و گلاب صبح بخیر…

श्रमिकों की दुर्दशा पर एक कविता
(हिन्दी, अंग्रेज़ी, भोजपुरी तथा मराठी अनुवादों के साथ)

यत्र त्वद्घटिता विभान्ति नगरेष्वट्टालिकामालिका
वस्तुं तत्र न ते दिनानि कतिचित् कोणोऽपि वास्तूयते।
कृष्टैरन्नचयैस्तवैव भरिता कोष्ठा यदीया भृशं
तस्यान्नप्रसृतिर्मनाक् प्रसरति क्षुद्रार्भकेभ्यो न ते॥१॥

जिन शहरों में तुम्हारी बनाई

ऊँची अटारियों की पाँतें चकाचौंध कर रहीं हैं

वहीं कुछ दिन रुक पाने के लिए

एक कोना भी नसीब नहीं है तुम्हें

जिन लोगों के कोठार

तुम्हारे ही उपजाए अनाजों से भरे हुए हैं

उन्हीं से अन्न की एक पसेरी भी नहीं निकल पा रही है

तुम्हारे अभागे बच्चों के लिए भी


उत्थानाय समर्पितस्तव निजो देहोऽपि येषां पुरे
सम्प्रत्युद्धरणाय ते, किल करस्तेषामकिञ्चित्करः।
कर्तुं स्वर्गसुचारु जीवितगतिं येषां त्वया रौरवास्
सोढाः, सम्प्रति घस्मरां विषहसे तेषां जुगुप्सादृशम्॥२॥

जिन शहरी लोगों को उठाने में

तुमने अपना शरीर ही गिरवी रख दिया था

अब तुम्हें उबारने के लिए

उनके हाथ में ज़रा भी जुम्बिश नहीं

जिनकी ज़िन्दगी को स्वर्ग जैसा बनाने के लिए

तुमने रौरव जैसे नरक सहे थे

अब उन्हीं की घातक घृणा दृष्टि भी सह रहे हो तुम


आपन्नस्य पुरे पुरस्तव करात् ग्रामोऽपि विभ्रश्यते
हित्वा दैवदरिद्र! नैजमुडुपं सच्छिद्रनौः सेविता।
आयातं सुखजीवनं मृगयितुं यस्यां नगर्यां त्वया
दुर्दैवादिह ते न वापि सुलभो मृत्युः प्रतिष्ठायुतः॥३॥

तुम शहर में क्या फँसे

देखते देखते गाँव भी तुम्हारे हाथों से छूट गया

दुर्भाग्य के मारे तुम अपनी डोंगी छोड़कर

दूसरों के छेदों से भरे जहाज पर बैठ गए
जिस नगर में सुखी जीवन की खोज में आए थे तुम

विडम्बना है कि वहाँ तुम्हें इज़्ज़त की मौत भी नसीब नहीं


नो बन्धुस्तरलान्तरोऽत्र सरलः, स्वामी खरो निष्ठुरः
पाल्यो न त्वमिहासि वा करुणया, शोष्योऽसि दासेरकः।
जानीहि क्षणतृष्णिकाहतमते दूरापकृष्टैष ते
नो ग्रामः परदुःखदुःखित इदं पाषाणपूर्णं पुरम्॥४॥

यहाँ तुम्हारे सरल तरल बन्धु नहीं

यहाँ तो हृदयहीन निठुर मालिक लोग विराजते हैं

यहाँ कोई दया से भर कर तुम्हारा पालन नहीं करेगा

तुम तो यहाँ सस्ते मजूर हो

दुर्भाग्य तुम्हें दूर ले आया, मृगतृष्णा ने तुम्हारी मति हर ली

ठीक से जान लो

संवेदनाओं से भरा गाँव नहीं है, ईंट पत्थरों से भरा शहर है यह


नो ग्रामश्चिरहापितस्तव वशे दूरं सुदूरे स्थितः
ग्रावीभूतमथो हितं न नगरं तुभ्यं चिराराधितम्।
नीचैर्नेतृभिरञ्चितो हतबलो देशो न दिष्टाय ते
विश्वे विष्वगपीह हन्त शरणं शीर्णस्पृहाणां न वः॥५॥

बहुत पहले जिसे छोड़ दिया था

वह गाँव अब तुम्हारी पहुँच से और भी दूर हो गया

सारी उमर जिसकी सेवा की

वह अहितकर शहर ही पत्थर हो गया

कमनज़र भ्रष्ट नेताओं से भरे

इस हतबल देश में तुम्हारा क्या भविष्य है?

टूटे सपने वाले तुम लोगों के लिए, हाय

सारे संसार में कहीं कोई सहारा नहीं

                                          – बलराम शुक्ल

Translated into English by Justice Shabih-ul-Hasnain (Retd.Judge,High Court, Allahabad,Lucknow Bench)

                        ( 1 )

The cities in which you crafted
Corridors of dazzling architecture lofted
Could not provide you a tiny corner
For a few days a shelter a cover
People,whose stores are overflowing
With the grains
Your blood and sweat outpouring
A morsel of food could not they spare
As a matter of course
For the unfortunate lads of yours

                       (2)

You pledged your torso and your limb
To facilitate the urban elite climb
And they not lift a finger or hand
To drag you out of dreadful quicksand
You suffered the hell to make cities a paradise
They hated your guts with much despise

                     (3)

You got stuck in the town an alien land
Your own village slipped out of your hand
You abandoned your small boat of poles
Preferred to jump in a big ship full of holes
You came dreaming of better-life than real
Alas ! you couldn’t even get a decent burial
(4)
Here are not your simple loving companions
Here reign the heartless cruel chameleons
None will pamper,nourish you with piety
You are simply a cheap commodity
Your misfortune lured you to this land
Mirage overtook your senses, understand
This is no native village of empathies
A jungle of mortars bricks and stones

              (5)

The land you left long ago
Distanced further from your reach
The city you served whole life with
Has become your doom
The destructive city has turned of stone
In a country full of short sighted leaders of all kind
What is your fate and destiny ?
Except your shattered dreams
O ‘ God! there’s no place for you on this vast endless earth
——————————————

सुहृद्-वर Sushant Kumar Sharma जी ने इस कविता “पाषाणपूर्णं पुरम् ” का सुन्दर भोजपुरी काव्य रूपान्तर “पाथर नगरिया” नाम से किया है —

जवना सहरिया में तोहरे बनावल
ऊंची रे अटरिया के पाँत हो
ओहि रे सहरिया के कोनवो ना भइलें
दुखवा में तोहरो कनात हो ।
तोहरे बोवल तोहरे उपिजावल
भरल बा जिनका कोठार हो
अंखिया से लोर चार चउरो ना निकसे
भुखल बलकवा तोहार हो ।

देहिया तोहर जब बन्हकी धराइल
बढ़लें सहरिया के लोग
हाय राम उहो नाहीं अब रहि गइलन
तोहर बिपत टारे जोग ।।

नरकि में रही जब गइलs तू भइलें
उनकर घर कबिलास
आजु काहे उनके नजरिया ना निरखे
तोहरा नयनवा के आस ।।

नगर के जाल में भइलs मछरिया
पानी जस छूटल गाँव
आपन डेंगिया तिआगि के चढ़लs
अनकर छेदल नाँव ।

कवन सपन देखि अइलs नगरिया
सुख के जिनिगिया के आस
जहवाँ इजतिया के मुअन मिलल नाहीं
सपना के जरलें लहास ।

इहाँ नाहीं बसें रामा भाई पटिदरवा
निठुर मलिकवा हजार
कउड़ी से कीनल चाहेलें देहिया
दया माया नाहीं दरकार ।

कवन अभाग के पेरल मतिया
कवना सपनवा के फांस
पाथर नगरिया में तोहे लेइ अइलें
जहां नाहीं मनई के बास ।

तोहरे तिआगल गउवां जे भइलें
तोहरे नजरिया से दूर
बजर के छतिया भइल उ नगरिया
जहां जाइ बनलs मजूर ।

राज रजायसु आन्हर देस के
कँहवाँ बा नवल बिहान
टूटल सपनवा मजूरवा रे भइया
सुखवा के मिले ना ठेकान ।।

मराठी – अनुवाद –

दगड धोंड्यांचे शहर

  • बलराम शुक्ल

अशा या शहरात
तुम्हीच बनवलेल्या
उंचच उंच ईमारती
तुमचे डोळे दीपवित आहेत…
पण तेथेच क्षणभर सुद्धा
निवारा मिळण्याचे नशिबात
नाहिए तुमच्या….
ज्या लोकांची कोठारे
तुम्हीच पिकवलेल्या अन्नधान्यानं भरली आहेत,
पण त्याच कोठारातील
एक दानाही मिळणार नाही
तुमच्या भुकेल्या मुलांना….

ज्या शहरी लोकांच्या भल्यासाठी आपला देह गहाण ठेवला होता तुम्ही
पण आता तुम्हालाच
मदत करायला त्यांच्याकडे
नाहिए सवड , स्थिती आणि
ईच्छा सुद्धा…..
ज्यांचे आयुष्य स्वर्गासारखे
बनवण्यासाठी सहन केली
तुम्ही भयानक अशी
रौरव नरक यातना….
आता त्यांचीच उपेक्षा आणि घातक अशी घृणादृष्टी सुद्धा
सहन करताय तुम्ही…..

या शहराच्या भव्य गर्दीत
असे फसलाय तुम्ही की
तुमचेच गांव सुद्धा विरघळून पडले आहेत तुमच्या हातून
जशी सरकते वाळू
गच्च बांधलेल्या मुठीतून….

आज सोडून आपली वल्हे दुसर्यांच्या भोकं पडलेल्या
जहाजात विराजमान
झालात तुम्ही…..
ज्या शहरात सुखी, समृद्ध
जीवनाच्या शोधात तुम्ही
आलात स्वप्ने उराशी घेऊन.
आता कशी झालीय
तुमचीच विडंबना की सुखासुखी तेथे मृत्युही
नशिबात नव्हताच तुमच्या…..

ही राहिली नाहित तुमची
भावंडे, सगे सोयरे किंवा
आपली म्हणावी अशी माणसं…
इथं आहेत फक्त आता
मालक, बाँस, सर, किंवा
ठेकेदार आणि…
हृदयहीन, निघृण, भावनाशुन्य
माणसांचे कळप…
दया, कृपा, माणूसकी संपलीय इथं.
तुम्ही आहात आणि होते
फक्त स्वस्त , सोयीचे मजूर….

दुर्देवानेच ओढून आणलेय
तुम्हाला इथं अन मग
तुम्हीही गुरफटलात या
मृगतृष्णेच्या जंगलात.
तुम्हीच केली तुमची मतीभ्रष्ट..

हे लक्षात ठेवा !
हा माणूसकिचा गांव नाही
येथे संवेदनांचा ठाव नाही
फक्त दगड धोंड्यांनी भरलेले
हे सिमेंटचे जंगल आहे.
माणूसकिचा येथे
मुडदा पडला आहे जेथे
तेच हे शहर आहे…..

फार आधीच, कधी तरी
सोडले होते तुम्ही तुमचे गांव,
तेही आता नाहिए तुमच्या
आवाक्यात..पुढ्यात..
आता फक्त रस्ते आणि रस्तेच
लांबच लांब..
आयुष्यभर ज्यांची सेवा
तुम्ही केली या स्वप्ननगरीत
आता हे शहरच झालेय
दगड धोंड्यांचे अन
दृष्टि ही अधू झाली आहे
इथल्या नेत्यांची, पुढार्यांची.
अशा या शहरात, देशात..
काय आहे तुमचे भविष्य ???

भंगलेली स्वप्ने तुमची,
तुमची थिजलेली पावले
भिजलेले कोरडे डोळे अन
अडखळलेले श्वासही तुमचेच.
कुणीच नाही तुमचे
या दगड धोंड्यांच्या शहरात
नव्हे या भयान रस्त्यावर
असहाय….
हतबल…..
हताश…..
या दगड धोंड्यांच्या शहरात..

अनुवाद:
डॉ. सतीश पावडे

हिन्दी रूपांतर लोकमत, नागपुर से प्रकाशित –

Lokmat ePaper – http://epaperlokmat.in/lokmatsamachar/epapernew.php?articleid=LOKSAM_NPLS_20200601_4_4

क्रान्तद्रष्टा कवि समाज का ऐसा वैज्ञानिक होता है जो मात्र समस्या की रूपरेखा भर नहीं खींचता… अपितु समस्याओं की जड़ों को पोसने वाली अट्टालिकाओं की परतें भी उघार देता है। यथार्थ के इस अनावरण से मानवीय चेतना जाग जाती है… और व्यवस्था की संरचना पारदर्शी होकर आरपार दीखने लगती है। कोरोना संक्रमण में, लॉकडाउन के प्रभावों से उपजी मानवीय गति ‘चरैवेति’ की अनुगामिनी बनी है। बंद व्यवस्था ने कर्मचारियों को पलायन के लिए मजबूर कर दिया। ये निरन्तर चलते रहने वाले श्रमिक बन गए और बढ़ने लगे हजारों किलोमीटर दूर अपने गाँव-जवार की ओर….! एक देश में कई देश बसते हैं, जहाँ आश्रय न मिल सके वह अपना देश नहीं…. इसीलिए अपनी माटी का आकर्षण बच्चों-बूढ़ों-महिलाओं के भी पैरों में प्राण फूंकता है और वे चलते रहते हैं। सभ्यता के प्रतिमान ‘शहर’ में सम्वेदनाएं इतनी नहीं पसीजतीं कि कोरोना-काल का दुर्दिन वहीं कट सके। ऐसे में कवि डॉ. बलराम शुक्ल जी ने सामयिक परिदृश्य का दिग्दर्शन किया। त्रस्त मानवीयता की श्रम संरचना का ओर-छोर उकेर दिया है। सामयिक परिदृश्य पर आधारित यह कविता सीमित परिधि में सांस भर ले पा रही संस्कृत-भाषा में अलंकृत है। कवि का दग्ध अन्तस् भाव-वेदना को महसूस करता है, भावों की अमूर्त भाषा से मन मथित होता है… विदग्धता संस्कृत के आश्रय में अभिव्यक्ति पाती है। यही संस्कृत भाषा के कालजयीपन का रहस्य है। संस्कृत-प्रेमी/अध्येता/व्यसनी आपस में कवि-सम्मेलन करके भाषा को जो उर्वरता देते हैं वह वाङ्मय के लिए संजीवनी है। आदि आचार्यों के मत में कविता की प्रकृति में रमणीयता, रसात्मकता अनुस्यूत रहती है। अदृष्ट कीट के प्रकोप-विस्तारण में उद्योगों के ठहर जाने के कारण श्रमिकों द्वारा जीवन में गति बनाए रखने हेतु ‘चरैवेति’ की साधना जीवन के प्रति लालसा को दर्शाता है। । इस साधना-यात्रा में श्रमिक के कठिन-कष्ट ने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर दिया। कवि ने प्रवासी श्रमिकों की ‘चरैवेति’ साधना का आमूलचूल अवलोकन किया है और उसे देवभाषा में अभिव्यक्त किया। इस कविता के प्रयोजन में रसात्मकता अथवा रमणीयता अन्वेषित करें तो, निष्कर्ष यह निकलता है कि “समाज का वह वर्ग जो सुविधा सम्पन्न घरों में सुरक्षित/संरक्षित है वह भी पैदल-यात्रा-व्यथा का मन से भुक्तभोगी है। मनोमय, विज्ञानमय और प्राणमय कोशों से सूत्रात्मक ढंग से बंधी हमारी संवेदना हमें ‘एक’ करती है…। मानवीय संवेदना की व्यापकता के ऐक्य का बोध ही रमणीय और रसात्मक है। संस्कृत कविता का आरम्भ अवलोकनीय है—

पाषाणपूर्णं पुरम्
(पत्थरों का शहर)
यत्र त्वद्घटिता विभान्ति नगरेष्वट्टालिकामालिका
वस्तुं तत्र न ते दिनानि कातिचित् कोणोऽपि वास्तूयते।
कृष्टैरन्नचयैस्तवैव भरिता कोष्ठा यदीया भृशं
तस्यान्नप्रसृतिर्मनाक् प्रसरति क्षुद्रार्भकेभ्यो न ते॥१॥
इस कविता पर परमादरणीय आचार्य प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी जी समीक्षात्मक टिप्पणी लिखते हैं—“बलराम शुक्ल की कविता “पाषाणपूर्णं पुरम्” समकालीन संस्कृत कविता के सामर्थ्य और वैभव की परिचायक है। शार्दूलविक्रीडित छंद का चयन समीचीन है, अच्छी तरह कसी हुई और मँजी हुई पदावली प्राचीन महाकवियों की प्रौढि का स्मरण कराती है। भोज ने व्यत्यय नाम से अलंकार बतलाया है, जो जीवन और जगत् में होने वाले व्यत्यास या उलटफेर के चित्रण से कविता में आता है। बलराम जी ने व्यत्यय के साथ असंगति और यमक जैसे अलंकारों को इस कविता में सहज रूप में गूँथ लिया है।“
परंतु समस्या यह है कि संस्कृत भाषा में अभिव्यक्त भाव संस्कृतज्ञों के लिए ही बोधगम्य हैं। ऐसे में संस्कृत न समझने वाला वर्ग भाषिक सौंदर्य से ही चमत्कृत हो सकेगा… और अर्थबोध से वंचित रह जाएगा…! संत ज्ञानेश्वर ने जब गीता का मराठी अनुवाद किया तो वे आरम्भ में लिखते हैं कि अर्जुन कृष्ण से कहते हैं कि ‘प्रभु जो आप बता रहे हैं वह बहुत ही महत्त्वपूर्ण और उपयोगी है लेकिन संस्कृत में समझ नहीं आ रहा आप इसे यदि सरल मराठी में समझाते तो अधिक समझ आता। ऐसी दुर्बाधता के निदान हेतु डॉ. बलराम शुक्ल जी ने स्वयं इस कविता को भाषांतरित किया। सहज हिंदी में इस भाषांतरण ग्राह्यता बढ़ गई…!
जिन शहरों में तुम्हारी बनाई
ऊँची अटारियों की पाँतें चकाचौंध कर रहीं हैं
वहीं कुछ दिन रुक पाने के लिए
एक कोना भी नसीब नहीं है तुम्हें
जिन लोगों के कोठार
तुम्हारे ही उपजाए अनाजों से भरे हुए हैं
उन्हीं से अन्न की एक पसेरी भी नहीं निकल पा रही है
तुम्हारे अभागे बच्चों के लिए भी

लेकिन इस अनुवाद से साधारण श्रमिक और उनकी प्रतीक्षा में डूबते-उतराते उनके ग्रामवासी परिजन कविता में निहित मरहम के माहात्म्य को न बूझ सकेंगे। ऐसे में शोधार्थी, कवि, अनुवादक, अध्येता सुशांत शर्मा जी ने संस्कृत काव्य की आत्मा को भोजपुरी की देह में प्रतिष्ठापित किया। अनुवाद में सुशांत जी ने बेटी-विवाह के समय का विदाई गीत वाला छंद/लय चुना। सामाजिक संरचना का एक विस्थापन बेटी की विदाई है। जिसमें विदा होने वाली से अधिक विलाप अन्य सभी स्त्रियां करती हैं, क्योंकि सबके अपने विस्थापन की वेदना समष्टिमूलक हो गई रहती है। एक विदाई गीत देखते हैं—
हटिया कय सेनुरा महंग भईल बाबा,
चुनरी भईल अनमोल रे
यहि रे सेनुरवा के कारन बाबा छूटा है देश हमार हो…

जीवनस्तर में गुणात्मक सुधार हो, चार पैसे हाथ में आएं तो मनपसन्द खा-पहन लें, बच्चों को जरूरी शिक्षा दिला सकें और बीमारियों का समुचित निदान हो सके… इसी आस में गाँव के राजाबाबू जैसे युवा शहर में मजदूर बनने पहुँच जाते हैं और अवसरसापेक्ष पत्नी, बच्चों को भी साथ लिए जाते हैं। आज श्रमिकों के पलायन में वेदना की समष्टि के कारण ही सजी थाली के स्वाद और वातानुकूलित कमरे का सुख भी कुरेद उठता है…! बहुत कुछ रिसने लगता है। शहर चार पैसे के एवज में बहुत कुछ सोखता रहता है। ऐसे में, एक वाइरस के प्रकोप में शहरी संवेदना की जो निर्ममता सड़कों पर पग-पग बढ़ती दीखती है, उससे सुशांत शर्मा की कराह भोजपुरी गीत में बदल जाती है—
“पाथर नगरिया”
जवना सहरिया में तोहरे बनावल
ऊंची रे अटरिया के पाँत हो
ओहि रे सहरिया के कोनवो ना भइलें
दुखवा में तोहरो कनात हो ।
तोहरे बोवल तोहरे उपिजावल
भरल बा जिनका कोठार हो
अंखिया से लोर चार चउरो ना निकसे
भुखल बलकवा तोहार हो ।
अनुवाद पुनराभिव्यक्ति है…! यहाँ कलात्मक विधा के रूप में अनुवाद सफल है…! मूल संस्कृत की सुरभि को किञ्चित भी विनष्ट किए बिना…. भोजपुरी पात्र में उड़ेला गया है…। यहाँ भावों का सफलतम स्थानांतरण है। हिंदी साहित्य में अनुवाद की परम्परा रीतिकाल में मुखरित है। रीतिकाल में बहुत से संस्कृत साहित्य का ब्रजभाषा में अनुवाद हुआ। सोमनाथ ने भवभूति विरचित मालती-माधव का माधव-विनोद नाम से ब्रजभाषा में काव्यात्मक अनुवाद किया।
कही बहादुर सिंह ने, एक दिना सुख पाई।
सोमनाथ या ग्रन्थ की, भाषा देहु बनाई।।
इस वक्तव्यात्मक पद्य में अनुवाद को ‘भाषा’ कहा गया है…! रीतिकाल में संस्कृत की भाषिक दुर्बोधता ब्रजभाषा में ढलकर मूल के ही भाव का पान कराने लगी थी। विवेच्य प्रसंग में कवि सुशांत शर्मा ने संस्कृत पद्य की ‘भाषा’ बनाई है…! यह गढ़न भोजपुरी-भाषा के सांचे में आकारित है। हिंदी नवजागरणकाल के अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र सामाजिक बदलाव में अनुवाद की भूमिका और उसके महत्त्व पर लिखते हैं—
पै सब विद्या की कहूँ होय जु पै अनुवाद।
‘निज भाषा में तौ सबै या कौ लैहें स्वाद।।
जानि सकैं सब कुछ सबहिं विविध कला के भेद।
वनै वस्तु कल की इतै मिटै दीनता खेद।।
मूल कृति के विचार और भावतत्त्व से अधिकाधिक जनसमूह लाभान्वित हो सके यह अनुवाद का मुख्य उद्देश्य होता है। ज्ञान और संवेदना को पल्लवित करने में अनुवाद एक मजबूत आधारस्तम्भ है। भारतेंदु हरिश्चंद्र अनुवाद के माहात्म्य के विषय में आगे लिखते हुए अनुवादकों को प्रेरित करते हैं—
अंग्रेजी अरु फारसी, अरबी संस्कृत ढेर।
खुले खजाने ज्ञान के लूटत लागहु देर।।
सबको सार निकारि के पुस्तक रचहु बनाइ।
छोटी बड़ी अनेक विधि विविध विषय की लाइ।।

हिंदी साहित्य की सम्पदा में विस्तारण हेतु ‘सरस्वती’ पत्रिका के सम्पादक, युगप्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ग्रन्थकारों से विनय करते हैं कि—
इंग्लिश का ग्रन्थ-समूह बहुत भारी है,
अति विस्तृत जलधि समान देहधारी है।
संस्कृत भी इसके लिए सौख्यकारी है,
उसका भी ज्ञानागार हॄदयहारी है।
इन दोनों में से अर्थ-रत्न ले लीजै,
हिन्दी के अर्पण उन्हें प्रेमयुत कीजै।।
उपरियुक्त सन्दर्भ से अनुवाद की महत्ता को व्यापक रूप से स्वीकारना ही साहित्य की पहुँच को विस्तार देता है। अनुवाद एक सेतु है, जिसमें एक भाषा के मर्म की यात्रा दूसरी भाषा में समाहित हो जाती है, और नए पाठकवर्ग को सिक्त करती है, लेकिन काव्यानुवाद एक चुनौती है। अनुवाद विज्ञान के चिंतकों, विचारकों ने काव्यानुवाद की प्रक्रिया की दुरुहताओं को स्वीकारते हुए कहा है कि—
Samual Johnson—कविता का अनुवाद हो ही नहीं सकता।
Herbert Peyser—गीतों और गीति-नाट्यों का उत्कृष्ट अनुवाद असम्भव है।
Heine—कविता का अनुवाद करना ऐसा ही है जैसे रवि-रश्मियों को तृण-रज्जु में बांधना।

काव्यानुवाद की जटिलता के कारण ही कह सकते हैं कि अनुवाद परकाया प्रवेश की प्रक्रिया है। मामा वरेरकर कहते हैं कि—”लेखक होना आसान है किंतु अनुवादक होना अत्यंत कठिन है।“ कभी-कभी मुलनिष्ठता के चक्कर में अनुवाद बोझिल हो जाता है और कभी-कभी लक्ष्यभाषा में तरलता बनाए रखने के चक्कर में मूल की आत्मा कहीं छूट जाती है। ऐसे में अनुवादक के दायित्व दोहरे हो जाते हैं। सुशांत शर्मा जी ने अपने अनुवादक-व्यक्तित्व में कवित्व-शक्ति का नियोजन करते हुए विवेच्य अभिव्यक्ति को परोसा है। यहाँ अनुवाद की सफलता का एकमात्र हेतु अनुवादक में भावों को आत्मसात कर लेने वाली नैसर्गिक प्रतिभा है। इस अनुवाद(जिसे अनुसृजन कहना न्यायोचित है।) में विलियम जेराल्ड गोल्डिंग का वक्तव्य पूर्णतया घटित होता है। जेराल्ड कहते हैं कि—”सर्वांगपूर्ण अनुवाद भले ही न हो सके, पर अच्छे अनुवाद किए जा सकते हैं और कभी-कभी तो वे मूल से भी बेहतर हो सकते हैं।“
सुशांत शर्मा जी ने मूल कविता के शब्दों की ध्वनि और अर्थविधायी शक्तियों, अर्थच्छायाओं के लिए भोजपुरी के शब्दों को भावतरंगों से जूझकर चुन लिया है और उन्हीं शब्द-रत्नों को विदाई-गीत के लय में जड़ दिया है। यहाँ अनुवादक ऐसा सर्जक है जो भावों के आवेग का यात्री भर नहीं है अपितु सर्जना के इस आवेग में मूल कविता की आंधी-पानी से जूझता हुआ अभिव्यक्त हुआ है। यह संस्कृत कविता और उसका भोजपुरी अनुसृजन वस्तुतः संस्कृत-भोजपुरी की सामयिक मैत्री है। भोजपुरी की सामर्थ्य-शक्ति की प्रभावोत्पादकता बढ़ाने हेतु विदाई-गीत का लय चयनित है…। यह चयन काव्यानुवाद की चुनौतियों को निर्मूल कर रहा है। फ़िट्जजेराल्ड का अनुवाद संसार के सर्वश्रेष्ठ अनुवादों में परिगणित है। सुशांत शर्मा जी आज के फ़िट्जजेराल्ड हैं क्योंकि इन्होंने अनुवाद प्रक्रिया में भावों की सूक्ष्मतम-तरलता को संरक्षित रखते हुए भाषा के आवरण को परिवर्तित कर दिया है। यहाँ बौद्धिकता भावों द्वारा अनुशासित है।
अब मूल कविता का वैशिष्ट्य देखते हुए, अनुवाद की गुणवत्ता को परखते हुए कविता में आगे बढ़ना ही प्रासंगिक होगा। कविता की अगली कड़ी–
उत्थानाय समर्पितस्तव निजो देहोऽपि येषां पुरे
सम्प्रत्युद्धरणाय ते, किल करस्तेषामकिञ्चित्करः।
कर्तुं स्वर्गसुचारु जीवितगतिं येषां त्वया रौरवास्
सोढाः, सम्प्रति घस्मरां विषहसे तेषां जुगुप्सादृशम्॥२॥
इस अंश के विषय में मूर्धन्य विद्वान, आलोचक आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी जी लिखते हैं कि—“किल करस्तेषामकिञ्चित्करः में अनुप्रास और यमक दोनों विडंबना की सारी अभिव्यक्ति को तीव्रता देने का काम करते हैं।“ डॉ. बलराम शुक्ला का भाषान्तरण कुछ यूं बन पड़ा है—
जिन शहरी लोगों को उठाने में
तुमने अपना शरीर ही गिरवी रख दिया था
अब तुम्हें उबारने के लिए
उनके हाथ में ज़रा भी जुम्बिश नहीं
जिनकी ज़िन्दगी को स्वर्ग जैसा बनाने के लिए
तुमने रौरव जैसे नरक सहे थे
अब उन्हीं की घातक घृणा दृष्टि भी सह रहे हो तुम

इस प्रसंग के अनुवाद में अनुवादक सुशांत शर्मा जी के मन की पीर श्रमिकों को उनके वास्तविक मूल्य से अवगत कराती है। धनाढ्य की अयोग्यता उजागर है। उद्योगपति मानवीयता के निवर्हन में फेल हुए हैं, सड़क के किनारे… रेल की पटरियों के सहारे आगे बढ़ते(वापस लौटते) श्रमिक गौरवान्वित होने लगते हैं। अनुवादक का गीत रुदन बनकर फूटता है। मजदूर तुष्ट हैं कि वे शहर को पसीने से सींचकर, अपनी आयु-उत्साह-जोश से संवार कर लौट रहे हैं। इन दाता, अमीर श्रमिकों के समक्ष शहर कंगला दिखता है।
देहिया तोहर जब बन्हकी धराइल
बढ़लें सहरिया के लोग
हाय राम उहो नाहीं अब रहि गइलन
तोहर बिपत टारे जोग ।।
नरकि में रही जब गइलs तू भइलें
उनकर घर कबिलास
आजु काहे उनके नजरिया ना निरखे
तोहरा नयनवा के आस ।।

कवि डॉ. बलराम शुक्ल जी शहर की तंगदिली की परतें और भी उघारते हैं। शहर में बसकर मजदूर गाँव में भी छुट्टियों में ही मेहमान बनकर जाता है, लेकिन आज एक महामारी के आतंक में शहर की असलियत खुल गई है। यहाँ अंतिम प्रज्ज्वलन हेतु ‘चार बोझ चईला’ भी नहीं नसीब है, यहाँ चिरनिद्रा के लिए दो गज जमीन भी मयस्सर नहीं है। ऐसे शहर में मजदूर कमाने नहीं अपितु उसे बसाने-बढ़ाने-संवारने ही जाता है। यह कटु सत्य अनावृत है इस कविता में—

आपन्नस्य पुरे पुरस्तव करात् ग्रामोऽपि विभ्रश्यते
हित्वा दैवदरिद्र! नैजमुडुपं सच्छिद्रनौः सेविता।
आयातं सुखजीवनं मृगयितुं यस्यां नगर्यां त्वया
दुर्दैवादिह ते न वापि सुलभो मृत्युः प्रतिष्ठायुतः॥३॥

डॉ. बलराम शुक्ल जी का सहज बोधगम्य भाषान्तरण कुछ ऐसा बन पड़ा है—
तुम शहर में क्या फँसे
देखते देखते गाँव भी तुम्हारे हाथों से छूट गया
दुर्भाग्य के मारे तुम अपनी चप्पू छोड़कर
दूसरों के छेदों से भरे जहाज पर बैठ गए
जिस नगर में सुखी जीवन की खोज में आए थे तुम
विडम्बना है कि वहाँ तुम्हें इज़्ज़त की मौत भी नसीब नहीं

मुश्किलों के जेठ महीने में सुशांत शर्मा जी की भावधारा सांस लेते श्रमिकों के लिए ऐसी मरीचिका है, जिसमें सांस की आयु बढ़ती है। अपनत्व से विलग श्रमिकों को गीत का अपनापा जीवंत करता है… बुझती हुई आँखें टक्क से ताकने लगती हैं कि कोई है धरा पर अपना जिसे पता है श्रमिकों के जीवन का मोल। वापस लौटता मजदूर शहरी सुखों के छलावे को समझ चुका है, असल सुख बाह्य चाकचिक्यता नहीं अपितु अन्तस् का अपनापा ही है।
नगर के जाल में भइलs मछरिया
पानी जस छूटल गाँव
आपन डेंगिया तिआगि के चढ़लs
अनकर छेदल नाँव ।
कवन सपन देखि अइलs नगरिया
सुख के जिनिगिया के आस
जहवाँ इजतिया के मुअन मिलल नाहीं
सपना के जरलें लहास ।

डॉ. बलराम शुक्ल जी की अग्रिम पंक्तियां पढ़ते ही ‘तिरिछ’ कहानी याद आ गई। तिरिछ का काटा हुआ तो बच सकता है लेकिन शहरी संवेदनहीनता तिरिछ से भी अधिक जहरीली है। मजदूरों को मालिक की स्वार्थ में सीझी हुई आत्मीयता का यथार्थबोध करवाना कवि अपना दायित्व समझते हैं। कोरोना एक बहाना है, वास्तविकता बाज़ार की बस इतनी है कि वह येन-केन-प्रकारेण अपने बिजनेस को विस्तार देना ही चाहता है…! मजदूर बस शहर में पोषित हो जाता है यह पोषण ठीक वैसा ही होता है जैसे भोजनोपरांत आचमन के माध्यम से दुआरे का नीम सींच जाता है। जैसे नालियों के उगे लमेरा पौधे फलने लगते हैं। अब तक मजदूर इसे अपनी उन्नति समझता रहा था, लेकिन कवि ने मजदूरों के चक्षु को उन्मीलित कर दिया है–
नो बन्धुस्तरलान्तरोऽत्र सरलः, स्वामी खरो निष्ठुरः
पाल्यो न त्वमिहासि वा करुणया, शोष्योऽसि दासेरकः।
जानीहि क्षणतृष्णिकाहतमते दूरापकृष्टैष ते
नो ग्रामः परदुःखदुःखित इदं पाषाणपूर्णं पुरम्॥४॥

महदूरों के वास्तविक महत्त्व को सहज हिंदी में दर्शाता कवि का स्वकृत अनुवाद–
यहाँ तुम्हारे सरल तरल बन्धु नहीं
यहाँ तो हृदयहीन निठुर मालिक लोग विराजते हैं
यहाँ कोई दया से भर कर तुम्हारा पालन नहीं करेगा
तुम तो यहाँ सस्ते मजूर हो
दुर्भाग्य तुम्हें दूर ले आया, मृगतृष्णा ने तुम्हारी मति हर ली
ठीक से जान लो
संवेदनाओं से भरा गाँव नहीं है, ईंट पत्थरों से भरा शहर है यह

अनुवादक सुशांत शर्मा जी शहरी मालिकों की अपेक्षा पटीदारों में भी अपनापा पाते हैं। लोकलाज के भय से जलनखोर पटीदार भी हमदर्दी जता देते हैं लेकिन शहर ने किसी को रोकने की औपचारिकता भी नहीं निभाई। मजदूर चलते रहे दयालुता दिखाने वाले कुछ-कुछ बंटवाते रहे… । पीड़ा मिटी नहीं, बस छली जाती रही। रुपए से न रुपया बढ़ता है और न ही रोबोट हर कार्य कर सकता है। ये प्रवासी मजदूर एक तरफ उद्योगों को समृद्ध करते हैं तो दूसरी तरफ छोटे व्यवसाय भी भी इन्हीं के दम पर फलते फूलते हैं। दुश्मन बना भाई भी अंतिम समय में कांधा देने आ जाता है… लेकिन इस पलायन में मजदूर अपनी गृहस्थी की लाश स्वयं ही ढोते हुए बढ़ते रहते हैं। ये प्रसंग भविष्य के बच्चों, युवाओं को सचेत करते हैं। सुशांत शर्मा जी के गीत ढेबरी का उजाला हैं जिसमें पराएपन का डंक स्पष्ट दिखता है–
इहाँ नाहीं बसें रामा भाई पटिदरवा
निठुर मलिकवा हजार
कउड़ी से कीनल चाहेलें देहिया
दया माया नाहीं दरकार ।
कवन अभाग के पेरल मतिया
कवना सपनवा के फांस
पाथर नगरिया में तोहे लेइ अइलें
जहां नाहीं मनई के बास ।

कवि की कोमलता एक कठोर सत्य का साक्षात्कार करवाती है, जहाँ ‘माया मिली न राम’ की उक्ति ही चरितार्थ हुई है। शहर और गाँव दो ऐसे पाट हैं जिसमें श्रमिक शोषित ही हो रहा है। गाँव अपना नहीं रहा…. शहर ने अपनाया ही नहीं। इस कठोर सत्य को स्वीकार करके ही भावी पीढ़ी को अपना पथ चुनना होगा।
नो ग्रामश्चिरहापितस्तव वशे दूरं सुदूरे स्थितः
ग्रावीभूतमथो हितं न नगरं तुभ्यं चिराराधितम्।
नीचैर्नेतृभिरञ्चितो हतबलो देशो न दिष्टाय ते
विश्वे विष्वगपीह हन्त शरणं शीर्णस्पृहाणां न वः॥५॥
आदरणीय राधावल्लभ त्रिपाठी जी इस अंश पर कहते हैं कि—‘यहाँ एक नया आभाणक कवि ने रच दिया है। विश्वे विष्वगपीह हन्त शरणं शीर्णस्पृहाणां न वः – इस उक्ति में शीर्णस्पृह शब्द हमारे समय के दुःखद इतिहास के पृष्ठ खोल देता है।‘
कवि डॉ. बलराम शुक्ला जी स्वयं के भाषान्तरण में सुहृदसम्मित सत्य कह जाते हैं–
बहुत पहले जिसे छोड़ दिया था
वह गाँव अब तुम्हारी पहुँच से और भी दूर हो गया
सारी उमर जिसकी सेवा की
वह अहितकर शहर ही पत्थर हो गया
कमनज़र भ्रष्ट नेताओं से भरे
इस हतबल देश में तुम्हारा क्या भविष्य है?
टूटे सपने वाले तुम लोगों के लिए, हाय
सारे संसार में कहीं कोई सहारा नहीं

अनुवादक सुशांत शर्मा जी गाकर यथार्थबोध करवाते हैं, वे कहते हैं कि अपनी माटी से विलग जिंदगी को शहर में कोई आधारभूमि नहीं मिलती। चाकरी में जिंदगी त्रिशंकु की तरह झूलती रहती है। शहरी अन्तस् मोरंग है जो उम्र और जोश को सोख लेता है उसमें माटी की महक दुर्लभ है। एकबार जवार छोड़ दिया तो सुख नसीब से उकठ जाता है। यहाँ भाव यह है कि सुख के लिए भटकने से अच्छा है कि अपनी जमीन पर ही रहते हुए सुखों का सृजन किया जाय तभी बेहतरी है। पलायन के परिणामस्वरूप बहुत कुछ सीखने को भी मिलता है। शहर की चाकरी से भली गाँव की खेती-बारी है। पेट भर सकता है नींद आती रहती है। रंगीन कपड़ों और दिखावे के जूते-चश्मे-हैट से मुक्त रहना ही श्रेयस्कर है।
तोहरे तिआगल गउवां जे भइलें
तोहरे नजरिया से दूर
बजर के छतिया भइल उ नगरिया
जहां जाइ बनलs मजूर ।
राज रजायसु आन्हर देस के
कँहवाँ बा नवल बिहान
टूटल सपनवा मजूरवा रे भइया
सुखवा के मिले ना ठेकान ।।
इस कविता पर आदरणीय राधावल्लभ त्रिपाठी जी की समीक्षात्मक टिप्पणी इस प्रकार है– बलराम जी संस्कृत की अकूत शब्दसंपदा का साधिकार दोहन करते हैं, घस्मरां विषहसे तेषां जुगुप्सादृशम, वस्तुं तत्र न ते दिनानि कतिचित् कोणोऽपि वास्तूयते, देशो न दिष्टाय ते, दासेरकः, ग्रावीभूत – इत्यादि उनकी पदावली में प्राचीन काव्यों के बंध और दुर्लभ शब्द अर्थगौरव के साथ नवप्रतिष्ठाप्राप्त करते हैं। यह एक परिदेवन काव्य है, परिदेवन या अफसोस प्रकट करने के भाव से आगे इसमें कविता नहीं जाती – यह इसकी सीमा भी है।“
डॉ. बलराम शुक्ल ने इस कविता में भविष्य को एक दिशा दी है। यह कोरोना-काल सदैव नहीं रहेगा, जब यह इतिहास बनकर पन्नों में दर्ज हो जाएगा तब फिर कोई नई इंसानी पौध रोजगार के लिए पलायन के क्रूर सत्य को इसी कविता में देख पाएगी। यहाँ छोटे शहरों , कस्बों, गाँवों को छोड़ने के विकल्प का वर्जन ध्वनित है। यह कविता रोजगार के लिए गाँवों में ही राह तलाशने के मर्म सिखाने वाली है। आजादी के बाद देश की अर्थव्यवस्था नेहरू-नीति पर आगे बढ़ी। वैश्विक मंदी के अत्यधिक प्रभाव से ग्रसित भारत में अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह जी ने 1991 नई आर्थिक नीति लागू की। उदारीकरण, वैश्वीकरण, निजीकरण की यह नीति देश की डूबती अर्थव्यवस्था को बचा तो लेती है लेकिन इस नीति में ‘ग्रामीण-स्वराज’ की अवधारणा उपेक्षित रह जाती है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने देश मे जगह बनाईं, चौबीस घण्टे काम करने वाले सस्ते लेबर बड़ी ही सहजता से महानगरों में बढ़ने लगे। बित्ते भर के घर में पूरा परिवार समाने लगा….., गाँव उजाड़ हो गए। ऐसे में कोरोना-प्रकोप ने बाज़ारवादी लाभ की नीति को उजागर करके श्रमिकों का पथ प्रदर्शित किया है। कोरोना-काल के अवसान के बाद देश एक नए ढांचे में आकारित होगा। जब अर्थव्यवस्था सुधार की दिशा तय करेगी तब पुनः मजदूरों का प्रवास न आरम्भ हो इसलिए यह कविता मानवीय चेतना को जाग्रत रखेगी। स्थानीय स्तर पर ही रोजगार निर्मित करना होगा। स्थानीय लोगों द्वारा छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना होगा। आपसी भावनात्मक सहयोग से गाँव आत्मनिर्भर बनने लगेंगे। आत्मीयता में बेगारी करवा लेने की मनोवृत्ति से ऊपर उठना होगा। हस्तशिल्प की कद्र की जाए तो गाँव अच्छे उत्पादक सिद्ध होंगे। टोमैटो सॉस की जगह टमाटर के सलाद के माहात्म्य को समझकर हम जड़ों से जुड़े रह सकते हैं। रंगीन पन्नी में छिपी बाजार की जादूगरनी के आकर्षण से मुक्त होकर देशी बन जाने का यही सही समय है। मजदूरों का पलायन बाज़ारवादी संस्कृति का यथार्थबोध करवाने में पूर्ण समर्थ है। इस कविता में भीगकर… परिवेदना के ताप में पिघलकर… अफसोस करने बाद अपनी सांस्कृतिक चेतना, समष्टिगत सुख-दुःख वाले भाव को पुनः पाने के लिए सजग हो जाना ही डॉ. शुक्ल की विदग्धता का प्रयोजन है।
हाल ही में मैंने डॉ. बलराम शुक्ल के शोध पढ़े हैं, जिसके आधार पर मैं कह सकती हूँ कि डॉ. शुक्ल एक भाषाविद् के साथ ही एक उत्कृष्ट शोधार्थी, अच्छे अध्येता और समाज को दिशा देकर मूल से जोड़ देने वाले कवि ही नहीं अपितु सामयिक परिप्रेक्ष्य में एक कुशल आर्थिक सलाहकार भी हैं। डॉ. बलराम शुक्ल जी की मूल कविता व्यापक जनसमुदाय को सिक्त करने में प्रभुसम्मित है जिसे संस्कृत से अनभिज्ञ नहीं बूझ सकता लेकिन संस्कृतज्ञ द्रवित हुए बिना नहीं रह सकता। डॉ. शुक्ल का स्वकृत अनुवाद सुहृदसम्मित है जो अवबोधन के दायरे को विस्तार देता है…! संस्कृतेतर भी समझने लगते हैं कि सीमित पाठ्यक्रम, कर्मकांड और पूजा से इतर भी संस्कृत है, जो संवेदनाओं को उदीप्त करती है। सुशांत शर्मा जी द्वारा विरचित गीत जोकि वस्तुतः अनुवाद है, उसमें मौलिकता की महक है। यह अनुसृजन कांतासम्मित यथार्थबोध करवाते हुए, अंचरा से आंस पोंछने का सामर्थ्य रखता है।
कवि, अनुवादक और मूल कविता के समीक्षक आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी जी को अशेष साधुवाद, जिनके आश्रय में मेरी विवेचना निःसृत हुई…! संवेदनाएं विजयिनी होती रहें यहीं मानवीयता की जय है।

डॉ. कल्पना दीक्षित

सत्यसन्ध प्रभु

वेदान्तदेशिक (१२६८–१३६९ ई॰) पर बनी एक सुन्दर तमिळ फ़िल्म में उनके द्वारा रचित प्राकृत स्तुति काव्य अच्युत–शतक से एक सुन्दर स्कन्धक की प्रस्तुति की गई है। उसका मूल और संस्कृत च्छाया, हिन्दी तथा Sushant Kumar Sharma जी के उज्ज्वल भोजपुरी (सवैया) अनुवाद के साथ प्रस्तुत है-

मुहचन्दमोलिदिणअरमज्झठिओ तुज्झ चिहुरभारंधारो।
अघडिअघडणासत्तिं सच्चं ठावेइ दाससच्च समग्गं॥३४॥
(मुखचन्द्रमौलिदिनकरमध्यस्थितो तव चिकुरभारान्धकारः।
अघटितघटनाशक्तिं सत्यं स्थापयति दाससत्य समग्रम्॥)

भक्तों के लिए हे सत्यसन्ध प्रभु,
तुम्हारे मुख चन्द्र और मुकुट रूपी सूर्य के बीच
तुम्हारे केशों का अन्धकार स्थितिमान् है।
यह (असम्भव) घटना
स्वयम् ही असम्भव को सम्भव बनाने वाली
तुम्हारी क्षमता को
सत्यापित करती है।

अनुवाद के लिए लिया गया सवैया भले ही मूल स्कन्धक से बड़ा छन्द हो लेकिन सहृदय अनुवादक ने एक भी शब्द रस के विरूद्ध नहीं लिया है बल्कि अनुवाद में ‘हेमकिरीट’ तथा ‘राति’ आदि शब्द डालकर कविता को स्पष्ट और सुन्दर बना दिया है –

“हेम किरीट लसै सिर ऊपर सोहत सूरुज कै छवि नाईं
सोहत हे सतसंध! तोहार छबी मुख के जस चन्द जुन्हाई
बीच उभै रवि चंद के राति सों नाथ लसै कच के करिआई
नाथ असम्भव सम्भवकारन साबित बा छमता प्रभुताई ।।”