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Sanskrit Grammatical Tradition of the Jainas

A paper dealing with 1500 years long tradition of formulating grammatical rules by the Jain scholars, titled “जैन संस्कृत व्याकरण परम्परा” has been published in Sambodhi (Indological Research Journal of LDII) XL volume. Almost all the Jain grammarians with their special features with an account of general characteristics of Jain Sanskrit Grammar,have been discussed here. The paper can be seen or downloaded from the following link-
https://www.academia.edu/…/Sanskrit_Grammatical_Tradition_o…

 

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प्रेमवैदग्धी

 

प्रेमवैदग्धी

स्तिमिता तनुकप्रसरा स्वल्परवा नववधूरिव सलज्जा।
अकथं कथमपि रसतां क्वापि स्मायाति याऽतिचाटुशतैः॥

सैव तु सम्प्रति मां प्रति कविता नवरसविशेषसन्नद्धा।
मधुरवर्णातिरुचिरा सुगुणा प्रचुरोज्ज्वलाभरणा॥

अनुदिनमनुगुणरीतिं ध्वनयन्ती छन्दसाऽप्यशेषेण।
प्रोषितमुदीक्षमाणा भावं धत्ते सुमध्यानाम्॥

अनुधावामि स्म पुरा कविताकान्तां विटप्रभो मुग्धाम्।
मह्यं प्रगल्भते सा प्रौढा प्रेम्णोऽधुना मधुना ॥

प्रेमाग्नेर्वैदग्धीमवलोकय योऽप्यदग्धदहनेन।
उभयमपि पक्षमच्छैरनुरागैरुज्ज्वलं तनुते॥

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A Sanskrit poem of mine published in Sanskrit-ShreeH. Sharing with its Hindi translation-

प्रेम की दक्षता

कविता, पहले नयी–नवेली दुल्हन की तरह थी
सिमटी सी, ठिठकी सी, लजीली जिसकी ध्वनि कभी कभी सुनाई दे जाती थी।
जो हज़ार मिन्नतों के बाद कभी, कहीं और किसी तरह रस्यता को प्राप्त हो पाती थी।
वही कविता वनिता अब मेरे लिए नवों रसों (अथवा ताज़ा रसों) को लेकर तैयार,
मधुर वर्णों के नाते अत्यन्त रुचिकर, सद्गुणों का प्रदर्शन करती हुई
पर्याप्त उज्ज्वल अलंकारों से सजकर, मनोऽनुकूल रीतियों से ध्वनित होती हुई
सारे छन्दों की लोच अपने अन्दर समोए हुए
प्रतिदिन मध्यमा (या, सुन्दर मध्य भाग वाली) नायिका की तरह
उत्कण्ठा में भर कर मेरी राह तकती रहती है
जैसे प्रोषितपतिका अपने परदेसी पति का इन्तज़ार करती हो
जिस मुग्धा कविता कामिनी के पीछे पहले मैं एक रसिक लम्पट की तरह भागा करता था
प्रेम की मदिरा के प्रभाव से अब वही मुझसे प्रौढा की तरह प्रगल्भताएँ करती है
प्रेम की आग की कुशलता देखो, जो अदग्ध दहन के द्वारा
दोनों पक्षों को अनुराग से प्रदीप्त करके उज्ज्वल बना देती है।

विगत सप्ताह महाराष्ट्र केसरी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के बहु–आयामी व्यक्तित्व पर सोमैया भारतीय संस्कृति विद्यापीठ द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन (३–५ दिसं॰) में “Tilak’s view on the Antiquity of the Vedas” विषय पर मैंने एक शोध पत्र प्रस्तुत किया। तिलक महाराज के आश्चर्यजनक रीति से विविधमुखी व्यक्तित्व पर अनेक विशेषज्ञ विद्वानों ने अपने शोधपूर्ण वक्तव्य दिये।

RUMI by a HINDI

 

 

Two ghazals of Rumi with their Hindi translation were presented in the department of psychology in Gorakhpur University on 22.11.17. Video by- Abhijit Mishra.

नज़्दे कसी[1]

مولوی » دیوان شمس » غزلیات

دلا نزد کسی بنشین که او از دل خبر دارد
به زیر آن درختی رو که او گل‌های تر دارد
در این بازار عطاران مرو هر سو چو بی‌کاران
به دکان کسی بنشین که در دکان شکر دارد
ترازو گر نداری پس تو را زو رهزند هر کس
یکی قلبی بیاراید تو پنداری که زر دارد
تو را بر در نشاند او به طراری که می‌آید
تو منشین منتظر بر در که آن خانه دو در دارد
به هر دیگی که می‌جوشد میاور کاسه و منشین
که هر دیگی که می‌جوشد درون چیزی دگر دارد
نه هر کلکی شکر دارد نه هر زیری زبر دارد
نه هر چشمی نظر دارد نه هر بحری گهر دارد
بنال ای بلبل دستان ازیرا ناله مستان
میان صخره و خارا اثر دارد اثر دارد
بنه سر گر نمی‌گنجی که اندر چشمه سوزن
اگر رشته نمی‌گنجد از آن باشد که سر دارد
چراغست این دل بیدار به زیر دامنش می‌دار
از این باد و هوا بگذر هوایش شور و شر دارد
چو تو از باد بگذشتی مقیم چشمه‌ای گشتی
حریف همدمی گشتی که آبی بر جگر دارد
چو آبت بر جگر باشد درخت سبز را مانی
که میوه نو دهد دایم درون دل سفر دارد

१. दिला नज़्दे कसी बेन्शीन् कि ऊ अज़ दिल ख़बर दारद
बे नज़्दे आन् दरख़्ती रौ कि ऊ गुल–हा ए तर दारद
२. दर् ईन बाज़ारे अत्तारान् मरौ हर सू चु बीकारान्
बे दुक्काने कसी बेन्शीन् कि दर् दुक्कान् शकर दारद
३. तराज़ू गर न दारी पस तुरा ज़ू रह ज़नद हर कस
यकी क़ल्बी बे–आरायद तू पिन्दारी कि ज़र दारद
4. तुरा बर दर निशानद ऊ ब तर्रारी कि मी आयद
तु मन्शीन मुन्तज़िर बर दर कि आन् ख़ाने दो दर दारद
5. बे हर दीगी कि मी जूशद म–यावर कासे ओ म–न्शीन्
कि हर दीगी कि मी जूशद दरून् चीज़ी दिगर दारद
6. न हर किल्की शकर दारद न हर ज़ीरी ज़बर दारद
न हर चश्मी नज़र दारद न हर बह्री गुहर दारद
7. बेनाल ऐ बुलबुले दस्तान्! अज़ीरा नाले ए मस्तान्
मियाने सख़रे ओ ख़ारा असर दारद असर दारद
८..बेनेह सर गर न मी गुंजी कि अन्दर चश्मे ए सूज़न
अगर रिश्ते न मी गुंजद अज़् आन् बाशद कि सर दारद
९. चराग़–स्त ईन् दिले बीदार् बे ज़ीरे दामन–श मी दार
अज़् ईन् बाद् ओ–हवा बुग्ज़र हवाय–श शूर ओ शर दारद
१०.चु तू अज़ बाद बुग्ज़श्ती मुक़ीमे चश्मे ई गश्ती
हरीफ़े हमदमी गश्ती कि आबी बर जिगर दारद
१. चू आब–त बर जिगर बाशद दरख़्ते सब्ज़ रा मानी

कि मीवे नौ दहद दाइम दरूने दिल सफ़र दारद
२१– सत्संगतिः कथय किं न करोति
१. ऐ दिल, तू ऐसे किसी के पास बैठ जिसे दिलों की ख़बर हो।

तू किसी ऐसे पेड़ के पास जा, जिसमें तरो–ताज़ा फूल लगे हों।
२. इन पंसारियों की दुकानों के चारों ओर फ़िज़ूल लोगों की तरह मत भटक।

तू उसकी दुकान पर बैठ जिसकी दुकान में शक्कर हो, मधु हो।
३. अगर तुम्हारे पास (विवेक रूपी) तराज़ू नहीं हुआ तो इस बाज़ार में तुम्हें कोई भी, कभी भी ठग लेगा।

खोटा सिक्का सजा बजा कर, कोई भी तुम्हारे पास ले आयेगा, और तुम्हें लगेगा– कि ये सोना है।
४. तुमको वह चालाकी से दरवाज़े पर बैठा देगा कि “बैठो, मैं अभी आया”।

तुम दरवाज़े पर उसे निहारते मत रह जाना, क्योंकि उसके घर में दो दरवाज़े हैं।
५. हर उबलते हुए कड़ाहे के पास अपनी भीख की कटोरी लेकर न बैठ जाना

क्योंकि हर पकते हुए कड़ाहे में ज़रूरी नहीं कि तुम्हारी मनचाही चीज़ ही पक रही हो।
६. हर गन्ने में शक्कर नहीं होता, हर पस्तियों के साथ उठान नहीं लगी होती।

हर आँख के पास नज़र नहीं होती और हर समन्दर में मोती नहीं हुआ करते।
७. पुकार ‍ऐ सुरीली कोयल पुकार! क्योंकि प्रेम में डूबी हुई पुकार का असर-

पत्थरों पर भी हो जाता है।
८. अगर (प्रेम के राज्य में) तुम्हारा गुज़र नहीं हो पा रहा है तो अपना सर झुका कर प्रवेश करने की कोशिश करो।

क्योंकि अगर धागे के सिर पर गाँठ हुई तो वह सुई की आँख में नहीं घुस पाता।

९. यह जागृत हृदय दिये की तरह होता है। इसे अपने आँचल में छिपाकर रखो।

इच्छाओं की हवा से बच कर निकल जाओ। क्योंकि ये हवाएँ इस हृदय में उपद्रव और ख़राबी पैदा
कर देती हैं।
१० .अगर तुम इस हवा से बच कर निकल गये तो समझो कि जीवन स्रोत के पास तुमने घर बना लिया ।

और फिर उस प्रिय के साथ लग गये जो जिसके हृदय में रस ही रस है।
११.जब तुम्हारा हृदय भी सरस हो जायेगा तो तुम भी उस हरे भरे पेड़ की तरह हो जाओगे–
जो कि हमेशा फल देता है और अपने अन्दर ही अन्दर सफ़र करता रहता है।

[1] छन्द व्यवस्था – । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ

९३– हिकायती[1]

شنیدم کاشتری گم شد ز کردی در بیابانی بسی اشتر بجست از هر سوی کرد بیابانی
چو اشتر را ندید از غم بخفت اندر کنار ره دلش از حسرت اشتر میان صد پریشانی
در آخر چون درآمد شب بجست از خواب و دل پرغم برآمد گوی مه تابان ز روی چرخ چوگانی
به نور مه بدید اشتر میان راه استاده ز شادی آمدش گریه به سان ابر نیسانی
رخ اندر ماه روشن کرد و گفتا چون دهم شرحت که هم خوبی و نیکویی و هم زیبا و تابانی
خداوندا در این منزل برافروز از کرم نوری که تا گم کرده ی خود را بیابد عقل انسانی
شب قدر است در جانت چرا قدرش نمی‌دانی تو را می‌شورد او هر دم چرا او را نشورانی
تو را دیوانه کرده‌ست او قرار جانت برده‌ست او غم جان تو خورده‌ست او چرا در جانش ننشانی
چو او آب است و تو جویی چرا خود را نمی‌جویی چو او مشک است و تو بویی چرا خود را نیفشانی

१. शुनीदम क्,उश्तुरी गुम शुद ज़ कुर्दी दर बयाबानी
बसी उश्तुर बजुस्त् अज़ हर सुई कुर्दे बयाबानी
२. चू उश्तुर रा न दीद अज़् ग़म बेख़ुफ़्त् अन्दर किनारे रह
दिल–श अज़ हसरते–उश्तुर, मियाने सद परीशानी
३. दर् आख़िर, चून् दर् आमद शब, बेजस्त अज़ ख़ाब् ओ दिल पुर ग़म
बर् आमद गू ए मह् ताबान्, ज़ रू ए चर्ख़े चौगानी
४. बे नूरे मह बेदीद् उश्तुर, मियाने राह इस्तादे
ज़ शादी आमद–श गिरिये बेसाने अब्रे नैसानी
५. रुख़् अन्दर माहे रौशन कर्द् ओ गुफ़्ता–चून् देहम शर्ह–त
कि हम ख़ूबी ओ हम नीकी ओ हम ज़ीबा ओ ताबानी
६.ख़ुदावन्दा! दर् ईन् मंज़िल, बर् अफ़रूज़् अज़ करम नूरी
कि ता गुम कर्दे ए ख़ुद रा बियाबद अक़्ले–इन्सानी
७.शबे क़द्र–स्त दर जान–त चेरा क़द्र–श नमी दानी
तु–रा मी शूरद् ऊ हरदम, चेरा ऊ–रा न शूरानी
८. तु–रा दीवाने कर्दे–स्त् ऊ, क़रारे जान्–त बुर्दे–स्त् ऊ
ग़मे जाने तू ख़ुर्दे–स्त् ऊ, चेरा दर जान्–श न निशानी
९.चू ऊ आब–स्त तू जूई, चेरा ख़ुद रा न मी जूई
चू ऊ मुश्क–स्त् ओ तू बूई, चेरा ख़ुद रा न अफ़्शानी

९३– एक कहानी
१. मैंने सुना है कि एक चरवाहे का ऊँट रेगिस्तान में खो गया था
उस रेगिस्तानी चरवाहे ने अपने ऊँट को चारों ओर खूब खोजा
२. जब उसको ऊँट कहीं नहीं मिला तो बेचारा दुखी होकर रास्ते के किनारे सो गया
ऊँट की चिन्ता में उसका दिल सैकड़ों परेशानियों से घिर गया था
३. अन्ततः, जब रात आयी तो वह दुखी दिल लेकर नींद से उठा
तब तक चौगान के मैदान जैसे आसमान में गेंद की तरह चमकता चाँद निकल आया था
४. चाँद के प्रकाश में उसने देखा कि उसका ऊँट रास्ते के बीच में खड़ा है
ख़ुशी के मारे वह बरसाती बादलों की तरह रो पड़ा
५. उसने अपने चेहरे को चाँद की ओर उठाया और बोला–मैं तुम्हारी प्रशंसा कैसे करूँ
तुम अच्छे भी हो, भले भी हो, सुन्दर भी हो और चमकदार भी हो
६. हे परमेश्वर, हम लोगों पर भी अपनी कृपा की वह रौशनी फैला दो
ताकि, हम मनुष्यों की बुद्धि भी अपना खोया हुआ स्वरूप पा जाए
७. तुम्हारी आत्मा के अन्दर एक उजियारी रात है, तुम उसकी क़ीमत क्यों नहीं समझते?
वह तुम्हें निरन्तर उत्तेजित करती रहती है, तुम उसके संकेतों को क्यों नहीं जान पाते?
८.तुमको उसने दीवाना कर डाला है, तुम्हारे प्राणों का चैन उसने छीन लिया है
तुम्हारे प्राणों के दुखों की चिन्ता है उसको, तुम उसको अपने प्राणों में बिठा क्यों नहीं लेते?
९.अगर तू धारा है तो वह तुम्हारा जल है, तुम अपने आप की खोज क्यों नहीं करते?
अगर वह कस्तूरी तो तुम गन्ध हो, तो तुम अपने आप को फैला क्यों नहीं देते?

[1] छन्द व्यवस्था– । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ

संस्कृतश्रियः नवे‍ऽङ्के प्रकाशमासादितेयम् कविता। छन्दश्चात्र प्रयुक्तम् वस्तुतः पारसीकस्य परन्तु

तदत्यन्तं साम्यम् उपेन्द्रवज्रया वहति। नीचैः तदीयं विवरणं प्रदत्तम्।

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अनेकजन्मस्वनेकनारीकठोरवक्षोजपीडनेन।

न सम्प्रतीमेऽपि भङ्गुरत्वं गता अहो वासनानखाग्राः॥

रवीन्दुबिम्बोज्ज्वलाननानां सहस्रवर्षाणि चाङ्गनानाम्।

निविष्टदृष्टेर्मुखे मुखे तेऽधुनापि मोहाक्षिणी क्षते नो! ॥

गरिष्ठभोगैर्विदूनकुक्षौ युगानि देहे सुदृष्टहानिः।

तवात्र जिह्वाधुनापि लालारसार्द्रतां याति भोगदृष्टौ॥

प्रतारितो लक्षशः सहस्रप्रकारमाभर्त्सितोऽपि ताभिः।

विहाय मानं प्रयासि पश्चात्पुनः पुनर्नीच कामिनीनाम्॥

 

रसाय कस्मै स्पृहावतस्तेऽधरामृतानां परीक्षणानि।

कमीहसेऽवाप्तुमाप्तकामं प्रमत्तवद् हिण्डसे दिशासु॥

विशिष्टवर्णं कमाप्तुकामः कपोलपालीर्विलोकसेऽलम्।

न वर्तते यस्तवान्तरङ्गे मयूरबर्हप्रभाप्रमोषे॥

सुगन्धमाघ्राय पद्मिनीनां विमुह्य बद्धो द्विरेफकल्पः।

स्वकीयहृत्पद्मसौरभैश्चेदयेऽभविष्यस्तु संस्तुतस्त्वम्॥

प्रघूर्णनं केन सर्गमूले तवाहितं येन बंभ्रमीषि।

निरन्तरं वर्धते गतिस्तेऽनुजन्म भोगाय सा दुरन्ता॥

असौ तृषा केन धुक्षिता ते प्रकृष्यसे तासु तृष्णिकासु।

न तृप्तये नो रताय यासां नु जीवहारीणि चेष्टितानि॥

मनो मनाक् पश्य ते मनोजस्त्वदङ्गजातोऽपि बाधते त्वाम्।

भवन्ति वाच्या ध्रुवं य एव स्वसन्ततीर्नैव शिक्षयन्ते॥

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छन्द

इस पद्य में प्रयुक्त छन्द मूलतः फारसी का है। इसकी गणव्यवस्था है–

मफ़ाइलुन् फ़ाइलुन् फ़ऊलुन् ।

इसे अगर भारतीय छन्दःशास्त्र की दृष्टि से देखें तो गणव्यस्था हो सकती है–

जभान ताराज राजभा गा (।ऽ। ऽऽ। ऽ।ऽ ऽ)

इसका नाम फ़ारसी छन्दःशास्त्र के अनुसार – “मुतक़ारिब मुसम्मन मक़बूज़ असलम मुज़ाइफ़” है

इस छन्द में छठे अक्षर के बाद एक लघु जोड़ देने से यह उपेन्द्रवज्रा में परिवर्तित हो जाता है। इसी प्रकार अगर हम उपेन्द्रवज्रा के छठें (लघु अक्षर) का लोप कर दें तो यह छन्द प्राप्त हो जाता है–

उदाहरण के लिए–

त्वमेव माता पिता त्वमेव (संस्कृत छन्द) –––––– त्वमेव माता पिता त्वमेव (फ़ारसी छन्द)

भारतीय आधुनिक छन्दःशास्त्रियों ने इसे सम्मिलित करने का प्रयास किया है। पुत्तूलाल शुक्ल ने इसका नाम विहंग[2] रखा है तथा इसे संस्कृत वृत्त जलोद्धतगति[3] का मात्रिक संस्करण माना है । प्राचीन संस्कृत साहित्य में इस छन्द का प्रयोग नहीं मिलता। आधुनिक कवियों ने संस्कृत ग़ज़लों में इस छन्द का प्रयोग किया है। तथा इसका नाम नवीन लक्षण ग्रन्थों में यशोदा रखा है[1]। संस्कृत के प्रायः पहले ग़ज़लकार भट्ट मथुरानाथ शास्त्री से एक उदाहरण प्रस्तुत है–

न याहि लावण्यगर्वितानाम् उपान्तदेशं सखे मनो मे ।

अयेऽवधानेन पालयेथा इमं निदेशं सखे मनो मे ॥ (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री)

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                            (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री)

फ़ारसी तथा उर्दू में इस छन्द का सर्वदा वार्णिक रूप ही देखा गया है लेकिन संस्कृत कवियों ने इसके मात्रिक रूप का प्रयोग भी किया है। उदाहरण के लिए आधुनिक कवियों में से जगन्नाथ पाठक तथा रमाकान्त शुक्ल के ग़ज़लों के उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं––

स्थिरे प्रवाहे तरन्ति मन्ये समे किशोराः समे युवानः।

सुपिच्छिले पथि पतन्ति मन्ये समे किशोराः समे युवानः॥ (समे किशोराः समे युवानः: जगन्नाथ पाठक)

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                                       (स्वर्गीय जगन्नाथ पाठक)

सरस्वतीपादपद्मसेवा यदीयमास्ते परं हि लक्ष्यम्।

बुधाग्रगाणामतन्द्रितानां मदीयकविते कुरुष्व गानम्॥ (मदीयकविते कुरुष्व गानम् : रमाकान्त शुक्ल)

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                     (श्री रमाकान्तशुक्ल काव्यपाठ करते हुए)

ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्राचीन फ़ारसी कवियों के यहाँ इस छन्द का प्रयोग देखने को नहीं मिलता। ईरान के कवियों की अपेक्षा भारतीय फ़ारसी कवियों ने इस छन्द का अधिक प्रयोग किया है। बहुत अधिक सम्भावना है कि फ़ारसी कविता के भारतीय सम्प्रदाय (सब्के हिन्दी) से सम्बद्ध कवियों ने इसकी ईजाद उपेन्द्रवज्रा की धुन से की हो। उदाहरण के लिए भारतीय फ़ारसी कवि बेदिल देहलवी ने इस छन्द का प्रयोग निम्नोक्त कविता में किया है–

बेदिल

                       (महाकवि बेदिल की समाधि, बाग़े बेदिल–दिल्ली में)

ज़ही ब शोख़ी बहारे नाज़त शिकस्ता रंगे ग़ुरूरे इम्कान्

दो नर्गिसत क़िब्लागाहे मस्ती दो अब्रुयत सज्दागाहे मस्तान्

सुख़न ज़ लाले तो गौहर् आरा निगह ज चश्मे तो बादा पैमा

सबा ज ज़ुल्फ़े तो रिश्ते बर पा चमन ज़ रूये तो गुल ब दामान्

ब गम्ज़ा सहरी ब नाज़ जादू ब तुर्रा अफ़सून् ब क़द क़यामत

ब ख़त बनफ़्शा ब ज़ुल्फ़ सुम्बुल ब चश्मे नर्गिस ब रुख़ गुलिस्तान्

चमन ब अर्ज़े तो बहारे नाज़त दर् आतशे रंगे गुलफ़रोशी

सहर ज़ गुल करदने अरक़हा ब आलमे आबे सुम्बुलिस्तान्

मताब रूये वफ़ा ज़ बेदिल मशौ ज मजनूने ख़ीश ग़ाफिल

ज दस्तगाहे शहान् चि नुक़सान् ज़ पुर्सिशे हाले बी नवायान्

 

इस ग़ज़ल का इसी छन्द में अनुवाद करने का प्रयत्न मैंने संस्कृत में किया है। यद्यपि बेदिल के भावों की परम गम्भीरता इसमें नहीं आ पायी है। आख़िर बेदिल तो अबुल् मआनी (अर्थ विच्छित्ति के पिता) ठहरे। अनुवाद इस तरह है–

        निःस्वलोकवार्तम्

अहो सलीलं त्वदीयहावो जहार सम्भावनाभिमानम्।

दृशोर्युगं ते मदस्य भूमिर् भ्रुवोर्युगं तेऽसिलौहशालम्॥

रदच्छदाद् वाक् सुमौक्तिकश्रीर् दृशोः कटाक्षाश्च मत्तमत्ताः।

तवालकैर् बद्धपात् समीरः सुमं च वाट्यां तवाननोत्थम्॥

दृशेन्द्रजालं तथैव भ्रूर्भ्यां च कार्मणं यातु केशपाशैः ।

मुखेन वाटी शशी कपोलैर् विभाति सा चक्षुषा सरोजम्॥

मुखेन ते दर्पणं सुवाटी निशा तव स्कन्ध एष केशैः ।

वचोऽमृतैस्ते गृहं द्युलोको विचित्रितं ब्रह्मणो विधानम्॥

दयादृशं मा विदूरयास्माद् उपेक्ष्यतां नो निजानुरागी।

नृपस्य हानिर्न जायते यत् पिपृच्छिषेन् निःस्वलोकवार्तम्॥

 

 

 

[1]जगौ यशोदा (छन्दःप्रभाकर–पृष्ठ १२०)

[2]आधुनिक हिन्दी में छन्दयोजना पृ॰ २६७

[3]जसौ जसयुतौ जलोद्धतगतिः – वाग्वल्लभ पृ॰१८७

हलचल

डॉ. बलराम शुक्ल प्रताप नारायण युवा साहित्यकार सम्मान से सम्मानित

  • काव्य डेस्क, नई दिल्ली (अमर उजाला)

साहित्यकार डॉ. बलराम शुक्ल को प्रतिष्ठित भाऊराव देवरस सेवा न्यास ने वर्ष 2017 के पंडित प्रताप नारायण युवा साहित्यकार सम्मान से नवाजा है। संस्कृत भाषा और साहित्य में मौलिक रचनात्मकता के लिए यह सम्मान विधानसभाध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित ने उत्तर-प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ में सोमवार को आयोजित कार्यक्रम में प्रदान किया।

राप्तीनगर के रहने वाले डॉ. शुक्ल मूल रूप से महराजगंज के भिटौली बाजार कस्बे के समीप सोहरौना राजा गांव के रहने वाले हैं। इनकी प्राथमिक शिक्षा यहीं से हुई है। पिता रामचंद्र शुक्ल जूनियर हाई स्कूल महराजगंज के अवकाश प्राप्त शिक्षक हैं। सम्मानित होने की खबर को सुनकर उनके आवास पर गुरुजनों, शुभचिंतकों के बधाई देने का तांता लगा रहा।

बचपन से ही मेधावी डॉ. शुक्ल ने गोरखपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से संस्कृत और फारसी साहित्य में परास्नातक किया। दोनों विषयों में यूनिवर्सिटी टॉप करने पर डॉ. सीडी देशमुख पुरस्कार प्राप्त किया। डॉ. शुक्ल संस्कृत तथा फारसी दोनों भाषाओं के कवि हैं। इन्होंने ईरान के विश्व कविता समारोह में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। विविध सांस्कृतिक प्रसंगों में वे आठ बार ईरान की आमंत्रित किए गए हैं।

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The paper, which swallowed all my summer vacation days, is out. “Rumi’s Philosophical Rendering of Ethical Stories of Panchatantra”(रूमी की कीमियागरी :पंचतन्त्र की नैतिक कहानियों का आध्यात्मिक संस्करण) published in the recent number of prestigious Hindi Journal of CSDS ( Centre for the studies of developing societies)प्रतिमान. The प्रतिमान aims at decolonizing the knowledge construction. The PDF file of the paper can be downloaded from the following link –

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रूमी की कीमियागरी : पञ्चतन्त्र की नैतिक कथाओं का आध्यात्मिक संस्करण

                                                              –बलराम शुक्ल (दिल्ली विश्वविद्यालय)

 

शब्द, प्रतीक, कहानियाँ एवम् विचार समय के प्रवाह में सर्वत्र भ्रमण करते हुए मानवीय संस्कृति एवं सभ्यता को समृद्ध करते हैं। निरन्तर भ्रमण के कारण उनके स्वरूप में देश तथा काल के अनुरूप स्वभावतः परिवर्तन हो जाते हैं । कभी कभी ये परिवर्तन इतने अधिक होते हैं कि कथाओं के मूल स्वरूप की पहचान ही कठिन हो जाती है। ये परिवर्तन वस्तुतः भिन्न समाज तथा संस्कृति में गृहीत कथाओं या प्रतीकों को अधिक स्वीकृत बनाने के लिये किये जाते हैं। इनका उद्देश्य मूल कथा को हानि पहुँचाना नहीं होता है। इसीलिये इन परिवर्तनों के बावजूद  कथाओं का मूल सन्देश प्रायः समान रहता है ।

ईसा पूर्व तृतीय शताब्दी के लगभग संकलित पञ्चतन्त्र ग्रन्थ कथा साहित्य के चतुर्दिक् प्रव्रजन का अपूर्व उदाहरण है। यह सर्वाधिक साहित्यिक अनुवादों वाला भारतीय ग्रन्थ है जिसके ५० भाषाओं में लगभग २०० संस्करण उपलब्ध हैं । इनमें से तीन चौथाई संस्करण भारतीयेतर भाषाओं में प्राप्य हैं। केवल भारत में ही इस ग्रन्थ के २५ विभिन्न संस्करण मिलते हैं जिनमें तन्त्राख्यायिका से लेकर हितोपदेश तक सम्मिलित हैं । विद्वानों ने प्राचीन भारत में प्रसारित पञ्चतन्त्र की विभिन्न शाखाओं को चार प्रमुख समूहों में वर्गीकृत किया है। पञ्चतन्त्र का सबसे प्राचीन स्वरूप सम्भवतः तन्त्राख्यायिका है (Dasgupta 1947: 90)। यह वही पाठ है जिससे पहलवी (फ़ारसी भाषा का मध्यकालीन रूप) भाषा में अनुवाद किया गया होगा। सोमदेव के कथासरित्सागर तथा क्षेमेन्द्र की बृहत्कथामञ्जरी में जिस पञ्चतन्त्र की कथाओं का उपयोग किया गया था वह उसका उत्तर–पश्चिम पाठ रहा होगा जो अब उपलब्ध नहीं होता। जैनों के कथा साहित्य में पञ्चतन्त्र की कहानियाँ मुख्यतः दो रूपों में उपस्थित दिखायी देती हैं। उन्होंने संस्कृत भाषा में पञ्चतन्त्र के पूरे संस्करण प्रस्तुत किये जिसमें सबसे प्रसिद्ध है ११९९ ई॰ में विद्यमान जैनाचार्य पूर्णभद्र का पञ्चाख्यान नामक परिवर्धित संस्करण। एस॰ एन॰ दासगुप्त के अनुसार यह पञ्चतन्त्र के दाक्षिणात्य संस्करण पर आधारित रहा होगा। पञ्चतन्त्र की कथायें जैन धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों की व्याख्याओं में भी बिखरी पड़ी हैं। ये कथायें प्राकृत भाषा में लिखी गयी हैं और इनका सम्भावित समय ६ठीं शताब्दी इस्वी है[1]। प्राकृत की ये कथायें जैन ग्रन्थों में प्रयुक्त होने के बावजूद अपने मूल स्वरूप को सुरक्षित रखती हैं। । पञ्चतन्त्र का सबसे नवीन तथा परिवर्तित–परिवर्धित संस्करण नारायण पण्डित का हितोपदेश है। नारायण पण्डित बंगाल के राजा धवलचन्द्र के आश्रित थे। धवलचन्द्र का समय १३७३ ई॰ है।

पञ्चतन्त्र की विश्वयात्रा उसके प्राचीन फ़ारसी अनुवाद के साथ शुरू होती है। फ़ारसी तथा अरबी जगत् में पञ्चतन्त्र कलीलः व दिम्नः(کلیله و دمنه)[2] के नाम से रूपान्तरित एवं प्रख्यात है । ५७० ईस्वी में सासानी सम्राट् अनूशीरवान् (انوشیروان)  के मन्त्री बुज़ुर्गमेह्र (بزرگمهر) ने बरज़वै तबीब के माध्यम से इस ग्रन्थ का अनुवाद पहलवी (मध्यकालीन फ़ारसी) भाषा में कराया। पहलवी में इसका नाम कलीलग व दिम्नग था। यही अनुवाद पञ्चतन्त्र के सीरियन तथा अन्य विश्वभाषाओं में हुए अनुवादों का आधार बना । ७५० ईस्वी वर्ष में फ़ारसी भाषा के विद्वान् अब्दुल्लाह इब्ने मुक़फ्फ़ा ने इसका अनुवाद अरबी भाषा में किया । १२ वीं सदी में ग़ज़नवी वंश के शासक बहराम शाह के यहाँ मुंशी पद पर कार्यरत नसरुल्लाह मुंशी ने इसका अनुवाद अर्वाचीन फ़ारसी में किया। इस अनुवाद का नाम भी कलीलः व दिम्नः ही है। यह अनुवाद मूल की अपेक्षा बहुत परिवर्धित है। फ़ारसी का यही अनुवाद अनवारे सुहैली आदि अनेक दूसरे फ़ारसी रूपान्तरणों का आधार बना[3]। अनवारे सुहैली ग्रन्थ १५वीं सदी में हिरात के तैमूरी सुल्तान हुसैन बैक़रा के दरबारी विद्वान् वाइज़ काशिफ़ी के द्वारा लिखा गया था। इसका प्रमुख आधार नसरुल्लाह मुंशी का फ़ारसी भाषा में लिखित कलीलः व दिम्नः ग्रन्थ था। इन फ़ारसी रूपान्तरणों के अतिरिक्त पञ्चतन्त्र की कथायें समस्त विश्व में रूपान्तरित तथा स्वीकृत हुईं, जो एक स्वतन्त्र अध्ययन का विषय है[4]

सम्पूर्ण विश्व में भ्रमण करने उपरान्त भी पञ्चतन्त्र की कथाओं के मूल सन्देश में बहुत अधिक अन्तर नहीं देखा गया है। पञ्चतन्त्र की कथाओं का मूल उद्देश्य है–रुचिकर पशुकथाओं का उपयोग करके बालकों को नीतिशास्त्र की शिक्षा देना। स्वयं पञ्चतन्त्र के प्रारम्भ में इन कथाओं के संग्रह का उद्देश्य अमरशक्ति राजा के मन्दबुद्धि पुत्रों को नीतिशिक्षण रूपी आख्यान द्वारा बताया गया है। विष्णुशर्मा की प्रतिज्ञा उन राजकुमारों को नीतिशास्त्र में निष्णात बनाना ही था[5]। हितोपदेश में भी इन कथाओं का स्पष्ट उद्देश्य यही बताया गया है। इसके प्रस्तावनात्मक श्लोकों में कहा गया है[6]

कथाच्छलेन बालानां नीतिस्तदिह कथ्यते॥

(इस पुस्तक में कहानी के बहाने बच्चों को नीति शिक्षा दी जा रही है।)

यही कारण है कि पञ्चतन्त्र के आरम्भ में देवताओं को प्रणाम करने के बाद ग्रन्थकार ने प्राचीन काल के प्रमुख नीतिशास्त्र प्रणेताओं (नयशास्त्रकर्ता ) को नमस्कार समर्पित किये हैं–

मनवे वाचस्पतये शुक्राय पराशराय ससुताय।

चाणक्याय च विदुषे नमोऽस्तु नयशास्त्रकर्तृभ्यः॥ (कथामुख २)

पञ्चतन्त्र में व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों प्रकार की नैतिक शिक्षाएँ कथाओं में सुन्दर रीति से गूँथ दी गयी हैं। इनका उद्देश्य यह है कि इसका अध्ययन करने वाले बालकों के हृदय में ये नैतिक शिक्षायें इस प्रकार घर कर जायें कि वे जीवन के किसी भी क्षेत्र में अव्यावहारिक आचरण न करें तथा कहीं भी असफलता प्राप्त न करें । पञ्चतन्त्र की फलश्रुति में भी इसका उद्देश्य यही बताया गया है–

अधीते य इदं नित्यं नीतिशास्त्रं शृणोति च।

न पराभवमाप्नोति शक्रादपि कदाचन॥ (पञ्चतन्त्र कथामुख १०)

(जो इस नीतिशास्त्र का नित्य अध्ययन करता है तथा इसे सुनता है वह इन्द्र से भी कभी पराजित नहीं हो सकता। )

इस पत्र का केन्द्रीय विषय मौलाना जलालुद्दीन रूमी (आगे रूमी अथवा मौलाना के नाम से अभिहित) द्वारा अपनी विश्वप्रसिद्ध  आध्यात्मिक कविता– मसनवी ए मानवी (आगे मसनवी की संज्ञा से कथित) में  इन कथाओं का किया गया उपयोग है। मसनवी में हमें पञ्चतन्त्र की कथाओं के स्वरूप एवं सन्देश दोनों में आश्चर्यजनक  परिवर्तन मिलता है। प्रस्तुत पत्र में यह देखने का प्रयत्न किया गया है कि किस प्रकार रूमी ने पञ्चतन्त्र की नैतिक कथाओं को आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान करके उनका उपयोग अपने कथ्य को पुष्ट करने में किया है।

मौलाना १३ वीं सदी में उत्पन्न फ़ारसी जगत् के महत्तम रहस्यवादी सूफ़ी सन्त कवि हैं। उनका स्थितिकाल १२०७ ई॰ से १२७२ ई॰ वर्ष है। वे बल्ख़ में उत्पन्न हुये थे जो इस समय अफ़ग़ानिस्तान में है। उनके पिता बहाउद्दीन वलद उस समय के बहुत बड़े दार्शनिक थे तथा सुल्तान–उल–उलमा[7] कहे जाते थे। तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों के दबाव में उन्हें परिवार तथा अनुयायियों के साथ तुर्की के कूनिया नामक स्थान में बसना पड़ा था। तुर्की का यह हिस्सा कभी रोमन साम्राज्य के अधीन था इसलिये इसे रोम अथवा रूम कहा जाता था। रूम से सम्बन्धित होने के कारण मौलाना का दूसरा अभिधान रूमी भी पड़ा। अपने पिता की मृत्यु के बाद उनके बृहत् शिष्य समुदाय के मार्गदर्शन का दायित्व मौलाना पर आया। परन्तु गुरुपद स्वीकार करने के पहले मौलाना ने अपने पिता के प्रमुख शिष्य बुरहानुद्दीन मुहक़्क़िक़ के संरक्षण में अध्ययन एवं साधनायें परिपूर्ण कीं तथा हलब (Aleppo) के प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान में इस्लामिक विधि विधानों की विधिवत् शिक्षा ली ।

अध्ययन समाप्त करके वे अब अपने समय के अद्वितीय धर्मशास्त्री हो गये। उनके पीछे अनुयायियों का एक भारी वर्ग (लगभग दस हजार[8] की संख्या में) एकत्रित हो गया। उस सम्पूर्ण क्षेत्र में उनकी बड़ी ख्याति हो गयी। राज्य का सम्राट् स्वयं उनके प्रवचनों में आया करता था। लेकिन तभी एक अद्भुत घटना घटी। ३७ वर्ष की अवस्था में उनकी भेंट शम्सुद्दीन तबरेज़ी नामक एक रहस्यात्मक व्यक्ति से हुई। उसने मौलाना के व्यक्तित्व को पूरी तरह से पलट कर रख दिया। धर्मशास्त्र के शुष्क प्रवचनों की जगह उनके हृदय में रसपूर्ण ईश्वरीय भक्ति का आविर्भाव हो गया। शरीयत की साधनाओं की अवधि पूरी हो चुकी थी। अब तरीक़त का कालखण्ड प्रारम्भ हो गया था। उन्हें प्रेम रूपी सिद्धि मिल चुकी थी।  वे प्रवचनों को छोड़कर आह्लादपूर्ण नृत्य और गान में लग गये तथा बुद्धिवाद को बिल्कुल बिसरा दिया। शम्सुद्दीन तबरेज़ी से मिलने के पहले और बाद की दशाओं का उन्होंने अपनी एक प्रसिद्ध ग़ज़ल में बहुत ही सुन्दर रीति से वर्णन किया है–

मैं मरा हुआ था जी उठा हूँ, मैं चीत्कार था उल्लास बन गया हूँ । मेरे पास प्रेम की पूँजी आ गयी और मैं अविनश्वर राज्य बन गया हूँ । मेरी आँखे तृप्त हो गयी हैं , मेरे प्राण साहसी हो गये हैं । मेरा जिगर शेर का हो गया है, मैं शुक्र  ग्रह की तरह चमकने लगा हूँ । मेरे प्रेमास्पद गुरु ने कहा कि तू अभी तक बावला नहीं हुआ है इसलिये अभी तू मेरे घर के लायक नहीं हो पाया है – बस, मैं पागल हो आया और अपने शरीर को ज़ञ्जीरों से जकड़ लिया। उसने कहा – कि तू मस्त नहीं  है, भाग जा तू हमारी जमात शामिल होने लायक़ नहीं है – बस, मैं सरमस्त हो आया और उत्सवों से भर गया । उसने कहा – तुम तो बड़े पण्डिताऊ हो। तर्क और सन्देहों में डूबे हुए हो– मैं नादान हो आया और सारे सिद्धान्तों से छूट गया। उसने कहा कि तुम तो ख़ुद राह दिखाने वाले दिये हो, इतनी बड़ी भीड़ तुम्हारी पूजा करती है–नहीं, मैं  अब दिया नहीं रहा, भीड़ भी नहीं रहा, धुआँ  होकर बिखर गया। उसने कहा – तू तो महन्त है , प्रमुख है , पेशवा है ,मार्गदर्शक है  । नहीं, अब मैं पण्डित नहीं रहा ,पेशवा नहीं रहा, उसके हुक्म का ग़ुलाम हो गया। उसने कहा – तुम्हारे पास अपने पंख और डैने हैं , मैं तुम्हें अपने वाले पंख और डैने नहीं दूँगा – बस, मैंने उन पंखों के लोभ में इन पंखों को कटवा लिया और असहाय हो गया । उसने कहा कि मेरे पास पुरानी बातें दुहराना बन्द करो । मैंने कहा – ठीक है , नहीं दोहराउंगा । मैं अब चुप और अवाक् हो गया । मेरे प्राण आज ही सुबह इतराते हुए कह रहे थे – मैं पहले दासों का भी दास था, और अब राजाओं का भी राजा बन गया हूँ ।

मौलाना अब विधि निषेध के मार्ग को छोड़कर आन्तरिक साधना के रास्ते पर निकल चुके थे। यह बात उनके कट्टर शिष्यों को नागवार गुज़री। रूमी में आये इस आपादमस्तक परिवर्तन का कारण उन्होंने शम्स तबरेज़ को माना तथा अपनी मूर्खता के कारण उनपर अनुचित दबाव बनाने लगे। इस स्थिति में शम्स को लुप्त हो जाना पड़ा। अपने परम प्रेमास्पद गुरु के विरह से रूमी का अन्तर तड़प उठा। उनकी जुदाई की व्यथा में मौलाना ने जो ग़ज़लें लिखीं हैं वे सच्ची कविता के दुर्लभतम उदाहरणों में से हैं। ये ग़ज़लें लगभग ४००० की संख्या में हैं तथा दीवाने शम्स में एकत्रित हैं, जिसका दूसरा नाम दीवाने–कबीर (बड़ा काव्यसंग्रह) भी है। इसके बाद शम्स फिर प्रकट होते हैं और फिर मौलाना के शिष्यों की अनुचित संक्रियाओं के कारण रहस्यात्मक ढंग से ग़ायब हो जाते हैं। शम्स के दूसरी बार आने के बाद मौलाना को तत्त्व का पूरी तरह से भान हो जाता है। अतः वे शम्स के दूसरी बार ग़ायब होने के बाद उद्वेग प्रदर्शित नहीं करते। मानो, प्रेम के बादल पूरी तरह से गरज कर बरस चुके थे।  अब उर्वर ज़मीन से अध्यात्म और ज्ञान की फ़सल उगने वाली थी– भक्तिर्ज्ञानाय कल्पते। अब दीवाने शम्स के जोशभरे गीतों का मौसम गुज़र चुका था। अब धीर गम्भीर मसनवी के प्रणयन का समय था। शम्सुद्दीन तबरीज़ी के बाद रूमी को सलाहुद्दीन ज़रकोब तथा हुसामुद्दीन चलबी नामक दो व्यक्तियों ने बहुत प्रभावित किया।  हुसामुद्दीन चलबी को सम्बोधित करके उन्होंने अपनी मस्नवी लिखी । रूमी की मस्नवी की बड़ी विशेषता यह है कि वह संवादात्मक ढंग से लिखी गयी है। उसमें शास्त्रीय ग्रन्थों की तरह विवेचन की कठिन शैली का आश्रय नहीं लिया गया है। यह एक संवाद है जिसमें वाचक रूमी हैं तथा श्रोता उनके शिष्य। अनेकत्र रूमी अपने शिष्यों के प्रश्नों को भी ख़ुद छेड़कर उस पर चर्चा करते हैं।

मस्नवी फ़ारसी साहित्य की एक विधा है[9] जो महाकाव्यात्मक कथानकों के लिये काम में लायी जाती है । इसमें सामान्यतः लघु–आकार के छन्द प्रयुक्त होते हैं जो तुकान्त होते हैं । मौलाना के पहले फ़िरदौसी, निज़ामी, सनाई तथा अत्तार इस शैली में अपनी उत्कृष्ट रचनाएँ कर चुके थे। फिर भी मौलाना की मसनवी इतनी अधिक प्रसिद्ध हुई कि फ़ारसी में मसनवी शब्द कहने से सामान्यतः रूमी की मसनवी ए मानवी (مثنوی معنوی) का ही ग्रहण होता है। मसनवी में छः दफ्तर (खण्ड) तथा २६००० के लगभग पद्य हैं। सभी पद्यों में प्रयुक्त छन्द एक ही है, जिनकी छान्दसिक व्यवस्था[10] निम्नवत् है–

ऽ   ।     ऽ   ऽ    ‍ऽ     ।  ऽ  ऽ       ऽ    ।  ऽ       ऽ  । ऽ  ऽ     ऽ   ।   ऽ  ऽ     ऽ   ।  ऽ

बिश्नव् अज़् नै     चून् हिकायत्   मी कुनद् । व,ज़् जुदाई    हा शिकायत्  मी कुनद ॥

फ़ाइलातुन्         फ़ाइलातुन्         फ़ाइलुन्। फ़ाइलातुन्        फ़ाइलातुन्    फ़ाइलुन् ॥      अथवा

राजभा ता      राजमाता       राजभा । राजभाता       राजमाता  राजभा ॥

 

इस कृति की साहित्यिक ही नहीं अपितु धार्मिक तथा आध्यात्मिक मान्यता इतनी अधिक है कि आलोचकों ने इसे फ़ारसी भाषा का कुरान भी कहा है[11]। रूमी को पैग़म्बर कहने से बचते हुए भी परीक्षकों ने मसनवी को आसमानी किताब का दर्जा दिया है–

मन नमी गूयम कि आन् आली जनाब

हस्त पैग़म्बर, वली दारद किताब

(मैं नहीं कहता कि वे प्रतिष्ठित महापुरुष=रूमी पैग़म्बर हैं, लेकिन उनके पास जो किताब है वह आसमानी है[12]। )

दार्शनिक तथा आध्यात्मिक विषयों का विशेष वर्णन होने से इसे मा,नवी (= दार्शनिक ) कहा जाने लगा[13]। मा,नी शब्द का तात्पर्य अर्थ होता है। इस प्रसंग में मा,नी शब्द रहस्य अथवा आध्यात्मिक रहस्यों के लिए प्रयुक्त है। मा,नवी शब्द का अर्थ है आध्यात्मिक रहस्यों से सम्पन्न। इसकी सामग्री को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जा सकता है। पहली है–आध्यात्मिक तथा रहस्यवादी चर्चायें तथा दूसरी उनको समझाने के प्रसङ्ग में लायी गयी कहानियाँ तथा उदाहरण (मसल) एवं युक्तियाँ (हिकमत)[14]। दोनों सामग्रियाँ परस्पर इस तरह गुँथी हुई हैं कि इन दोनों में किसी भी प्रकार का असामञ्जस्य दिखायी नहीं पड़ता।

मसनवी की कहानियाँ विभिन्न स्रोतों से ली गयी हैं । मौलाना प्रायः अपनी कथाओं के स्रोतों की ओर स्वयं संकेत करते हैं। इनमें से सबसे प्रमुख स्रोत हैं – क़ुरान तथा हदीस (पैग़म्बर मुहम्मद के वचन)। इसके अतिरिक्त  सनाई ग़ज़नवी तथा फ़रीदुद्दीन अत्तार जैसे पूर्ववर्ती कवियों की आध्यात्मिक रचनाओं से समान रुचि की कथाएँ लेकर उन्हें अतिरिक्त आध्यात्मिक आयामों से देखा गया है। मौलाना ने निज़ामी अरूज़ी (1110-1161 ई॰) की किताब – चहार मक़ाला, मुहम्मद औफ़ी (1771-1242 ई॰) की किताब  जवामे उल हिकायात तथा कलीलः व दिम्नः (पञ्चतन्त्र) आदि उस समय तक प्रचलित कथा संग्रहों की नैतिक कथाओं का भी उपयोग किया है[15]

मौलाना ने कलीलः व दिम्नः में से कम से कम पाँच कहानियों का प्रत्यक्ष उपयोग किया है[16]। इनका विवरण निम्नवत् है–

१–सिंहशशककथा – मित्रभेद  ‍, १–८ ।  मसनवी पहला दफ्तर –९००–१३९०

२– गोमायुदुन्दुभिकथा – मित्रभेद , १–२ । मसनवी दूसरा दफ्तर– ३१५५–३१६२

३–शशकगजयूथपकथा – काकोलूकीय, ३–२। मसनवी तीसरा दफ्तर– २७३८

४–मत्स्यत्रयकथा – मित्रभेद, १–४। मसनवी चौथा दफ्तर– २२०२

५–सिंहलम्बकर्णयोः कथा – लब्धप्रणाश, ४–२ । मसनवी पाँचवाँ दफ्तर २३२६

इसके अतिरिक्त, मस्नवी में अनेकत्र ऐसी सूक्तियाँ हैं जिनका संबन्ध पञ्चतन्त्र से माना जा सकता है।

मौलाना द्वारा स्वीकृत ये कहानियाँ समाज में शताब्दियों से नैतिक मूल्यों की शिक्षा के लिये विभिन्न कथा संग्रहों में प्रयुक्त होती रहीं थीं। लेकिन रूमी ने इन कहानियों को अन्य संग्रहीताओं की भाँति यथावत् लेकर पिष्टपेषण नहीं किया। उन्होंने इन कथाओं का विनियोग नीति की अपेक्षा उच्चतर मूल्यों को समझाने के लिये किया। पञ्चतन्त्र की कथाएँ भारतीय जनमानस की तरह फ़ारसी भाषी जनता के मनो–मस्तिष्क में भी शताब्दियों से रूढमूल  हो गयी थीं। उनकी इसी लोकप्रियता का उपयोग रूमी ने अपने सन्देश को प्रसारित करने में किया। रूमी का मूल सन्देश है –आध्यात्मिक रहस्यवाद । वे जिस भी सामान्य से सामान्य कथा अथवा वचन को पकड़ते हैं उसको अपने रंग में रँग कर आश्चर्यपूर्ण रीति से प्रभावोत्पादक बनाकर प्रस्तुत करते हैं। अपने इस अद्भुत उपक्रम को पाठकों के अनुमान अथवा शोध पर न छोड़ते हुए रूमी विधिवत् इस प्रकार के उपयोग की घोषणा करते हैं।  उनका स्पष्ट कथन है कि जिन कहानियों का उपयोग शताब्दियों से नीति शिक्षण के लिए किया जाता रहा है, मैं उनका आध्यात्मिक अर्थ बता रहा हूँ। इतना ही नहीं वे यह दावा भी करते हैं कि उनके द्वारा बताया गया अर्थ ही इन कहानियों का वास्तविक तात्पर्य है। उदाहरण के लिए मत्स्यत्रयकथा को प्रारम्भ करने से पहले वे घोषणा करते हैं–

दर कलीलः ख़ान्दे बाशी लीक आन् – क़िस्रे क़िस्से बाशदो ईन् मग़्ज़े जान्[17]

(तुमने इस कहानी को कलीलः व दिम्नः अर्थात् पञ्चतन्त्र में पढ़ रखा होगा, पर वह तो केवल कथा की भूसी थी

मेरे वर्णन में इस कथा का दाना अर्थात्, सार या आत्मा वर्णित है।)

       उपर्युक्त उपमा से स्पष्ट है कि मौलाना रूमी कथा के नैतिक स्वरूप को भूसी की तरह निस्सार तथा आध्यात्मिक व्याख्या को दाने की तरह सारभूत मान रहे हैं। इसलिए वे आगाह करना चाह रहे हैं कि चाहे तुमने पहले इस कथा को पढ़ क्यों न लिया हो, मेरे द्वारा प्रस्तुत इन कथाओं की व्याख्या बिल्कुल नयी है। केवल नयी ही नहीं बल्कि यही वास्तविक व्याख्या है। केवल पञ्चतन्त्र की कथाओं के बारे में ही नहीं अपने द्वारा प्रयुक्त सभी कथाओं के बारे में मौलाना का कथन है कि उनकी कहानियाँ पुराने शरीर में नयी आत्मा की तरह हैं तथा इनमें वह तासीर है कि वे अमृत की तरह तुम्हें ज़िन्दा कर देंगी–

आबे हैवान् ख़ान, मख़ान ईन् रा सुख़न्। रूहे नौवीन दर तने हर्फ़े कुहन्[18]

(इन कहानियों को अमृत कहो, ये सिर्फ़ बाते नहीं हैं। ये शब्दों के पुराने शरीर में आत्मा की तरह हैं॥)

रूमी के अनुसार अध्यात्म तत्त्व उस अमृत की तरह है जो सदियों पुराने कथानकों को पुनरुज्जीवित करने में समर्थ है। इसका कारण यह है कि सूफ़ियों की दृष्टि में अध्यात्म का गुणात्मक मूल्य नीति की अपेक्षा अधिक है। नीति वह साधना है जिसके बल पर अध्यात्म फलित होता है। अध्यात्म के तत्त्वों में सभी नैतिक व्यवहार फलीभूत तथा कृतकृत्य हो जाते हैं। नैतिकता समाज से सम्बद्ध  आचरण एवं व्यवहार है जो समाज तथा व्यक्ति की व्यवस्था के लिये आवश्यक होता है। इसी कारण इसमें करणीय एवं अकरणीय का निर्णय होता है, शुभ–अशुभ एवं विधि– निषेध की समस्या चर्चित होती है। धर्मशास्त्र के सामाजिक नियम मुख्यतः नीतिनिर्धारक ही हुआ करते हैं। अध्यात्म के अनुसार हमारी सारी समस्याओं का निदान सामाजिक सुव्यवस्था मात्र से नहीं होने वाला है। यहाँ तक कि सामाजिक सुव्यवस्था भी केवल नैतिक उपदेशों से नहीं हो सकती। वस्तुतः समस्या हमारे अन्तर में है। आन्तरिक समस्याओं का ही प्रतिबिम्बन बाहरी गड़बड़ियों के रूप में हो रहा है। इसलिए हमें सबसे पहले अपने अन्तर को सुधारना होगा। इस तथ्य के समर्थन के लिए रूमी की मसनवी से एक छोटी सी कहानी का उद्धरण अप्रासंगिक नहीं होगा।

कहा जाता है कि सुलैमान पैग़म्बर अपने विशेष सिंहासन पर बैठ कर हवा की सवारी करते थे। एक दिन हवा उनके सिंहासन प्रति असन्तुलित होकर बहने लगी, जिससे उनका सिंहासन डगमगाने लगा।  सुलैमान ने हवा से कहा– “ऐ हवा तू टेढ़ी मेढ़ी और असन्तुलित होकर क्यों बह रही है”? हवा ने कहा–“ऐ सुलैमान तुम आज असन्तुलित क्यों हो, और अगर तुम ख़ुद असन्तुलित हो तो मेरे असन्तुलन से क्रोधित होने का अधिकार तुम्हें नहीं है”–

बाद बर तख़्ते सुलैमान् गश्त कज़। पस सुलैमान गुफ़्त–बादा, कज़ म–वज़॥

बाद हम गुफ़्त–ऐ सुलैमान, कज़ म–रौ। व,र रवी कज़ अज़ कज़म ख़श्मीन् मशौ॥ (मसनवी ४.७२)

 

कहानी आगे बढ़ती है और सुलैमान अपने टेढ़े हो गये मुकुट को सीधा करते हैं। बार बार प्रयत्न करने के बावजूद मुकुट सीधा नहीं होता। मुकुट ने कहा कि अगर तुम मुझे १०० बार सीधा करोगे तो भी मैं टेढ़ा ही रहूँगा, तुम्हारा जो हृदय राग–द्वेष के कारण असन्तुलित हो चुका है, उसे पहले ठीक करो। फिर सुलैमान ने अपने हृदय की ओर रुख किया तथा उसमें से वासनाओं को हटाकर उसे स्वच्छ किया। अब उनके मुकुट तथा उनके इर्द गिर्द बहने वाली हवा–दोनों सीधे सीधे हो गये।

मसनवी की एक अन्य कथा में रूमी ने स्पष्ट रूप से इस तथ्य की ओर इशारा किया है कि बाहरी दुनिया में जो कुछ भी है वह हमारे अन्तर का ही प्रतिबिम्बन है[19]

बाग़हा ओ मीवेहा अन्दर दिलस्त। अक्से लुत्फ़े आन् बर् ईन् आबो गिलस्त॥

(बाहर दीखने वाले बग़ीचे और फल वस्तुतः हृदय के अन्दर हैं–बाहर पाञ्चभौतिक रूप में प्रकट वस्तुएँ उसी मानसिक सृष्टि का प्रतिबिम्बन हैं।)

चूँकि सम्पूर्ण बाह्य वातावरण चित्त का ही प्रतिबिम्बन है इसलिए अध्यात्मशास्त्र में  सबसे अधिक जोर चित्त की शुद्धि पर तथा उसके द्वारा अपने को जानने पर दिया जाता है। अध्यात्म शब्द का अर्थ ही है– आत्मा से सम्बद्ध[20]। जब तक हमारी दृष्टि दूषित है उसके द्वारा दिखायी पड़ने वाले दृश्य साधु नहीं हो सकते । इसलिये सूफ़ियों ने अपने को पहचानने और अपने मूल से जुड़ने पर बल दिया है[21]

ऐ ख़ुनक आन कस कि ज़ाते ख़ुद शिनाख़्त। अन्दर अम्ने सरमदी क़स्री बेसाख़्त॥

(धन्य है वह जिसने अपने स्वरूप को पहचान लिया– उसने मानो अपनी निरन्तर सुरक्षा के लिए बड़ा दुर्ग बना लिया।)

समष्टि स्वरूप जगत् (जो वस्तुतः ईश्वर ही है) को समझने के लिए आवश्यक है कि हम शुरुआत व्यष्टि (अर्थात् अन्तरात्मा) से करें, क्योंकि ‘यत्पिण्डे तद्ब्रह्माण्डे’। भारतीय अथवा सूफ़ी अध्यात्म शास्त्र इस बिन्दु पर एकमत दिखायी पड़ते हैं। एक हदीस (अर्थात् पैग़म्बर का वचन ) के अनुसार जिसने अपने आप को समझ लिया इसने ईश्वर को भी समझ लिया, भी इसी तथ्य की ओर इशारा कर रहा है–

मन अरफ़ नफ़्सहु फ़क़द अरफ़ रब्बहु

मौलाना ने भी अपनी मसनवी को चित्त दर्पण का शोधन करने वाला (सैक़ले–अर्वाह) बताया है। अध्यात्मशास्त्र अपने को समझने के लिए काम तथा लोभ आदि के मैल को चित्त से हटाने की हिदायत देता है है[22]। इन्हीं चित्तगत मलों के कारण आत्मा का स्वरूप चित्तरूपी दर्पण में प्रतिफलित नहीं हो पाता है। मसनवी के प्रारम्भिक पद्यों में ही मौलाना ने हमें इस रहस्य से अवगत कराया है–

आइनत दानी चेरा ग़म्माज़ नीस्त?। ज़ा,न् कि ज़ंगार् अज़ रुख़श मुम्ताज़ नीस्त॥

(जानते हो तुम्हारे दर्पण में प्रतिबिम्बन शक्ति क्यों नहीं है? क्योंकि उसका तल ज़ंग से पृथक् नहीं है। )

रूमी उन तत्त्वों के निरन्तर अभ्यास की बात करते हैं जिससे चित्त के मल दूर हो जायें। इन तत्त्वों में सबसे प्रमुख प्रेम (इश्क़) है। इसके अभ्यास से अहंकार का विगलन हो जाता है तथा बाक़ी  सारे आत्मिक दोष भी दूर हो जाते है।  मसनवी के प्रारम्भ में ही उन्होंने प्रेम की स्तुति करते हुए उसे सभी कष्टों का चिकित्सक, अहंकार की दवा तथा अफ़लातून और गैलिनस जैसे महान् दार्शनिकों के समकक्ष बताया है[23]। उनकी मस्नवी इन्हीं तत्त्वों के प्रतिपादन से भरी पड़ी है, इसलिए वे मस्नवी को भी चित्तदर्पण को शुद्ध करने वाले एक ऐसे ही रेगमाल काग़ज़ (सैक़ले अरवाह) से उपमित करते हैं। जिसका चित्त शुद्ध है तथा जिसने तत्त्व का दर्शन कर लिया है उसके लिए सारी दिशाएँ मित्र बन जाती हैं, सारे रास्ते उसके लिए हमवार हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति चूँकि परमेश्वर की इच्छा से अवगत होता है इसलिये उससे कोई ग़लती नहीं हो सकती। सभी प्रकार के अनर्थों को दूर करने का एकमात्र उपाय यही है। नैतिक उपदेशों से निर्देशित होने वाली सामाजिक सम्बन्धों की सुव्यवस्था हमें सभी कष्टों से नहीं बचा सकती। कई बार तो सुव्यवस्थाएँ और अधिक कष्टों में डालकर हमें ग़ाफ़िल भी बना देती हैं। सामाजिक सुव्यवस्थाएँ प्रायः भौतिक साधनों की उपलब्धि में हमारी सहायता करती हैं। चित्त के दोषों के रहते ही यदि हमें भौतिक साधनों की पर्याप्त उपलब्धि हो जाए तो इससे हमारे अहंकार को और बढ़ावा मिलता है। अहंकार अन्ततः हमारे अधःपतन का साधन बनता है। मौलाना के अनुसार भौतिक प्रगति की सीढ़ी अहंकार है, और अहंकार स्वयं पतनोन्मुख होता है। जो इस अहंकार की सीढ़ी पर जितना ही ऊपर चढ़ता है गिरने पर उसकी हड्डियाँ उतनी ही अधिक टूटती हैं, क्योंकि यह एक ऐसी सीढ़ी  है जो अन्ततः ख़ुद भी गिर पड़ती है–

नर्दबाने ईन् जहान् मा ओ मनी–स्त। आक़िबत ईन् नर्दबान् उफ़्तादनी–स्त॥

लाजरम् हर कस कि बालातर निशस्त। उस्तुख़ानश सख़्ततर ख़ाहद शिकस्त[24]

इस प्रकार आत्यन्तिक कल्याण के लिए केवल नैतिक व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। इसीलिए मौलाना ने भी नैतिक व्यवस्था को आत्मिक उन्नति के लिए अपर्याप्त बताया है। हमें हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि रूमी ने कभी भी नैतिक व्यवहार को व्यर्थ अथवा निन्दित नहीं कहा है। उनके अनुसार नैतिक व्यवस्था का अनुपालन आध्यात्मिकता के उद्भव में सहायक ही होता  है[25]

इश्क़ो रिक़्क़त आयद अज़ नाने हलाल। इल्मो हिकमत ज़ायद अज़ नाने हलाल॥

(प्रेम और आँसू तथा ज्ञान और बुद्धिमत्ता विधिपूर्वक उपार्जित जीविका से ही उत्पन्न हो पाते हैं।)

नैतिकता आध्यात्मिकता का आधार ज़रूर है लेकिन हमें आधार तक ही सीमित होकर नहीं रह जाना है। उसके आगे का आत्मिक जगत् हमारी प्रतीक्षा में है। हमें अपने अन्तर में प्रविष्ट होकर अपने आप से जुड़ जाना है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण का अर्जुन के प्रति वेद से प्रतिपाद्य नैतिक व्यवहारों के परे होने का आह्वान भी उपर्युक्त स्वर को ही प्रतिध्वनित करता है–

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। (भगवद्गीता २–४५)

उस निस्त्रैगुण्य आध्यात्मिक अवस्था में शुभ – अशुभ, विधि–निषेध तथा त्याज्य–ग्राह्य का प्रश्न ही शेष नहीं रह जाता (निस्त्रैगुण्ये पथि विचरतः को विधिः को निषेधः?शुकाष्टकम्)। मौलाना के शब्दों में उस परिस्थिति में मूसा और फ़िरऔन में भी कोई विरोध नहीं रह जाता[26]। रूमी मनुष्य की चेतना को इसी स्तर पर ले आना चाहते हैं। पञ्चतन्त्र की कथाओं की  आध्यात्मिक व्याख्या का आधार मौलाना का उपर्युक्त चिन्तन ही है।

पञ्चतन्त्र एवं मसनवी के उद्देश्यों में अन्तर नैतिकता तथा आध्यात्मिकता का है। यही कारण है कि दोनों जगह उपयुक्त कहानियों के लगभग समान होने के बावजूद उनके कथ्य सन्देशों में बड़ा अन्तर  हो जाता है । पञ्चतन्त्र का उद्देश्य है – व्यक्ति का समाज के प्रति कर्तव्यबोध दिखाकर सामाजिक सुव्यवस्था का निर्धारण, जबकि मौलाना का उद्देश्य है– व्यक्ति के अन्तर की चिकित्सा। इसी कारण बहुत सारे प्रसङ्गों में रूमी कहते हैं कि मेरे द्वारा व्याख्यात कहानियाँ स्वयं मानवीय व्यक्तित्व की व्याख्या करने वाली हैं –

बिश्नवीद ऐ दूस्तान ईन् दास्तान् । ख़ुद हक़ीक़त नक़्दे हाले मास्त आन्[27]

ईन् हिकायत नीस्त पीशे मर्दे कार। वस्फ़े हाल् अस्तो हज़ूरे यारे ग़ार[28]

(हे मित्रो, इस कथा को सुनो। यह कथा हमारी अवस्था की सचाई बयान करने वाली है। आचरणशील व्यक्ति के लिए

यह कोई सामान्य कहानी नहीं बल्कि वर्तमान का विश्लेषण है और हृदयस्थ प्रियतम का निदर्शन है।)

मौलाना कथाओं को आध्यात्मिक प्रशिक्षण के लिए एक साधन अथवा प्रतीक मात्र मानते हैं। ठीक ऐसे ही जैसे पञ्चतन्त्रकार इन कहानियों को नैतिक प्रशिक्षण का बहाना मानते हैं (कथाच्छलेन बालानां नीतिस्तदिह कथ्यते)। रूमी के यहाँ कथाओं का अपने आप में बहुत महत्त्व नहीं है। अतः वे श्रोताओं से अनुरोध करते हैं कि श्रोतागण कथाओं में निहित सन्देशों को ग्रहण तथा धारण करें, केवल कहानियों के बाहरी स्वरूप मात्र पर ही अटके न रह  जायें –

ऐ बरादर, क़िस्से चून् पैमाने ई स्त। मा,नी अन्दर वै मिसाले दाने ई स्त॥

दाने ए मा,नी बेगीरद मर्दे अक़्ल ।  नन्गरद पैमाने रा गर गश्त नक़्ल[29]

(ऐ भाइयो, कहानी एक माप का साधन होती है और उसमें निहित तात्पर्य गेहूँ आदि परिमाप्य द्रव्य की तरह होता है। होशियार व्यक्ति तात्पर्य को ग्रहण करता है। वह मापन के साधन की तरफ़ ध्यान नहीं देता, चाहे वह नितान्त अनुपस्थित ही क्यों न हो जाये।)

रूमी पञ्चतन्त्र की कहानियों को भी इसी दृष्टिकोण के साथ पढ़ने की हिदायत देते हुए प्रतीत होते हैं। वे कहते हैं कि इन नैतिक कहानियों में से अपना हिस्सा निकाल लो। और हिस्सा निकालने  से उनका निश्चित आशय इनकी आध्यात्मिक व्याख्या से है–

अज़ कलीलः बाज़ कुन ईन् क़िस्से रा। व,न्दरीन् क़िस्से तलब कुन हिस्से रा[30]

माजरा ए बुलबुलो गुल गूश दार।  गरचे गुफ़्ती नीस्त आन् जा आशकार[31]

इन्हीं दृष्टिकोणों के साथ उनके द्वारा प्रस्तुत कहानियों में किये गये परिवर्तनों तथा व्याख्याओं पर हम विशद दृष्टि डालते हैं ।

  • सिंहशशककथा (बयाने तवक्कुल् ओ तर्के जुह्द गुफ़्तने नख़चीरान् बे शीर[32])

 

शेर और ख़रगोश की यह कहानी पञ्चतन्त्र के पहले तन्त्र की अति प्रसिद्ध कथा है। पञ्चतन्त्र के अनुसार इसका  सन्देश है शारीरिक बल की अपेक्षा बुद्धि–बल की श्रेष्ठता को स्थापित करना– बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्। मस्नवी में इस नीति सन्देश की प्रमुखता को परिवर्तित कर दिया गया है। मौलाना रूमी ने इस कथा का उपयोग एक अत्यन्त चर्चित धर्मशास्त्रीय विषय–भाग्य तथा कर्म के मध्य श्रेष्ठता की समस्या के समाधान हेतु किया है। इस्लामी धर्मशास्त्र के अनुसार भाग्य का तात्पर्य ईश्वर पर विश्वास तथा उसके प्रति समर्पण है जिसे तवक्कुल कहा गया है। दूसरी ओर मनुष्य का अपना प्रयत्न है जिसे जुह्द कहा गया है।

शेर के आतङ्क से त्रस्त होकर जंगली जीव उसे प्रतिदिन एक पशु भेजने की बात कहते हैं तथा उसे अतिरिक्त व्यर्थ प्रयत्न से बच कर अपने भोजन हेतु परमेश्वर पर आश्रित रहने की सलाह देते हैं। अर्थात्, जंगली जीवों को मौलाना ने तवक्कुल (भाग्य) का पक्षधर बनाया है। सिंह जंगली जीवों से प्रयत्न तथा कर्म के पक्ष में तर्क देकर बहुत दूर तक अपना मन्तव्य रखता है। मौलाना ने उसे पुरुषार्थ का प्रवक्ता बनाया है।

ध्यातव्य है कि दैव तथा पुरुषार्थ की तुलना प्राचीन भारतीय दर्शन, धर्मशास्त्र तथा राजनीति गत शास्त्रार्थों के अन्तर्गत बहुचर्चित विषय है। रामायण–महाभारत जैसे महाकाव्यों, चरकसंहिता जैसे वैज्ञानिक ग्रन्थों, याज्ञवल्क्य स्मृति जैसे स्मृति ग्रन्थों, भर्तृहरि के नीतिशतक जैसे सुभाषित ग्रन्थों, विभिन्न पौराणिक ग्रन्थों  तथा योगवासिष्ठ जैसे दार्शनिक ग्रन्थों में इस विषय पर लम्बी चर्चाएँ उपलब्ध होती हैं। यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण इसलिए है कि व्यक्ति अपने कर्म की सफलता के सम्बन्ध में सदा जिज्ञासु रहता है। कर्म प्रत्यक्ष है जबकि भाग्य अनुमान गम्य। अनेक बार ऐसा होता है कर्म को पर्याप्त मात्रा में सम्पादित करने पर भी अपेक्षित सफलता नहीं मिलती। इसकी तार्किक व्याख्या के लिए विचारकों ने भाग्य के सम्प्रत्यय को विकसित किया होगा। फल देने की दशा में आये पुराने कर्मों को ही  भारतीय विचारकों ने भाग्य के रूप में परिभाषित किया, तथा निर्णय यह दिया कि सारे कर्मों की सफलता अथवा विफलता का कारण है भाग्य तथा पुरुषार्थ का संयोग। याज्ञवल्क्यस्मृति (१.३४९) के अनुसार–

दैवे पुरुषकारे च कर्मसिद्धिर्व्यवस्थिता।

तत्र दैवमभिव्यक्तं पौरुषं पौर्वदैहिकम्॥

(कार्य की सिद्धि भाग्य तथा प्रयत्न पर आश्रित होती है। पूर्व शरीर में किया गया प्रयत्न जब प्राकट्य की अवस्था में आता है तो उसे ही दैव अथवा भाग्य कहते हैं।)

 

श्रीमद्भगवद्गीता (१८.१४) में किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए ५ कारकों की उपस्थिति को अनिवार्य माना गया है, इसमें भाग्य को अन्तिम कारक के रूप में परिगणित किया गया है–

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।

विविधाश्च पृथक् चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥

दैव तथा पुरुषार्थ के सम्बन्ध में भारतीय मतों का सिद्धान्त पक्ष यह है कि कार्य की सिद्धि के लिए दोनों की ही आवश्यकता अनिवार्य है। जैसे चिड़िया एक पंख से उड़ नहीं सकती अथवा रथ एक चक्के से चल नहीं सकता, उसी प्रकार प्रयत्न के बिना दैव भी सिद्ध नहीं हो सकता–

यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।

तथा पुरुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति[33]

लेकिन फिर भी ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि भारतीय विचार प्रणाली में दैव की अपेक्षा सर्वत्र पुरुषकार को ही वरीयता दी गयी है। इसके दो कारण हैं–१. पहला यह कि भाग्य भी वस्तुतः भूतकाल में किया गया कर्म ही है जो अपने परिपाक की अवस्था में आ पहुँचा है। अतः कर्म ही कालान्तर में भाग्य के रूप में परिवर्तित हो जाता है[34]। २. दूसरा यह कि यदि भाग्य फल देने की अवस्था में आ भी गया हो तो भी उसे वर्तमान कर्म की आवश्यकता होती ही है। ऐसा नहीं होने पर फलोन्मुख भाग्य भी फल देने में असमर्थ हो जाता है (..पुरुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति)

भाग्य अथवा दैव की यह स्थिति इस्लामिक विचार सरणि में थोड़ी सी भिन्न है। इसका कारण यह है कि भारतीय चिन्तकों ने दैव को पौर्वदेहिक अर्थात् पुराने जन्म के कर्मों की परिपाकावस्था कहा है। इस्लाम (अथवा अन्य इब्राहीमी धर्मों) में पुनर्जन्म अथवा पूर्वजन्म की मान्यता ही नहीं है, अतः भाग्य का सम्प्रत्यय इस्लाम में वही नहीं हो सकता जो भारतीय चिन्तन परम्परा में है। लेकिन वर्तमान कर्म के अतिरिक्त कार्य की सफलता का और कोई कारक तो निश्चित रूप से मानना ही पड़ेगा, क्योंकि इसके बिना कार्य की सफलता–असफलता को तार्किक रूप से समझाया नहीं जा सकता है। इसलिए भाग्य को इस्लामिक दृष्टि से ईश्वर की इच्छा के रूप में समझा गया है। ईश्वर तथा जीव में सेव्य–सेवक भाव सम्बन्ध है। वह अनुकूल तथा प्रतिकूल परिस्थितियाँ उद्भावित करके अपने सेवकों को उसमें डालता है, ताकि वह उनकी ईमानदारी तथा निष्ठा की परीक्षा ले सके। किन्हें वह अच्छी परिस्थिति में रखता है और किन्हें बुरी, इसके सम्बन्ध में प्रश्न नहीं किया जा सकता। यह उसका विशेष अधिकार क्षेत्र है। संसार में परिस्थितियों की विभिन्नता तथा विषमता का यही कारण है।

भाग्य तथा कर्म के विषय में इस्लामी तन्त्र में प्रचलित कई शब्द–युग्म भी इसी सम्प्रत्यय की ओर इशारा करते हैं। इससे सम्बन्धित कुछ प्रचलित शब्द हैं– जब्र–इख़्तियार, जुह्द–तवक्कुल आदि। जब्र का अर्थ विवशता तथा इख़्तियार का अर्थ अधिकार है। तवक्कुल का अर्थ है ईश्वर पर समर्पण जबकि जुह्द का अर्थ है प्रयत्न करना।

यहाँ यह बात ग़ौर–तलब है कि भाग्य को ईश्वरेच्छा अथवा ईश्वराज्ञा का पर्याय मानने के कारण इस्लामी परिप्रेक्ष्य में इसका स्थान कर्म की अपेक्षा श्रेष्ठतर हो गया है। कारण यह है कि इस्लाम में ईश्वर सभी प्रकार के तत्त्वों से शक्तिशाली तथा उसका शासन करने वाला है– इन्नल्लाह अला कुल्लि शैइन् क़दीर[35](निश्चित रूप से परमेश्वर सभी चीज़ों से अधिक सामर्थ्यवान् है)। भाग्य जो कि ईश्वरेच्छा (हुक्महा ए किर्दगार[36]) है, उसका उल्लंघन न केवल मूर्खता है अपितु अपराध भी है–

अज़ कि बुगरीज़ीम अज़ ख़ुद ऐ मुहाल। अज़ कि बिरबाईम अज़ हक़ ऐ वबाल[37]

भारतीय विचारधारा के अनुसार ईश्वर यद्यपि कर्तुम्–अकर्तुम्–अन्यथाकर्तुं समर्थ है, तथापि न्यायकारी होने के कारण वह जीवात्मा को उसके कर्मों के अनुसार ही फल देता है, निरंकुशता पूर्वक नहीं। अपनी सर्वज्ञता के कारण वह जीवात्माओं के सारे कर्मों को जानता है तथा कर्मों की अध्यक्षता करता है[38]। पौराणिक कथाओं में तो वह स्वयं भी अनेक बार कर्मों से बाध्य दिखाया गया है[39]

इस्लामी विश्वास के आधार ग्रन्थों में हम दैव तथा पुरुषार्थ दोनों की यथास्थान महत्ता देख पाते हैं। ईश्वर की सर्वसमर्थता इत्यादि के बावजूद क़ुर्आन में कहा गया है कि मनुष्य के पास प्रयत्न के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है– लैस लिल् इन्सान इल्ला मा सआ[40]। मौलाना जलालुद्दीन रूमी ने शेर तथा जंगली पशुओं के वार्तालाप में दोनों पक्षों से सम्बन्धित शास्त्रीय प्रमेयों को प्रस्तुत किया है, जिसमें से कुछ प्रमुख तथा रोचक सन्दर्भ नीचे उद्धृत किये जा रहे हैं–

सिंह के नित्य अनेक पशुओं के शिकार से त्रस्त जानवर उसे प्रतिदिन एक पशु का शिकार करके ईश्वरेच्छा पर सन्तुष्ट रहने की सलाह पर शेर ने प्रयत्न तथा सावधानी को ईश्वर तथा पैग़म्बर के अनुकूल बताया। इस पर पशुओं का कहना–

जुम्ले गुफ़्तन्द् ऐ हकीमे बा ख़बर। अल् हज़र दअ लैस युग़्नी अन् क़दर॥

दर हज़र शूरीदने शूरो शरस्त। रौ तवक्कुल कुन, तवक्कुल बेहतरस्त॥

बा क़ज़ा पंजे मज़न ऐ तुन्दो तीज़।  ता नगीरद हम क़ज़ा बा तू सतीज़॥

मुर्दे बायद बूद पीशे हुक्मे हक़। ता नयायद ज़ख़्म अज़ रब्बुल् फ़लक़[41]

(सारे पशुओं ने कहा–ऐ परम विद्वान् व्यक्ति, सावधानी तथा प्रयत्न बहुत अच्छी चीज़ है लेकिन तभी तक जब तक वह ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध न हो। सावधानी में अनेक प्रकार के उपद्रवों का जंजाल है। जाओ, परमेश्वर पर छोड़ दो। वही बेहतर रास्ता है। ऐ ख़तरनाक शेर, भाग्य के साथ पंजा मत लड़ाओ। कहीं ऐसा न हो कि भाग्य भी तुमसे लड़ाई करने पर उतारू हो जाए। परमेश्वर की इच्छा के आगे हमें चाहिए कि हम मृत की तरह व्यवहार करें। ताकि ईश्वर की ओर से हमें हानि न पहुँचे। )

पशुओं के उपर्युक्त कथन के विरुद्ध अपनी बात सिद्ध करने के लिए शेर पैग़म्बर की दो हदीसों का हवाला देता है–

गुफ़्त–आरी, गर तवक्कुल रहबर अस्त। ईन् सबब हम सुन्नते पैग़म्बर् अस्त॥

गुफ़्त पैग़म्बर ब आवाज़े बुलन्द। बा तवक्कुल ज़ानु ए उश्तुर बेबन्द॥

रम्ज़े-‘अल्कासिब हबीबुल्लह’ शिनौ। अज़ तवक्कुल दर सबब काहिल मशौ[42]

(शेर ने कहा– माना कि तवक्कुल हमारा रहनुमा है, लेकिन प्रयत्न भी पैग़म्बर की सुन्नत=परम्परा है। पैग़म्बर मुहम्मद ने तार स्वर से कहा है– ईश्वर पर विश्वास रखकर ऊँट के घुटने बाँध दो[43]। ‘अल्कासिबु हबीबुल्लाह’= काम करने वाला ईश्वर का प्रिय होता है, इसका रहस्य सुनो! यह है– तवक्कुल=ईश्वरार्पण के बहाने से  साधनों तथा कर्तव्यों की ओर से आलसी मत बनो।  )

पशुओं ने शेर की बात काटते हुए कहा कि यदि तुम मानते हो कि प्रयत्न ही सबसे बड़ी वस्तु है तो समझ जाओ कि ईश्वर पर विश्वास रखना ही सबसे बड़ा, वास्तविक और सुरक्षित प्रयत्न है। तवक्कुल के बिना किए हुए प्रयत्न से व्यक्ति एक बला के बाद दूसरी बला में पड़ जाता है। एक ओर वह साँप से बचता है तो दूसरी ओर उसे अजगर मिल जाता है। मनुष्य के उपाय ही उसके जाल बन जाते हैं। वह दरवाज़ा बन्द करके सोचता है कि वह सुरक्षित है जबकि उसका दुश्मन उसके घर में ही बैठा होता है। हमारी आँखों में हज़ारों दोष हैं इसलिए हमें अपनी आँखों को प्रिय (प्रभु) की आँखों में विलीन कर देना चाहिए। अपनी आँखों के बजाय उसकी आँखे पाना क्या अद्भुत क्षतिपूर्ति है। उसकी आँखों से तुम अपनी सभी इष्ट वस्तुओं को प्राप्त कर लोगे। छोटा बच्चा जब तक पकड़ने और चलने लायक़ नहीं होता तब तक पिता के कन्धे ही उसकी सवारी होते हैं। यदि वह उसके पहले ही चलने की कोशिश करता है तो उसकी दुर्गति होती है। हम भी परमेश्वर के परिवार के बच्चे हैं और दूध के लिए छटपटा रहे हैं। पैग़म्बर ने ख़ुद फ़रमाया है–सारे प्राणी परमेश्वर के परिवारी जन हैं[44]-अल्ख़ल्क़ु कुल्लुहुम् अयालुल्लाहि। वह जो कि आसमान से बारिश करता है, उसकी कृपा हमें रोटी भी दे सकती है।

शेर पशुओं की उपर्युक्त बात को स्वीकार करते हुए भी पुरुषार्थ की महत्ता पर अपना मत व्यक्त करता है। शेर ने कहा कि आप लोगों की बातें सही हैं लेकिन परमेश्वर ने हमारे पैरों के आगे प्रयत्न रूपी सीढ़ी लगा दी है ताकि हम इसके एक एक सोपान पर चढ़ कर छत तक पहुँच सकें। अब ऐसी अवस्था में भाग्यवादी बन कर बैठे रह जाना मूर्खतापूर्ण लोभ है। जब तुम्हारे पास पैर है तो तुम लंगड़े क्यों बन रहे हो। हाथ के होने पर भी अपनी अंगुलियों को छिपा क्यों रहे हो। अगर मालिक नौकर के हाथ में एक बेलचा दे दे तो बिना कहे ही मालिक का मन्तव्य प्रकट हो जाता है। तुम्हें जो उसने बेलचे जैसे हाथ दिये हैं वह प्रयत्न करने की ओर ही संकेत करता है। अगर तुम उसके संकेतों को अपने प्राणों में धारण कर सकोगे तो उन पर जान भी दे सकोगे। उसके संकेत तुम पर रहस्यों को खोल देते हैं। अभी तुम भार ढो रहे हो, उसके संकेतों के अनुसार आचरण करने पर वह स्वयं तुम्हारे भार का वहन करेगा। अगर उसके आदेशों को स्वीकार करोगे तो वह तुम्हें स्वीकृत बना देगा। पुरुषार्थ का आसरा लेना परमेश्वर की नेमतों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन है, जबकि भाग्यवादी होना उनको अस्वीकृत कर देना है। पुरुषार्थ के प्रति धन्यवाद देने से तुम्हारी प्रयत्न करने की शक्ति बढ़ेगी जबकि उनके प्रति उदासीन होने से वे नेमतें तुम्हारे हाथ से दूर हो जायेंगी। भाग्यवादी होना मानो रास्ते में सोना है। जब तक हमें मंज़िल न मिल जाये तब तक सोना उचित नहीं है। भाग्यवादी होना मानों लुटेरों के बीच में ग़ाफ़िल होकर सो जाना है। भाग्य पर भरोसा करने वाली बुद्धि भ्रमित है। जिस मस्तिष्क में सोचने की क्षमता नहीं है वह दुम की तरह है। भाग्यवादिता नाशुक्री है और वह ईश्वर का अपमान है इसलिए वह सीधे नरक को ले जाती है। अगर तुम्हें भाग्य का आश्रय लेना ही है तो प्रयत्न करने के बाद लेना चाहिए–बीज बोओ और उसके बाद ईश्वर पर छोड़ दो[45]

शेर के इस तर्क का पशुओं ने पुरज़ोर विरोध करते हुए कहा कि प्रयत्न तथा विभिन्न साधनों का आश्रय लेने वाले लोभी हैं। यदि प्रयत्न से ही सब कुछ मिलने वाला होता तो बताओ इतिहास में गुज़रे हज़ारों हज़ार प्रयत्नशील स्त्री पुरुष दुर्भाग्य ग्रस्त क्यों रहे। अनेक युगों में छलपूर्ण प्रयत्न करने वालों ने इतने अधिक प्रयत्न किये हैं जिनके बारे में स्वयं क़ुर्आन में कहा गया है कि उन प्रयत्नों से पहाड़ भी उखड़ जायें (सूरा१४–आयत ४६), लेकिन अन्ततः उन्हें वही मिला जो उनकी क़िस्मत में बदा था।

परमेश्वर के आदेश के आगे सभी प्रयत्नों की व्यर्थता को सिद्ध करने के लिए मौलाना ने इसी कहानी के बीच में एक और छोटी सी रोचक कहानी की योजना की है जो इस प्रकार है[46]

एक सुबह एक भद्र व्यक्ति सुलेमान के दरबार की ओर न्याय के लिए भागा जा रहा था।

उसका चेहरा दुख से पीला तथा उसके दोनों होंठ नीले पड़ गये थे। सुलेमान ने उससे पूछा–

आपको क्या कष्ट है? उस आदमी ने कहा कि इज़राईल (मृत्यु के फ़रिश्ते) ने मेरी ओर क्रोध

और घृणा से भरी नज़रों से देखा है। सुलेमान से उससे पूछा कि बताओ अब क्या चाह रहे हो?

उस व्यक्ति ने कहा कि हवा से कहो कि मुझे यहाँ से हिन्दुस्तान ले जाये, शायद वहाँ मेरी जान बच जाये।

सुलेमान ने हवा को आज्ञा दी कि वह इस व्यक्ति को हिन्दुस्तान के किसी सुदूर घाटी में छोड़ आये।

दूसरे दिन दरबार की बैठक में सुलेमान ने इज़राईल से पूछा–तुम एक भले आदमी को ऐसे क्यों देखते हो

कि उसे अपना घर छोड़कर भागना पड़ता है? इज़राईल ने कहा– अरे मैं उसको क्रोध से कब देख रहा

था, मुझे तो उसे राह में देखकर आश्चर्य हुआ कि मुझको ईश्वर ने आदेश दिया है कि इस आदमी की

जान तुम्हें हिन्दुस्तान में लेनी है। मुझे आश्चर्य हुआ था कि अगर इस आदमी के अगर सैकड़ों पंख भी हो

जायें तो भी इतनी जल्दी हिन्दुस्तान पहुँचना इसके लिए कठिन है।

इस कहानी में मौलाना रूमी ने मृत्यु को ईश्वराज्ञा और हिन्दुस्तान जाने को मनुष्य के फ़िज़ूल प्रयत्नों का प्रतीक माना है–

तर्स दरवेशी मिसाले आन् हरास। हिर्सो कूशिश रा तू हिन्दुस्तान शनास[47]

 

शेर अभी भी हार नहीं मानता है। वह कहता है आपकी बातें तो ठीक हैं लेकिन ईश्वर के द्वारा भेजे गये पैग़म्बरों के जीवन को तो देखें जो अनेक प्रकार के कठिन प्रयत्नों से भरा हुआ है। ईश्वर ने उनके प्रयत्नों को सफल बनाया। उनकी अल्पताएँ पूर्णताओं में विपरिणत हुईं। तुम लोग भी प्रयत्न करो ताकि उन महान् लोगों के रास्ते पर चल पाओ। मानव द्वारा किये गये प्रयत्न को ईश्वराज्ञा के साथ विरोध करना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ईश्वराज्ञा ही यही है कि मनुष्य प्रयत्न करे[48]। वही प्रयत्न श्रेष्ठ है जो संसार के त्याग की दिशा में किया जाये न कि जो संसार में फँसने का कारण बन जाये। यह संसार कारागार की तरह है और हम सब इसमें बन्दी हैं। इस कारागार में सूराख़ करने का प्रयास करो और ख़ुद को बचा लो। दुनिया क्या है? ईश्वर से विमुख होना। कपड़ा–लत्ता, सोना–चाँदी, स्त्री–पुरुष दुनिया नहीं हैं। क्योंकि वह सम्पत्ति जो धर्म के कार्य में व्यय होती है वह श्रेष्ठ सम्पत्ति है। वह आसक्ति का कारण नहीं बनती है। सम्पत्ति पानी की तरह है। पानी अगर नाव के नीचे रहे तो वह उसे गति देता है, लेकिन वही अगर नाव के अन्दर आ जाये तो नाव को ही नष्ट कर देता है। निष्किंचनता की हवा जिस व्यक्ति के हृदय में भरी रहती है वह संसार के सागर में वैसे ही नहीं डूबता है जैसे कि वह घड़ा जिसका मुँह ढँका हो और जिसके अन्दर हवा भरी हो। इसलिए प्रयास अपने आप में बुरा नहीं है यदि वह निःस्पृह हो।

इस बात की प्रबल सम्भावना है कि रूमी अपने इस प्रतिपादन में योगवासिष्ठ के प्रारम्भ में ही उपलब्ध दैव–पुरुषकार सम्बन्धी शास्त्रार्थ से अतीव प्रभावित हुए हों। लेकिन वहाँ एक महत्त्वपूर्ण अन्तर ध्यातव्य है कि योगवासिष्ठकार ने जहाँ पुरुषार्थ के पक्ष को समर्थित किया है, जबकि रूमी के यहाँ दैव (अर्थात् पशुओं) का पक्ष भारी पड़ता है। दोनों ग्रन्थों के इस प्रकार के भिन्न निष्कर्षों के पीछे विशिष्ट दार्शनिक उद्देश्य हैं। यह पूरा प्रसंग स्वतन्त्र अध्ययन की अपेक्षा रखता है।

मौलाना सूचना देते हैं कि पुरुषार्थवादी शेर इस प्रकार बहुत से तर्क देता रहा जिससे थक कर पशुओं ने वाद विवाद छोड़ कर ईश्वरेच्छा को व्यवहार में लाना श्रेयस्कर समझा। उन्होंने शेर को राज़ी कर लिया कि हम एक पशु, जिसका भाग्य विपरीत होगा, को नित्य आपकी सेवा में उपस्थित करेंगे।

अन्ततः ख़रगोश की बारी आती है। रूमी ने ख़रगोश तथा पशुओं के मध्य वार्तालाप भी उपस्थित किया है। रूमी के अनुसार ख़रगोश रुक कर इस आपदा से छूटने के उपाय पर चिन्तन करता है तथा इससे पशुओं को अवगत कराता है। पशुगण उसे डाँट पिलाते हुए उसका उपहास करते हैं कि तुमसे बड़े बड़े पशुओं के मस्तिष्क में इससे बचने का रास्ता नही आ पाया तो तुम्हारे दिमाग में क्या आयेगा। ख़रगोश कहता है कि ईश्वर ने उसे हिदायत दी है जिसके नाते निर्बलों के पास भी महत्त्वपूर्ण विचार आ जाते हैं। इस प्रसंग में बहुत सारे उदाहरणों द्वारा ख़रगोश इस बात को सिद्ध करता है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि रूमी ने मूल कथा में अनुपस्थित इस प्रसंग को अपनी ओर से जोड़ा है ताकि ईश्वर की महत्ता को स्पष्ट किया जा सके।

कथा के सन्देश का आध्यात्मिकीकरण करते हुए भी रूमी ने पञ्चतन्त्र के सन्देश का नितान्त अनादर नही किया है। कथा के इस बिन्दु पर वे बुद्धि की श्रेष्ठता का भी बयान करने लगते हैं, जो मूल कहानी का कथ्य है। रूमी के अनुसार मनुष्य प्रजाति सम्पूर्ण सृष्टि पर क़ाबिज़ इसी कारण से है क्योंकि उसमें बुद्धि की प्रधानता है।

कथा की समाप्ति के पहले रूमी इसमें एक और छोटी सी घटना जोड़ते हैं। पशुओं को जब पता चलता है कि ख़रगोश के पास शेर को हराने की कुछ विशेष योजना है तो वे उससे उसके बारे में पूछते हैं। वे सबसे सलाह करने की बात करते हैं जिससे योजना को और स्पष्ट रूप दिया जा सके। ख़रगोश आपस में मशविरा करने से मना कर देता है और वही जवाब देता है जो संस्कृत की सूक्ति षट्कर्णो भिद्यते मन्त्रः[49] से अभिव्यक्त होता है–

दर बयाने ईन् दो से जुम्बान् लबत। अज़ ज़हाबो अज़ ज़हब व,ज़ मज़हबत॥

व,र बेगूयी बा यकी दो अल् विदाअ। कुल्लु सिर्रिन् जाविज़ इस्नैन शाअ॥

 

वस्तुतः इस चर्चा के पीछे रूमी का उद्देश्य इस आध्यात्मिक मर्यादा को स्पष्ट करना है कि आध्यात्मिक मार्ग की उपलब्धियों के बारे में सर्वत्र व्यर्थ सूचना देने से वे निर्बल होकर नष्ट हो जाती हैं–  धर्मः क्षरति कीर्तनात्। ध्यातव्य है कि मौन रूमी की केन्द्रीय शिक्षाओं में से एक है। ख़ामोश रहने को वे इतना महत्त्व देते हैं कि अपनी ग़ज़लों में उन्होंने शम्स के अतिरिक्त अपने लिए ख़ामोश तख़ल्लुस (काव्यनाम) का भी इस्तेमाल किया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि रूमी ने अपने इसी अनुवर्ती सिद्धान्त को यहाँ भी प्रस्तुत करना चाहा है।  उनकी ग़ज़लों से इसी कोटि का एक उदाहरण है–

ख़मुश ख़मुश! कि इशाराते इश्क़ मा,कूस् अस्त!!
निहान् शवन्द म,आनी ज़ गुफ़्तने बिसियार[50]।।

(शान्त रहो, चुप रहो! क्योंकि प्रेम के इशारे उल्टे होते हैँ। अधिक बोलने से अर्थ -उन्हीं बातों में- छिप जाते हैं।)

 

मौलाना वस्तुतः अध्यात्म से इतने अधिक आविष्ट हैं कि जब भी किसी पात्र के मुँह से बोलते हैं तो अध्यात्म की गुत्थियाँ ही सुलझाने लगते हैं। उन्हें इस बात की कोई फ़िक्र नहीं रहती कि कथा में पात्र नायक है अथवा नायकेतर। वे सबके मुँह से अपना अभिप्रेत अर्थ कहलवाने लगते हैं। ख़रगोश के देर करने पर शेर पशुओं को कोसता हुआ अनेक नीति वचनों के द्वारा नीच लोगों की निन्दा प्रस्तुत करता है। इस प्रसंग में वह एक कहानी भी प्रस्तुत करता है। ख़रगोश शेर के पास पहुँच कर देर होने का कारण बताता है। शेर उसके जाल में फँसता जाता है, और वह उसके साथ कुँए पर चलने को राज़ी हो जाता है जहाँ ख़रगोश की कहानी का शेर छिपा हुआ था।  यहाँ पर मौलाना की टिप्पणी है कि जिसने भी शत्रु की बात पर यक़ीन किया उसकी पराजय निश्चित हो गयी। लेकिन तुरन्त विषय को आध्यात्मिक बनाते हुए वे दो कथायें प्रस्तुत करते हैं। एक हुदहुद की कहानी और दूसरी प्रथम मनुष्य आदम की कहानी। दोनो कथाओं का तात्पर्य है कि जब ईश्वरेच्छा अथवा भावी प्रबल होती है तो व्यक्ति की बुद्धि नहीं चल पाती–

चून् क़ज़ा आयद शवद दानिश ब ख़ाब । मह सियह गर्दद बेगीरद आफ़ताब[51]

 

(जब ईश्वरेच्छा प्रबल होती है तो उसके आगे बुद्धि सोने चली जाती है। चाँद काला पड़ जाता है और सूरज रुक जाता है। )

 

स्पष्ट ही है कि रूमी पञ्चतन्त्र के सन्देश–“बुद्धि के महत्त्व” को ईश्वरेच्छा के मुक़ाबले कम करके दिखाना चाहते हैं। उनका प्रतिपाद्य यह लगता है कि शेर की हार में ख़रगोश की बुद्धि की अपेक्षा ईश्वरेच्छा की भूमिका अधिक थी जिसके कारण शेर की बुद्धि मारी गयी। प्रयत्न की अपेक्षा ईश्वरेच्छा की प्रशंसा में रूमी कहते हैं कि यदि ईश्वरेच्छा (भाग्य) तुम्हें काली रात की तरह लपेट ले तो भी अन्ततः वह तुम्हारी सहायता ही करेगी। अगर भाग्य के नाते तुम्हारा घर लुटता हुआ प्रतीत हो तो भी वह तुम्हें स्वर्ग के राज्य में ऊँचा स्थान दिलायेगी। अगर ईश्वर तुम्हें डरा रहा है तो समझो यह उसकी कृपा ही है ताकि वह तुम्हें अपने उपद्रव रहित राज्य में स्थान दे सके। (मस्नवी १.१२५८–१२६१, पृ॰ ५९)

 

पञ्चतन्त्र तथा मस्नवी की शैली में बहुत प्रकट अन्तर यह है कि पञ्चतन्त्र में कथाओं के अन्तर्गत नीति के उपदेश हैं जबकि मस्नवी में कथाएँ उपदेशों के सामने गौण हैं। बार बार आध्यात्मिक समस्याओं की चर्चा करते हुए रूमी मूल कथा से बहुत दूर चले जाते हैं, और बार बार लम्बी चर्चाओं के बाद मूल कथा की ओर श्रोताओं का ध्यान स्वयं ही आकृष्ट करते हैं। उदाहरण के लिए इसी प्रसंग में वे कहते हैं–

ईन् सुख़न पायान् नदारद गश्त दीर। गूश कुन तू क़िस्से ए ख़रगूशो शीर॥ (मस्नवी १.१२६३,पृ॰ ५९)

(इन आध्यात्मिक चर्चाओं का कोई अन्त नहीं है। बहुत देर हो गयी अब तुम ख़रगोश और शेर की कहानी

को आगे सुनो॥)

शेर को कुँए तक पहुँचा कर खरगोश पीछे हटने लगता है, शेर उसे बलात् अपने साथ कुँए के पास तक लाता है। इस छोटे से प्रसंग को जोड़कर रूमी ने उसका उपयोग आध्यात्मिक प्रवचन के लिए किया है।  रूमी छोटे से छोटे कथा प्रसंग में आध्यात्मिक चर्चा जोड़ते हुए नहीं थकते। उदाहरण के लिए ख़रगोश प्रतिद्वन्द्वी शेर के कुँए में रहने का कारण बताते हुए कहता है कि कुँए का तल वस्तुतः हृदय के एकान्त का तल है जो दुनिया के अन्धकार से बेहतर है। बुद्धिमान लोग इसी एकान्त का आश्रय लेते हैं, क्योंकि एकान्त में ही आध्यात्मिक आनन्द मिल सकता है–

क़ारे चह बुग्ज़ीद हर कू आक़िल अस्त। ज़ा,न् कि दर ख़िल्वत सफ़ा–हा ए दिलस्त॥

ज़ुल्मते चह बेह कि ज़ुल्मत–हा ए खल्क़। सर नबुर्द आन् कस् कि गीरद पा ए ख़ल्क़[52]

 

ध्यातव्य है कि एकान्त सेवन हर संस्कृति की आध्यात्मिक साधनाओं के लिए स्पृहणीय बताया गया है। भगवद्गीता में भी अनेक बार इसकी ताकीद की गयी है[53]। यह भी अवधेय है कि मुख्य धारा के इस्लाम (शरीअत) में समाज से दूर जाकर एकान्तसेवित्व को हतोत्साहित किया गया है। इस सम्बन्ध में पैग़म्बर मुहम्मद का एक वचन (हदीस) को उद्धृत किया जाता है– ला रुहबानिय्यत फ़िल् इस्लाम अर्थात् इस्लाम में एकान्तवास आदि की गुंजाइश नहीं है।

शेर के कुँए में गिर जाने पर रूमी ख़रगोश की बुद्धि की प्रशंसा नहीं करते वे इसे शेर के कुकर्मों का फल बताते हैं। वे कहते हैं कि शेर उसी कुँए में गिर गया जिसको उसने खोदा था। उसका ज़ुल्म ही उसके सर पर आ पड़ा। सारे विद्वानों का कहना है कि ज़ालिमों का ज़ुल्म उन्हीं के लिए अन्धा कुँआ बन जाता है। जो जितना ही ज़ालिम होता है उसका कुँआ उतना ही अधिक भयंकर होता है। न्याय का तक़ाज़ा यही है कि बुरे से बुरे पाप के लिए ख़तरनाक से ख़तरनाक सज़ा दी जाये–

दर फ़ताद अन्दर चही कू कन्दे बूद। ज़ा,न् कि ज़ुल्मश दर सरश आयन्दे बूद॥

चाहे मुज़्लम गश्त ज़ुल्मे ज़ालिमान्। ईन् चुनीन् गुफ़्तन्द जुम्ले आलिमान्॥

हर के ज़ालिमतर चहश बाहौलतर। अद्ल फ़र्मूदे–स्त बदतर रा बतर[54]

 

वे लोग जो दूसरों पर ज़ुल्म करते हैं वस्तुतः वे अपने पर ज़ुल्म कर रहे होते हैं। जैसे कि शेर अपनी परछाईं पर हमला कर रहा था। अगर तुम्हें किसी अन्य पर ग़ुस्सा आ रहा है तो वास्तविकता यह है कि तुम्हें ख़ुद पर क्रोध आ रहा है। अगर तुम्हें अपने चाचा की सूरत अच्छी नहीं लग रही है तो वस्तुतः वह तुम ही हो जो अपने आप को अप्रिय लग रहे हो। इसीलिए पैग़म्बर का कहना है कि ईमान वाले एक दूसरे के लिए आईना होते हैं। तुम्हारी आँखों के आगे काला शीशा लगा हुआ है जिससे तुम्हें सारी दुनिया काली नज़र आ रही है। अगर तुम दृष्टिहीन नहीं हो तो उस कालेपन का स्रोत ख़ुद को समझो और किसी अन्य को दोष न दो। ईमान वाले सारी वस्तुओं को ईश्वर की रौशनी में देखते हैं इसलिए उन्हें वस्तुएँ यथावस्थ नज़र आती हैं।

पञ्चतन्त्र के विपरीत रूमी शेर के कुँए में गिर जाने पर ही कथा समाप्त नहीं कर देते। शेर से ख़रगोश के छूटने के उत्सव को वे एक साधक के ईश्वर प्राप्ति के बाद मृत्यु से छूटना समझते हैं। रूमी के अनुसार हमारी आत्माएँ इस भौतिक संसार में बन्दी हैं और जब वे इस पाञ्चभौतिक संसार से छूटती हैं तो प्रसन्न हो जाती हैं। तब वे ईश्वर के प्रेम रूपी वायु में पूर्णिमा के सम्पूर्ण चन्द्र की तरह नृत्य करने लगती हैं। मौलाना जलालुद्दीन रूमी के अनुसार आशिक दो तरह के होते है तलब वाले और तरब वाले[i]। वे जब तक वे महबूब से मिले नहीं होते तलब अर्थात् निरन्तर अन्वेषण में रहते हैं। मिलन के बाद वे नख से शिख तक तरब अर्थात् उत्सव में निमग्न हो जाते हैं। रूमी की कविताओं में दोनों भाव अत्यन्त ऊर्जस्वल प्रकार से प्राप्त होते हैं। ईश्वरमिलन के उत्सव का वर्णन वे कहीं नहीं छोड़ते।

मौलाना कई बार घटनाओं की विपरीत आयाम में व्याख्या करते हुए भी आध्यात्मिक उपदेशों के लिए प्रयुक्त करते हैं। शेर कुँए में पड़ा हुआ है और ख़रगोश खुशखबरी सुनाने के लिए जंगल में अपने साथियों की ओर भाग रहा है, इस परिस्थिति को प्रतीक के रूप में लेकर वे अपने शिष्य को सम्बोधित करके कहते हैं कि वासना रूपी तुच्छ ख़रगोश ने तुम्हारे जैसे बड़े शेर को कुँए के तल में गिरा दिया है। तुम्हारी इन्द्रियाँ खरगोश की तरह जंगलों में भाग रही हैं और तुम शेर की तरह पराजित होकर पड़े हुए हो। शर्म है उस शेर पर जिसको कि ख़रगोश ने पराजित कर दिया , इस पर भी तुर्रा यह है कि तुम चाहते हो कि तुम्हें फ़ख़्रे–दीन (धर्म के लिए गर्वास्पद=महान् धार्मिक) कहा जाए[55]

प्रसन्न ख़रगोश शेर के गिरने की शुभ सूचना पशुओं को देता है। पशु उसे घेर कर ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए उसकी प्रशंसा करते हैं तथा उससे इस अद्भुत कृत्य का रहस्य जानना चाहते हैं। ख़रगोश विनम्रता पूर्वक कहता है कि इस सारी सफलता का कारण परमेश्वर की सहायता है अन्यथा संसार में एक ख़रगोश की क्या औक़ात। परमेश्वर ने मुझे दृष्टि दी जिसके कारण मुझे बल प्राप्त हुआ। परमेश्वर जिसे चाहे प्रतिष्ठा दिलाता है और जिसे चाहे पतन का रास्ता दिखाता है[56]

कहानी का अन्त इस ख़रगोश की पशुओं से इस सलाह के साथ होता है कि आप लोगों को भाग्य चक्र के द्वारा दिखाये गये इस परिवर्तनीय ख़ुशी से मदमत्त नहीं होना चाहिए बल्कि उस अवस्था को प्राप्त करना चाहिए जहाँ इस प्रकार के हानि लाभ के अवसरों का स्पर्श नहीं होता–

हीन् ब मुल्के नौबती शादी मकुन। ऐ तू बस्ते नौबत आज़ादी मकुन॥

आन् के मुल्कश बरतर अज़ नौबत तनन्द। बर तर अज़ हफ़्त अंजुमश नौबत तनन्द॥

बर तर अज़ नौबत मलूके बाक़ी अन्द। दौरे दाइम रूह–हा बा साक़ी अन्द॥

तर्के ईन् शुर्ब अर बेगूयी यक दो रूज़। दर कनी अन्दर शराबे ख़ुल्द पूज़॥ (मस्नवी १.१३६९–१३७२)

 

मौलाना पैग़म्बर के एक हदीस का हवाला देते हुए अन्ततः आह्वान करते हैं कि बाहरी शत्रु को मारना सबसे छोटा जिहाद (जिहादे असग़र) है। अब हमें अपने अन्दर के दुर्गुण रूपी शत्रुओं को मारने के लिए सबसे बड़ा जिहाद (जिहादे अकबर) करना होगा– रजअना मिन् जिहादिल् असग़र इला जिहादिल् अकबर

 

ऐ शहान् कुश्तीम मा ख़स्मे बिरून्। मान्द खस्मी ज़ू बतर दर अन्दरून्॥

कुश्तने ईन् कार अक़्लो हूश नीस्त। शीरे बातिन सख़्रे ए ख़रगूश नीस्त॥

दूज़ख़ अस्त ईन् नफ़्सो दूज़ख़ अज्दहास्त। कू ब दर्या–हा न गर्दद कम्मो कास्त॥

सह्ल शीरी दान् कि सफ़–हा बिश्कनद। शीरे आन–स्त आन् कि ख़ुद रा बिश्कनद[57]

(ऐ शाहंशाहो, हमने बाहरी दुश्मनों को मार डाला है, लेकिन उनसे ख़तरनाक दुश्मन हमारे अन्दर हैं। यह दुश्मन चतुराई और होशियारी से नहीं मारा जा सकता। अन्दर का शेर ख़रगोश से पराजित नहीं होता। हमारी आन्तरिक वासना नरक है और नरक अजगर की तरह है। उसकी आग अनेक समुद्रों के जल से नहीं बुझ सकती। दुश्मनों की पंक्तियों को तोड़ने वाला शेर तो घटिया शेर है। असली शेर वह है जो अपने आप को तोड़ पाता है। )

 

  • मत्स्यत्रय कथा – (क़िस्से ए आन् आबगीर ओ सय्याद व आन् से माही[58])

तीन मछलियों की यह कथा अत्यन्त प्राचीन है। इसका प्राचीनतम स्वरूप महाभारत में प्राप्त होता है। पञ्चतन्त्र में यह कहानी इस रीति से आयी है जिससेराजनीति के इस सिद्धान्त का पोषण हो सके कि अशक्त पक्ष को बलवान् शत्रु से बचकर निकल आना चाहिये–

अशक्तैर्बलिनः शत्रोः कर्तव्यं प्रपलायनम्।

श्रयितव्योऽथवा दुर्गो नान्या तेषां गतिर्भवेत्॥

मूल कथा का संक्षेप यह है कि किसी तालाब में अनागतविधाता, प्रत्युत्पन्नमति तथा यद्भविष्य नामक तीन मछलियाँ रहती थीं। किसी दिन एक मछुआरे ने तालाब में दूसरे दिन उसमें जाल डालने का निश्चय किया। यह बात मछलियों को पता चल गयी। अनागतविधाता ने सबसे स्थिति की भयावहता को बताते हुए वहाँ से दूसरे तालाब में जाने का परामर्श किया। प्रत्युत्पन्नमति के अतिरिक्त यद्भविष्य आदि मछलियों ने उसके विचार को अस्वीकार कर दिया। फलतः वे दोनों दूसरे तालाब में चली गयीं। प्रातःकाल मछुवारों ने जाल डालकर सम्पूर्ण तालाब को मछलियों से रहित कर दिया।

   पञ्चतन्त्र की इस कथा का कलेवर बहुत छोटा है। बाद के संस्करणों में इस कथा में परिवर्तन भी कर दिया गया है। विशेषतः यह परिवर्तन कथा में अनागतविधाता तथा प्रत्युत्पन्नमति की स्थितियों में विभेद को और भी विस्तृत करने के लिए किया गया है। रूमी ने इसे पञ्चतन्त्र के फ़ारसी संस्करण कलीलः व दिम्नः से लिया है। कलीलः व दिम्नः में भी लेखक ने कथा में कई जगह परिवर्तन कर दिया है तथा इसी परिवर्तित संस्करण का उपयोग मौलाना ने अपनी आध्यात्मिक व्याख्या के लिये किया है।

मूल कथा में मछुआरों के आने का समय दूसरे दिन सुबह बताया गया है लेकिन रूमी के अनुसार मछुआरे तालाब को देखते ही जाल ले आने के लिए भागते हैं, जो बात होशियार मछलियों को पता चल जाती है। कथा के कलीलः दिम्नः संस्करण में पञ्चतन्त्र  के विपरीत आक़िल=बुद्धिमान् (मूल में अनागतविधाता) मछली किसी से परामर्श नहीं करती और चुपचाप आत्मरक्षा हेतु निकल जाती है। मौलाना इससे वास्तविक वैराग्य से सम्पन्न जीव का प्रतीक लेते हैं। उनके अनुसार वास्तविक वैराग्य होने के बाद संसार को छोड़ने के लिए हमें संसारी जीवों से कभी भी सलाह नहीं लेनी चाहिये। वरना संसारियों की भोग बुद्धि उसे परमार्थ मार्ग से हटा सकती है। जो लोग ख़ुद भोग में आकण्ठ मग्न हैं वे संसार को छोड़ने की सलाह क्यों देंगे–

आन् कि आक़िल बूद अज़्मे राह कर्द–अज़्मे राहे मुश्किले नाख़ाह कर्द

गुफ़्त बा ईन् हा नदारम मशविरत– के यक़ीन् सुस्तम कुनद अज़ मक़्दिरत

मश्विरत रा ज़िन्दे ई बायद निकू–कि तुरा ज़िन्दे कुनद व् आन् ज़िन्दे कू

ऐ मुसाफ़िर बा मुसाफ़िर राय ज़न–ज़्,आन् कि पायत लंग दारद राये ज़न

(जो आक़िल मछली थी उसने बाहर जाने का कठिन रास्ता चुन लिया। उसने कहा मैं इन मछलियों से सलाह नहीं लुंगी, क्योंकि वे मेरी निश्चय शक्ति को शिथिल कर देंगी। सलाह जीवन्त लोगों से लेनी चाहिए जो तुम्हें भी जीवन्त कर दें। वैसे ज़िन्दा लोग कहाँ हैं। ऐ मुसाफ़िर, तू केवल मुसाफ़िरों से सलाह लो क्योंकि औरतों की सलाह तुम्हारे पाँवों को लँगड़ा बना देगी।)

 

जो मछलियाँ तालाब को नहीं छोड़ने के पक्ष में थीं उसमें उनका तर्क था कि अपने पूर्वजों के स्थान–स्वदेश को वे मरने के भय से नहीं छोड़ेंगी। क्योंकि व्यक्ति कहीं भी जाये मृत्यु उसका पीछा नहीं छोड़ती। मृत्यु तो सुरक्षित स्थानों पर भी हो सकती है[59]। रूमी भी इस प्रसंग में पैग़म्बर के एक हदीस – हुब्बुल् वतन मिनल् ईमान, को विपक्षी के पक्ष में आशंकित करके उसकी अपव्याख्या करने से रोकते हैं। पञ्चतन्त्र में भी इस तथाकथित देशभक्ति का निरास करते हुए कहा गया है कि पौरुषहीन लोग ही स्वदेश का त्याग करने से डरते हैं तथा अपने आलस्य को देशप्रेम का चोला पहनाते हैं –

परदेशभयाद्भीता बहुमाया नपुंसकाः।

स्वदेशे निधनं यान्ति काकाः कापुरुषा मृगाः[60]

मौलाना कहते हैं कि इस बनावटी देशप्रेम से दूर हो जाओ क्योंकि जिसे तुम अपना देश समझ रहे हो वह तुम्हारा देश है ही नहीं । तुम्हारा स्वदेश तुम्हारा अन्तर है। वहाँ जाने से मत डरो –

अज़ दमे हुब्बुल् वतन बुग्ज़र म–ईस्त।  के वतन आन् सू–स्त जान् ईन् सूइ नीस्त॥

वे कहते हैं कि हदीस वाली बात सही है कि देशभक्ति ईमान का अंश है। लेकिन हमें  पहले यह समझना होगा कि देश शब्द का अर्थ क्या है? तुम्हारा देश भौतिक अस्तित्व वाला देश नहीं अपितु तुम्हारा आन्तरिक स्वरूप है और उससे प्रेम करना ही ईमान का अंश है।

मौलाना के अनुसार पहली मछली तालाब में नहीं अपितु समुद्र की ओर जाती है। इसका तात्पर्य यह है कि वह अल्प साधनों वाले मटमैले छोटे जोहड़ से निकल कर अनन्त जलराशि से सम्पन्न सागर की शरण ले रही है। सागर परमेश्वर का प्रतीक है। अनेक कष्टों को सहते हुए इस बुद्धिमान् मछली ने अन्ततः अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर ली[61]

इधर जब मछुवारे जाल लेकर तालाब पहुँचे तो नीम–आक़िल=अर्धविद्वान्  (प्रत्युत्पन्नमति) मछली ने पश्चात्ताप किया। उसने सोचा कि मैंने बहुत महत्त्वपूर्ण अवसर गवाँ दिया। मुझे आक़िल मछली के साथ जल्दी से निकल जाना चाहिए था यद्यपि वह बिना बताये चली गयी थी। लेकिन अब बीती बात पर शोक करने का समय नहीं रहा क्योंकि बीती चीज़ें फिर से लौटकर नहीं आतीं। अपने इस कथन के समर्थन में वह एक रोचक कहानी कहती है जिसमें एक क़ैदी चिड़िया की वसीयत है कि बीती हुई बात पर हमें अफ़सोस नहीं करना चाहिए।  ध्यातव्य है कि यह प्रसंग मूल पञ्चतन्त्र से भिन्न है।

बीते वक्त का अफ़सोस छोड़कर दूसरी मछली बचने का उपाय ढूँढती है। वह अपना पेट फुलाकर और शरीर को पलट कर मरने का नाटक करती है जिसके नाते मछुवारे उसे मरा समझ कर छोड़ देते हैं । मौलाना प्रकृत प्रसङ्ग का अद्भुत उपयोग इस सूफ़ी सिद्धान्त को समझाने में करते हैं कि इस संसार में जो मृत्यु से पहले मर गया वह छूट गया। मृत्यु के पहले मरने का तात्पर्य इस संसार के भोगों के प्रति आत्यन्तिक विरक्ति है। इस प्रसंग में वे पैग़म्बर की इसी आशय की एक हदीस को भी उद्धृत करते हैं।

मुर्दे गर्दम ख़ीश बिस्पारम बर् आब। मर्ग पीश् अज़ मर्ग अम्न् अस्त् अज़् अजाब॥

मछुवारे उसे मरा समझ कर अफ़सोस करते हैं। एक मछुवारा उसे हाथ में लेता है और घृणापूर्वक थूक कर एक ओर अलग फेंक देता है। वह मछली घिसटते घिसटते एक पास के तालाब में चली जाती है और उसके प्राण बच जाते हैं।

तृतीय जाहिल=मूर्ख (यद्भविष्य) मछली बचने की बहुत कोशिश करती है लेकिन अन्ततः पकड़ ली जाती है।  जब उसे आग के पास ले जाया जाता है तो वह पश्चात्ताप करती है । यह पश्चात्ताप वस्ततुः उस संसारी व्यक्ति का है जो मृत्यु आने पर अपनी मूर्खता पर रोता है । मछली का कहना है कि अगर मैं इस कष्ट से छूट गयी तो फिर ऐसे असीम जलस्थान का आश्रय लूँगी जिसमें अनन्त काल तक सुरक्षित तथा आनन्दित हो पाऊँ। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह असीम जलाशय ईश्वर ही है–

बाज़ मी गुफ़्त् ऊ कि गर ईन् बार मन। वा रहम ज़ीन् मेहनते गर्दन शिकन॥

मन नसाज़म जुज़ बे दरहा ए वतन। आबगीरी रा न मन साज़म सकन॥

आबे बी–हद जूयमो आमन शवम। ता अबद दर अम्न ओ सेह्हत मी रवम[62]

 

  • गोमायुदन्दुभिकथा (तर्सीदने कूदक अज़ आन साहिबे जस्से व गुफ़्तने आन शख़्स कि ऐ कूदक, मतर्स कि मन नामर्दम्[63])

गोमायुदुन्दुभिकथा पंचतंत्र के मित्रभेद नामक पहले तन्त्र की दूसरी कथा है। इस कथा की अवतारणा इस शिक्षा के लिए की गयी है कि किसी वस्तु के बाहरी स्वरूप अथवा उसके शब्द मात्र को सुनकर उससे प्रभावित होना अथवा डरना नहीं चाहिए। कथा इस प्रकार है कि किसी युद्धभूमि में किसी वृक्ष पर छोड़ दिया गया दुन्दुभि (बड़ा ढोल) पड़ा हुआ था जो हवा के नाते उस वृक्ष की चंचल डालियों से बज रहा था। गोमायु नामक सियार ने जब यह आवाज़ सुनी तो डर गया। लेकिन दिल मजबूत करके वह ढोल के पास गया और सोचा कि इसके अन्दर कोई मांसल जीव है। शिकार के उद्देश्य से नाख़ूनों से चमड़े में छेद करके वह उस बड़े ढोल में घुसा लेकिन वहाँ काठ के अलावा कुछ भी नहीं था। चमड़े को छेदते हुए बेचारे के नाख़ून भी टूट गये।  सियार यह श्लोक पढ़ता हुआ वहाँ से निकल गया–

पूर्वमेव मया ज्ञातं पूर्णमेतद्धि मेदसा।

अनुप्रविश्य विज्ञातं यावच् चर्म च दारु च॥

(पहले मुझे लग रहा था कि यह ढोल वसा चर्बी से भरा हुआ है। अन्दर जाकर मैंने जाना कि यह केवल

चमड़ा और लकड़ी भर है।)

 

मौलाना ने इस कथा का बड़े विचित्र से समलैंगिक[64] सन्दर्भ में उपयोग किया है। ध्यातव्य है कि मौलाना रूमी तथा अन्यान्य फ़ारसी कवियों के वर्णनों में समलैंगिकता के सन्दर्भ प्रकट तथा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। उर्दू कविता में प्रेयसी का पुंल्लिङ्ग में वर्णन किया जाना फ़ारसी कविता का ही प्रभाव है। प्रसिद्ध ईरानी विद्वान् सीरूश शमीसा ने अपनी पुस्तक शाहिदबाज़ी दर अदबियाते फ़ारसी[65] में फ़ारसी कविता में समलैंगिकता के प्रसंगों की बड़ी सूक्ष्मता से पड़ताल की है। संस्कृत आदि प्राचीन भारतीय साहित्य में इस प्रकार के प्रसंग खोजने पर भी नहीं मिलते। फ़ारसी आदि साहित्य में आयी यह प्रवृत्ति कितने हद तक उस समाज में प्रचलित प्रवृत्तियों का प्रतिफलन है, यह शोध का विषय है।  स्वयं रूमी ने अपनी मस्नवी में यौनिकता सम्बन्धी अनेक असुन्दर प्रसंग उपस्थापित किये हैं जिसे कई लोग अश्लील तथा स्त्रीविरोधी भी कह सकते हैं।

मौलाना रूमी द्वारा उपर्युक्त कथा के सन्देश में कुछ विशेष परिवर्तन नहीं किया गया है। उनकी छोटी सी कहानी का सार इस प्रकार है–

एक दिन एक हृष्ट–पुष्ट आदमी ने एक लड़के को पकड़ लिया। लड़का उसकी बुरी नीयत को भाँप कर डर के मारे पीला पड़ गया। उस आदमी ने लड़के से कहा– ऐ मेरे ख़ूबसूरत जवान, बिलकुल डरो मत क्योंकि तुम मेरे ऊपर रहोगे। मैं भले ही देखने में डरावना लग रहा होऊँ लेकिन मैं हूँ नपुंसक। तुम मुझपर ऊँट की तरह सवारी करो और मुझे धक्का दो। अनेक लोग देखने में कुछ और वास्तव में कुछ और ही होते हैं, बाहर से आदमी लेकिन अन्दर से गर्हित असुर होते हैं–

सूरते मर्दानो मानी ईन् चुनीन् । अज़ बिरून् आदम दरून् दीवे लईन्[66]

तुम उस ढोल की तरह हो जिसे हवा पीट रही थी और उससे आवाज़ आ रही थी। लोमड़ी ने उसके लोभ में अपना शिकार छोड़ दिया। जब उसने ढोल के अन्दर असली वसा नहीं पाया तो उसने कहा कि इस खाली बस्ते से अच्छा तो सुअर का ही मांस है। अन्त में दार्शनिकता की ओर मुड़ते हुए रूमी कहते हैं कि लोमड़ियाँ ढोल की आवाज़ से डर जाया करती हैं जबकि बुद्धिमान् व्यक्ति उसी ढोल को इतना पीटते हैं कि पूछो मत।

 

  • शशकगजयूथपकथा (हिकायते ख़रगूशान् कि ख़रगूशी रा ब रिसालत पीशे पील फ़रिस्तादन्द कि बेगू कि मन रसूले माहे आसमानम पीशे तू कि अज़ ईन चश्मे ए आब हज़र कुन चुनान् कि दर किताबे कलीलः तमाम गुफ़्ते अस्त[67])

यह कथा पञ्चतन्त्र के तृतीय काकोलूकीयम् नामक तन्त्र में आती है। इसमें ख़रगोश अपने रहने के स्थान को हाथियों द्वारा भ्रष्ट किया जाता देखकर उसे बचाने के लिए एक अद्भुत चाल चलते हैं और हाथियों को मूर्ख बनाकर अपनी रक्षा करते हैं। जंगल में सूखे के चलते हाथियों का एक झुंड पानी की खोज में उसी तालाब के पास आ जाता है जिसके चारो ओर गीली भूमि पर ख़रगोशों का बसेरा था। हाथियों की आवाजाही से ख़रगोशों की बहुत क्षति होती है। इससे बचने के लिए परस्पर मन्त्रणा करके वे लम्बकर्ण नामक एक प्रबुद्ध ख़रगोश को भेजते हैं। लम्बकर्ण हाथियों के समूह के स्वामी चतुर्दन्त के पास जा कर कहता है कि मैं चन्द्रमा का सन्देशवाहक हूँ। वे ख़रगोशों की हुई क्षति के कारण तुम लोगों से बहुत क्रुद्ध हैं। वे स्वयं भी हमारी सान्त्वना के लिए आये हैं और मुझे तुम लोगों के पास अपना संदेश लेकर भी भेजा है। चतुर्दन्त कहता है कि वे कहाँ हैं और उनका सन्देश क्या है बताओ ताकि वैसा ही किया जा सके। लम्बकर्ण ने जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा को दिखाते हुए कहा– ये देखो हमारे देवता जल के बीच समाधिस्थ होकर बैठे हैं। उन्हें धीरे से प्रणाम करके निकल जाओ और फिर कभी भी न आना अन्यथा वे समाधि टूट जाने के कारण और भी अधिक क्रोधित होंगे। चतुर्दन्त हाथी प्रतिबिम्ब को डरते डरते धीरे से प्रणाम करके दल के सभी सदस्यों को लेकर कभी नहीं आने के लिए निकल जाता है। कथा का तात्पर्य यह है कि अगर व्यक्ति के पास शारीरिक बल न भी हो तो उसे ऐसे अभिनय करना चाहिए कि वह अनर्थों से बच सके –

निर्विषेणापि सर्पेण कर्तव्या महती फटा।

विषं भवतु मा वास्तु फटाटोपो भयंकरः[68]

(विषरहित सर्प को भी अपना चौड़ा फन तो फैलाना ही चाहिए। ज़हर हो न हो फन का दिखावा तो भय पैदा कर ही देता है।)

इसके अतिरिक्त इस कथा की एक सीख और है कि बड़े लोगों के नाम के प्रभाव से कई बार बड़े बड़े कार्यों में सफलता मिल जाती है[69]

रूमी इस कथा में आये सन्देश वहन के तात्पर्य को अब्राहमिक धर्मों के परिप्रेक्ष्य में लेकर इसका उपयोग करते हैं। ध्यातव्य है कि अब्राहमिक धर्मों में यह विश्वास है कि ईश्वर पृथ्वी पर अपने सन्देशवाहक (पैग़म्बर) को भेजता है। मस्नवी में यह कहानी एक मुख्य कथा के अंग के रूप में आयी है। मस्नवी के तीसरे खण्ड में कथा है कि सबा नामक राज्य में ईश्वर पन्द्रह पैग़म्बरों को भेजता है। वहाँ के लोग उनके पैग़म्बर होने पर शक करते हैं। उनके रिसालत का निषेध करते हुए वे कहते हैं कि हम तुम्हारी बातों में नहीं आयेंगे। हम वे हाथी नहीं हैं जो ख़रगोशों की बातों में आकर उन्हें पैग़म्बर मान बैठें।

मूल कथा की अपेक्षा मस्नवी में केवल इतना अन्तर है कि इसके अनुसार एक बूढ़े ख़रगोश ने पहाड़ की चोटी पर चढ़ कर हाथियों को कहा कि मैं चन्द्रमा का रसूल हूँ। तुम लोगों पर क्रुद्ध होकर उन्होंने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। तुम चौदहवीं की रात को आओ और ख़ुद देखो। चौदहवीं की रात जब हाथी वहाँ पहुँचता है और उसके लंबे सूँढ से पानी उद्वेलित होता है तो चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब काँपने लगता है। इससे चन्द्रमा को क्रोधित जानकर हाथी डरकर भाग जाते हैं। यह कथा मसनवी ए मानवी के तीसरे खण्ड के २७३८ से २७५३ पद्यों तक वर्णित है।          

  • सिंहलम्बकर्णयोः कथा (हिकायत दर बयाने आन् कि कसी तोबे कुनद व पशीमान शवद, व बाज़ आन् पशीमानी हा रा फ़रामूश कुनद व आज़मूदे रा बाज़ आज़मायद, दर ख़सारते अबद उफ़्तद[70])

 

सिंह तथा लम्बकर्ण गधे की कहानी  कलीलः व दिम्नः में मूल पञ्चतन्त्र की अपेक्षा अनेक मार्मिक परिवर्तनों के साथ आयी है । पञ्चतन्त्र में यह कथा अपनी ग़लती से सीख न लेने वालों की दुर्दशा को समझाने के लिए आयी है–

आगतश्च गतश्चैव गत्वा यः पुनर् आगतः।
अकर्णहृदयो मूर्खस्तत्रैव निधनं गतः॥[71]

मौलाना ने इस कथा को विस्तृत करके इसके माध्यम से इस्लाम के तौबा (प्रायश्चित्त) सिद्धान्त को समझाया है । उनके अनुसार परमेश्वर हृदय से प्रार्थित सभी प्रायश्चित्तों को स्वीकृत कर लेता है परन्तु वे जो तौबा करने के बाद वही अपराध फिर करते हैं उनके प्रायश्चित्त स्वीकृत नहीं होते। इस विस्तृत कथा में मौलाना ने भूख या व्रत की भी प्रशंसा की है जो अध्यात्म मार्ग के पथिकों के लिये साधना का एक अङ्ग है।

मस्नवी के पाँचवें खण्ड में वर्णित इस कथा का सार तथा उसमें किये गये प्रमुख परिवर्तन निम्नवत् हैं–

एक धोबी के पास एक दुबला गधा था जिसका पेट खाली और पीठ तार तार हो गया था। सुबह से शाम तक वह ढेलों और पत्थरों के बीच लावारिस पड़ा रहता था। खाने पीने के लिए वहाँ पानी के अलावा कुछ भी नहीं था। उसी के निकट जंगल में एक शेर रहा करता था। शेर का एक हाथी से युद्ध हुआ और वह घायल होकर एक किनारे पड़ गया। छोटे जानवर जो शेर के खाने से बचा हुआ खाते थे वे शेर के शिकार न कर सकने के कारण परेशान हो गये। शेर ने एक सियार को आज्ञा दी कि वह किसी गधे या किसी भी जानवर को फँसा कर ले आये। अगर गधे के गोश्त से मुझे कुछ ताक़त मिल पायेगी तो मैं उसके बाद दूसरे शिकारों को पकड़ूँगा।

यहाँ ध्यातव्य है कि रूमी ने मूल कथा में एक छोटी सी चीज़ यहाँ औरजोड़ी है। पञ्चतन्त्र में शेर के शिकार न करने से शेर भूख के मारे बेहाल हो गया था, जबकि यहाँ शेर का बचा खाने वाले दूसरे मांसभोजी जानवर भूख से परेशान हो गये थे जिनके लिए शेर ने शिकार को ले आने की बात कही। इस महत्त्वपूर्ण परिवर्धन से रूमी एक आध्यात्मिक व्याख्या का लाभ लेना चाहते हैं। सूफ़ी तरीक़त के अनुसार इसका रहस्य समझाते हुए वे कहते हैं कि पूर्ण गुरु एक शेर की तरह है और उसका काम है शिकार करना। बाक़ी लोग उसके लाये शिकार पर निर्भर रहते हैं। जब वह अशक्त हो जाता है तो सब लोग भूख से व्याकुल हो जाते हैं क्योंकि सारी रोज़ी उसी के हाथ में है। जब तक तुम्हारी शक्ति हो तुम गुरु की चाकरी करते रहो।  जब वह सशक्त होगा तो शिकार लेकर आयेगा। गुरु बुद्धि की तरह है और बाक़ी लोग शरीर के अंगों की तरह हैं। शरीर के अंगों की व्यवस्था बुद्धि पर निर्भर होती है। गुरु शरीर से दुर्बल हो सकता है आत्मा से नहीं। गुरु अपनी धुरी पर परिक्रमा करता है जबकि बाक़ी ब्रह्माण्ड उस पूर्ण गुरु की परिक्रमा करता  है। अगर तुम वस्तुतः उसके शिष्य हो तो उसके शरीर की सुरक्षा में उसकी मदद करो। उसकी सहायता वस्तुतः तुम्हारी अपनी ही सहायता है। क़ुरान में अल्लाह ने कहा है– तुम अगर सहायता करोगे तो तुम्हारी सहायता की जायेगी। लोमड़ी की तरह उसके लिए ज़िन्दा शिकार पकड़ो, क्योंकि मरे हुए शिकार तुच्छ लोग ले आते हैं।   (मस्नवी ५.२३३९–२३५०)।

सियार ने शेर की आज्ञा मान ली तथा गधे के पास जाकर उसकी वर्तमान परिस्थिति पर तरस खाने लगा। इस पर गधे ने जो कहा वह ईश्वर पर विश्वास करके सब्र रखने वाले नेक बन्दे की उक्तियों जैसा है। गधे ने कहा– ईश्वर मुझे यदि कष्ट में रखे या स्वर्ग में, मैं उसका कृतज्ञ हूँ। चूँकि वही सब कुछ देने वाला है इसलिए उसकी शिकायत करना कुफ़्र है। ईश्वर ही एकमात्र मित्र है बाक़ी सब शत्रु हैं। शत्रुओं से मित्र की शिकायत करना क्या अच्छी बात है? अगर वह मुझे मट्ठा देता है तो मैं शहद की इच्छा नहीं करूंगा। क्योंकि प्रत्येक लाभ में हानि भी छिपी होती है। (मस्नवी ५.२३५६–२३६०)। ध्यातव्य है कि पञ्चतन्त्र में जब सियार गधे के पास जाता है तो गधा केवल आशंका जताता है कि वह वन्य पशुओं का वध्य है इसलिए उसे वन में जाने से डर लगता है। इसके विपरीत मस्नवी में रूमी ने उसे एक सन्तोषी जीव के रूप में दर्शाया है ताकि सब्र के महत्त्व को बताया जा सके।

गधा सब्र के महत्त्व को समझाते हुए एक कहानी कहता है जो मूल पञ्चतन्त्र में नहीं है। कहानी यह है कि एक भिश्ती के पास एक बहुत ही दुबला–पतला, त्रस्त गधा था। एक दिन एक भला आदमी कुछ दिनों के लिए स्वास्थ्य लाभ हेतु उसे राजा के अस्तबल में ले जाता है। वहाँ हृष्ट–पुष्ट तथा स्वस्थ घोड़ों को देखकर गधा ईश्वर से शिकायत करने लगता है कि उसने उसे इन घोड़ों की तरह अच्छी परिस्थिति में क्यों नहीं रखा। तभी पता चलता है कि युद्ध की घोषणा हो गयी है और सभी घोड़ों को युद्ध में भाग लेना है। युद्ध के नाते घोड़ों के घाव और अन्य दुर्गति को देखकर गधा ईश्वर को उसके द्वारा प्रदत्त स्थिति पर धन्यवाद करने लगता है। (मस्नवी ५.२३६१–२३८७)

सियार गधे से असहमति जताता हुआ कहता है कि धर्मपूर्वक जीविका (हलाल रोज़ी) की खोज करना ईश्वर का आदेश है ताकि तुम्हारे हिस्से को दूसरे लोग हड़प न लें। पैग़म्बर मुहम्मद ने भी कहा है कि जीविका के दरवाज़े पर ताला लगा हुआ है और उस ताले को हमें अपने प्रयत्नों से खोलना है। गधा जवाब देता है कि यह सब विचार ईश्वर पर विश्वास की कमी के नाते पैदा होते हैं, वरना जिसने हमें पैदा किया है वही हमें रोटी भी देगा। जो लोग सम्राट् हैं वे भी खाते समय दो रोटियों से ज़्यादा नहीं खाते हैं। पशु–पक्षी कभी भी अपनी जीविका की चिन्ता नहीं करते लेकिन उन्हें भी जीविका उपलब्ध होती है। सन्तोषियों के पास जीविका स्वयं आ जाती है। बेसब्री के कारण मनुष्य को प्रयत्नों का कष्ट झेलना पड़ता है। सियार जवाब देता है कि इस प्रकार का सन्तोष संसार में अत्यन्त दुर्लभ है। दुर्लभ वस्तुओं की आशा करना मूर्खता है। पैग़म्बर मुहम्मद ने यद्यपि सन्तोष को ख़ज़ाना कहा है लेकिन वह ख़ज़ाना सबको कहाँ उपलब्ध हो पाता है। अपनी सीमाएँ समझ कर बहुत ऊँचे उड़ान मत भरो नहीं तो तुम गन्दी खाइओं में गिर पड़ोगे। गधे ने कहा तुम उल्टी बातें कर रहे हो। पतन की गन्दी खाइयाँ लोभ से पैदा होती हैं। सन्तोष के नाते आज तक किसी के प्राण नहीं गये और लोभ से आज तक कोई सम्राट् नहीं बना। सन्तोष का आश्रय लेते हुए जीविका की निश्चितता भी हो जाती है, इसे सिद्ध करने के लिए गधा एक और कहानी सुनाता है। वह यह है कि किसी व्यक्ति ने पैग़म्बर मुहम्मद से सुना कि तुम्हारे भाग्य में जो जीविका है वह तुम्हें किसी भी अवस्था में अवश्य मिलेगी। इसका परीक्षण करने के लिए वह बयाबान में जाकर सो गया जहाँ भोजन की दूर दूर तक कोई गुंजाइश नहीं थी। कुछ समय बाद वहाँ से एक कारवान् गुज़रा। उन्होंने उसे विपत्तिग्रस्त देखकर उसे खिलाया पिलाया।

आगे सियार और गधे के बीच सन्तोष तथा प्रयत्न के बारे में शास्त्रार्थ उसी तरह आगे बढ़ने लगता है जैसे शेर और ख़रगोश की कहानी में हमने पहले देखा है। अन्ततः सियार गधे को प्रभावित कर ही लेता है। जब गधा शेर के पास जाता है तो शेर उस पर हमला करता है। शेर के हमले से किसी तरह बच कर गधा तोबा करता है कि वह पुनः ऐसे फ़रेबों में नहीं फँसेगा। लेकिन दूसरी बार भी वह सियार के जाल में फँस जाता है। पञ्चतन्त्र में सियार गधे को जवान गर्दभियों का लोभ दिखाकर ले जाता है, ऐसा बताया गया है। दूसरी बार जब सियार गधे को फँसाने के लिए आता है तो कहता है कि वह शेर नहीं था वह तो कामासक्त गर्दभी थी जो कामोत्तेजना के आवेश में तुम्हारी ओर बढ़ी। लेकिन तुम भाग चले। रूमी ने इस अंश को बदल दिया है। उनके अनुसार सियार ने कहा कि वह तो जादू था शेर नहीं था। मैं तो ख़ुद तुम्हें इसके बारे में बताने वाला था लेकिन मुझे स्मरण ही नहीं रहा। गधे ने सियार को बहुत हटाने और लानत मलामत की कोशिश की लेकिन गधे का सब्र निर्बल था इसलिए लालच ने उस पर क़ब्ज़ा कर लिया। रूमी कहते हैं–

हिर्स कूरो अहमक़ो नादान कुनद। मर्ग रा बर अहमक़ान् आसान् कुनद[72]

(लालच अन्धा, मूर्ख और अज्ञानी बना देता है, और मौत को मूर्खों के लिए आसान बना देता है।)

जो भी अपने लालच के कारण तोबा और प्रण तोड़ता है वह कष्ट पाता है–

तक़्ज़े मीसाक़ो शिकस्ते तोबे हा। मूजिबे लानत शवद दर इन्तिहा॥

(वायदा अथवा तोबा तोड़ना अन्ततः अपमान का कारण बनता है।)

 

पञ्चतन्त्र में यह बताया गया कि गधा पुनः कष्ट में इसलिए फँसा क्योंकि उसने पिछली घटना से सीख नहीं ली। रूमी यह भी बताते हैं कि वह पिछली घटना से सीख क्यों नहीं ले पाया? क्योंकि उसमें लालच की मात्रा अधिक थी। रूमी वास्तविकता के कई परत भीतर तक जाकर सत्य के व्याख्यान का कौशल रखते हैं।

इस प्रकार हमने देखा कि मौलाना जलालुद्दीन रूमी ने पञ्चतन्त्र की कहानियों को नैतिक पायदान से उठाकर धर्मशास्त्रीय तथा आध्यात्मिक धरातल पर रख दिया है। मौलाना एक ऐसे कीमियागर हैं जिनकी प्रतिभा के संस्पर्श से सारी कथाएँ, उनके सब प्रसंग, उनके सारे पात्र तथा उनके सभी संवाद अध्यात्मीकृत हो गये हैं। इस प्रक्रिया से पञ्चतन्त्र की कथाओं के मूल्य में अपार वृद्धि हुई है। अगर हम इस बात को न भी माने तो भी इतना मानने में तो किसी को विप्रतिपत्ति नहीं होगी कि मसनवी में पञ्चतन्त्र की कथाओं का नवीन एवं अद्भुत अवतार प्रकट होकर सामने आया है।

 

 

चयनितसन्दर्भ

फ़ारसी

(फ़ारसी पुस्तकों के सन्दर्भ में क्रमशः पहले लेखक या संपादक का नाम, प्रकाशनवर्ष , फिर तिरछे अक्षरों में पुस्तक का नाम , कोष्ठक में पुस्तक की विषयवस्तु हिन्दी में , प्रकाशक का नाम , प्रकाशनस्थान दिये  गये हैं ।)

१– अब्बासी, मुस्तफ़ा ख़ालिक़दाद हाशिम–पञ्चाख्यान या पञ्चतन्त्र ( पञ्चतन्त्र का फ़ारसी अनुवाद) ताराचन्द,

सैयद अमीर हसन आबिदी;  जलाली नाईनी (सम्पादक)  इक़बाल ,तेहरान –१९८४.

२–  इन्दुशेखर (१३४१ हिजरी) , पञ्चतन्त्र ( पञ्चतन्त्र का फ़ारसी अनुवाद ) , इन्तिशाराते दानिशगाहे तेहरान ,

तेहरान.

 ३– ज़मानी, करीम (१३९०हिजरी) शरहे जामे ए मसनवी (मसनवी की बृहद् व्याख्या)–इन्तिशाराते

इत्तेलाआत,  तेहरान.

४– जमालज़ादे, मुहम्मद अली(१३३५ हिजरी)  बांगे नाय (मसनवी की कहानियां ) – इन्तिशाराते अंजुमने

किताब, तेहरान.

५– ज़र्रीन–कूब,अब्दुल हुसैन (तीसवाँ संस्करण –१३८९ हिजरी) पिल्ले पिल्ले ता मुलाक़ाते ख़ुदा ( मौलाना की

    जीवनी) –इन्तिशाराते इल्मी , तेहरान.

६– निकोल्सन , आर॰ ए॰ (१३५० हिजरी)(अनु॰ एवं टिप्पणी) आवेनेस आवेनेसियन ,मुक़द्दमे ये रूमी व तफ्सीरे

     मसनवी ए मानवी , साज़माने इन्तिशारात ओ चाप – दानिशगाहे तेहरान.

७–नीशापूरी,फ़रीदुद्दीन अत्तार (सं॰) मुहम्मद इस्तेलामी(२१ वाँ संस्करण १३९०हिजरी)–तज़्किरातुल औलिया

    (सूफ़ी सन्तों की जीवनी) इन्तिशाराते जव्वार, तेहरान.

८–नीशापूरी, फ़रीदुद्दीन अत्तार (सं॰) फ़रूज़ान् फ़र, बदीउज्ज़मान (१३९० हिजरी) दीवाने अत्तार (सूफ़ी काव्य)

मुवस्ससेये इन्तिशाराते निगाह , तेहरान.

९– फ़रुज़ान फ़र , बदीउज्ज़मान (१३१५ हिजरी) –शरहे हाले मौलवी (मौलाना की जीवनी) , किताबफरूशे

जवार ,मशहद.

१०– फ़रुज़ान फ़र , बदीउज्ज़मान(१३७६ हिजरी) (सं॰)दाउदी , हुसैन – अहादीसो क़िससे मसनवी(मसनवी में

     आयी कहानियों के स्रोतों का संकलन) ,मुवस्सिसे इन्तिशाराते अमीर कबीर , तेहरान.

११– फ़रुज़ान फ़र, बदीउज्ज़मान (१३७९ हिजरी) – शरहे मसनवी शरीफ़ (रूमी की मसनवी की व्याख्या) ,

इन्तिशाराते रूज–तेहरान.

१२– मौलाना , जलालुद्दीन मुहम्मद इब्ने मुहम्मद (व्या॰) नसीरी, जाफर (१३८० हिजरी) ; शरहे मसनवी ए

     मानवी (दफ्तरे यकुम), इन्तिशाराते तर्फन्द , –  तेहरान.

१३– मौलाना, जलालुद्दीन मुहम्मद इब्ने मुहम्मद (सं॰) निकोल्सन ,आर॰ ए॰(१३८६ हिजरी);मसनवी ए

      मानवी–पादानुक्रमसहित, मास्को संस्करण, इन्तिशाराते हिरमिस, (चतुर्थ संस्करण) ।

१४– मौलाना, जलालुद्दीन मुहम्मद इब्ने मुहम्मद (सं॰) कदकनी, मुहम्मद रजा शफीई (१३८८ हिजरी)– दीवाने

      शम्स तबरीज  (मौलाना के दीवान का संक्षिप्त तथा सटिप्पण संस्करण) ,  इन्तशाराते सुखन– तेहरान.

१५– मौलाना, जलालुद्दीन मुहम्मद इब्ने मुहम्मद (सं॰) निकोल्सन ,आर॰ ए॰(१३८९ हिजरी)– मसनवी ए

     मानवी, हुनरसराये गूया– तेहरान.

१६– मुंशी, नसरुल्लाह (सं॰) अब्दुल अजीम करीब –किताबे कलीलेः व दिम्नेः – महल्ले फरूशे तेहरान,

किताबखाने हा ए मोतबर ।

१७– शमीसा, सीरूश (१३८१ हिजरी) शाहिदबाज़ी दर अदबियाते फ़ारसी– इन्तशाराते फ़िरदौस, तहरान–ईरान

English-

Arberry, A.J. – Tales from Masnavi , George Allen and Unwin LTD, Ruskin House

Museum Street , London – 1961

(Editors) Banani ,Amin ;Hovannisian,Rechard ; Sabagh, Georges – Poetry and Mysticism in Islam : The Heritage of Rumi , Cambridge University Press – 1994

(Trans. & Comm.) Nicholson, R.A. (re.2014) The Mathnavi of Jalalu’ddin Rumi. Adam Publishers and Distributors, 1542, Pataudi House Darya Ganj, New Delhi-110002

Dasgupta, S.N. (1947) A History of Sanskrit Literature (Classical Period). University of Calutta.

(Editor) Quasemi (1997), Sharif Husein ; Maulavi Flute, New age International (P) Limited. Publishers, New Delhi.

Varadachari, V. A (1960) History of the Sanskrit Literature. Ram Narayan Beni Prasad Publisher and Booksellar, Allahabad.

Abstracts of International Conference on THE PAÑCATANTRA ACCROSS CULTURES AND DISCIPLINES, Held in Leipzig, 27-29 sep 2012.

Panchatantra and Masnavi e Ma’navi (پنچ تنترا و مثنوی معنوی) – Dr. Balram Shukla appeared in  ‘Mehr o Nahid- The Iranian Historical  Researches Quarterly (2012)

उर्दू

मौलवी, जलालुद्दीन मुहम्मद इब्ने मुहम्मद (अनु॰) हुसैन, क़ाज़ी सज्जाद(१९७४) ;मसनवी ए मानवी (अनुवाद तथा टिप्पणी) ,सबरंग किताबघर, दिल्ली.

अन्तर्जालीय सामग्री–

http://www.masnavi.net/2/25/eng/

(दिनांक ०५–०६–२०१७ तक देखी गयी)

[1] The Pañcatantra stories among Jains : versions, peculiarities and usages – Nalini BALBIR (Abstract of the paper)

[2] आधुनिक फ़ारसी में इसका उच्चारण – कलीले व दिम्ने , अरबी तथा उर्दू में कलीला व दिम्ना किया जाता है।

[3]….the Hebrew version 1100 A.D., the Latin about 1270 A.D., the German 1480 A.D., the Italian 1552A.D., the French 1678 A.D. The Greek in 1080 A.D. the Persian in 12th century A.D. (Vardachari 1960 : 124)

[4] विशेष चर्चा “पञ्चतन्त्र की विश्वयात्रा के मुख्य पड़ाव” नामक प्रकाश्यमान शोधपत्र में।

[5] “…पुनरेतांस्तव पुत्रान् मासषट्केन यदि नीतिशास्त्रज्ञान् न करोमि ततः स्वनामत्यागं करोमि।” पञ्चतन्त्र कथामुख पृ॰ ४

[6] हितोपदेश प्रस्तावना श्लोक सं॰ ८

[7] = दार्शनिकों का सम्राट्।

[8] मौलाना के पुत्र सुलतान वलद द्वारा लिखित वलदनामा के अनुसार।

[9] देखें फ़रहंगे फ़ारसी दरी (ज़हरा ख़ानलरी) नामक कोष के अन्तर्गत इसी शब्द की प्रविष्टि में।

[10]  फ़ारसी छन्दःशास्त्र में इसका नाम है–रमल मुसद्दस महज़ूफ़ । मस्नवी विधा के लिए अत्यन्त उपयुक्त होने के कारण अथवा मस्नवी ए मानवी में प्रयुक्त होने के कारण इसे  बह्रे मस्नवी भी कहते हैं। इस छन्द को भारतीय छन्दःशास्त्रियों ने पीयूषवर्ष नाम दिया है। ज्ञातव्य है कि फ़ारसी में छन्दों के नाम रखते समय भारतीय छन्दःशास्त्र की तरह सौन्दर्य दृष्टि का उपयोग न करके छन्द की संरचना को दृष्टि में रखा जाता है। उदाहरण के लिए इसी छन्द के नामकरण को लें। यहाँ दोनों पङ्क्तियों में गण के ६ बार आवृत्त होने के कारण इसे मुसद्दस कहा गया है, क्योंकि मुसद्दस शब्द का अर्थ होता है ६ की संख्या से युक्त। । फ़ाइलुन् में मूल गण  फ़ाइलातुन् का एक गुरु लुप्त (हज़्फ़) है इसलिये इसके नाम में महज़ूफ़ शब्द को भी डाल दिया गया है।

इसी छन्द के अन्त में यदि एक व्यञ्जन अधिक हो तो इसे रमल मुसद्दस मक़्सूर का नाम दे देते हैं–

तू न ईन् बाशी न आन् दर ज़ाते ख़ीश्

ऐ फ़ज़ून् अज़् वह्महा व,ज़् बीश् बीश्

(विशेष विवरण- फ़ारसी छन्दःशास्त्र तथा भारतीय साहित्य में उसका अनुप्रयोग नामक प्रकाशनाधीन पुस्तक में।)

[11] यह कथन मौलाना जामी का माना जाता है– मसनवी ए मानवी ए मौलवी। हस्त क़ुर्आन् दर ज़बाने पह्लवी॥

(मौलवी जलालुद्दीन रूमी की मसनवी ए मानवी फ़ारसी भाषा में क़ुर्आन है।)

[12] इस पंक्ति को भी मौलाना जामी के साथ सम्बद्ध किया जाता है। फ़ारसी के आधुनिक काल के कवि मुहम्मद हुसैन शह्रयार ने इसी भाव को दूसरे शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया है–

हम बे आन् क़ुर्आन कि ऊ रा पारे सीस्त।  मस्नवी क़ुर्आने शेरे पारसी–स्त॥

[13] मौलाना ने इसे हुसामीनामा भी कहा है, देखिए– मसनवी ए मानवी–6.1

   गश्त अज़ जज़्बे तू चू अल्लामे ई–दर जहान् गर्दान् हुसामीनामे ई॥

[14] A.J. Arberry – Tales from the Masnavi – Introduction.- page no.-II

[15] कथाओं के स्रोत के लिये देखें– फ़रुज़ान फ़र, बदीउज्ज़मान – अहादीसो क़िससे मसनवी तथा A J Arberry – Tales from Masnavi.

[16] फ़रुज़ान फ़र , बदीउज्ज़मान(१३७६ हिजरी) (सं॰)दाउदी , हुसैन, अहादीसो क़िससे मसनवी, मुवस्सिसे इन्तिशाराते अमीर कबीर , तेहरान.

[17] मसनवी ४–२२०३। जलालुद्दीन रूमी में इस प्रकार की अभिव्यक्तियाँ और भी मिलती हैं। क़ुर्आन के बारे में भी उन्होंने कहा है–

मन ज़ क़ुर्आन बर गुज़ीदन मग़्ज़ रा। उस्तुख़ान् रा पीशे सग अन्दाख़्तम्॥ (मैंने क़ुरान से उसका गूदा निकाल लिया और हड्डियों को कुत्तों के सामने

फ़ेंक दिया।)

[18] मसनवी–१.१२४

[19] मसनवी–४.५१

[20]समास विग्रह – आत्मनि (विषयसप्तमी)

[21] मसनवी ५.१४०

[22] सैक़ली कुन सैक़ली कुन सैक़ली (रगड़ो, रगड़ो और रगड़ो) –मसनवी ४.९३

[23] शाद बाश ऐ इश्क़े खुश सौदा ए मा – ऐ तबीबे जुम्ले इल्लतहा ए मा

ऐ दवा ए नख़वतो नामूसे मा – ऐ तू अफ़लातूनो जालीनूसे मा ॥ (मसनवी १.२३–२४)

[24] मसनवी ४.१०६

[25] मसनवी १.८८

[26] चून् बे बीरंगी रसी का,न् दाश्ती। मूसी ओ फ़िरऔन दारन्द आशती॥

[27] मसनवी १.२

[28] मसनवी ३.४३

[29] मसनवी २.१०७

[30] मसनवी १.४१

[31] मसनवी २.१०७.३६२४

[32] जानवरों का शेर से  ईश्वर पर विश्वास करने के आगे प्रयत्न के त्याग करने का वर्णन।

[33] याज्ञवल्क्य॰ १.३५१

[34] इसलिए कर्म फल की निष्पत्ति में काल का भी बहुत महत्त्व है। कुछ विचारकों ने भाग्य तथा कर्म के अतिरिक्त काल को भी फल प्रदायक कारकों में परिगणित किया है। उदाहरण के लिए– केचिद्दैवात् स्वभावाद् वा कालात् पुरुषकारतः। संयोगे केचिदिच्छन्ति फलं कुशलबुद्धयः॥ (याज्ञवल्क्य॰१.३५१), कर्म किंचित् क्वचित् काले विपाके नियतं महत्। किंचित्त्वकालनियतं प्रत्ययैः प्रतिबोध्यते॥ (चरक॰३.४१)। भर्तृहरि ने वाक्यपदीयम् में काल को शब्द ब्रह्म की सबसे प्रमुख शक्ति मानते हुए इसे सभी कार्यों में तथा भावों में पौर्वापर्य का कारण माना है–अध्याहितकलां यस्य कालशक्तिमुपाश्रिताः।  जन्मादयो विकाराः षड् भावभेदस्य योनयः॥ (वाक्य॰ १.३)

[35] क़ुर्आन १.१०६

[36] ईश्वर की आज्ञाएँ, मस्नवी १.९५४, पृ॰४६

[37]  मस्नवी १.९७०, पृ॰४७

[38] कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः (श्वेताश्वतरोपनिषद्–६.११)

[39] तुलना करें– ब्रह्मा येन कुलालवन्नियमितो ब्रह्माण्डभाण्डोदरे विष्णुर्येन दशावतारगहने क्षिप्तो महासङ्कटे।

रुद्रो येन कपालपाणिपुटके भिक्षाटनं कारितः सूर्यो भ्राम्यति नित्यमेव गगने तस्मै नमः कर्मणे ॥ (नीतिशतकम्)

[40] क़ुर्आन–५३.३९

[41] मस्नवी–१.८०९–८११, पृ॰४४.

[42] मस्नवी–१.८१२–८१४, पृ॰ ४४

[43] ऐसा कहते हैं कि किसी अरब व्यक्ति ने अपने ऊँट को बाँधा नहीं, वैसे ही छोड़ दिया, और इसे उसने तवक्कुल (ईश्वरेच्छा पर निर्भर रहना) मान     लिया। पूछने पर पैग़म्बर ने कहा था–‘ऐक़ल–हा व तवक्कल’, अर्थात् उसे बाँध दो और तवक्कुल करो।

[44] मस्नवी–१.८१५–८२८, पृ॰ ४४–४५

[45] मस्नवी– १.९२९–९४६, पृ॰ ४७

[46] यह कथा रूमी के पूर्ववर्ती सूफ़ी कवि सन्त फ़रीदुद्दीन अत्तार ने अपनी किताब इलाहीनामे के छठे भाग में प्रयुक्त किया है।

[47] मस्नवी १.१६२, पृ॰ ४६.

[48] बा क़ज़ा पंजे ज़दन नबुवद जिहाद। चून् कि ईन् रा हम क़ज़ा बर मा निहाद॥ (मस्नवी १.९७६)

[49] जब कोई रहस्य ६ कानों अर्थात् ३ लोगों के पास चला जाता है तो वह रहस्य नहीं रहता।

[50] दीवाने शम्स पृ॰ ६१८

[51] मस्नवी १.१२३२, पृ॰ ५८

[52] मस्नवी १.१२९८.९९

[53] १. विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः। (१८.५२), २. विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि। (१३.११)।

[54] मस्नवी १.१३०८–१३१०, पृ॰६१–६२

[55] मस्नवी १.१३४९–१३५२, पृ॰६२

[56] मस्नवी १.१३६५–६८, पृ॰६४

[57] मस्नवी १.१३७३–१३७६, १३८९, पृ॰ ६४–६५

[58] उस तालाब, मछुआरे और उन तीन मछलियों की कहानी।

[59] अहो न भवद्भ्यां मन्त्रितं सम्यगेतदिति यतः किं वाङ्मात्रेणापि तेषां पितृपैतामहिकमेतत्सरस्त्यक्तुं युज्यते । यद्यायुःक्षयोऽस्ति तदन्यत्र गतानामपि

मृत्युर्भविष्यत्येव । उक्तञ्च – अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति । जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे न जीवति॥

पञ्चतन्त्र १.१४।

[60] वही।

[61] मैत्रेयी उपनिषद् में भी स्वदेश को छोड़ने की  बात आयी है–

विद्वान् स्वदेशमुत्सृज्य संन्यासानन्तरं स्वतः। कारागारविनिर्मुक्तचोरवद्दूरतो वसेत्॥ (२.११)

[62] मस्नवी १.२२८४–८६, पृ॰ ६५०

[63] बच्चे का उस हट्टे कट्टे आदमी से डरना और उस आदमी का कहना कि ऐ बच्चे, डरो मत क्योंकि मैं नपुंसक हूँ।

[64] यहाँ समलैंगिकता से सर्वत्र तात्पर्य पुरुष समलैंगिकता से है।

[65] इन्तशाराते फ़िरदौस, तहरान–ईरान, १३८१ हिजरी।

[66] मस्नवी २.३१६०, पृ॰ ३०९

[67] उन ख़रगोशों की कहानी जिन्होंने एक ख़रगोश को सन्देशवाहक बनाकर हाथी के पास भेजा कि यह कहो कि मैं आकाश के चन्द्रमा का दूत बन कर तुम्हारे पास आया हूँ। तुम सब इस जलस्रोत से दूर हट जाओ, जैसा कि कलीलः (=पंचतंत्र) नामक पुस्तक में पूरी तरह से वर्णित है।

[68] पञ्चतन्त्र ३.८६

[69] व्यपदेशेन महतां सिद्धिः सञ्जायते परा।
शशिनो व्यपदेशेन वसन्ति शशकाः सुखम्॥पञ्चतन्त्र ३.८१॥

[70] इस कथ्य को पुष्ट करने के लिए एक कहानी कि अगर कोई तौबा करे  और शर्मसार हो, लेकिन फिर उस शर्मसारी को भूल जाये और उसी बात की फिर आज़माइश करने लगे तो वह बहुत बड़े घाटे में फँस जाता है।

[71] पञ्चतन्त्र४.३३

[72] मस्नवी ५.२८२३

[i] अगर तू यार न दारी चेरा तलब नकुनी

अगर बे यार रसीदी चेरा तलब नकुनी   (दीवाने शम्स)

 

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